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भगवानक दर्शन (मननीय लेख – हिन्दी-अंग्रेजी अनुवाद सहित)

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लेख-विचार

– प्रवीण नारायण चौधरी

भगवान् धरि पहुँचब सहज अछि

हम सब भगवान् मे विश्वास करैत छी । ई हमरा सभक बौद्धिक कल्पना थिक । जखन हमरा सब केँ एतेक अनुभव भेटैत अछि जे हम सब अपना केँ आ अपन परिवेश केँ नीक जेकाँ बुझय लगैत छी, तखनहि हमरा सब केँ स्वतः भगवान् धरि पहुँच भ’ जाइत अछि ।

भगवान् केर सेहो अनेकों प्रकार होइत अछि । नव्य न्याय केर विशेषज्ञ पंडित रुद्रधर झा ‘गूढ़ तत्त्व मीमांसा’ (पुस्तक) मे दू प्रकारक भगवान् – एक वैकल्पिक भगवान् आ दोसर अनिवार्य भगवान् केर बारे मे बहुत मार्मिक व्याख्या कएने छथि । अनिवार्य भगवान् अपन माता-पिता सँ शुरू भ’ अपन कुटुम्बजन, बुजुर्ग लोकनि, गुरु लोकनि, मित्र सब, अतिथि लोकनि, आनों विशिष्ट लोक सब, आदि धरिक जिनका मे एहि मानव जीवन केँ जिबैतकाल किछु न किछु ऐश्वर्य (दैविक गुण आदि) देखब सुनिश्चित भेल, हुनका सब केँ भगवान् कहल जाइत अछि । आ, जखन हमरा लोकनिक मन मे ऐश्वर्यक अनुभव एहेन बिन्दु धरि पहुँचि जाइत अछि जेतय भगवान् व्यक्तिगत रूप सँ तँ नहि देखाइत छथि, मुदा हुनकर अनन्त महिमा हमरा सभ केँ दृश्यमान भ’ जाइत अछि – वैह परमपिता, भगवान् थिकाह ।

पंडित झा अदृश्य शक्ति आ सर्वशक्तिमान भगवानक अस्तित्व केँ अनिवार्य स्वीकार्य नहि कहने छथि । हमरा-अहाँ पर छोड़ि देने छथि, चाहब त मानब आ नहि चाहब त नहि मानब । मनुष्य मे विश्वास स्थापित करबाक लेल प्रकृतिक देल ५ (पाँच) ज्ञानेन्द्रिय संग मन, बुद्धि आ अहंकार अर्थात् प्रकृति केर कुल ८ तत्त्वक माध्यम सँ हम सब ओहि ८ तत्व सँ परिपूर्ण सर्वज्ञ सृष्टिकर्ता केँ बुझि सकैत छी – ओ भगवान् जे ब्रह्माण्ड केर संरचना, व्यवस्था आ सम्पूर्ण आधार केर निर्माण कएने छथि । आब जँ ज्ञान, बुद्धि, मन आ अहंकारक प्रयोग कए हमरा सभक समझ अदृश्य शक्ति धरि नहि पहुँचि सकैत अछि, तखन हम सभ सदिखन केवल सन्देहक घेरा मे, अपन सीमित बौद्धिक सीमा धरि गप्प क’ सकैत छी । एकर मतलब ई नहि भेलैक जे भगवानक अवधारणा गलत अछि ।

ई हमर सभक अपन सीमा अछि जे हमरा सब केँ अपन सीमा में सीमित रहय लेल बाध्य कय रहल अछि । यदि हमर सोच आर चिन्तन हमर दृष्टि केँ स्थूल सँ लय कय सूक्ष्म धरिक सब अवस्था आर घटक धरि पहुँचा सकैत अछि, तखन भगवान् हर तरह सँ आर सब जगह देखय लेल भेटताह, ठीक ओहिना जेना खुला दुनिया खुला आँखि सँ देखाय दैत अछि । जेना आँखि मुनलाक बादो सब किछु देखि सकैत छी, तहिना भगवान् केँ अपन मनक आँखि सँ देखबाक चाही, हुनका बुझबाक चाही आ जँ इच्छा हो त’ हुनका मे लीन भ’ जेबाक चाही – कारण ओ सबहक मालिक छथि । ओ हमरा सब केँ सदिखन अपन संरक्षण (शरण) मे राखथि, एहि लेल हमरा सब केँ प्रार्थना करबाक चाही ।

हरिः हरः !!

ईश्वर तक पहुँचना सहज है

ईश्वर को हम मानते हैं । यह हमारी बौद्धिक कल्पना है । हमें जब इतना अनुभव हो जाता है कि खुद को और हमारे परिवेश को बेहतर ढंग से समझने लगते हैं उसके बाद ही स्वतः ईश्वर तक हमारी पहुँच बन जाती है ।

ईश्वर के भी अनेकों प्रकार हैं । नव्यन्याय के ज्ञाता पंडित रुद्रधर झा ने गूढ़ तत्त्व मीमांसा में ईश्वर के दो प्रकार – ऐच्छिक एवं अनिवार्य ईश्वर के रूप में अत्यन्त मार्मिक व्याख्या किये हैं । अनिवार्य ईश्वर हमारे जन्मदाता से लेकर परिजनों, श्रेष्ठजनों, गुरुजनों, मित्रों, अतिथियों, विशिष्टजनों आदि जिनमें हमें कुछ न कुछ ऐश्वर्य इस मानव जीवन को जीते-जीते अवश्य ही देखने को मिल जाता है, वे सभी ईश्वर कहलाते हैं । और, जब हमारे मन-मस्तिष्क में ऐश्वर्यों की अनुभूति एक ऐसे विन्दु तक पहुँच जाता है जहाँ ईश्वर साक्षात् तो नहीं दिखते, परन्तु उनकी असीम-अनन्त महिमा हमें दिखने लगती है – वही परमपिता परमेश्वर होते हैं ।

अदृश्य शक्ति और सर्वसत्तावान् भगवान् अनिवार्य नहीं माने हैं पंडित झा – यह हम-आपपर छोड़ दिये, आप चाहें तो मानें, चाहें तो नहीं मानें । हम मानव में मान्यता स्थापित करने के लिये प्रकृतिप्रदत्त ज्ञानेन्द्रियाँ (जो पाँच हैं) और मन, बुद्धि, अहंकार – यानि कुल ८ प्रकृति अवयवों से उन ८ अवयवों वाले सर्वज्ञ स्रष्टा – ब्रह्माण्ड की संरचना, पद्धति और समस्त पूर्वाधार बनानेवाले परमेश्वर को समझ सकते हैं । अब यदि ज्ञान, बुद्धि, मन और अहंकार का प्रयोग करते हुए हमारी समझ अदृश्य शक्ति तक नहीं पहुँच सकती तो हम सदैव सन्देह के घेरे में, अपनी परिवेष्ठित बौद्धिक सीमाओं तक ही बात कर सकते हैं । इसका मतलब यह नहीं हुआ कि ईश्वर की परिकल्पना ही गलत है ।

हमारी खुद की सीमितता है जो अपनी सीमा में सिमटने को विवश कर रहा है । यदि हमारी चिन्तन-मनन स्थूल से सूक्ष्म तक की सभी अवस्थाओं और अवयवों तक दृष्टि को ले जा सके तो ईश्वर हर तरह से हर जगह वैसे ही दिखेंगे जैसे कि खुले आँखों से खुला संसार दिख रहा है । जैसे हम अपनी आँखों बन्द कर लेने उपरान्त भी सब कुछ देखते ही रहते हैं, ठीक उसी प्रकार मन की आँखों से ईश्वर को देखें, समझें और दिल करे तो उनमें खो जायें – क्योंकि सबका मालिक वही हैं, हमें सदैव अपने शरण में रखें, यही तो प्रार्थना करना है ।

हरिः हरः!!

It is easy to reach God

We believe in God. This is our intellectual imagination. When we gain so much experience that we start understanding ourselves and our surroundings in a better way, only then we automatically get access to God.

There are many types of God. Pandit Rudradhar Jha, an expert of Navya Nyaya, has given a very poignant explanation of two types of God in his book the “Goodh Tattva Meemaamsaa” – Optional and Compulsory God. Compulsory God is from our birth giver to our relatives, great peoples, teachers, friends, guests, special peoples etc. in whom we definitely get to see some or the other opulence while living this human life, they all are called God. And, when the experience of opulence in our mind reaches such a point where God is not visible directly, but we start seeing His infinite-endless glories – He is the Supreme Father God.

Pandit Jha has not considered the existence of an invisible power and an omnipotent God as a Compulsory One. This is left to us, you may believe it or not believe it. To establish our belief in humans, we can understand the omniscient creator of the universe, the God who is the architect of the universe, its system and the entire foundation, with the help of the sense organs (which are five) given by nature, and mind, intellect and ego, i.e., the total eight elements of nature. Now, if our understanding cannot reach the invisible power using knowledge, intellect, mind and ego, then we can always talk within the circle of doubt, within our own intellectual limits. This does not mean that the concept of God is wrong.

It is our own limitation that is forcing us to confine ourselves to our limits. If our thinking and contemplation can take our vision to all the states and elements from gross to subtle, then God will be seen everywhere in every way, just as the open world is seen with open eyes. Just like we can see everything even after closing our eyes, in the same way we can see God with the eyes of our mind, understand Him and if we wish, we can get lost in Him – because He is the master of all, may He always keep us under His protection, this is what we should pray for.

Harih Harah!!

(Translation Courtesy: Google Translator)

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