लेख विचार
प्रेषित: अशोक कुमार सहनी
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- #दहेजमुक्त विवाहक परिभाषा — एक सामाजिक दृष्टिकोण सँ
दहेज अर्थात कन्यादानक समय पर देल जाइत उपहार आ संपत्ति, जे शुरूआती रूप में कन्या पक्ष द्वारा स्वेच्छा सँ देल जाइत छल, कालांतर में समाज पर भार बनि गेल। एहि प्रथा केँ आजुक समय में दहेजक नाम पर व्यापारिक सौदा बना देल गेल अछि। मुदा एहि सभक विरोध में ‘दहेजमुक्त विवाह’ नामक एक सशक्त आंदोलन समाज में धीरे-धीरे अपन पाँख पसारि रहल अछि। मुदा सवाल उठैछ — दहेजमुक्त विवाह आखिर होइ छै की? की केवल दहेज नहि लेनाई दहेजमुक्त विवाह छी? की बेरोजगार सँ विवाह क’ लेब दहेजमुक्तता छी?
दहेजमुक्त विवाह के मूल भावना
दहेजमुक्त विवाह के मूल में अछि — सम्मान, समानता आ समझदारी। जखन दू परिवार बिना एक-दोसर पर आर्थिक बोझ देनाई के सोच के विवाह करैत छथि, ओ विवाह दहेजमुक्त होइ छै। एहन विवाह में प्रेम, संस्कार, आ सहमति के स्थान प्रमुख होइ छै — न कि गहना, गाड़ी आ नगद पैसाक।
दहेजमुक्त विवाह के परिभाषा केवल ‘नगद नहि लेब’ या ‘लड़की गरीब होअय’ तक सीमित नहि अछि। एहन सोच खुदे दहेज के उलटा रूप होइ छै। किएक तँ जँ समाज कहय लगत जे पढ़ल-लिखल लड़का जँ गरीब लड़की सँ विवाह करत तँ से दहेजमुक्त होइ छै, त’ ओ विवाह दया बनि जायत — सम्मान नहि।
दहेजमुक्त विवाह = समझदारी आधारित विवाह
जखन विवाह क’ आधार लड़काक घरक स्थिति नहि, ओकर विचार, संस्कार, आ व्यवहार होइ छै।
जखन वर-पक्ष द्वारा कन्या पक्ष सँ किछु नहि माँगेल जाइ छै — न उपहार, न खर्च, न साज-सज्जा।
जखन विवाहक आयोजन सादगी सँ होइ छै आ खर्च दुन्नु परिवारक इच्छानुसार, समभाव सँ होइ छै।
जखन वर अपन योग्यता पर गर्व करैत छै आ कन्या सँ कोनो बोझ नहि मांगै छै।
जखन कन्या केँ अपन योग्यता अनुसार जीवन जीबाक स्वतंत्रता भेटै छै — ओहिना जेना वर केँ भेटै छै।
ई होइ छै वास्तविक दहेजमुक्त विवाह।
समाज में प्रचलित भ्रम
अखन समाज में एकटा भ्रम फैला रहल अछि —
“पढ़ल-लिखल लड़की बेरोजगार लड़का सँ बियाह करत तँ ओ दहेजमुक्त विवाह।”
की बेरोजगार सँ विवाह क’ लेब चाही? अवश्य, जँ ओ व्यक्ति मे आत्मसम्मान, कर्तव्यबोध आ भविष्य निर्माण के सोच होइ। मुदा खाली बेरोजगारी के आधार पर विवाह के दहेजमुक्त कहब — सही परिभाषा नहि अछि।
ओहिना,
“नौकरी-पेशा लड़का गरीब, अनपढ़ लड़की सँ विवाह करय तखन ओ दहेजमुक्त।”
ई सोच सेहो समस्या उत्पन्न करैत अछि। जँ विवाह दया या दिखावा बनि जाय — तँ ओ दहेजमुक्त नहि, मानसिक दहेज के स्वरूप बनि जायत।
दहेज मुक्त विवाह के सफल उदाहरण
मिथिला क्षेत्र में अनेक परिवार अब साधारण मंडप में, बिना बैंड-बाजा, बिना गाड़ी-घोड़ा, केवल कन्यादान आ वचन के आधार पर विवाह सम्पन्न क’ रहल छथि।
कतिपय वर अपन विवाह में फोटोग्राफी तक न करा क’ केवल संस्कारक आधार पर विवाह संपन्न करैत छथि।
बहुत लड़की सभ कहैत छथि — “हमर बाबूजी के कोनो दहेज नहि देबाक अछि। जे हमरा मन सँ स्वीकार करत, हम ओहिना जएब।”
ई सब उदाहरण अछि ओ समाज के, जे दहेजक खिलाफ सोचबो करैत अछि आ कदम सेहो उठबैत अछि।
बदलैत सोच के दिशा
दहेज मुक्त विवाह केवल एक दिन के आयोजन नहि — ई सोच के क्रांति छी। एकर प्रभाव:
कन्या पक्ष मानसिक रूप सँ स्वतंत्र होइत छथि।
वर स्वयं पर भरोसा करैत छथि, नहि कि कन्या पक्ष के धन पर।
समाज में स्त्री-पुरुष के बीच बराबरी के भावना पनपैत अछि।
दिखावा, आडंबर आ खर्चीला प्रथा पर रोक लागैत अछि।
आखिर में …
दहेजमुक्त विवाह एकटा आदर्श सोच छी — जे अपन मूल्य पर टिकै छै। ई केवल अमीरी-गरीबी के अंतर समाप्त करबाक नाम नहि, बल्कि संबंध में समानता, सहमति आ समझदारी के नाम छी। जँ एक बेरोजगार युवा दहेज नहि ले क’ विवाह करैत अछि — से सराहनीय बात छी, मुदा ओहि बेरोजगारी के आधार पर विवाह के प्रचार करब गलत संदेश दैत अछि। ओहिना जँ पढ़ल-लिखल युवक अपन जीवनसाथी के संस्कार देखि स्वीकार करैत अछि — त’ से दहेजमुक्त विवाह के सम्मान अछि।
अंत में, दहेजमुक्त विवाह तब कहल जायत जखन विवाह के मूल में प्रेम, सम्मान आ समानता हो — आ कोनो लेन-देन या दया नहि।
