शिक्षण पेशा मे रही । काल्हि बच्चा सब केँ कि पढ़ायब से आइ नीक सँ अपने पढ़य पड़ैत छल । कारण, तेज बच्चा सब, सेहो अंग्रेजी माध्यमक आवासीय विद्यालय केर बच्चा सब मे तेज श्रेणीक बच्चा केँ देखी जे एक-एक टा बात केँ खोंइचा छोड़ाकय बुझबाक यत्न करय आ फाँकी देनिहार मास्टर साहेब सब अगल-बगल आँखि दौड़ाबय लागथि यदि विषय पर नीक ज्ञान नहि रहनि तँ । अपनो जहिया कक्षा मे छात्र रूप मे रही त गोटेक मास्टर साहेब सब बिना समुचित अध्ययन केँ पढ़ाबय आबथि त बड तंग कयल करियनि । आब नाम लिखैत लेहाज भ’ रहल अछि, मुदा किछु गोटे तेहनो रहथि जिनका पढ़ाबय के लुइर बिल्कुल नहि रहनि, बस अपन डिग्री आ सोर्स-पैरवी सँ ओ मास्टर साहेब भ’ गेल छलाह, तेँ हम सब झेलि रहल छलहुँ । ई दुर्गुण अपना मे बिल्कुल नहि आबय से कटिबद्ध रही । तेँ काल्हि कि पढ़ेबाक अछि, कोन कक्षा मे कोन अध्याय चलि रहल अछि से आइये नीक सँ अभ्यास करी, राति मे जागइयो पड़य त तैयारी कहियो नहि छोड़ी । एहि तरहें एकटा अक्खड़ आ धोल-माँजल शिक्षक रूप मे स्वयं केँ प्रस्तुत करय मे सहजता होइत छल ।
एतय विराटनगर मे अक्सर कोनो न कोनो विषय पर कार्यक्रम सब होइत रहैछ । अधिकतर कार्यक्रम जाहि मे हमरो बाजय के रहैछ त पहिने विषय केँ नीक सँ बुझबाक आ तखन मात्र बाजि सकबाक वैह मास्टर साहेब वला गुण काजक सिद्ध होइछ । अफसोस तखन होइत अछि जखन पद-प्रतिष्ठा प्राप्त व्यक्ति जिनका मात्र अवसर भेटैत छन्हि कोनो व्याख्यान प्रस्तुत करबाक लेल, ओ जँ पटरी छोड़ि कपोल-कल्पित तथ्य-कथ्य सब राखब आरम्भ करैत छथि, होइत अछि जे ‘बौद्धिक बलात्कार’ भ’ रहल अछि । मोन मे विद्रोहक तरंग उठय लगैछ । बड़ीकाल वर्दाश्त करैत छी । अति भेला पर उठिकय बाहर जाय लेल बाध्य होइत छी ।
विदित हो जे बिना अध्ययन – बिना तथ्य-सत्य बुझने – यदि कोनो विषय पर कियो वक्ता बजता त ओहि सभा मे मौजूद अध्ययनशील लोकक बौद्धिक बलात्कार मात्र होयत । एहि सँ समाजहु केर हित नहि भ’ सकैत अछि । खर्चा लागि गेल, ढोल-पिपही बाजि गेल, कतेको लोक अपन पीठ अपनहि ठोकि लेलक – धरि उपलब्धि भेटत बड पैघ ‘जीरो’ ।
एकटा पक्ष आर स्पष्ट कय दी । कोनो विमर्श कार्यक्रम मे मात्र मुंहपोछुआ दुलार – एकतरफा प्रशंसा टा कयल जायत, त बुझि जाउ जे स्वार्थ मे आन्हर दरबारिया शैली मे मुक्तकंठ विरुदावली पढ़ल जा रहल अछि । आलोचनात्मक तथ्य तथा विरोधक कटु सत्य सेहो राखब आवश्यक होइत छैक । एकतरफा विरुदावली गायन सँ सम्बन्धक मधुरता कनिकाल लेल सम्भव भइयो जायत, मुदा दूरगामी सहमति-सम्मति कथमपि नहि होयत ।
आजुक लेख मे कोनो खास विषय नहि, अपितु सभा-गोष्ठी-संगोष्ठीक पैटर्न पर एक मास्टर साहेबक अनुभव मात्र राखल । विज्ञजन – बुझि सकनिहार प्रतिक्रिया दय सकैत छी । धन्यवाद !
हरिः हरः!!
