Search

भाई-बहिनक निश्छल प्रेम, विश्वास आऽ पारस्परिक जिम्मेदारी के प्रतीक मानल जाइत अछि

430 भ्यूज

लेख विचार
प्रेषित: दिलीप झा ललित
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- राखी : रक्षा सूत्र केर बन्हन

भाई-बहिनक प्रेमक रेशमी सेतु
******************

स्नेहक सूत सँ बन्हय जीवनक रेखा,
राखिक डोरि में छिपल प्रेमक लेखा।

भारतीय संस्कृति अपन संवेदनशीलता आऽ पारिवारिक मूल्य के लेल विश्वभर में प्रसिद्ध अछि। एही सांस्कृतिक धरोहर मे एक अनुपम पर्व अछि रक्षाबंधन, जे भाई-बहिनक निश्छल प्रेम, विश्वास आऽ पारस्परिक जिम्मेदारी के प्रतीक मानल जाइत अछि। “रक्षा” आऽ “बंधन” शब्द सँ मिलिकय बनल ई पर्व केवल एक धागा के बंधन नहि, बल्कि आत्मिक सुरक्षा, भावनात्मक लगाव आऽ जीवनभरिक संबंध के आदर्श रूप थिक।
इतिहास आऽ पौराणिक सन्दर्भ के देखी त’
रक्षाबंधन के इतिहास बहुत प्राचीन अछि। वेद-पुराण, महाभारत आऽ ऐतिहासिक आख्यान सभ मे ई पर्वक उल्लेख सर्वथा भेटैत अछि।
महाभारत मे वर्णित अछि जे द्रौपदी कृष्ण के चोट लागल देखिकय अपन आँचल के टुकड़ा फाड़िकय ओहि पर बांधि देलक। ताहि दिन सँ कृष्ण द्रौपदी के रक्षा के संकल्प लेने छलाह। ई प्रसंग रक्षाबंधन के आत्मिक महत्व केँ दर्शबैत अछि।
भगवान विष्णु जखन राजा बलि के वचन अनुसार हुनका संगे पाताल गेलाह, तखन लक्ष्मी जी ब्राह्मणी रूप मे बलि के राखी बाँधलथिन आऽ हुनका सँ अपन पति के मांग कएलथिन। बलि वचन निभा कऽ विष्णु जी केँ बैकुण्ठ पठा देलथिन। एहि कथा मे राखी के प्रतीकात्मकता बंधन, संकल्प आऽ प्रेम स्पष्ट रूप सँ देखाइत अछि।
ऐतिहासिक सन्दर्भ मे, चित्तौड़ की रानी कर्णावती हुमायूँ के राखी पठा कय रक्षा के याचना कएलथिन आऽ हुमायूँ मुस्लिम होइतहुँ भाई धर्म निभा कऽ हुनकर रक्षा लेल युद्ध करै पहुँच गेलाह।
रक्षाबंधन केवल एक विधि-निष्ठ पर्व नहि, बल्कि भाई-बहिन के संबंध मे नव ऊर्जा भरनिहार पर्व थिक। बहिन राखी बाँधिकय भाई सँ जीवनभरि रक्षा के संकल्प लैत अछि। ई पर्व बहिनक स्नेह, विश्वास आऽ भाईक अपनत्वक उज्जवल उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि। परिवारक संग एकटा पुनर्मिलनक अवसर सेहो बनैत अछि। बहिन नैहर आबैत अछि, घर उत्सव में बदलि जाइत अछि। छोट-छीन सिख प्रेम, कर्तव्य, दायित्व आऽ संवेदना एहि पर्व सँ आत्मसात होइत अछि।
आधुनिक समय मे रक्षाबंधन के रूप
समयानुसार बदलल अछि, जीवनशैली मे बदलाव भेल अछि परन्तु परंपराक मूल भावना यथावत अछि।
आजुक युग मे बहिन भाई केँ राखी डाक, कोरियर आऽ ऑनलाइन प्लेटफार्म सँ पठबैत छथि। कतहु- कतहु राखी सोशल मीडिया पर “वर्चुअल” रूप मे सेहो बाँधल जाइत अछि। मुदा भावनाक गहिराई आइयो ओहि धागा मे जकड़ल अछि।

रक्षाबंधन आई एक व्यापक बंधुत्व के प्रतीक बनि गेल अछि। केवल जैविक भाई-बहिन तक सीमित नहि रहिकय, आब ई पर्व सामाजिक एकता, राष्ट्रीय सौहार्द आऽ भाईचारा के संदेश सेहो दैत अछि।
नारी सम्मान आऽ सशक्तिकरण मे रक्षाबंधन एक अवसर बनि सकैत अछि, नारी के मान-सम्मान, सुरक्षा आऽ सशक्तिकरण के बात करबाक लेल।
एहि पर्व पर भाई वचन दैत अछि “हम अहाँ के सिर्फ शारीरिक नहि, बल्कि मानसिक, सामाजिक आऽ वैचारिक रूप सँ सेहो संरक्षण देब।” ई सोच रक्षाबंधन के खाली रस्म नहि, बल्कि सामाजिक जागरूकता के अवसर बना सकैत अछि।
अंत मे कहब जे रक्षाबंधन मात्र एक धागाक पर्व नहि, बल्कि रिश्ताक रेशमी भावना थिक। ई भाई-बहिन के परस्पर प्रेम, विश्वास आऽ कर्तव्यबोध के जीवंत प्रतीक थिक। बदलैत समय मे एहिके केवल परंपरा नहि, बल्कि मूल्य-प्रवाहित संस्कार के रूप मे जीवित रखनाइ आवश्यक अछि। जखन बहिन अपन राखी में अपन भावना के धागा मे बान्हि कऽ राखैत अछि, तऽ भाई सेहो अपन संकल्प के कवच बनबैत अछि।
अतः चारि पांति रक्षावंधन के उपलक्ष में समर्पित करैत छी…
राखिक डोरि मे बन्हल स्नेहक बंधन,
भाई-बहिनक प्रेमक अमर अन्वेषण।
संस्कारक दीप जरे हर मन-आँगन,
रक्षाबंधन बनय प्रेमक अभिनंदन।

 

Related Articles