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मिथिलाभाषा रामायण – उत्तरकाण्ड – सातम अध्यायः रामक भ्राता व सन्तान सब केँ राज्याभिषेक, कालपुरुषक आगमन आ लक्ष्मणक स्वर्ग जायब

585 भ्यूज

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण

उत्तरकाण्ड – सातम अध्याय

रामक भ्राता व सन्तान सब केँ राज्याभिषेक, कालपुरुषक आगमन आ लक्ष्मणक स्वर्ग जायब

।चौपाइ।

अथ एक समय युधाजित नाम । आबि अयोध्या भरतक माम ॥१॥
रघुनन्दन-आज्ञा काँ पाय । निजपुर लय गेल भरत लेआय ॥२॥
महती सेना समर अभीति । गन्धर्व्वक नायक जन जीति ॥३॥
नाम पुष्करावति जे धाम । पुष्कर भेला नृप तहिठाम ॥४॥
तक्षशिलापुर मे पुन तक्ष । सुत दुहु नर-वर भरत समक्ष ॥५॥
भरत कयल सुत-युग अभिषेक । बड़ धन धन्य पूर सविवेक ॥६॥
अपने आबि अयोध्या भरत । रामचन्द्र-सेवा मे निरत ॥७॥
पुन लक्ष्मण काँ कहलनि राम । पश्चिम देश करू सङ्ग्राम ॥८॥
महामल्ल दुर्ज्जन जिति लेब । तनिक राज्य सुत दुनु काँ देब ॥९॥
अङ्गद चित्रकेतु जनि नाम । उचित निवास देब दुइ ठाम ॥१०॥
कय अभिषेक शीघ्र पुनि आउ । हमरा छोड़ि अनत जनु जाउ ॥११॥
जेहन रघूत्तम-आज्ञा-वचन । सत्वर लक्ष्मण कयल से रचन ॥१२॥
रघुनन्दन-पद-सेवा-निरत । बन्धु यहन दोसर के करत ॥१३॥
अथ एक समय राम महिपाल । पुर तापस बनि पहुँचल काल ॥१४॥
लक्ष्मण द्वारपाल तहिठाम । मुनि पुछलनि कत छथि नृप राम ॥१५॥
हमर आगमन ततय शुनाउ । प्रभु-रुचि पाबि ततय लय जाउ ॥१६॥
शुनि लक्ष्मण गेला तहिठाम । छल छथि देव-देव जत राम ॥१७॥
दर्शनेच्छ तापस एक द्वार । आयल छथि जेहन हो विचार ॥१८॥
हुनि मुनि काँ सादर लय आउ । वत्स ततय सत्वर अहँ जाउ ॥१९॥
तेज-पुञ्ज मुनि बनल विविक्त । अनलराशि उपमा घृत-सिक्त ॥२०॥

भावार्थः

एक समय भरतक मामा युधाजित अयोध्या अयलाह, आर राम सँ अनुमति लयकय भरत केँ अपना ओतय लय गेलाह । लड़ाइ मे नहि डरायवला हुनकर विशाल सेना सब गन्धर्व सभक नायक लोकनि केँ जीति लेलक । ओहि स्थानक नाम पुष्करावती राखल गेल आर भरतक पुत्र पुष्कर केँ ओतय राजा बनायल गेल । फेर तक्षशिला नगर मे भरतक पुत्र तक्ष राजा बनायल गेलाह । ई दुनू पुरुषश्रेष्ठ भरतक पुत्र भेलथि । भरत धन-धान्य आ विवेक सँ भरल-पुरल ओहि दुनू पुत्र लोकनि केँ राज्याभिषेक कयलनि । तेकर बाद स्वयं अयोध्या घुरि अयलाह आ रामक सेवा मे लागि गेलाह । फेर राम लक्ष्मण सँ कहलनि – “अहाँ पश्चिम दिशा मे लड़ाइ करू । ओतय दुर्जन महामल्ल केँ जीतब आर ओकर राज्य अपन दुनू पुत्र केँ देब, जिनकर नाम अंगद आ चित्रकेतु छन्हि । दुनू पुत्र केँ दुइ ठाम निवास देबनि । ओहि दुनूक राज्याभिषेक कय केँ अहाँ घुरि आयब । हमरा छोड़ि कतहु जायब नहि ।” राम जेना-जेना कहलनि, लक्ष्मण तुरत तेना-तेना कयलनि । रामक चरणक सेवा मे लागल एहेन कोन दोसर भाइ कय सकैत अछि ! ॥१-१३॥

कालपुरुष केर आगमन आर लक्ष्मणक स्वर्ग जायब

एक समय, जखन राम राजा छलथि, काल तापस केर रूप धारण कय केँ हुनक नगर पहुँचलाह । ताहि समय लक्ष्मण द्वारपाल रहथि । तापस मुनि पुछलन्हि – “राजा राम कतय छथि ? हुनका हमर अयबाक सूचना देल जाउ आर हुनका सँ अनुमति लय केँ हमरा हुनका लग लय चलू ।” ई सुनिकय लक्ष्मण ओतय गेलाह जेतय देवक देव राम विराजमान छलथि । ओ राम सँ कहलनि – “अपनेक दर्शन वास्ते एकटा तापस द्वार पर उपस्थित छथि । अपनेक जेहेन आज्ञा हो ।” राम कहलनि – “हे वत्स, अहाँ जल्द ओतय जाउ आ ओहि तापस केँ आदर संग लय अनियौन ।” ओ कपटी तापस स्पष्ट रूप सँ तेज सँ भरि गेल जेना घी ढारला सँ आगि प्रज्वलित भ’ उठैत अछि ॥१४-२०॥

।दोहा।

दीप्यमान निज तेज सौँ, ओ देखल रघुवीर ॥२१॥
मधुर मधुर कहलनि ततय, आशिष-वचन गभीर ॥२२॥

भावार्थः

अपन तेज सँ चमकैत ओ तापस राम केँ देखलनि आ ओतय मीठ स्वर मे हुनका किछु आशीर्वाद देलनि ॥२१-२२॥

।चौपाइ।

बड़ स्वागत पूजन-विधि सकल । रामचन्द्र पूछल निर्व्विकल ॥२३॥
रघुवर दिव्यासन-आसीन । मुनि काँ पुछल वचन छलहीन ॥२४॥
अपने अयलहुँ एतय यदर्थ । बुझि उद्यम हम करू तदर्थ ॥२५॥
ओ कहलनि शुनु रघुवर भूप । कानहिँ कहब एकान्ते चूप ॥२६॥
शुनथि न जन पुन देख न नयन । शुनल वचन रह मानस शयन ॥२७॥
जौँ जन तेहि अन्तर हठ अयत । अपनैँक हाथ मरण तनि हयत ॥२८॥
यहन प्रतिज्ञा करु प्रतिपाल । तखन कहब अभिमत महिपाल ॥२९॥
लक्ष्मण काँ कहलनि रघुनाथ । द्वार सज्ज रहु असि लय हाथ ॥३०॥
एको व्यक्ति नहि आबय पाब । सम्प्रति पत्रादिक नहि लाब ॥३१॥
हठ सौँ जे करता सञ्चरण । हमरहि कर सौँ तनिकर मरण ॥३२॥
तखन कहल प्रभु अछि एकान्त । कहल जाय मुनि की वृत्तान्त ॥३३॥
रघुवर सौँ कहलनि सद्भाव । चलल जाय निज धामहिँ आब ॥३४॥
कालपुरुष हम तापस-रूप । अयलहुँ विधिक पठाओल भूप ॥३५॥
रण-दुर्ज्जय दशमौलिक मरण । धरणीभार कयल प्रभु हरण ॥३६॥
निज मर्य्यादा राखल जाय । विधिक कहल हम देल शुनाय ॥३७॥
रघुनन्दन कयलनि स्वीकार । यदपि सकल छल निज व्यवहार ॥३८॥

भावार्थः

राम पूरा विधिपूर्वक हुनकर बहुते आवभगत आ पूजा कयलनि, फेर हुनका सँ सहज भाव सँ पुछलन्हि – “अपने एतय कोन काज सँ अयलहुँ, से जँ हम जानी त ओ पूरा करबाक प्रयास करी ।” मुनि कहलनि – “हे रामा राम, सुनू । ई बात हम कान मे चुपेचाप असगर मे कहब । एहि बात केँ कियो सुनय नहि; कियो आँखि सँ देखय नहि । सुनल बात मनहि मे समायल रहय । जँ कियो व्यक्ति अचानक भीतर आओत तँ अहाँ अपनहिं हाथ सँ ओकरा मारि देबैक । हे राजा, अहाँ पहिने ई प्रतिज्ञा कयल जाउ, तखन हम अपन मोनक बात कहब ।” ई सुनिकय राम लक्ष्मण सँ कहलनि – “अहाँ हाथ मे तलवार लेने द्वार पर तैनात रहू । कियो भीतर नहि आबि पाबय । एखन चिट्ठी-पत्री सेहो नहि लायब । जे कियो बलजोरी घुसत, हमरा हाथ सँ ओकर मृत्यु हेतैक ।” एकर बाद राम कहलनि – “हे मुनि, आब एकान्त अछि । कहू, कि बात अछि ?” मुनि शुद्ध भाव सँ राम सँ कहला – “आब अपन धाम चलू । हम कालपुरुष थिकहुँ । तापस केर कपट-वेष बनाकय आयल छी । हे राजा, हमरा ब्रह्मा पठौलनि अछि । हे प्रभु ! अपने लड़ाइ मे नहि जितय योग्य रावण केँ मारि चुकल छी आ धरतीक भार केँ दूर कय चुकल छी । आब अपन देवोचित मर्यादाक पालन कयल जाउ । ब्रह्मा जे कहलनि से हम अपने केँ सुना देलहुँ ।” राम ई स्वीकार कय लेलनि, हालांकि ई सब हुनकर अपनहि खेल छलन्हि ॥२३-३८॥

।सोरठा।

दुर्व्वासा तहिकाल, कालक प्रेरित प्राप्त तहँ ॥३९॥
के बुझ कोप विशाल, लक्ष्मणकाँ कहलनि यहन ॥४०॥

भावार्थः

ताहि समय कालपुरुषक प्रेरणा सँ दुर्वासा ऋषि ओतय पहुँचलाह । के जनैत छल जे ओ एतेक क्रोधी छथि । ओ लक्ष्मण सँ एना कहलनि – ॥३९-४०॥

।चौपाइ।

लक्ष्मण सत्वर नृपतट जाउ । रामभद्र सौँ भेँट कराउ ॥४१॥
से पुन उत्तर देल शुनाय । क्षण भरि क्षमा कयल मुनि जाय ॥४२॥
रामचन्द्र सौँ कहु की काज । से सम्पन्न करब हम आज ॥४३॥
राजा कार्य्यान्तर-आरूढ़ । के बुझ नृपतिक आशय गूढ़ ॥४४॥
केओ सम्प्रति नहि करय प्रवेश । श्रीरघुनन्दन नियम निदेश ॥४५॥
नृप-आज्ञाक करब नहि भङ्ग । के हो हठ सौँ अनल-पतङ्ग ॥४६॥
से शुनि मुनि काँ बाढ़ल कोप । काल करय न ककर मति-लोप ॥४७॥
हमर अवज्ञा नृपतिक द्वार । मुनिजन काँ थिक अधिक अभार ॥४८॥
जौँ नहि कहल करब ई काज । कतय महीपति कत ई राज ॥४९॥
परिजन-सहित भस्म कय देब । नृपतिक द्वार अनादर लेब ॥५०॥
शुनि मन लक्ष्मण कयल विचार । बड़ सङ्कट पड़ल व्यवहार ॥५१॥
जौँ जायब छूटत ई लोक । कालक दण्ड ककर बुत रोक ॥५२॥
नहि जायब तौँ निकट अनर्थ । कालक निकट यतन हो व्यर्थ ॥५३॥
एक हमर जौँ होयत नाश । रघुनन्दन रहता निस्त्रास ॥५४॥
प्रजालोक आनन्दित रहत । अपयश पाप हमर नहि कहत ॥५५॥
यहन विचारि राम-नृप-वास । कयल प्रवेश कहल निस्त्रास ॥५६॥
सावधान प्रभु परमोदार । आयल छथि दुर्व्वासा द्वार ॥५७॥
काल विसर्ज्जन मुनिक प्रणाम । शुनितहिँ जाय कयल प्रभु राम ॥५८॥
कि करब टहल कहल मुनि जाय । मुनि-सत्कार गृही काँ न्याय ॥५९॥

भावार्थः

“हे लक्ष्मण, अहाँ तुरत राम लग जाउ आर हमरा हुनका सँ भेंट कराउ ।” लक्ष्मण उत्तर देलनि – “हे मुनि, क्षण भरि वास्ते क्षमा कयल जाउ । बताउ अहाँ केँ राम सँ कोन काज अछि ? हम आइये ओ काज पूरा कय देब । राजा दोसर काज मे व्यस्त छथि । राजाक भितरिया बात के जनैछ ! राम आज्ञा देलनि अछि जे एखन कियो भीतर नहि आबय । हम राजाक आज्ञा केर उल्लंघन नहि करब । के हठ कय केँ आगि मे पतंग बनय जाय !” ई सुनिते दुर्वासा ऋषि अत्यन्त कुपित (क्रोधित) भ’ गेलाह । काल केकर बुद्धि केँ नहि बिगाड़ैछ ! ओ बजलाह – “राजाक द्वार पर हमर एहेन अपमान होयत ? ई त मुनि सभक बड़ा भारी अवहेलना भेल । यदि अहाँ हमर ई कहल नहि करब त कतय अहाँक राजा जेताह आ कतय ई राज्य – हम परिजन लोकनिक सहित राम केँ भस्म कय देबनि आ राजाक द्वार पर अपन अपमानक बदला लेब ।” ई सुनिकय लक्ष्मण मन मे सोचलनि – “हम त बड़ा भारी असमंजस मे पड़ि गेलहुँ, कि करू, कि नहि करू । जँ भीतर जाइत छी त एहि दुनिया सँ चलि जायब । काल केर दंड केँ रोकनाय केकर बूत्ताक बात अछि ! अगर नहि जाइत छी त सभक अनर्थ निश्चित अछि । कालक सोझाँ उबरबाक कोशिश बेकार अछि । यदि हम अकेले मरैत छी त राम पर कोनो खतरा नहि हेतनि । प्रजा सेहो आनन्द सँ रहत । ओ सब हमरा उपर कलंक नहि लगाओत । हम कोनो बदनामी नहि होयत ।” एना सोचिकय ओ राजा रामक भवन मे पैसि गेलाह आ बिना कोनो डर केँ हुनका सँ कहलनि – “हे परम उदार प्रभु, सावधान होउ । दुर्वासा ऋषि द्वार पर पधारला अछि ।” राम ई सुनिते काल केँ विदा कय केँ मुनि केँ प्रणाम कयलनि आ कहलनि – “हे मुनि, आज्ञा करू । हम अपनेक कोन सेवा करू ? मुनि लोकनिक सत्कार करब गृहस्थक धर्म अछि ।” ॥४१-५९॥

।दोहा।

कहल उपासल छलहुँ हम, शुनु नृप वर्ष हजार ॥६०॥
सिद्ध अन्न भोजन करब, मानस मुख्य विचार ॥६१॥

भावार्थः

दुर्वासा कहलनि – “हे राजा, सुनल जाउ । हम हजार वर्ष सँ भूखल छी । आइ सिद्ध अन्न (भात) खायब ।” राम एहि आज्ञाक पालन केँ सब सँ पहिल कर्तव्य बुझलनि ॥६०-६१॥

।चौपाइ।

कहयित कथा पाक सम्पन्न । भोजन कयल अमृत सन अन्न ॥६२॥
मुनि सन्तुष्ट गेला निजधाम । स्मरण कयल आज्ञा से राम ॥६३॥
चिन्ता दुःख कहल की जाय । हा हत हा हत लक्ष्मण भाय ॥६४॥
स्नेह प्रतिज्ञा दुख मन व्याप । विह्वल विकल रहथि चुपचाप ॥६५॥
से देखि लक्ष्मण जोड़ल हाथ । चिन्ता तेजल जाय रघुनाथ ॥६६॥
कालक गति के रोकय पार । तत्त्वविचार वृथा संसार ॥६७॥
प्रभुक निदेश वृथा भय जाय । घोर नरक हमरा तन पाय ॥६८॥
हमरा विषय नाथ जौँ प्रीति । पालन कयल जाय नृप-नीति ॥६९॥
हमर विचार उचित यहिठाम । पालन कयल जाय नहि साम ॥७०॥
करु निश्शङ्क हमर परित्याग । नीति नृपति काँ दोष न लाग ॥७१॥
लक्ष्मण-वचन शुनल रघुवीर । चिन्तातुर मानस नहि थीर ॥७२॥
सभ मन्त्री काँ लेल बजाय । गुरु वसिष्ठ काँ पूछल न्याय ॥७३॥
काल-यतीक व्यवस्था-सार । दुर्व्वासाक ततय सञ्चार ॥७४॥
अपन प्रतिज्ञा कथा समग्र । लक्ष्मण-प्रीति नीति मन व्यग्र ॥७५॥
शुनि प्रभु-वचन सचिव गुरु सकल । कहल विचारक वचन अविकल ॥७६॥
कयल धराक भार सभ हरण । जायत अपन धाम ई चरण ॥७७॥
धर्म्म-प्रतिज्ञा राखल जाय । लक्ष्मण त्याग सकल मत न्याय ॥७८॥
शुनलनि अर्थ धर्म्मयुत सार । रामचन्द्र मन ठीक विचार ॥७९॥
लक्ष्मण काँ कहलनि प्रभु सैह । करु गय धर्म्म-व्यवस्था जैह ॥८०॥
परित्याग बध एक समान । सज्जन काँ कह धर्म्म प्रधान ॥८१॥

भावार्थः

आज्ञा करिते भोजन तैयार भ’ गेल । मुनि अमृत जेहेन अन्न खयलनि । खा-पी कय मुनि सन्तुष्ट भ’ अपन स्थान पर चलि गेलाह । तखन राम अपन ओहि आज्ञा केँ याद कयलनि । हुनकर मोन मे अवर्णनीय चिन्ता आ वेदना भेलनि । ओ हाहाकार करय लगलाह – “हाय-हाय, हा भ्राता लक्ष्मण !” एक दिश भ्रातृस्नेह रहनि आ दोसर दिश ओ प्रतिज्ञा । ओ पीड़ा सँ भरि गेलाह । विकल आ विह्वल भ’ चुपचाप ठाढ़ रहलाह । से हाल देखिकय लक्ष्मण हाथ जोड़िकय कहलनि – “हे राम, अपने चिन्ता जुनि कयल जाउ । कालक गति केँ के रोकि सकैत अछि ? एहि संसार मे तत्त्व-मीमांसा करब बेकार अछि । यदि हमरा रहैत अहाँक आज्ञा विफल भ’ जाय त हमर ई शरीर कोन काजक ? हम त घोर नरक पायब । यदि अहाँक हमरा पर स्नेह अछि त राजाक जे उचित कर्तव्य अछि तेकर पालन कयल जाउ । हमर यैह विचार अछि जे एहि मे साम (समझौता) केर कोनो अवसर नहि अछि । बेधड़क हमर त्याग कयल जाउ । राजा केँ अपन नीति अनुसार कोनो काज करय मे दोष नहि छैक ।” राम लक्ष्मणक बात सुनलनि । हुनकर मन चिन्ता सँ व्याकुल भ’ दहलय लगलन्हि । ओ सब मंत्री लोकनि केँ बजौलनि । गुरु वसिष्ठ सँ पुछलनि जे कि करब उचित होयत ? राम कहलनि जे केना तापस-वेषधारी काल प्रतिज्ञा करौलनि, केना ऋषि दुर्वासा पहुँचलाह । स्वयं राम केना प्रतिज्ञा कयलनि तथा केना एक दिश लक्ष्मण प्रति स्नेह आ दोसर दिश प्रतिज्ञापालनक नीति – एहि द्विविधा मे चित्त व्याकुल छलन्हि । रामक बात सुनिकय सब मंत्री लोकनि आ गुरुजन लोकनि ठीक-ठीक विचार देलनि । “अपने पृथ्वीक भार दूर कय देलहुँ । आब अपने देवलोक मे पधारल जाउ । अपन प्रतिज्ञा रूपी धर्मक पालन कयल जाउ । लक्ष्मण केँ त्यागि देनाय हर प्रकार सँ उचित होयत ।” राम धर्मसम्मत तत्त्वार्थ सुनि लेलनि । हुनकहु यैह ठीक जँचलनि । राम लक्ष्मण सँ ओहि अनुसारें कहलनि – “वैह करू जे धर्मक अनुरू अछि । धर्मिष्ठ सज्जन लोकनिक कहब अछि परित्याग कयनाय आ वध कयना दुनू बराबर अछि ।” ॥६२-८१॥

।दोहा।

शुनि लक्ष्मण रघुनाथ-पद, कयलनि विनत प्रणाम ॥८२॥
दुःख शोक सौँ भरल से, गेला सत्वर धाम ॥८३॥

भावार्थः

ई सुनिकय लक्ष्मण रामक चरण मे प्रणाम कयल आ शोक सँ व्याकुल भ’ तुरत अपन महल मे गेलाह ॥८२-८३॥

।सोरठा।

से सरयूतट जाय, कयल आचमन शुद्ध-मन ॥८४॥
दृढ़ आसन सम काय, नव द्वार संयमित कय ॥८५॥
मस्तक पवन चढ़ाय, ध्यान निरन्तर ध्येय-पद ॥८६॥
देखि देव-समुदाय, सुमन वृष्टि कय स्तुति करथि ॥८७॥
लक्ष्मण काँ निजधाम, शचीकान्त लय जाय तहँ ॥८८॥
विष्णु-अंश अभिराम, जानि करथि पूजा तनिक ॥८९॥

भावार्थः

फेर सरयू तट पर जाकय आचमन कय मन केँ शुद्ध कयलनि । शरीर केँ सीधा कय आ समस्त नौ द्वार केँ काबू मे कय केँ अचल समाधि लगौलनि । श्वास केँ मस्तिष्क मे लय गेलाह । अविच्छिन्न रूप सँ ध्येय ब्रह्म केर ध्यान कयलनि । देवता लोकनिक हुनकर समाधि देखि-देखिकय फूल बरसाबैत स्तुति करय लगलाह । तखन इन्द्र लक्ष्मण केँ ओतय सँ अपन धाम अमरावती लय गेलाह । हुनका विष्णुक अंश बुझिकय हुनकर पूजा करय लगलाह ॥८४-८९॥

।इति चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे उत्तरकाण्डे सप्तमोऽध्यायः।

॥मैथिल चन्द्रकवि विरचित मिथिलाभाषा रामायण मे उत्तरकाण्डक सातम अध्याय समाप्त भेल॥

हरिः हरः!!

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