Search

पुस्तक परिचयः ‘वेद’ मैथिली अनुवाद

195 भ्यूज

वेद – पोथी परिचय

(The Vedas केर मैथिली अनुवाद ‘वेद’ – मूल लेखकः जगद्गुरु चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती, अनुवादकः प्रवीण नारायण चौधरी)

‘शशि प्रकाशन’ सँ प्रकाशित पुस्तक ‘वेद’ हिन्दू धर्म-दर्शनक मूल आधार वेदक समग्र स्वरूप – अंग, उपांग, विद्या, विज्ञान, स्पेस, टाइम, सृष्टि, आत्मा, परमात्मा सहित सम्पूर्ण मानव जीवन पर आधारित अनेकों रहस्योद्घाटनक संग प्रत्येक मानव लेल जनबा योग्य जीवनोपयोगी जानकारी सँ भरल पुस्तक थिक ।

मूल लेखकक संछिप्त परिचय

कांची कामकोटि पीठक शंकराचार्य जगद्गुरु चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती स्वामिगल (२० मई १८९४ – ८ जनवरी १९९४) काँची कामकोटिपीठम केर ६८म जगद्गुरु द्वारा अंग्रेजी भाषा मे ‘द वेदाज’ (The Vedas) लिखल गेल अछि । जगद्गुरु ‘परमाचार्य’ या ‘पेरियावल’ उपनाम सँ सुविख्यात छथि । मात्र १३ वर्षक आयु मे १९०७ ई. मे हिनका कांची कामकोटि पीठ केर शंकराचार्यक पद प्राप्त भेलन्हि । बहुमुखी प्रतिभाक धनी एक चमत्कारिक किशोर केँ शंकराचार्य पद प्राप्त करब स्वयं मे अद्भुत आ आश्चर्यजनक बात थिक ।

पारिवारिक पृष्ठभूमि आ आध्यात्मिक जीवनक आरम्भ

हिनक जन्म एक स्मार्त होयसल ब्राह्मण परिवार मे भेलन्हि । पिता एकटा जिला शिक्षा अधिकारी रहथिन । कुलदेवताक नाम सँ हिनक नामकरण ‘स्वामीनाथन’ कयल गेल छलन्हि । जन्म टिप्पणी लिखबाक क्रम मे टिप्पणी लिखनिहार ज्योतिषी हिनका दण्डवत् प्रणाम करैत कहने रहथिन – ई एहेन अद्भुत बालक छथि जिनकर चरण मे एक दिन सारा संसार रहतनि ।

प्रारम्भिक शिक्षा अर्काट अमेरिकन मिशन हाई स्कूल, तिंडिवनम् (तमिलनाडु) सँ भेलन्हि । पिता सुब्रमण्यम् शास्त्री जिला शिक्षा अधिकारी रहथिन आ पुत्र ‘स्वामीनाथन शास्त्री’ एकटा बहुमुखी प्रतिभा सँ भरल विद्यार्थी । कतेको विषय मे दक्ष रहथि ।

१९०५ मे माता-पिता उपनयन संस्कार कयलखिन्ह । १९०६ मे ई कांची कामकोटि पीठक ६६म शंकराचार्यक सान्निध्य मे चतुर्मास कयलनि । सत्संगक प्रभाव तथा जगद्गुरु शंकराचार्य सँ एतबा बेसी प्रभावित भेला जे एतहि सँ हिनकर जीवनक दिशा बदैल गेलन्हि ।

हिनकर अध्ययन ओ आध्यात्मिक अनुभूतिक आधार पर देल गेल उपदेश – वाचन – व्याख्यान सब सँ लोक अत्यधिक प्रभावित होइत छल । हिनकर कहल (वर्णन कयल) बात सब केँ समेटिकय कतेको रास पोथी सब लिखा गेल । लोकचर्चा मे हिनक विद्वता आ नामक प्रसार भेल । एक सँ एक महापुरुष सब हिनक कथोपदेश सब केँ सम्पादित कय केँ अनेकों पुस्तक तमिल संग विभिन्न भाषा सब मे प्रकाशित करबाक इतिहास अछि ।

‘द वेदाज’ केर अंग्रेजी प्रकाशनक इतिहास

परमाचार्यक ९५म जन्मतिथि पर १९८८ ई. मे एकर प्रथम प्रकाशन भेल । पुनः ९८म जन्मतिथि पर दोसर आ फेर १९९४ ई मे १००म जन्मतिथि पर तेसर प्रकाशन भेल ।

प्रकाशनक उद्देश्य अत्यन्त पुनीत छल । परमाचार्य द्वारा स्थापित एक सुदक्षिणा ट्रस्ट केर एक्जिक्युटिव ट्रस्टी आर वी राघवन द्वारा भारतीय विद्या भवन जे कि आध्यात्म व दर्शन सम्बन्धित भारतीय विद्याक अनेकों महत्वपूर्ण कथा-गाथा एवं उपयोग सामग्री सभक प्रकाशन कएने छल, तेकर समक्ष प्रस्ताव रखलनि जे गुरुजीक इच्छा ई छन्हि जे –

सनातन हिन्दू धर्मक प्राचीन ऋषि-मुनि आ महर्षि लोकनिक ज्ञान अत्यन्त गहींर आ गम्भीर छलन्हि, ओ सब जे किछु तथ्य-कथ्य-सत्यक वर्णन कएने छथि तेकर जैड़ थिक वेद । वेद केवल ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद ओ अथर्ववेद – चारि गोट वेदहि टा नहि, अपितु एहि सब वेदक विभिन्न भाग यथा संहिता, सुक्त, ब्राह्मण, आरण्यक आदि ‘विद्या’ केर मूल आधार थिक ।

एहि पोथीक विशिष्टता यैह अछि जे एहि मे १४ विद्याक वर्णन – चारि गोट वेदक संग छः वेदांग तथा चारि उपांग पर विशद् व्याख्या कयल गेल अछि । आन कोनो एक पुस्तक मे समस्त छः वेदांग – शिक्षा, व्याकरण, छंद, निरुक्त, ज्योतिष एवं कल्प केर एहेन व्याख्या नहि भेटैछ जे परमाचार्य द्वारा कयल गेल अछि ।

परमाचार्यक उपदेश अत्यन्त रोचक शैली मे – यानि आइ-काल्हिक अंग्रेजिया शिक्षा व्यवस्था मे ढलि चुकल लोक केँ बुझेबाक हिसाब सँ आधुनिक पैटर्नक अनुसार बुझेबाक भाषा प्रयोग कयल गेल अछि । वैज्ञानिक ढंग सँ आधुनिक शिक्षा पद्धति सँ पढ़ल-लिखल लोक केँ बुझेबाक उद्देश्य सँ आधुनिक पैटर्न मुताबिक वर्तमान मानव पीढ़ी केँ बुझबाक, मनन करबाक आ तदनुसार वैदिक निर्देशन केँ जीवन मे अनुकरण करबाक प्रेरणा प्राप्ति लेल लिखल गेल अछि ई पुस्तक ।

मैथिली मे अनुवादक प्रेरणा

धर्म व आध्यात्मक पुस्तक सब पढ़ब हमर रुचि मे रहल अछि । दक्षिण भारत केर विद्वान् लोकनिक पुस्तक अत्यल्प पढ़ने छी, लेकिन उत्तर भारतक विभिन्न लेखक व प्रकाशक संग अद्वैत दर्शन सँ जुड़ल रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द आदि पर केन्द्रित रोमाँ रोलाँ (फ्रान्सिस) केर लिखल पुस्तक सब पढ़ने छी, काफी प्रभावित भेल करैत छी । एहि क्रम मे गत वर्ष दुइ पुस्तक (१) द वेदाज आ (२) सी राजागोपालाचारी लिखित ‘महाभारत’ केर अध्ययन कयलहुँ । दुनू पुस्तक बहुत प्रभावित कयलक ।

महाभारत केर लेखनशैली सेहो अत्यन्त आधुनिक पद्धतिक अनुरूप राजा साहेब लिखने छथि, जे कि हमरा सन-सन कलियुगी विद्यार्थी सभक लेल सीधे माथा मे बैसयवला शैली बुझायल । लेकिन ‘द वेदाज’ हमरा अत्यन्त गूढ़ आ कठिन अंग्रेजीक कारण रुचि रहितो बोझिल बुझायल । तेँ अपन आदतानुसार कोनो बात केँ जँ अपन मातृभाषा मे बुझिकय माथा शान्त नहि करब त ओ पढ़लहबो बिनु पढ़लेहे जेकाँ बुझू ।

अतः अपन मैथिली मे बुझबाक वास्ते आ विशेष रूप सँ अपन बच्चा सब केँ सेहो बुझेबाक वास्ते एकर मैथिली अनुवाद करबाक सोच बनल । संयोगवश बेटी अम्बिका सँ एहि सन्दर्भ चर्चा कयलहुँ, ओकरो पढ़य मे खूब रुचि छैक, ओकरा सँ पढ़बेलहुँ त ओकरो नीक लगलैक । बस, एहि सम्बल जे लिखब त बच्चो सब बुझत आ परमाचार्यक पुनीत उद्देश्य मे ई मैथिली अनुवाद मिथिलावासी लोक लग तक पहुँचत त फेरो मिथिला मे चौदहो विद्याक विद्याधर सब जन्म लेताह – ई अनुवाद कार्य एहि तरहें पूर्ण भेल ।

हाल धरिक प्रतिक्रिया

डा. प्रवीण भरद्वाज जे स्वयं एक महान अनुवादक छथि, ‘नीक प्रयास’ कहि प्रशंसा कयलनि । लेखक रमेश पढ़लनि हँ त नहि एखन धरि, मुदा अनुवाद कार्य मे ‘वेद’ जेहेन सन्दर्भक सामग्री मैथिली साहित्य मे आयल, तेकर महत्व केँ गनलनि । मैथिली भाषा-साहित्यक स्रष्टा सब मे गानल गेनिहार किसलय कृष्ण, बालमुकुन्द, विकास वत्सनाभ सब सेहो अपन-अपन टिप्पणी लेखक रमेश जेकाँ देलनि अछि । प्रकाशक खबरि देलनि जे अमेजन मार्फत बी. के. कर्णा (हैदराबाद), ललित मिश्र (दिल्ली), प्रेम कुमार झा (कोलकाता) आदि मंगबौलनि अछि । आशा अछि जे ओ सब अपन-अपन रिव्यू जरूर देता (लिखता) ।

एकटा विशेष अनुभूति

माय केर एकादशी जाग मे दान करबाक वास्ते ३० प्रति पुस्तक श्री बिजेन्द्र कर्ण मंगबौलनि अछि । तहिना मायक श्राद्ध मे ब्राह्मण लोकनि केँ दान करबाक वास्ते १० प्रति किसलय कृष्ण मंगबौलनि अछि । साधारणतया ‘गीता’ टा दान मे देल जेबाक विकल्प छल । मुदा मैथिली मे ‘वेद’ गीताक स्थान पर सुन्दर प्रतिस्थापन भेल एहि सँ आत्मसन्तोष भेटि रहल अछि ।

मेहनत वैह सफल होइछ जे लोकहित करय । हम सचमुच अन्जान छी जे मेहनत कतेक सफल भेल – नहि भेल । किछु मित्र-बन्धु केँ पीडीएफ सेहो देलियनि पढ़बाक लेल । देखी कहिया धरि किछु रिव्यू पठबैत छथि । मुक्का मारिकय ढेकार करय लेल हम प्रवीण त एहि जीवन मे कहियो नहि कहब किनको – सभक रुचि आ समय अपन-अपन अछि । तखन याचना कएने छी – याचक केँ खाली हाथ नहि लौटायब एतबी निवेदन संग सब गोटे केँ हमर प्रणाम । आशीर्वाद बनेने रहय जाउ । हम अपन लेखन धर्म पथ पर अग्रसर सदैव रहब से ईश्वरक सत्कृपा बनल रहय ।

हरिः हरः!!

पुनश्चः आब किताब मंगाबय मे किनको कोनो झंझटि नहि अछि – एहि लिंक पर जाउ आ औनलाइन कीनू – Ved https://amzn.in/d/01chDp4r

Related Articles