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पहिल गुरु माँ छथि जे कुम्हार बनि अपन बच्चा के आकार दैत छथि

911 भ्यूज

लेख विचार
प्रेषित: बबिया प्रकाश
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- #जीवन_में_गुरु_केँ_महत्व

 

गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़ै खोट।
अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट।

गुरु कुम्हार छथि आओर शिष्य घैल; गुरु भीतर सौं हाथ’क सहारा दय आर बाहर सौं चोट मारि मारि कय शिष्य केँ बुराई निकालि दैत छथि, हुनका गढ़ैत छथि।

गुरु बिनु ज्ञान नहि….. गुरु जीवन केर आधार आदि आदि कविता’क रचना भेल अछि। गुरु के संदर्भ मे जतेक लिखब कम पड़ि जायत। जे हमरा गढ़लथि हुनका हम की गढ़ी! जतेक गुणगान करी कम अछि।

जीवन केँ मार्ग बहुत कठिन आर टेढ़-मेढ़ होइत अछि। बढ़िया आओर सुचारू रूप सौं जीवन जीअ वास्ते मार्गदर्शक केँ जरुरत पढ़ैत अछि, ओ मार्गदर्शक गुरु होइत छथि जे जीवन मार्ग केर प्रकाशवान करैत छथि।

सबसौं पहिल गुरु माँ होइत छथि। बच्चा केँ प्राथमिक आर व्यवहारिक ज्ञान ओ द दैत छथि।ओना त कहल गेल अछि जे जखन सौं हुनक गर्भ मे शिशु केँ आगमन होइत अछि तखने सौं ओ प्रयासरत भ जाइत छथि जे हुनक बच्चा सुसंस्कारी होइन। अभिमन्यु सुभद्रा केँ गर्भ मे चक्रव्यूह केँ ज्ञान प्राप्त केने रहैथ।

तकर बाद पिता सौं बच्चा सीखैत छथि- कोना संघर्ष में धैर्यवान बनि रही, कर्मठ बनी। पिता अपन अनुभव सौं बहुमूल्य मार्गदर्शन दैत छथि जाहि सौं बुझि सुझि क’ कार्य करैत छैथ आर अनावश्यक गलती करय सौं बचि जाइत छथि ।

आगू’क विद्या अर्जन, शिक्षा- दीक्षा शिक्षक सौं प्राप्त होइत अछि। जाहि सौं वर्तमान, भविष्य मे धनोर्पजन आर ओकर सदुपयोग कोना करी तेकर ज्ञान प्राप्त होइत अछि।

गुरु सिरिफ मार्गदर्शक के रुप मे नहि अपितु प्रशिक्षक के रूप मे से हो कार्य करैत छथि जैस’ निष्पक्ष मूल्यांकन कार्य मे मदति मिलति अछि। ओ रचनात्मक आलोचना कए क’ कमी के बतबय छथि जाहि सौं अपन कार्य केँ भांति भांति दृष्टि सौं देख केँ मार्गदर्शन भेटैत अछि।

जीवनसाथी से हो गुरु होइत छथि। जतय आर जिनका सौं जे किछु सीखय छी ओ सब गुरु होइत छथि। सिरिफ एकटा गुरु शिक्षक नहि अपितु मित्र, पड़ोसी, विश्वासपात्र से हो भय सकैत छथि। हुनक समर्थन, प्रोत्साहन बहुत उपयोगी खासक’ मुश्किल समेय मे प्रेरणादाई होइत अछि।

व्यक्तिगत विकास आर उन्नति वास्ते गुरु के मार्गदर्शन केर आत्मसात करनाई जरूरी अछि। जीवन के सभ पड़ाव पर सीखय लेल भेटैत अछि। सदैव सीखैत रही जाहि सौं मोन’क शांति आर ज्ञान भेटते रहैत अछि ‌।

अपन सभक संस्कृति में गुरुकेँ ईश्वर रुप मे पूजल जाइत छन्हि आर आदर सम्मान कयल जाइत छन्हि। अपन सभक जीवन में अनेकों गुरु होइत छथि । जखन धरि जीवन तखनि धरि सीख’ के अवसर।

अंत मे, ओ सभ गुरु केँ प्रति कृतज्ञता व्यक्त करय वास्ते समय अवश्य निकाली जे अपन सभक जीवन के सब क्षेत्र मे बदलाव आनलथि। अपन शिक्षा सौं अपन सभक जिनगी के सुधारलथि। ओ सभ गुरु कें हम करबद्ध नमन करैत छी आर कृतज्ञता व्यक्त करैत छी।

 

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