वैकुण्ठाधिपति भगवान् श्री लक्ष्मीनारायणक ध्यान

ध्यायाम्यप्राकृतौ सच्चिदानन्दमयविग्रहौ ।
लक्ष्मीनारायणौ दिव्यवैकुण्ठपुरवासिनौ ॥
नीलो नारायणो देवः पीताम्बरचतुर्भुजः ।
शंखचक्रगदापद्मवनमालाविभूषितः ॥
सुगन्धिः सरसः कान्तो माधुरीरसनिर्झरः ।
दयायाः सागरोऽनन्तः स एव परमा रमा ॥
लक्ष्मीर्हिरण्यवर्णा कनकाम्बरधारिणी ।
कञ्जद्वयवराऽभीतिवैजयन्तीविभूषिता ॥
पदपद्मप्रकाशेन ध्यायतां ध्वान्तनाशिनी ।
उदारा वत्सला देवी श्रीः पद्मा कमलेन्दिरा ॥
दिव्य वैकुण्ठ मे निवास करनिहार, अलौकिक सच्चिदानन्द विग्रहवला (भगवान्) लक्ष्मीनारायणक हम ध्यान करैत छी । भगवान् नारायणक विग्रह नीलवर्णक अछि, ताहि पर ओ पीताम्बर धारण कय रखने छथि । हुनक चारि भुजा अछि जाहि मे शंख, चक्र, गदा ओ पद्म (कमल फुल) सुशोभित अछि । हुनक कण्ठ वनमाला सँ सुशोभित अछि । ओ दयासिन्धु दिव्य सुगन्धि, दिव्य लावण्य ओ कान्तिमय छथि । माधुर्यक रसमय झरना जेहेन ओहि अनन्त श्री हरि केर विग्रह अछि । (हुनकहि पार्श्व मे) श्री हरि सँ अभिन्न स्वरूपवाली परम रम्य भगवती महालक्ष्मी विराजमान छथि । हुनक श्री-विग्रह सुवर्णक समान कान्तिवाली, सौवर्ण वस्त्राभूषित छथि । भगवती रमाक चारू हाथ मे दुइ कमल, वरमुद्रा तथा अभयमुद्रा शोभायमान अछि तथा वक्षःस्थल वैजयन्ती माला सँ अलंकृत अछि । उदारता, वत्सलता आदि सँ समन्वित, पद्मासना, कमल धारण कएने कान्तिमयी ओ भगवती अपन एहि दिव्य स्वरूपक ध्यान करयवला केँ चित्तगत अज्ञानान्धकार केँ अपन श्रीचरणारविन्दक प्रकाश सँ दूर कय रहल छथि ।
जय जय श्री लक्ष्मीनारायण भगवान् की जय !!
हरिः हरः!!
