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विद्यापति गीतः राधाकृष्णक प्रेम केँ सुन्दर भाव मे वर्णन ‘माधव, कि कहब सुन्दरि रूपे’

1331 भ्यूज

साहित्य

– महाकवि विद्यापति

विद्यापति गीत

(राधाकृष्ण प्रेम आ राधाक रूप केर अति-विलक्षण वर्णन । भाव सँ भरल – महान् भक्त कविक रचना, जे पढ़िते-सुनिते आ मनन करिते हम-अहाँ पवित्र भ’ सकैत छी । सम्पूर्ण पाप सँ छुटकारा भेटि सकैत अछि ।)

माधव, की कहब सुन्दरि रूपे
कतेक जतन बिहि आनि समारल
देखल नयन सरूपे !

पल्लव-राज चरन-युग सोभित
गति गजराजक भाने ।
कनक-कदलि पर सिंह समारल
तापर मेरु समाने ॥
माधव, की कहब सुन्दरि रूपे….

मेरु ऊपर दुइ कमल फुलायल
नाल बिना रुचि पाई ।
मनि-मय हार धार बहु सुरसरि
तओ नहि कमल सुखाई ॥
माधव, की कहब सुन्दरि रूपे….

अधर बिम्ब सन, दशन दाड़िम-बिजु
रवि ससि उगथिक पासे ।
राहु दूर बस नियरो न आबथि
तैं नहि करथि गरासे ॥
माधव, की कहब सुन्दरि रूपे….

सारँग नयन बयन पुनि सारँग
सारँग तसु समधाने ।
सारँग ऊपर उगल दस सारँग
केलि करथि मधुपाने ॥
माधव, की कहब सुन्दरि रूपे….

भनइ विद्यापति सुन बर जौबति
एहन जगत नहि आने ।
राजा सिवसिंघ रूपनारायण
लखिमा देइ पति भाने ॥
माधव, की कहब सुन्दरि रूपे….

भावार्थः

हे माधव! अपनेक नायिका ‘राधा’ केर सुन्दर रूपक वर्णन नहि कयल जा सकैत अछि । कतेक जतन सँ ब्रह्माजी हुनक रचना कएलनि, से एहि नयन सँ प्रत्यक्ष (सरूपे) देखल अछि ।

जिनकर युगल चरण पल्लव-राज अर्थात् कमल समान अछि तथा चलबाक शैली गजराज – हाथीक मदमस्त चाइल जेकाँ चलब छन्हि । सोना समान केराक थम्भ समाज जाँघ उपर सिंह समान पातर डाँर्ह छन्हि, ताहि उपर मेरु पर्वत समान छाती देखाइछ ।

मेरु उपर दुइ गोट कमल फुलायल उरज (स्तन) जे बिना डंटीक बहुते शोभायमान अछि, ताहि पर जे मणिमय हार पहिरने छथि से मानू अनेकों सुरसरिक (गंगाक) बहैत (प्रवाहमान) धार समान देखाइछ, तेँ ओ दुनू कमल (गंगाजलक निरन्तर स्रोत पेला सँ) कहियो नहि सुखाइछ ।

ठोर (लाल रंगक) बिम्बफल समान आ दाँत दाड़िम केर (अनारक) बिया समान एना सुशोभित अछि मानू सूर्य आ चन्द्रमा एकहि संग उगल होइथ । बस, राहु (हुनक केश) कथमपि ल’गो नहि आबय आ एहि सुन्दर चमकैत सूर्य-चन्द्रमाक संयुक्त प्रकाश केँ ग्रास नहि करथि । अर्थात् एहेन सुन्दर चेहरा उपर केशरूपी राहु आबिकय सूर्य-चन्द्रमा समान चमकैत चेहराक सुन्दरता केँ झाँपि नहि दियए – राहु जेकाँ ग्रास नहि बना लियए ।

आँखि हुनकर सारँग यानि हरिण समान आ बयन (बाजब) सेहो सारँग यानि कोयली समान छन्हि, जेकर संधान मे (कटाक्ष मे) स्वयं सारँग यानि काम (कामदेव) बसैत छथि । पुनः हुनकर सारँग यानि ललाटक उपर १० गोट सारँग अर्थात् हुनक केशक लट-गुच्छ भमरा बनिकय हुनकर मुखमंडल पर लटकिकय हुनक आभारूपी फूल सँ मधुपान कय ‘केलि’ (भमराक नाच-गान) कय रहल अछि ।

विद्यापति कहैत छथि – सुनू ब्रजक युवती लोकनि – एहि जगत मे एहेन (सुन्दर) आन कियो नहि छथि । हमर राजा शिवसिंह जे रूपनारायण स्वयं छथि – लखिमादेवीक पति छथि – हुनका सेहो एहि बातक भान (ज्ञान, अनुभव) छन्हि ।

हरिः हरः!!

नोटः हम बेर-बेर कहल करैत छी, फेर कहि रहल छी – मैथिली मे महाकवि विद्यापतिक पदावलीक सम्पूर्ण भाव व अर्थ लगायब अत्यन्त कठिन अछि । परञ्च गुरुश्रेष्ठ रामवृक्ष बेनीपुरी लगायत एहि भारतवर्ष मे लाखों लोक एखन धरि (विगत ८०० वर्ष) मे हुनका सुनबाक, पढ़बाक आ बुझबाक यत्न करैत आबि रहल छथि । जे किछु सामग्री हमरा भेटि गेल करैछ, तेकर आधार पर अपन दृष्टिक पूर्ण सामर्थ्य सँ कविक कल्पना केँ अक्षरशः बुझैत – हुनक भक्तिभावना आ राधाकृष्ण प्रेमक वर्णन करबाक शैली सँ आकर्षित भ’ कय ई भावार्थ आ यदाकदा गाबियो कय अपने सब लग राखि रहल छी । हम स्वयं आश्चर्य मे पड़ि जाइत छी जे वास्तव मे कविक शक्ति कतेक तीक्ष्ण होइछ – ओ कल्पना करैत कतेक गहींर धरि, कतेको रास विम्ब केँ यथारूप मे उकेर दैत अछि । बस, मुंह सँ एक्के टा शब्द निकलैछ ‘वाह विद्यापति – महाकवि, अहाँ केँ बेर-बेर प्रणाम । अहाँ केँ सुमिरन सँ राधाकृष्णक सुमिरन भ’ रहल अछि । बस, हम मरैत काल धरि अहाँक नित्यदर्शन करैत रही ।’

हरिः हरः!!

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