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भ्रमण सँ मनुष्यक जीवन मे पर्यावरणीय चेतना विकसित होइत अछि

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लेख विचार
प्रेषित: दिलीप झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- भ्रमण सँ मानव जीवन पर कि प्रभाव पड़ैत अछि

भ्रमण मात्र दृश्य नहि एक दृष्टि
(जीवनक गतिशील गाथा)

चलू पथिक बनि नील गगन तर,
जहिया धरती सिखबैत अछि कर।
भ्रमण नहि केवल शरीरक गाम,
वैह यात्रा अछि आत्मा केर धाम।

मनुष्य जीवन के मूल स्वभाव छी गतिशीलता। जे जिंदा अछि, से गतिमान अछि। ई गति केवल शरीरक नहि, बल्कि चित्त, चेतना आऽ आत्माक सेहो अछि। एहि गतिशीलता मे भ्रमण (यात्रा) एक स्वाभाविक आऽ अत्यंत आवश्यक अंग छी। मनुष्य जखन अपन घर सँ बाहर निकलैत अछि, त मात्र ठाम परिवर्तित नहि होइत अछि, ओकर सोच, दृष्टिकोण आ जीवन-दर्शन सेहो परिवर्तित होइत अछि।
एना कही जे भ्रमण एक आत्मिक अभ्यास अछि। आधुनिक काल मे भ्रमण के प्रायः मनोरंजन वा विश्राम केर रूप मे देखल जाइत अछि। मुदा भारतीय संस्कृति आऽ विशेष क’ मिथिला परंपरा मे भ्रमण के एक आध्यात्मिक साधना मानल गेल अछि। ऋषि-मुनि सभ वन-वन, ग्राम-ग्राम घुमैत छलाह। जनिका लेल भ्रमण ज्ञान संचय आ आत्मविकास केर माध्यम छल। ओ ज्ञानी कहबैत छलाह। “चरैवेति, चरैवेति” अर्थात चलैत रहू, यात्रा करैत रहू। ई चलन मात्र शरीरक नहि, आत्माक प्रवाह छी। भ्रमण आत्मा केँ क्लेश सँ मुक्ति दैत अछि, मन के चंचलता केँ विश्राम दैत अछि।
भ्रमण सँ मनुष्य के जीवन मे नव रंग अबैत अछि। जखन एकटा मैथिल युवक पहिल बेर हिमालय देखैत अछि, त ओकर हृदय मे केवल आश्चर्य नहि, एक प्रकारक मौन भक्ति उपजैत अछि। समुद्रक अथाह लहरि देखिकय कोनो सामान्य मनोविज्ञान सेहो कहैत अछि “हम कतऽ छी आ ई विश्व कतऽ?” ई भाव जीवनक सत्व केँ समझबाक मार्गदर्शन करैत अछि।
बनल-बनायल दिनचर्या, एके प्रकारक लोक, एके स्थान, एके रीति-नीति एहि सब सँ बाहर निकलिकय भ्रमण मनुष्य केँ विविधता सँ परिचित करबैत अछि। आऽ जखन हम विविधता केँ स्वीकार करैत छी, तऽ हम सहिष्णु, विवेकी आ मानवीय बनैत छी।
मिथिलामे भ्रमणक परंपरा अदौ काल सँ चलैत आबि रहल अछि। प्रमाण के लेल मिथिला सँ जुड़ल रामकथा केँ देखू राजा जनक स्वयं एक पथिक रहथि। हुनका द्वारा आयोजित सीता स्वयंवर मे भगवान राम जनकपुर धरि अपन भ्राता संग गाछी-बगिचा, नदिया-पनघट पार करैत पहुँचैत छथि। ओ यात्रा सिर्फ विवाहक उद्देश्य सँ नहि, एक आत्म-साक्षात्कार के यात्रा सेहो रहल।
मिथिला मे सदा सँ यात्रा के पवित्र मानल गेल अछि। मिथिला सँ गंगा पार कऽ काशी, प्रयाग, तीर्थराज पुष्कर, नासिक, जगन्नाथ धाम आऽ काठमांडू धरि लोक पैदल तीर्थयात्रा करैत रहलाह। अपन लोकगीत, भजन आ पाथेय लऽ क’ चलैत रहैत छलाह। ई भ्रमण मात्र देव-दर्शन नहि, अपितु आस्था, सहिष्णुता आऽ लोकसंस्कृति के सेतु रहल।

भ्रमण मूलतः जीवनक शिक्षक थिक जाहि सँ बहुत किछु सिखवाक अवसर भेटैत अछि। एकटा पंडित जतेक पोथी पढ़ैत अछि, ओतबे नै एकटा पथिक जतेक दुनिया देखैत अछि, ओ ओकरा जीवन के गूढ़ता बुझा दैत अछि। भ्रमण सँ ई सीख होइत अछि जे हम केवल अपन गामक केन्द्र नहि छी, प्रत्येक मनुष्य अपन प्रकारेँ महान अछि, अपन भाषा आऽ संस्कृतिक संग आनक भाषा आऽ संस्कृति सेहो मान्य अछि।
जखन एक मैथिल हिमाचल जाइत अछि, ओतऽ घुमैत-घुमैत, लोकक बात सुनैत, खीर खाइत वा ऊनी कपड़ा किनैत एक नव जीवनक स्वरूप बुझैत अछि।
भ्रमण सँ मनुष्य केँ पर्यावरणक संवेदना उपजैत अछि। ओ देखैत अछि पहाड़ कटि रहल अछि, नदी सूखि रहल अछि आऽ प्लास्टिक सभ घाट पर बहैत अछि इत्यादि इत्यादि। एहन दृश्य भ्रमणकारी केँ भीतर एक जागरूकता पैदा करैत अछि। ताहि हेतु एहि आलेख के माध्यम सँ सुझाव देवाक कोशिश कर’ चाहब जे भ्रमण करैत समय मनुष्य ज़िम्मेदार पथिक बनैथ ओ मात्र दृश्य के अवलोकनार्थी नहि बनैथ बल्कि अवलोकित दृश्य केँ सहेजबाक प्रण लैथ। कियैक त’ भ्रमण एक आध्यात्मिक तपस्या थिक। अपना मिथिला मे ‘पैदल तीर्थ’ करबाक प्रथा रहल अछि लोक दरभंगा सँ बैद्यनाथ धाम, जनकपुर सँ काशी आऽ बनगाँव सँ काठमांडू धरि यात्रा करैत छल। ई यात्रा महज भक्ति नहि, बल्कि स्व-शुद्धिकरण केर प्रक्रिया रहल। भ्रमण जखन कठिन होइत अछि धूप, धूल, थकान, भूख तखन आत्मा केँ सहनशील बनेबाक शक्ति भेटैत अछि।
यात्रा मे मौन सेहो एक पाथेय थिक। जखन हम पथ पर एकाकी चलैत छी आऽ चुपचाप प्रकृति, लोकक भाषा आऽ अपन अन्तरात्मा केँ सुनैत छी तखन ओ यात्रा केवल शरीरक नहि, आत्माक यात्रा बनि जाइत अछि।
काहबाक आशय ई जे मनुष्य जीवन अपन मूल रूप मे भ्रमण थिक कोखि सँ प्रारंभ, संस्कारक संग यात्रा, संबंधक संग सम्वाद, संघर्षक संग अनुभव आऽ अन्ततः समाधिक शान्ति धरि।भ्रमण, जीवन केँ एक खुलल पुस्तक बनबैत अछि जतय प्रत्येक ठाम, प्रत्येक लोक, प्रत्येक क्षण एक नव अध्याय लिखैत अछि।
भ्रमण सँ मनुष्य जीवन मे पर्यावरणीय चेतना विकशित होइत अछि। जेना जखन हम जंगल देखैत छी, पक्षी केँ उड़ैत देखैत छी, पहाड़ पर बर्फ पघलैत देखैत छी तखन एकटा संबंध प्रकृति सँ गूढ़ होइत अछि। हम ओ प्रकृति केँ अपन हिस्सेदारी मानै लगैत छी। जखन देखैत छी जे कतहु जंगल कटि रहल अछि, नदी सूखि रहल अछि, पर्वत पर प्लास्टिकक अंबार अछि त मन अकुला जाइत अछि। भ्रमण मनुष्य केँ पर्यावरणक रक्षक बना सकैत अछि, बस ओकर हृदयक द्वार खुलल होइक।
अंतिम विचार ई अछि जे मनुष्य जीवन स्वयं एक भ्रमण थीक ई पक्का घर नै, एक पड़ाव छी। एही पड़ाव मे जे भ्रमण कऽ अपन मन, आत्मा आ समाज केँ बुझलनि, से साँच जीवन जिएलनि।
भ्रमण के केवल “घुमबाक” नजरिया सँ नहि, बल्कि “सीखबाक”, “संघर्ष करबाक” आऽ “जीवन के विस्तार करबाक” रूप मे देखल जाय, त ई जीवन केँ एक नवीन अर्थ दैत अछि।
तैं विज्ञ बहुजन सब कहैत छैथ जे जीवन एक यात्रा छी जइमे पथ सँ पैघ गुरु आऽ गन्तव्य सँ पैघ अनुभव होइत अछि।
एहि हेतु, अपन मोनक द्वार खोलू, समय निकालू, गाम सँ बाहर निकलू एक नव ठाम, एक नव लोक, एक नव भाषा आऽ एक नव आत्मानुभूति के दिस। भ सकैत अछि एहि यात्राक क्रम मे अहाँ स्वयं केँ भेट क’ सकी।

जीवन पथ अछि, ठीके भ्रमणक रूप,
गन्तव्य सँ भेटत अनुभवक स्वरूप।
जाहि पथ चली हम भेटै अपन मोन,
यात्रा बनत आध्यात्मिक दृष्टिकोन।

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