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नववर्ष एकटा तिथि नहि, चेतनाक नव प्रभात छी

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लेख विचार
प्रेषित: दिलीप झा ललित
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय : – समय-संवेदनाक नव अंकुर “नववर्षक उमंग”

समयक देहरी पर ठाढ़ भऽ नव प्रभात मुसकेलै,
आई आशाक नव अंकुर हृदय-भूमि मे हरियेलै।

नववर्ष केवल तिथि पत्रकक पन्ना बदलबाक औपचारिकता नहि, बल्कि समय-संवेदनाक एकटा नव अंकुर अछि। ई ओ क्षण अछि जखन बीतल दिनक थकान, पीड़ा आऽ पछतावा मनक आँगन सँ धीरे-धीरे विदा लैत अछि आऽ आशा, संकल्प आऽ नव ऊर्जा अपन पाँखि पसारैत अछि। नववर्ष समयक देह पर अंकित एकटा एहन विराम चिन्ह अछि, जकर बाद जीवन फेर सँ नव वाक्य लिखबाक अवसर दैत अछि।
पुरान वर्ष अनुभवक गुरुत्व छोड़ि जाइत अछि किछु स्मृति मुस्कान बनि जाइत अछि, तऽ किछु टीस बनि मौन सिखा जाइत अछि। मुदा नववर्ष एहि सभक जोड़-घटाव नहि, बल्कि नव दृष्टि अछि। ई सिखबैत अछि जे गलती हार नहि, सीख अछि आऽ संघर्ष अंत नहि, दिशा अछि। नववर्ष मनुष्यक भीतर आत्म-संवादक घंटी बजबैत अछि “की हम अपन समयक संग न्याय केलहुँ? की हम अपन संबंध, समाज आऽ प्रकृति सँ संतुलन बनौने छी?”
मिथिलाक सांस्कृतिक चेतना में नववर्ष सदा सँ शुभारंभक प्रतीक रहल अछि। खेत-खरिहान, लोकाचार, पर्व-त्योहार सभमे नवपनक आकांक्षा बसल अछि। ई उमंग केवल व्यक्तिगत खुशी तक सीमित नहि, बल्कि सामूहिक मंगलकामना बनि समाजक नाड़ी मे प्रवाहित होइत अछि। नववर्ष हमरा सभ केँ स्मरण करबैत अछि जे परंपरा आऽ परिवर्तन एक-दोसरक विरोधी नहि, बल्कि सहयात्री छथि।
आजुक समय मे जखन संसार तेज रफ्तार मे दौड़ रहल अछि, नववर्ष ठहरावक निमंत्रण लैत अछि। ई कहैत अछि कनी ठहरू, साँस लिअ, आऽ अपन भीतर झाँकु। नववर्ष संकल्पक सूची मात्र नहि, बल्कि संवेदना, करुणा आऽ जिम्मेदारीक पुनःस्थापना अछि। यदि ई वर्ष हम कम बाजब, अधिक सुनब, कम जोड़ि, अधिक बाँटब, कम उपभोग, अधिक संरक्षण करब तऽ नववर्षक उमंग सार्थक होयत।
अंततः नववर्ष एकटा तिथि नहि, चेतनाक नव प्रभात अछि। ई विश्वास जगबैत अछि जे अन्हार चाहे जतबा गहिर हो, एकटा नव सवेरा सदैव संभव अछि। नववर्षक उमंग एहि आशा सँ जन्म लैत अछि आऽ एहि आशा मे मानव जीवनक निरंतरता, सृजनशीलता आऽ सौंदर्य बसल अछि।
आऊ, ई नववर्ष हमरा सब लेल केवल शुभकामना नहि, बल्कि शुभकर्मक संकल्प बनय जाहि मे मनुष्य, समाज आऽ प्रकृति तीनू संग-संग आगु बढ़य। समय फेर सँ नव द्वार खोलि रहल अछि, आब ई हमरा पर निर्भर अछि जे हम एहि द्वार सँ उजास लऽ प्रवेश करैत छी कि फेर अतीतक बोझ उठा कऽ अपन जीवन, समाज आऽ समय तीनू केँ अर्थपूर्ण दिशा दैत छी।

नववर्ष तिथि नहि, चेतनाक उज्जर उजास छी,
शुभकर्मक संकल्प सँ जीवनक साँच रास छी।

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