विद्यापति गीत
सुन्दरि, अबहु बचन सुन
सबे परिहरि तोहि इछ हरि
आपु सराहहि पुन ।
लाखे तरुअर कोटिहि लता
जुबति कत न लेख ।
सब फूल मधु मधुर नहि
फूलहु फूल बिसेख ॥
सुन्दरि, अबहु बचन सुन…
जे फुल भमर निन्दहु सुमर
बासि न बिसरए पार ।
जाहि मधुकर उड़ि उड़ि पड़,
सेहे संसार क सार ॥
सुन्दरि, अबहु बचन सुन….
तोहरे चिन्ता तोहरे कथा
सेजहु तोहरे चाब ।
सपनहु हरि पुनु पुनु कए
लए उठए तोर नाब ॥
सुन्दरि, अबहु बचन सुन….
आलिंगन दए पाछु निहारए
तोहि बिनु सुन कोर ।
अकथ कथा आपु अबथा
नयन तेजए नोर ॥
सुन्दरि, अबहु बचन सुन…..
राहि राही जाहि मुँह सुनि
ततहि अप्पए कान ।
सिरि सिवसिंघ रस जानए
कवि विद्यापति भान ॥
सुन्दरि, अबहु बचन सुन….
सुन्दरि, अबहु बचन सुन
सबे परिहरि तोहि इछ हरि
आपु सराहहि पुन ॥
भावार्थः
हे सुन्दरि, हे राधा !! सब केँ छोड़ि अहाँ टा केँ चाहलनि हरि – श्रीकृष्ण ! अपनेक सराहना कयले सँ पुण्य होइछ ।
लाखों तरुअर (वृक्षश्रेष्ठ) आ कोटि कोटि (करोड़ों) लता जेकाँ जुबति (युवती) कतेको छथि जेकर लेख नहि अछि, अर्थात् कतेको युवती छथि जिनक गणना नहि अछि से ओहिना जेना कतेको रास वृक्ष एवं कतेको रास लता सँ ई धराधाम भरल अछि । मुदा जेना सब फूल केर मधु मधुर नहि होइछ, ताहि फूलहु मे फूलक मधुरताक विशेषता होइत छैक । हे सुन्दरि, अहाँ से विशेष फूल थिकहुँ जे हरिक इच्छित भेलहुँ । अपनहिक सराहना कयला सँ पुण्य होइछ ।
जाहि फूल केँ भमरा निन्दहु मे स्मरण करैत रहैछ, जेकर बास (सुगन्ध) केँ बिसरब पार नहि लगैछ (सम्भव नहि होइछ), जाहिपर मधुकर (भमरा) उड़ि-उड़िकय बेर-बेर बैसैछ, भरि संसारक सार ओतहि पबैछ । हे सुन्दरि, अहाँ से फूल थिकहुँ जेकर भमरा स्वयं हरि छथि आ बस अहीं टा सँ नेह रखैत अहाँ केँ भमरा जेकाँ निन्दहु मे सुमिरैत रहैछ, अहींक सुगन्धित सुवास सँ सुवासित बेर-बेर घुमिफिरि अहीँ लग अबैत छथि । बस अपनहिंक सराहना कयला सँ पुण्य भेटैछ ।
जिनका केवल अहीँ टा’क चिन्तन रहैत छन्हि, मात्र अहीँ टा’क कथा (चर्चा, नाम) सुनय मे नीक लगैत छन्हि; सेजहु (शयनशय्या, पलंग पर) पर्यन्त पर अहीँ टा’क चाहत रहैत छन्हि जिनका आ सपनहुँ मे बेर-बेर अहीँक नाम लयकय उठैत छथि । हे सुन्दरि, अहाँ से हरिक नायिका थिकहुँ जे हरि आर सब केँ छोड़िकय अहाँ टा केँ चाहलनि । अपनहिक सराहना सुमिरन मे पुण्य अछि ।
आलिंगन दय पाछु निहारैत छथि मुदा अहाँ बिनु अपन अंक रिक्त (खाली, सुन्न, शून्य) पबैत छथि, आब अपन जे अबस्था छन्हि से अकथ कथा जेकाँ कहल नहि जा सकैछ, ततेक वेदना मे भरि जाइत छथि आ आँखि सँ नोर दहोबहो तेजय (खसबय, बहबय) लगैत छथि । सुन्दरि, आबहु वचन सुनू, अहींक आराधना-सराहना सँ पुण्य भेटत ।
राधा – राधा जाहि मुँह सँ सुनैत छथि, अपन कान ओतहि पाथैत छथि । एहि रस केँ हमर राजा शिवसिंह जनैत छथि, कवि विद्यापति केँ एना भान होइत छन्हि । सुन्दरि, आबहु वचन सुनू । सब केँ छोड़िकय हरि मात्र अहाँक इच्छा कयलनि अछि । अहींक सराहना – मान-मनौव्वैल सँ पुण्य होयत ।
नोटः परमपूज्य रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा देल गेल अर्थ-अनुवादक आधार पर एकर पूर्ण भाव प्रवीणक हृदय सँ उचरल अछि । उम्मीद नहि विश्वास अछि जे महाकविक ई गीत कतेको पाथर हृदय केँ श्री राधा-कृष्ण प्रेमक अलौकिकता सँ पूर्ण ज्ञानी बना देत ।
हरिः हरः!!

1 Comment
प्रेम या श्रृंगार रस के वर्णन कविवर विद्यापति के पद में अद्भुत भेल अछी। भाव संग व्याख्या बढ नीक लागल।
आगां के प्रतीक्षा रहत। बोलल बम।।