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बहिन आऽ भाइक प्रेम, प्रकृति आऽ पक्षी-संरक्षण, संगहि नारीक सौंदर्य-बोध आऽ सृजनशीलता के अद्भुत प्रतीक मानल जाएत अछि

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लेख विचार
प्रेषित: दीलीप झा ललित
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- मिथिला केर सामा चकेबा पावनि

स्नेह, सृजन आऽ संस्कृति केर पर्व “सामा-चकेबा”

माटिक गंध, गीतक लय सँ, जीवित अछि अपन पहचान,
सामा-चकेबा खेल में, आइयो झलकै मिथिलाक सम्मान।

मिथिला के लोकजीवन सदा सँ भाव, संस्कृति आऽ स्नेहक मधुर रंग सँ रँगरायल रहल अछि। एही रंगसभ में एक अनुपम परंपरा अछि “सामा-चकेबा” जे विशेष रूप सँ कार्तिक मासक पूर्णिमा सँ आरंभ भऽ छठी तक मनाओल जाएत अछि। ई पर्व मुख्यत: बहिन आऽ भाइक प्रेम, प्रकृति आऽ पक्षी-संरक्षण, संगहि नारीक सौंदर्य-बोध आऽ सृजनशीलता के अद्भुत प्रतीक मानल जाएत अछि।

लोककथा अनुसार, सामा भगवान श्रीकृष्णक पुत्री छलि। झूठ आरोप लगबाक कारण ओ पक्षी सामा बनि गेली आऽ हुनकर प्रिय भाई चकेबा सेहो पक्षी बनि गेलाह। बाद में कृष्णक आशीर्वाद सँ दुनूके पुनः मानवी रूप भेटल। ई कथा भ्रातृ-स्नेह, नारीक मर्यादा आऽ सत्यक विजय के रूपक रूपेँ जनमानस में बसल अछि।कार्तिक पूर्णिमा के संध्या सँ गाम-गाम के कान्या नारीसभ माटिक सामा-चकेबा, दहिजा, बिनौली, सुग्गा, डाहुक, झरोका आदिक प्रतिमा बनबैत छथि। गीत गाबैत, दीप जरबैत, नदी या पोखरिक किछेर सामा-चकेबा खेलायल जाएत अछि।
गीत सभ में भाव, विनोद आऽ स्नेहक संगहि समाजक गूढ़ संदेश रहैत अछि “सामा-चकेबा खेलय नैहर सँ आयल भौजी…”, “ओ सामा केर बेर, ओ चकेबा केर नेर…” इत्यादि इत्यादि।
अंतिम दिन “विदाई” होइत अछि जाहि दिन सामा-चकेबा केँ जलधारा मे विदा कएल जाएत अछि, संगहि बहिन अपन भाइक दीर्घायु आऽ सुख-समृद्धिक कामना करैत अछि।
सामा-चकेबा नारीक लोककला, भावनात्मक संवेदना आऽ सामुदायिक एकता के प्रतीक अछि। माटि सँ प्रतिमा बनबैत समय, गीत गाबैत समय, हँसी-ठिठोली आऽ प्रेमक संवादक माध्यम सँ मिथिला के स्त्री अपन सृजन-शक्ति आऽ कलात्मकता के अभिव्यक्त करैत अछि।
एहि पर्वक माध्यम सँ पर्यावरण, पक्षी आऽ प्रकृति-संरक्षण केर संदेश सेहो सहज रूपेँ जन-मन मे बसल अछि।
आजुक बदलैत समय मे, जखन शहरीकरण आऽ प्रवासक कारण परंपरासभ धूमिल भऽ रहल अछि, तखन सामा-चकेबा मिथिला समाज लेल अपन लोक-परिचयक पुनः स्मरण अछि।
स्कूल, विश्वविद्यालय आऽ सांस्कृतिक मंचसभ पर एहन आयोजन समाजक मूल संस्कार आऽ बंधन केँ पुनर्जीवित करबाक प्रयास बनि रहल अछि।
सामा-चकेबा केवल एक खेल या पर्व नहि, बल्कि मिथिलाक आत्मा सँ जुड़ल लोकभावना अछि जे बहिन-भाइक स्नेह, नारीक सृजनशीलता आऽ प्रकृति-प्रेम केँ एक सूत्र मे पिरो दैत अछि। ऐना कही जे ई परंपरा मिथिलाक लोकसंस्कृति केँ अनंत काल धरि जीवित राखयवाली एक सुगंधित फुलवारी अछि।

लोक-रंग, प्रेमक छाँह, आऽ संस्कृतिक अछि ई मधुर गान,
सामा-चकेबा सँ सदा उज्ज्वल रहल मिथिलाक सम्मान।

 

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