एहि वैज्ञानिक तथ्य पर सब गोटे गौर करू –
श्वास नहि केवल शरीर केँ जीवित रखबाक लेल आवश्यक छैक बल्कि मन आ मानसिक स्वास्थ्य सेहो काफी हद तक एहि (श्वास) पर निर्भर करैत छैक । एना एहि लेल छैक, कियैक तँ मन जे सब विचार प्रक्रियाक कारण होइछ आ श्वास जे प्राणशक्तिक कारण होइछ, से एक्के थिक । नाड़ी या तंत्रिका केन्द्र केर कम्पन स्वस्थ या अस्वस्थ विचार सब लेल उत्तरदायी होइत अछि । अहाँ स्वयं एकर अनुभव कएने होयब । जेतय ईश्वर केर उपस्थिति प्रत्यक्ष हो या कोनो सन्तक उपस्थिति मे, जखन मन शांत हो, श्वास-प्रश्वास केहेन व्यवहार करैत अछि ? जखन ओ काम (वासनात्मक भावना) या क्रोध केर दबाव मे हो, त श्वास-प्रश्वास केहेन व्यवहार करैत अछि ? यैह पता लागत जे प्रत्येक मामिला मे श्वास-प्रश्वासक पैटर्न व्यापक रूप सँ भिन्न रहैत छैक । आनन्द आ प्रसन्नताक विभिन्न अवस्था मे सेहो श्वास-प्रश्वास मे अन्तर होइत छैक ।
धार्मिक अनुष्ठान या भजन सँ उत्पन्न होयवला आनन्द, इन्द्रिय या इन्द्रिय सभक इच्छा केर पूर्ति सँ उत्पन्न होयवला आनन्द सँ भिन्न होइत छैक । सामान्यतः, उच्चतर प्रकारक आनन्द दाहिना नासिका सँ श्वास छोड़य मे परिणत होइत छैक । केवल इन्द्रिय सुख टा बायाँ नासिका सँ श्वास छोड़नाय केँ सक्रिय करैत छैक । जखन विचार कोनो महान उद्देश्य पर केन्द्रित होइत छैक, त सबटा संवेदना संश्लेषित भ’ जाइत छैक । तखन, दुनू नासिका सँ श्वास धीमा, नियमित आर समान भ’ जाइत छैक, तखन श्वास पूरापूरी रुकि जाइत छैक आ मन सेहो सोचनाय बन्द कय दैत छैक, लेकिन जीवन चलिते रहैत छैक । आर अतिचेतन या ज्ञान व्यक्तिक अस्तित्व मे भरि जाइत छैक ।
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अपन-अपन श्वास केर पैटर्न पर मात्र गौर करब त उपरोक्त सत्य तथ्य सँ सब गोटे सहमत होयब । एहेन-एहेन हजारों सत्य बात मनन करब त जीवन जिबय के पैटर्न स्वतः बदलैत देखब ।
धर्म आ आध्यात्म सँ सामीप्यता बढ़ेला सँ मनुष्य केँ यैह पैघ लाभ होइत छैक । अन्यथा अनिश्चित पद्धति मे ई मन आ मानसिक स्वास्थ्य गड़बड़ाइत रहैत छैक ।
“वेद” यैह कारण मानव लेल एकटा शानदार पद्धति बुनने अछि ।
उपरोक्त तथ्य व सत्य शीघ्र अपने सब लेल ‘वेद’ नाम्ना मैथिली पुस्तक मे भेटत ।
हरिः हरः!!
