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महाकवि विद्यापतिक भावपूर्ण रचना – नखशिख मे श्रीकृष्णक नायिका राधाक यौवन वर्णन

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नखशिख

महाकवि विद्यापतिक एकटा आर भावपूर्ण रचना ‘नखशिख’ – नायिका (राधाक) सुन्दरताक वर्णन करैत प्राप्त भेल अछि । हम कमजोर छात्र छी, परञ्च पढ़बाक जिद्द अछि । रामवृक्ष बेनीपुरी जेहेन महान् रचनाकार केर सम्पादित ‘पदावली’ सँ मदति लैत ई सुन्दर सन रचना अपन पाठक सब लग परोसैत छी । पढ़ब आ भावविह्वल बनब तेकर गारन्टी हमर बुझू ।

कि आरे ! नव जौवन अभिरामा ।
जत देखल तत कहए न पारिअ,
छओ अनुपम एक ठामा ।
के आरे…..

हरिन इन्दु अरबिन्द करिनि हेम
पिक बूझल अनुमानी ।
नयन बदन परिमल गति तन रुचि
अओ अति सुललित बानी ।।
कि आरे….

कुच जग परसि चिकुर फुजि पसरल
ता अरुझायल हारा ।
जनि सुमेरु ऊपर मिली ऊगल
चाँद बिहिनु सब तारा ।।
कि आरे…

लोल कपोल ललित मनि-कुंडल
अधर बिम्ब अध जाई ।
भौंह भ्रमर नासापुट सुन्दर
से देखि कीर लजाई ।।
के आरे….

भनइ विद्यापति से बर नागरि
आन न पाबइ कोई ।
कंसदलन नारायन सुन्दर
तसु रंगिनि पए होई।।
कि आरे….

आहा! हुनक नव यौवन मोहक अछि ! जते देखलहुँ तते कहब पार नहि लगैछ ।

छबो गोट अनुपम एक्कहि ठाम भेटैछ । हरिन, इन्दु (चन्द्र), अरविन्द (कमल), करिनि (हथिनी), हेम (सोना) आ कोयली । ई सब स्वतः अनुमान सँ बुझा जाइछ । नयन (आँखि), बदन (शारीरिक अनुहार), परिमल (शरीरक सुगन्धि), गति (चलबाक शैली), तन रुचि (शरीरक कान्ति) आर अत्यन्त सुललित वाणी (मीठ बाजब जे सुनिते मुग्ध भ’ जाइछ मन) – ई सब हुनक छबो उपमान थिक । अर्थात् हुनक आँखि हरिनक समान, चेहरा चन्द्रमा समान, शारीरिक सुगन्ध कमल फुल समान, चाइल हथिनी समान, सोना समान चमकैत शरीरक आभा आ मीठ बाजब कोयली समान अछि ।

हुनक युगल कुच (उरोज, स्तन) केँ स्पर्श करैत चिकुर फुजि पसरल (खुजल केश पसरल) अछि जाहि पर सुन्दल गलाक हार एना उरझल (अटकल) अछि मानू जेना चन्द्रमा सुमेरु पर्वत सँ मिलल ताराविहीन आकाश मे उगल हो ।

कान मे पहिरने मणिक कुंडल हुनक गाल पर कम्पायमान अवस्था मे सुशोभित अछि आर ठोरक लाली एहेन जे बिम्बफलक (जे लाल रंगक फल थिक ओकर) लालिमा सेहो कम पड़ि जाइत अछि । हुनक भौंह भ्रमर समान (भमरा समान कारी) आ नासापुटक सुन्दरता देखिकय सुग्गा सेहो लजा जाइत अछि ।

विद्यापति कहैत छथि जे एहि रहस्य केँ चतुर नारी (नागरि) लोकनि मात्र बुझि सकैत छथि, आन एकर थाह नहि पाबि सकैत अछि । ई सुन्दरता कंसदलन नारायण समान सुन्दर भगवान् श्रीकृष्ण, हुनक प्रेयसी (राधा) मात्रक होइत छन्हि ।

हरिः हरः!!

नोटः मैथिली भाषाक अनेकों विद्वान् लोकनि सँ अनुरोध जे उपरोक्त भाव मे कतहु कोनो गलती बुझाय त जरूर सुधार कय देब । अग्रिम धन्यवाद !!

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