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नेपाली छन्दकविक मैथिली लेल शुभकामनाः ‘प्रिय बनोस्’

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छन्दकवि रोहिणी रसिकजीक एकटा नेपाली कविता

नेपालक राष्ट्रभाषा नेपाली भाषाक बाद मैथिली सर्वाधिक प्रयोग कयल जायवला भाषा थिक । मैथिलीभाषी समुदाय व नेपालीभाषी समुदाय सैकड़ों वर्ष सँ एक संग – एक संयुक्त समाज व राष्ट्र निर्माण कय केँ आपस मे मैत्रीभाव संग रहैत आबि रहल अछि । साविक मे मिथिला सँ तिब्बत केर बाट मे पड़यवला ट्रान्जिट मार्ग रूप मे रहल स्थान सब मे सिमरौनगढ़, मकवानपुर, भक्तपुर, काठमांडू आदिक स्थान आइयो अपन विशिष्ट ऐतिहासिकता सँ नेपाल मे विशेष स्थान रूप मे जानल-मानल जाइछ । परञ्च कालान्तर मे एकल भाषा नीतिक कारण नेपाली भाषा वाहेक अन्य भाषाभाषी प्रति उपेक्षाक कारण कतेको तरहक राजनीतिक वैमनस्यताक प्रसार भ’ गेला सँ, मैथिलीभाषी समुदाय केँ मिथिला सँ इतर अन्यान्य शाब्दिक सम्बोधन कयला सँ, मिथिलाक्षेत्रक नामकरण ‘मधेश’ तथा ओहि क्षेत्रक निवासी केँ ‘मधेशी’ आदि कहिकय सरकारी अवसर, सैन्यबल, राज्य संचालनक अन्य निकाय सब मे समान अवसर नहि देबाक कारण कतेको तरहक साम्प्रदायिक मतभेद-मनभेदक प्रसारक अवस्था मे भाषिक सौहार्द्रताक नव मित्रता सँ आपसी भाइचारा मजगूत होयबाक प्रयास भ’ रहल अछि । एहि तरहक एक प्रयास ‘बहुभाषिक कवि गोष्ठी’ मे मैथिली सहित नेपाली व अन्य भाषाक कवि लोकनि विराटनगर मे प्रत्येक मासक दोसर शनि दिन एकठाम अबैत छथि । एहि क्रम मे काल्हि नेपालक प्रसिद्ध छन्दकवि रोहिणी रसिक द्वारा एकटा सुन्दर छन्द-रचना मैथिली भाषाक उत्तरोत्तर प्रगति लेल वाचन कयल गेल छल । मैथिली जिन्दाबादक पाठक लोकनि लेल ई नेपाली संग-संग मैथिली भावानुवाद सहित प्रस्तुत अछि ।

शीर्षक :- प्रिय बनोस्

– छन्दकवि रोहिणी रसिक

छन्द:- शार्दूलविक्रीडित

यो प्राचीन सुरम्य शान्त स्थलमा शालीन संस्कारले
आफ्नै शिष्ट विशिष्ट वैभवलिई आत्मीय आचारले
छन् सम्पन्न तथापि मैथिलहरू जाग्छन् जगाऔं मिली
यस्तो लाग्छ समस्तको प्रिय बनोस् भाषा सधैँ मैथिली।

शिल्पीकारहरू कलानिधिहरू सम्मानका योग्य छन्
उस्तै हिम्मतिला जुझारु दरिला लाग्छन् सबै दक्ष छन्
जो छौं उर्वर क्षेत्रभित्र रहने संस्कार साँचौं मिली
यस्तो लाग्छ समस्तको प्रिय बनोस् भाषा सधैँ मैथिली।

भाषानै पहिचान साख गरिमा रङ्गीन उद्दीपन
भाषा सान इमान मान महिमा दर्शाउने माध्यम
पुर्खाको अपनत्वका विषयले हो लाग्छ अग्लो चुली
यस्तो लाग्छ समस्तको प्रिय बनोस् भाषा सधैं मैथिली।

भाषाले जसरी सिकाउँछ सधैँ हौ नीति जान्ने अनि
बन्नू नैतिकवान् विनम्र विनयी विद्वान् हुने छौ भनी
जान्ने जान्न सकून् सिकून् असजिलो लाग्नेहरूले मिली
यस्तो लाग्छ समस्तको प्रिय बनोस् भाषा सधैं मैथिली।

यो भाषा सबको बनाउन जुटौं पेवा बनायो भने
भाषा खुम्चिन मर्न सक्छद कतै भाषा गनायो भने
भाषाको अपनत्व गर्नुछ यहाँ जानेर जाग्नूस् अलि
यस्तो लाग्छ समस्तको प्रिय बनोस् भाषा सधैं मैथिली।

भाषा संग्रह हो विचार मनका पोख्ने सबैको प्रिय
भाषा माध्यम हो उदेश्य सबमा पोख्ने भई निर्भय
छोडी बोक्न खसाल्न एक नभए के हुन्छ डाहा गरी
अग्लो बन्न सकोस् सबैसँग हिडीँ भाषा सधैं मैथिली।

हामी माझ सयौं यसै समयका भाषाहरू छन् यहीँ
जम्मैको अपनत्व होस् सब उठून् भाषाहरू तङ्ग्रिई
छोडी भेद विभेद गर्न मिथिला लागोस् र लेओस् गति
यस्तो लाग्छ समस्तको प्रिय बनोस् भाषा सधैँ मैथिली ।

 

मैथिली भावानुवादः

– प्रवीण नारायण चौधरी

ई प्राचीन सुरम्य शान्त स्थलमे शालीन संस्कारसँ
अपन शिष्ट विशिष्ट वैभव लेने आत्मीय आचारसँ
अछि सम्पन्न तैयो मैथिल सब जागत जगाउ सबमिलि
एना लगैछ सभक प्रिय बनत भाषा सदा मैथिली

शिल्पीकार कलानिधि सब सम्मानक योग्य छथि
ओहने हिम्मती जुझारू बली लगैछ सब दक्ष छथि
जे छी उर्वर क्षेत्रभितर रहनिहार संस्कार सजाउ मिलि
एना लगैछ सभक प्रिय बनत भाषा सदा मैथिली

भाषे छी पहिचान साख गरिमा रंगीन उद्दीपन
भाषा शान इमान मान महिमा दर्शेबाक माध्यम
पुरखाक अपनत्वक विषयसँ लागैछ शिखर चुलि
एना लगैछ सभक प्रिय बनत भाषा सदा मैथिली

भाषा जेना सिखबैछ सदा होइ नीति विज्ञ जेना
बनू नैतिकवान् विनम्र विनयी विद्वान् होयब तेना
ज्ञानी जानय सकथि सिखय अज्ञानी सेहो मिलि
एना लगैछ सभक प्रिय बनत भाषा सदा मैथिली

ई भाषा सभक बनाबय जुटू प्रयत्न करब तँ
भाषा सिकुड़ि मरि सकैछ जँ भाषा बिगड़य तँ
भाषासँ अपनत्व करय पड़ैछ से जानि जागू कनि
एना लगैछ सभक प्रिय बनत भाषा सदा मैथिली

भाषा संग्रह छी विचार मोनक प्रकट सभक प्रिय
भाषा माध्यम छी उदेश्य सबलग प्रकट भ’ निर्भय
छोड़ि उठाउ खसाउ एक नहि भ’ के कि हो डाहे करी
उपर उठि सकय सभक संग चलि भाषा सदा मैथिली

अपन बीच सैयौं एहेन समयकेर भाषासब अछि एतय
सभक अपनत्व हो सब उठय भाषासब बलगर भय
छोड़ि भेद विभेद करब मिथिला लागय लियय गति
एना लगैछ सभक प्रिय बनत भाषा सदा मैथिली

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