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‘वेद’ – मानव लेल श्रेष्ठ आ हितकारी पोथी मैथिली मे

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वेद

मैथिली मे ‘वेद’ नामक अत्यन्त महत्वपूर्ण पोथी अपने समस्त मैथिलीभाषी लेल विशेष प्रयोजनार्थ अनुवाद कयल अछि । स्वयं जाहि कोनो पठनीय सामग्री सँ हितकारी हेबाक प्रयोजन सिद्ध होइत देखल, ताहि सामग्री केँ आर नीक सँ बुझबाक आ मनन करबाक लेल निज मातृभाषा मे लिखल ।

एहि पुस्तक मे अहाँ केँ एतेक रास नव जानकारी सब भेटत जाहि सँ जीवनक उद्देश्य बुझय मे, जीवन जिबैक पद्धतिक सम्बन्ध मे आ परापूर्वकाल सँ चलैत आबि रहल अनेकों परम्परा आ विधि-विधान सभक बारे मे नीक सँ मनन करबाक अवसर भेटत ।

आब जेना ‘उपनयन’ संस्कारक उदाहरण लेल जाउ । बँसकट्टी, मड़बठठ्ठी, कुम्हरम, आदि विभिन्न उपक्रम सँ गुजरैत ‘यज्ञोपवित’ धारण करबाक, वेदारम्भ – यानि ब्राह्मणकर्म मे वेदक अध्ययन आरम्भ करबाक आरम्भविन्दु उपनयन संस्कार सम्पन्न होइछ । वेद निर्देशित अनेकों विधि आ तहिना लोकव्यवहार मे परम्परागत ढंग सँ चलैत आबि रहल विभिन्न विध-व्यवहार सब कयल जेबाक कार्य होइछ । बटुक केँ ब्राह्मण बनि जीवन केना चलेबाक अछि, समस्त मानवलोक आ समाजक विभिन्न वर्णक लोक लेल अपन कर्तव्य केना पूरा करबाक अछि, एहि सभक अलग उद्देश्य आ महत्व होइत छैक ।

लेकिन आइ ई ‘उपनयन’ संस्कार केवल नौटंकी आ देखाबा लेल मात्र बचि गेल अछि । एतेक तक कि ९९.९९% ब्राह्मण केँ नहि पता जे हमर संस्कारक मूल मे कि अछि ।

वेद केर समझ गोटेक लाख व्यक्ति मे कियो एक केँ मात्र छैक एना हमरा लगैत अछि । कारण यावत ई पोथी हम नहि पढ़ने रही, तावत वेदक विशद रूप आ निहित निर्देशन, पठनीयता, अनुकरण योग्य पद्धति आदिक बारे मे बस सुनल-सुनायल बात टा बुझियैक । आब ई स्पष्ट भेल जे वेद सम्पूर्ण सृष्टिक मूल सार थिकैक ।

वर्तमान शिक्षा पद्धति मे उछल-कूद शिक्षा मात्र भेटैछ, सम्भवतः तेँ मनुष्य जीवन अत्यधिक पीड़ा, दुःख, अशान्ति आ उपद्रव सँ भरल रहैछ ।

सुनौती ज्ञान आ जनौती ज्ञान मे बड अन्तर छैक । कर्मकाण्ड आ ज्ञानकाण्ड – एहि दुइ मे मनुष्य केँ फर्क बुझय पड़ैत छैक । कर्मकाण्ड यदि प्राथमिक शिक्षा भेल त ज्ञानकाण्ड उच्चशिक्षा भेल । बिना प्राथमिक शिक्षा प्राप्त कएने कियो कतबो दावी कय लियए जे हम फल्लाँ डिग्री होल्ड करैत छी, ओ बेकार आ व्यर्थ मात्र हेतैक ।

अच्छा – आधुनिक विज्ञान सहित अनेकों दर्शनशास्त्रक परिभाषा आ वर्णन जे कोर्स मे निर्धारित कयल गेल अछि से कि बतबैत अछि ? जीवन केँ पूर्णता कहियो एहि सँ भेटत ? कदापि नहि, किन्नहुं नहि । ठोकल दावी सहितक ई निष्कर्ष कहि सकैत छी ई पोथी पढ़ला आ मनन कयला उपरान्त ।

बहुत जल्द ई पुस्तक अपनहुँ लोकनिक हाथ मे रहत । मूल्य भारू ५०० टका राखल अछि । नेरू १००० टका राखल अछि । आर योग्य व्यक्ति लेल ई निःशुल्क पढ़य लेल सेहो उपलब्ध करेबाक प्रवीण नीति पर चलबाक सोच अछि । कहबाक तात्पर्य मिथिलाक मौलिक शक्ति केँ पुनः अर्जित करबाक लेल मूल धर्म – वेद, वेदान्त संग वेदक अंग-उपांग, उपनिषद-पुराण एवं धर्मशास्त्रक सही व्याख्याक सुन्दर प्रचार करबाक अभिप्राय सिद्ध हो । ततबी ।

मूल लेखक काञ्चीपीठ शंकराचार्य ‘चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती’ केर लेखन शैली अनुरूप मैथिली अनुवादक प्रयास मे कतेको स्रोत आ सहयोगी प्रति हृदय सँ आभार व्यक्त करैत जीवनक एक कृति अपने सब लेल समर्पित अछि ।

हरिः हरः!!

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