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‘वेद’ आब मैथिली मे – पोथी परिचय

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जनकपुरधाम साहित्य, कला तथा अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली नाट्य महोत्सव २०८२ केर उद्घाटन सत्र मे मधेश प्रदेशक मुख्यमंत्री प्रमुख अतिथिक रूप मे प्रवीण नारायण चौधरी द्वारा अनुवादित पोथी ‘वेद’ केर विमोचन करैत – संग मे अन्यान्य मंत्री व गणमान्य व्यक्तित्व सब ।

मधेश प्रदेश मुख्यमंत्री कृष्ण प्रसाद यादव द्वारा ‘वेद’ केर विमोचन

‘वेद’ विमोचन बारे

जनकपुरधाम साहित्य, कला तथा अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली नाट्य महोत्सव २०८२ – मैथिली विकास कोष द्वारा आयोजित महान आयोजनक मंच सँ ‘वेद’ केर विमोचन कयल गेल । विमोचनकर्ता रहथि ‘मधेश प्रदेश’ (मिथिला) केर मुख्यमंत्री कृष्ण प्रसाद यादव, शिक्षा एवं संस्कृति मंत्री रानी शर्मा तिवारी, वरिष्ठ प्रदेश सांसद राम सरोज यादव, कृषि मंत्री श्याम पटेल, मधेश प्रज्ञा प्रतिष्ठानक प्रमुख राम भरोस कापड़ि भ्रमर एवं मैथिली विकास कोषक अध्यक्ष जिबनाथ चौधरी सहित मंचस्थ दुइ दर्जन सँ बेसी सुप्रतिष्ठित मैथिली साहित्यकार, विद्वान् भाषाविद्, संस्कृतिविद् एवं राजनीतिक क्षेत्रक लब्धप्रतिष्ठित व्यक्तित्व सभक उपस्थिति मे विमोचन सम्पन्न भेल ।

एहि पोथी मे वेद कि थिक ताहि बातक वृहत् चर्चा कयल गेल अछि । चर्चा आजुक पीढ़ीक मनोनुकूल तथा वर्तमान शिक्षा एवं शैक्षणिक विषय-सन्दर्भक हिसाब सँ कयल गेल अछि । सामान्यतया धर्मनिरपेक्षताक श्रेष्ठताक राज्य-प्रायोजित प्रचार-प्रसारक कारण सनातन हिन्दू धर्मक कथ्य-तथ्य प्रति लोक आस्था मे कमी आयल अछि । वेद व पुराण आदि केँ ब्राह्मणवादी विचारधारा कहिकय जनसामान्यक दृष्टि मे नीचाँ खसायल गेल । आर त आर, वेद अध्ययन-मनन लेल परिकल्पित ब्राह्मण जाति (समुदाय) मे पर्यन्त वेद प्रति उदासीनता हावी देखाइत अछि ।

सनातन हिन्दू धर्मक परिकल्पना मे बहुदेववाद (अनेकेश्वरवाद) संगहि विभिन्न तंत्र-मंत्र एवं साधना आदिक प्रति अनेकों नकारात्मक धारणाक प्रसार कालान्तर मे अन्य मानव-निर्मित पन्थवादी एवं अनिश्वरवादी सब द्वारा प्रसार कयल गेल । हिन्दू धर्मक मूल आधार थिक ‘वेद’ । वेदहि सँ सारा विद्याक आविर्भाव भेल अछि । मुदा वेदहि केँ रिक्त-कल्पना, कोरा-कल्पना, कपोल-कल्पना कहिकय सामान्य मनुष्य मे भ्रमक प्रसार भ’ जायत त स्वाभाविक छैक जे हिन्दू धर्म कमजोर पड़त, एकर अलौकिक शक्ति क्षीण भ’ जायत आ एहि धर्मक लोक केँ आपस मे विभाजित कय केँ आन धर्मक लोक अपन शासन (सत्ता) चलाओत । ई स्थिति केकरो सँ नुकायल नहि अछि । आइ १०० मे ९५ हिन्दू स्वयं अपन धर्मक सही समझ सँ भटकल देखाइछ ।

उपर सँ वर्तमान ‘शिक्षा पद्धति’ सँ हमरा सभक जीवन ‘धोबियाक कुत्ता’ वला हाल मे चलि गेल अछि । न अपने मे छी, आ न आनहि सँ पूर्णता पाबि सकैत छी । तखन जे कोनो साधना करब, सारा व्यर्थ मात्र होयत । अपूर्ण सिद्धान्त पर पेटो पोसनाय पहाड़ भेल अछि । वैदिक कल्पना मे पेट पोसबाक लक्ष्य त तुच्छ वस्तु मात्र कहल गेल अछि । वैदिक निर्देशन मनुष्य केँ यथार्थ कर्म-सिद्धान्तक उपदेश दैछ । लेकिन भारतवर्ष पर बाहरी धार्मिक आक्रान्ता सभक सम्राज्य स्थापित हेबाक कठोर इतिहास हमरा सभक सोझेँ मे अछि । बाहरी आक्रान्ता सँ पूर्व सेहो आन्तरिक विवाद आ धार्मिक विश्वास मे मतान्तर सँ उठल बिहाड़िक इतिहास सेहो अछि । कहियो बुद्धक नाम पर आस्था-अनास्था बीच विवाद, कहियो जैन, कहियो सिख, कहियो किछ – कहियो किछ । हमहुँ सब बँटिते रहल छी ।

कारण की ?

कारण केवल आ केवल ‘वेद’ केर सही समझ सँ दूर छी हम सब । अपन प्रकृतिप्रदत्त स्वभाव अनुरूपक जुड़ाव संग अपन-अपन स्वतंत्र वैचारिक व कार्मिक आचार-विचार संग जीवनयापन मे ‘वेद’ अथवा कोनो धर्मक कोनो ग्रंथ केवल आदर्श जीवन पद्धतिक बात करैछ । वेद द्वारा सेहो जीवन पद्धतिक बारे अत्यन्त विलक्षण ढंग सँ बुझबैत अछि । एहि गूढ़ विषयक विभिन्न शाखा, अंग, उपांग आदिक बारे क्रमिक रूप सँ ज्ञान घटैत चलि गेल अछि, आर घटबाक बात प्रलय (विनाश) केर सिद्धान्त अनुरूप रहितो महापुरुष सब सदिखन ‘सृष्टि’ केँ सुरक्षित रखबाक वास्ते अपन-अपन महान कर्म करैत रहैत छथि ।

एहने महान कर्म रूप मे ‘वेद’ बारे ‘The Vedas’ मे काञ्ची कामकोटि पीठक अधीश्वर महान शंकराचार्य ‘चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती’ द्वारा अत्यन्त वैज्ञानिक ढंग सँ अनेकों दृष्टिकोण सहित व्याख्या कयल गेल अछि ।

प्रवीणक दावी

‘वेद’ केँ एक बेर मात्र नीक सँ पढ़ि लेब त मनुष्य जीवनक सही आ सटीक ‘समझ’ (understanding the right and accurate discourse of human life) विकसित होयत । एखन जेना जीवन जिबि रहल छी, ताहि सँ स्वतः भिन्न अनुभव करब । भय आ आशंकाक घेरा सँ मुक्ति पायब । सही कर्म पथ पर अग्रसर होयब । ईश्वर के थिकाह, कि थिकाह आ कतय छथि – सब किछु ढंग सँ बुझय मे आबि जायत । माता-पिता, परिजन-सखा, जन्म-मरण व जीवन – सब बात नीक सँ पता चलि जायत ।

चेतावनी

पुरान लोक सब कहने छथि जे ‘वेद’ पढ़बाक अधिकारी केवल ‘द्विज’ छथि, से कतहु सँ गलत नहि अछि । ‘द्विज’ बनबाक अधिकारी मायक गर्भ अनुसार मात्र होयब, एहि मत केँ कतेको महापुरुष ‘गलत’ सिद्ध करैत अपन महान कर्म सँ अब्राह्मण रहितो ब्राह्मण बनबाक उदाहरण प्रस्तुत कएने छथि । लेकिन ई ‘वेद’ जे मैथिली मे अछि, से प्रत्येक मैथिलीभाषी पढ़ि सकैत छथि । हँ, बुझय मे सब केँ नहि अओतनि सेहो सत्य छैक । सब केँ रुचि भइये नहि सकैत छन्हि, सेहो सत्य अछि । लेकिन सौभाग्यवृद्धिक अवसर सभक लेल प्रकृतिप्रदत्त अनुपम ऊर्जास्रोत जेकाँ निःशुल्क आ समान रूप सँ सब केँ भेटैत अछि, तहिना ई पुस्तक सभक लेल विमोचन उपरान्त पढ़बाक आ गुनबाक लेल उपलब्ध अछि ।

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सभक लेल शुभकामना !!

हरिः एव हरः !!

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