मोक्षदा एकादशीक प्रातक एकटा छोट प्रवीण सन्देश
बन्धुगण, जीवन मे कर्म अनेकों करय पड़ैछ मनुष्य केँ । कर्महि गुणे धर्म होइछ । धर्मक सेहो कतेको रूप-रंग हम-अहाँ मिथिलावासी अपन पुरखाजन सँ सिखैत आयल छी । हमरा त सच पुछू माँ सेहो धार्मिक आ पिता सेहो धार्मिक भेटलथि । हालांकि माँ आ पिताक धार्मिकता मे फर्क सेहो बुझायल । माँ जेतय पूर्णरूपे गृहस्थी धर्मक संग घर-आंगनक देवी-देवता आ साफ-सफाइ पर ध्यान राखिकय धार्मिकता निभबैत रहल, पिता ओतहि बिल्कुल उपनिषदीय आ आरण्यक मार्गक अनुगामी, केवल नाम-जप, लोकोपकार, सत्यवादिता, ईमानदारिता आदिक संग अयाची गुण सँ बिना कोनो इच्छा जे हमरा ई भेटय कि ओ भेटय – तेहेन ज्ञानी समान धार्मिकताक निर्वाह कयलनि । तेकर बाद काकी, बाबी, काका, बाबा, भाइ, बहिन, आदिक संग जे धार्मिकताक बात देखलियैक ताहि मे कतेको तरहक पूजा-पाठ, मन्दिर आयब-जायब, फूल तोड़ब, माला बनायब, दिवारी बनायब, टेमी तैयार करब, घर-अंगना बहारब-निपब, ठाउं-पीढ़ी करब, अहिपन पाड़ब, आदि ।
आब अपन बेर मे कि सब धार्मिकता निभाबी ? बड पैघ सवाल होइत छैक ई । माँ-पिता-परिजन सँ सिखल सब बात अपनेलहुँ । पिता वला स्वाध्याय केँ अपनेलहुँ । ससुरजी भेटलाह, सन्ध्या-बन्धन सिखा देलाह, सन्ध्या-तर्पण सेहो अपनेलहुँ । माँ जेकाँ भोरे उठि तुलसी चौरा लग जाय दण्डवत् देबाक बात कहियो नहि बिसरलहुँ । गाछ-वृक्ष, मन्दिर, मस्जिद, श्मशान, कब्रिस्तान, विद्यालय, अस्पताल, इदगाह, चर्च, वेश्यालय, मदिरालय, आदि सर्वत्र कोनो न कोनो विशेष कारण सँ सिर झुकबैत रहलहुँ । पैघ केँ प्रणाम मे पैघत्वे टा देखलहुँ, जाति-धर्मक बात नहि, बस जे होशोहवास मे हमरा सँ एको दिन फाजिल सूरज उदय आ अस्त देखने छथि, से सब प्रणम्य छथि । कहियो-कहियो छोटो बच्चा सब चमत्कारिक बुझायल त हृदय सँ ओकरो मे भगवान् देखिकय प्रणाम कयलहुँ । ओना कुमारि-ब्राह्मणक भोजनोपरान्त प्रणामक परम्परा सर्वविदिते अछि अपना ओतय ।
एखन वेद, वेदक अंग, उपांग, आदिक मादे मोट जानकारी शंकराचार्य ‘चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती’ रचित पुस्तकक अध्ययन उपरान्त आ अपन उमेरक हिसाब सँ परमात्माक सम्बन्धक पूर्वज्ञान आर बेसी फरिच्छ आ स्पष्ट होइत चलि जेबाक क्रम मे छी । ईश्वर सर्वोपरि, सर्वव्यापी, सदिखन मन-हृदय मे विराजमान राखिकय चलबाक कोशिश करैत छी । तथापि कतेको रंगक विषय आ इन्द्रिय सुख सँ विरक्ति नहि भ’ सकल अछि, गुरुजन आ जगतगुरु श्रीकृष्णक शिक्षानुसार विरक्ति होयबाक योगाभ्यास सब कने-मने जे सुतरैत अछि, से सब करैत छी । नंगट, गदहा, बेवकूफ, बदमाश, लोफर, बकलेल, ढहलेल, बताह आदि अनेकों विशेषण सब बच्चे सँ भेटैत आबि रहल अछि । ई सब सेहो लगभग-लगभग बनले अछि । तखन सुखक बात ई जरूर अछि –
जखन फूल बिछय जाइत छी, एक-एक फूल चुनैत ईश्वर-ईश्वर स्मरण होइत अछि । एकर जे परमसुख अछि से अवर्णनीय अछि । मानसिक, वाचिक व कार्मिक शुद्धता मे ई बड पैघ सहयोगी सिद्ध भ’ रहल अछि । आशा करैत छी जे एहि तरहें ई जीवन पार लागि जायत । स्वयं त ‘फल’ तय कय नहि सकैत छी, बस उपरोक्त कर्महि केर मार्ग उचित अछि, बढ़ैत जा रहल छी । कतेको तरहक बाधा, उपद्रव, अशान्ति, आँधी-तूफान जेकाँ जीवन मे अबैत अछि, फेर जीवनरूपी धारा मे हमर नाव कखनहुँ एहि पार, कखनहुँ बीच मझधार, मुदा सदिखन खेबैया भगवान् एकरा खेबैत आगू बढ़ा रहल छथि । मंजिल जरूर भेटत से तय अछि । हम घबरायब तैयो, उछलब-कूदब कि खुशी मनायब तैयो – खेबनहार भगवान् छथिन, वैह जनथिन ।
एकादशी व्रतधारी सब केँ हम प्रवीण हृदय सँ प्रणाम करैत छी । अपने लोकनि हमरा जेहेन तुच्छ-पापरत लोक पर दहिन दृष्टि राखब, हमरो कल्याण भ’ जायत । अस्तु, हमर सन्देश हमर सन्तति एवं नव पीढ़ी लेल एतबी अछि जे कहियो अपन बाप-पुरखाक सिखायल कर्मधर्ममार्ग सँ विचलित नहि होयब । ॐ तत्सत् !!
हरिः हरः!!
