विद्यापति गीत
– महाकवि विद्यापति
आजु देखल जति के पतिआएत
अपुरुब बिहि निरमान रे ।
जुगल सैल-सिम हिमकर देखल
एक कमल दुइ जोति रे ।
फुललि मधुरि फुल सिंदुर लोटाएल
पाँति बइसलि गज-मोति रे ॥
बिपरित कनक कदलि-तर सोभित
थल-पंकज के रूप रे ॥
तथहु मनोहर बाजन बाजए
जनिजागे मनसिज भूप रे ।
भनइ विद्यापति पूरब पुन तह
ऐसनि भजए रसमन्त रे ।
बुझल सकल रस नृप सिवसिंघ
लखिमा देइ कर कन्त रे ॥
आइ हम एहेन सुन्दरि (राधाजी) केँ देखलहुँ, जिनकर सुन्दरताक वर्णन शायदे कियो पतियाएत । ओ ब्रह्माजी द्वारा अद्भुत आ अपूर्व निर्माण कयल गेलि अछि ।
युगल शैल (पर्वत समान) उन्नत सीना, ताहि पर हिमकर (चन्द्रमा) समान आभा सँ भरल हुनक मुखमंडल अछि – जे एकटा कमल थिक आ ताहि मे हुनक दुइ ज्योति (आँखि) सुशोभित अछि । फुलायल माधुरी फूल केर लालिमा एहेन अछि मानू सिन्दूर लेभरायल (लोटायल) हो आ ताहि मे हुनक विहुँसब सँ जे दाँत सब चमकैत अछि से बुझू जे पाँति मे सजायल (पंक्तिबद्ध) गजमोती (गजमुक्ता) हो ।
बिपरीत कनक-कदलि यानि उन्टा सोन वर्णक केरा थम्भ (नीचाँ पातर उपर मोट, यानि राधाजीक शारीरिक काँइत) केर नीचा मे थल-कमल समान हुनक दुइ चरण छन्हि, जाहि मे मनोहर बाजन बाजि रहल अछि यानि हुनकर पैजनियाँ (पायल) केर छमछम मनहारी आवाज निकालि रहल अछि जे सुनिकय मनसिज भूप यानि कामदेवहु केर राजा स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण जागि उठैत छथि ।
कवि विद्यापति कहैत छथि जे जिनकर पूर्वजन्मक पुण्य कयल अछि, सैह रसमन्त (रसिक) लोकनि एहेन अपूर्व सुन्दरी केँ भजैत (सुमिरैत) छथि आर ई सकल रस (समस्त रहस्य) हमर राजा शिवसिंह जे कि स्वयं लखिमा देवीक कन्त (पति) छथि हुनका बुझल छन्हि ।
हरिः हरः!!
नोटः एहि रचनाक अनुवाद आर बहुते विद्वान् लोक सब कएने छथि, एकटा नागार्जुन (बैद्यनाथ मिश्र यात्री) द्वारा कयल सेहो हमरा अभरल । लेकिन हम ओहि भाव सँ बिल्कुल सहमत नहि छी । उदाहरण स्वरूप आ अपने लोकनि द्वारा मनन करबाक लेल हम हुनकर अनुवाद सेहो यथारूप ‘हिन्दी’ मे राखि रहल छीः
पदावलीक जे रूप हमरा उपलब्ध भेटल, ताहि मे सेहो व्याकरणक सिद्धान्त पर हम किछु परिवर्तन कयने छी । पदावलीक यथारूप संग नागार्जुनक अनुवाद निम्न अछि –
आज देखल जत के पतिआएत अपूरब बिहि निरमान रे.
बिपरित कनक-कदलि-तर सोभित थल-पंकज अपरूप रे.
तथहु मनोहर बाजन बाजए जागए मनसिज भूप रे.
भनइ विद्यापति पुरबक पुन तह ऐसनि भजए रसमंत रे.
बुझए सकल रस राजा सिवसिंह लखिमा देइ केर कन्त रे.
नागार्जुन का अनुवाद –
दो पर्वतों की सीमा पर मैंने चांद देखा है. कमल के एक ही फूल में मैंने दो आलोक देखे हैं.
खिले हुए लाल फूल सिन्दूर में सन गए. गजमुक्ता के दाने दो पंक्तियों में जमे बैठे हैं…
आज जितना जो कुछ देखा, भला किसे विश्वास होगा? विधाता की अनूठी सृष्टि थी वह…
कनक-रचित कदली स्तंभ उल्टे शोभित थे(उनका पतला हिस्सा नीचे था, मोटा ऊपर). नीचे दो थल-कमल(चरण) थे. वहां मनोहर वाद्य बज रहा था(पायल छमक रही थी). यह आवाज़ मानो महाराज कामदेव को जगाने के लिए थी…
विद्यापति कहते हैं- “पूर्व जन्म का संचित पुण्य हो, तभी रसिक व्यक्ति इस प्रकार की युवती पा सकता है… लखिमा देवी(रानी) के पति राजा सिवसिंह ही इन गीतों का मर्म जानते हैं…”
हरिः हरः!!
