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मिथिलाभाषा रामायण – उत्तरकाण्ड – छठम अध्यायः कुश-लव केर गीत रामक कान मे पड़ब…

559 भ्यूज

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण

उत्तरकाण्ड – छठम अध्याय

कुश आ लव केर गीत रामक कान मे पड़ब, राम द्वारा हुनका दुनू गोटेक पहिचान करब, सीताक धरती मे प्रवेश, उदास राम केर आध्यात्म-चिन्तन मे लीन होयब तथा माता सब केँ उपदेश देब

।जयकरी छन्द।

काज न करब एक अगुताय । ई देल मुनि वाल्मीकि शिखाय ॥१॥
रामचन्द्र बड़ गोट महराज । आयल छी अहँ तनिक समाज ॥२॥
शुनता जखना अहँ मुह गीति । बाढ़त तनिकाँ अहँ मे प्रीति ॥३॥
अनतय गायब पड़तनि कान । होयता बड़ प्रसन्न भगवान ॥४॥
शुनता सभामध्य मँगबाय । गायब गीत चरित-समुदाय ॥५॥
ओ सन्तुष्ट देता धन ढेरि । ग्रहण न अहाँ करब तहि बेरि ॥६॥
बाहर बाहर कुश-लव-गान । रामचन्द्र काँ पड़लनि कान ॥७॥
मन दय शुनल तनिक प्रभु गान । त्यागल मन प्रवृत्ति सुख आन ॥८॥
पाठ अपूर्व्व जाति भल छन्द । गेय-समन्वित कर आनन्द ॥९॥
प्रभु-मन भेल शुनब हम गान । करब सदस-दश मे सन्मान ॥१०॥
अथ प्रभु काँ कर्म्मान्तर काज । सभा बजाओल राजसमाज ॥११॥
मुनि पण्डित पटुतर प्राचीन । पौराणिक संशय सौँ हीन ॥१२॥
सकल-शास्त्र-वेत्ता जन अयल । निज जन सहित सभा प्रभु कयल ॥१३॥
कुश लव गायन काँ अनबाय । स्वागत-सहित विहित जे न्याय ॥१४॥
कुश लव छथि देखल तहिठाम । अनिमिष-लोचन भेला राम ॥१५॥
सभा परस्पर सभ जन बाज । गायन-तुल्य रूप महराज ॥१६॥
वल्कलि जटिल न रहितथि बाल । तौँ समतूल राम महिपाल ॥१७॥
राघव सौँ नहि बुझि पड़ आन । कथा करथि सभ कानहिँ कान ॥१८॥

भावार्थः

वाल्मीकि मुनि सिखौलनि – “कोनो काज हड़बड़ाकय नहि करब । रामचन्द्र बहुत पैघ महाराज छथि । अहाँ सब हुनका लग जा रहल छी । जखन ओ अहाँक मुँह सँ गान सुनताह तखन अहाँ लोकनि सँ बहुते स्नेह भ’ जेतन्हि । अहाँ सब अन्यत्रे कतहु गायब । स्वर राजाक कान मे पड़तन्हि । ओ बहुत प्रसन्न हेताह । ओ तखन अहाँ सब केँ सभा (दरबार) मे बजबाकय गान सुनताह । अहाँ सब रामचरितक गीत गायब । ओ प्रसन्न भ’ कय बहुते रास धन देताह, लेकिन अहाँ सब ओतय किछु लेब नहि ।” रामचन्द्र केँ बाहरे सँ कुश-लव केर गीत सुनाय पड़लन्हि । किछु समय धरि ध्यान सँ ओ गीत सुनैत रहलाह । हुनकर मन आन सबटा सुख केँ बिसरि गेल । ओहि गीतक पाँति, ओकर जाति आ छन्द अजीब छलैक । संगीत सँ युक्त भ’ कय ओ आनन्द कय दैत छल । राजा राम केँ मोन भेलनि जे ओ गान सुनता आ दस सभासद सभक बीच हुनकर सम्मान करता । तखन राम केँ जखन राजकाज सँ फुरसत भेलनि तखन आन काजक लेल राजभवन मे सभा बजौलनि । ओहि सभा मे मुनि लोकनि अयलाह, विज्ञ प्राचीन पंडित लोकनि अयलाह आ पुराणवेत्ता अयलाह, जिनका अपन-अपन शास्त्र मे कतहु सन्देह नहि रहनि से सब अयलाह । सब शास्त्रक विद्वान सब अयलाह । राजा राम अपन परिजन-सहित सभा मे उपस्थित रहथि । तखन गायक कुश आर लव केँ बजौलनि आ यथोचित रीति सँ हुनकर स्वागत-सत्कार कयलनि । राम कुश आ लव केर छवि देखितहि एकटक भ’ गेलाह । सभा मे सब एक-दोसर सँ कहैत अछि – “अरे, ई दुनू गायक तँ राजा रामजी जेहेन लगैत छथि । यदि हिनक वल्कल आ जटा नहि रहितनि त ई हू-ब-हू रामहि जेकाँ लगितथि ।” सब कनफुस्की करैत अछि। लगैत अछि, ई रघुवंशीक सिवा आर कियो नहि ॥१-१८॥

।सोरठा।

कुश लव कयलनि गान, मधुर मधुरतर शुद्धस्वर ॥१९॥
शुन गान्धर्व्व जे कान, साधु साधु कह सभ्य सभ ॥२०॥
यहन शुनल नहि साम, सकल सभा मन-हरण धुनि ॥२१॥
कहल भरत काँ राम, देबक हिनकाँ अयुत धन ॥२२॥

भावार्थः

तखन कुश आर लव शुद्ध स्वर मे मधुरहु सँ मधुर गान कयलनि । जे-जे सभासद लोकनि ओ गान सुनलनि, वाह-वाह करय लगलाह । राम भरत सँ कहलनि – “सम्पूर्ण सभाक मन केँ हरयवला धुन मे एहेन साम-गान तँ हम सुननहि नहि रही । हिनका सब केँ दस लाख स्वर्ण-मुद्रा देल जाइन्ह ।” ॥१९-२२॥

।चौपाइ।

जखन सुवर्ण देबय लगलाह । कुश लव तखनहि कहि चललाह ॥२३॥
हम वन बसी कन्द फल खाइ । धनसङ्ग्रह सपनहुँ नहि जाइ ॥२४॥
ई कहि मुनि-सन्निधि संप्राप्त । रामचन्द्र-मन विस्मय व्याप्त ॥२५॥
बुझलनि वैदेहीक कुमार । पुरुष आन के यहन उदार ॥२६॥
कहलनि प्रभु शत्रुघ्न बुझाय । हिनकाँ सभ काँ लाउ बजाय ॥२७॥
जनिकर जनिक कहै छी नाम । सत्वर आबथु सभ यहिठाम ॥२८॥

भावार्थः

जखन भरत देबय लगलाह तखन कुश आर लव कहलनि – “हम सब त वन मे रहैत छी आ कन्द-मूल-फल खाकय जिबैत छी । धन-संचय करब त सपनहुँ मे नहि सोचलहुँ ।” ई कहिकय ओ दुनू मुनि वाल्मीकि लग चलि गेलाह । रामचन्द्र केँ भारी विस्मय भेलन्हि । हुनका बुझय मे आबि गेलन्हि जे ई लोकनि सीताक पुत्र सब थिकाह । एतेक उदार आर के भ’ सकैत अछि ! राम शत्रुघ्न केँ बुझाकय कहलनि – “हिनका सब गोटे केँ बजा आनू । जिनकर-जिनकर नाम हम कहैत छी, ओ सब जल्दी एतय आबथि ॥२३-२८॥

।सवैया छन्द।

मारुत-पुत्र सुषेण विभीषण, अङ्गद वालमीकि बजबाउ ॥२९॥
सीता-सहित रहित दुर्ज्जन सौँ, वैदेही सौँ शपथ कराउ ॥३०॥
रामक उक्ति कहल सभजन काँ, कहलनि मुनि पुनि शुनिकेँ नीक ॥३१॥
प्रातहि शपथ करथि महि-तनया, न्याय नृपति काँ उचिते थीक ॥३२॥

भावार्थः

पवनसुत हनुमान, सुषेण, विभीषण, अंगद आर वाल्मीकि हिनका सब केँ बजाउ । सीता सेहो आबथि, लेकिन कियो दुर्जन नहि आबि पाबय । हुनका सभक बीच सीता केँ शपथ कराउ ।” शत्रुघ्न रामजीक ई बात सब गोटे सँ कहलनि । मुनि वाल्मीकि सुनिकय कहलनि – “ठीक छैक । काल्हि भोरे धरतीक बेटी सीता शपथ करती । राजाक न्याय करब त धर्मे होइछ । स्त्रीक लेल पति मात्र सब सँ पैघ देवता छथि ।

।पादाकुल दोहा।

नारी सभ काँ परमदेव पति, गति नहि तनिकाँ आन ॥३३॥
मुनि-रघुवर-संवाद सकल जन, शुनलनि कानहिँ कान ॥३४॥

भावार्थः

स्त्री केँ आर कोनो दोसर सहारा नहि छैक ।” राम आ वाल्मीकिक बीच जे संवाद भेल ओ कानों-कान सब केँ पता लागि गेल ॥३३-३४॥

।चौपाइ।

कहलनि रघुवर काँ मुनिराज । करती सीता शपथ जे आज ॥३५॥
सकल शुभाशुभ जानथु लोक । देखथु आबि रोक नहि टोक ॥३६॥
मिथ्या जन अपवाद लगाब । पापक रुचि जनु मन निधि पाब ॥३७॥
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यक जाति । देखय आयल शूद्र जमाति ॥३८॥
अयला ततय महर्षि अनेक । वानर-वृन्द सुभक्ति विवेक ॥३९॥
मुनि वाल्मीकि शीघ्र अयलाह । वैदेही काँ सङ्ग लयलाह ॥४०॥
चललि अधोमुखि मुनि चल आगु । गदगदकण्ठ सती भय त्यागु ॥४१॥
लक्ष्मी सनि अयली मख ताहि । साधुवाद बाढ़ल धुनि जाहि ॥४२॥
सीता काँ वाल्मीकि सहाय । सती-शिरोमणि समुचित न्याय ॥४३॥
कहलनि मुनि वाल्मीकि विचारि । सती शिरोमणि सीता नारि ॥४४॥
त्यागल पर-अपवादक भीति । अहह रघूत्तम कयल अनीति ॥४५॥
हमरा आश्रम छलनि निवास । पति-व्रत-रत मन छलि निस्त्रास ॥४६॥
ई कुश लव छथि अहँक किशोर । शुनथि रघूत्तम बह दृग नोर ॥४७॥
यमल जात एक तरहक गात । जेहने अपनैँ हिनकर तात ॥४८॥
वरुणक हम छी दशम कुमार । शपथ करै छी बारंबार ॥४९॥
तप-फल हमरा आब न काज । जौँ दुष्टा सीता महराज ॥५०॥
शुनि मुनि-वचन कहल पुनि राम । दृढ़ प्रतीति हमरहु एहिठाम ॥५१॥
अपनेक वचन शुनल हम कान । एहि सौँ प्रत्यय अछि की आन ॥५२॥
पूर्व्वहुँ सीता लङ्का-देश । जनित प्रतीति अनल-परवेश ॥५३॥
साधुवाद सुरगण-मुख शून । निज घर आनू सीता पून ॥५४॥
क्षमा करब मुनि नृपता दोष । त्यागल सती-शिरोमणि रोष ॥५५॥
थकथि कुशीलव हमरे तनय । कयल बहुत हम साहस अनय ॥५६॥
ब्रह्मा इन्द्र देवगण सकल । देखथि राम-चरित निर्व्विकल ॥५७॥
प्रजा सकल मन नव सुख-सृष्टि । त्यागल राम आज दुर्दृष्टि ॥५८॥

भावार्थः

वाल्मीकि राम सँ कहलनि – “आइ सीता शपथ करती । नीक कि बेजाय सब लोक जानि लियए । सब आबिकय देखय । केकरो कोनो रोक-टोक नहि हेबाक चाही । जेकरा पापकर्म मे रुचि रहैत छैक सैह लोक सब झूठक कलंक पसारैत अछि । एहि सँ ओकरा लगैत छैक जेना कोनो बड़का खजाना भेटि गेल होइक ।” दल बना-बनाकय ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आ शूद्र सब वर्णक लोक सब देखय आयल । ओतय अनेकों महर्षि लोकनि अयलाह आ भक्ति एवं ज्ञानवला कपिगण सेहो अयलाह । वाल्मीकि मुनि सीता केँ संग लेने शीघ्रहि आबि गेलाह । आगू-आगू मुनि चलैत छथि आ पाछू माथ झुकौने सीता छलथि । मुनि गदगद स्वर मे कहैत छथि – “हे सती सीता, अहाँ डराउ जुनि ।” लक्ष्मीक समान सीता यज्ञस्थल पर अलिह । साधु-साधु केर ध्वनि चारूदिश गुंजि उठल । सीता केँ एकमात्र वाल्मीकि सहारा छलथि – ओ भरोसा देलनि – “हे सतीशिरोमणि, अहाँ केँ उचित न्याय भेटत ।” मुनि वाल्मीकि सोचि-बुझिकय कहलनि – सीता सतीशिरोमणि छथि । लोकापवदाक डर सँ, हे रघुकुलश्रेष्ठ, अपने जे हिनकर त्याग कयलहुँ से अपने हिनका प्रति अन्याय कयलहुँ । ई हमर आश्रम मे रहैत छलिह । हिनकर मन सदा पतिव्रत मे लागल रहैत छलन्हि । ओतय हिनका केकरहु डर नहि रहनि । ई कुश आ लव अपनहिंक पुत्र छथि ।” ई सुनिते रामक आँखि सँ नोर बहय लगलनि । फेर वाल्मीकि कहलनि – “हिनक जन्म जौआँ भेलनि अछि । दुनू गोटेक चेहरा एक्के समान छन्हि । ई सब ठीक ओहिना लागि रहल छथि जेना अहाँ हिनका लोकनिक पिता लगैत छी । हम वरुण केर दसम पुत्र छी । बेर-बेर शपथ करैत कहैत छी – हे महाराज, यदि सीता कुलटा होइथ त हमर एकहु जप-तप काज नहि लागय ।” मुनि वाल्मीकिक बात सुनिकय फेर राम कहलनि – “एहि बात पर हमरा पक्का विश्वास अछि । अपनेक बात हम अपन कान सँ सुनलहुँ । भला एहि सँ बढ़िकय आर कि प्रमाण होयत ? सीता लंका मे रहली, आर पहिनहि अग्नि मे प्रवेश कय केँ ओ अपन सतीत्व प्रमाणित कयल चुकल छथि । देवता सभक मुँह सँ साधु-साधु केर आवाजक संग सुनि रहल छी जे फेर सीता केँ अपन घर आनि लियौन । हे मुनि, राजा हेबाक कारण हमरा सँ गलती भेल जे हम क्रोध मे पड़िकय सतीशिरोमणि सीता केँ त्यागि देलहुँ । हमर ई अपराध अपने क्षमा करब । ई कुश आ लव हमरहि पुत्र छथि । हम बहुत साहस आ अन्याय कयलहुँ ।” ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवता सब एकटक रामक चरित केँ निहारि रहल छलथि । सम्पूर्ण प्रजाक मन मे नव आनन्दक लहरि उठलैक – आखिर आइ रामक भ्रम टूटि गेलनि ॥३५-५८॥

।सारवती छन्द।

आइलि जानकि देवसभा, श्रीमति चम्पक हेमानभा ॥५९॥
आनत वारिज-श्रीवदना, प्राञ्जलि भाष जगत्सदना ॥६०॥

भावार्थः

चम्पा आ सोनाक समान चमकैत सीता रामक सभा मे अयलिह । हुनक कमल-समान मुख झुकल छल । घट-घट मे व्याप्त शक्तिरूपा सीता बजलिह – ॥५९-६०॥

।मिथिलासङ्गीतानुसारि मालीछन्द।

शुनु शुनु सकल सदस्य सत्यकरणी ।
शपथ करै छी आज रघुवर – घरणी ॥६१॥
मनसौँ आनक चिन्तना नहि कयलहुँ ।
रघुवर – पति – आश सर्व्व – शोक – हरणी ॥६२॥
सत्य पतिव्रत जौँ तनय दुहु प्रभुहिक ।
हमरा विवर देती माता देवी धरणी ॥६३॥
खल – उपहास – तम – शमन उदित भेल ।
सज्जन-मानस-कञ्च-बोध सत्य-तरणी ॥६४॥

भावार्थः

“सुनू, समस्त सभासद लोकनि, सुनू हमर सत्य बात । हम रामचन्द्रक पत्नी आइ शपथ करैत छी । हम कहियो मनहु मे परपुरुषक भावना नहि कयलहुँ । हमरा सब शोक केँ हरण करयवला पति रामचन्द्र मात्रक आशा हमेशा रहल अछि । यदि हमर सतीत्व सत्य होत त ई दुनू पुत्र अहाँक छी’ हमरा माता धरती अपन गर्भ मे जगह देती । आइ सत्य रूपी सूर्य उदित भ’ गेल । दुष्ट लोक सब द्वारा पसारल गेल अपवाद रूपी अन्धकार दूर भ’ गेल । सज्जन सभक मन रूपी कमल फुला गेल ।” ॥६१-६४॥

।सवैया छन्द।

फणिपति-फणपर सिंहासन-वर, तेहि ऊपर भूदेवि विराज ॥६५॥
धरणी-विवर उपर जन देखल, बड़ अद्भुत मन मानल काज ॥६६॥
पुत्रि पुत्रि कहि कहि सीता काँ, ओ लेल अङ्क अपन आरोपि ॥६७॥
गेलि पाताल सहित फणिपतिसौँ, विवर मृत्तिकासौँ दय थोपि ॥६८॥

भावार्थः

धरती फाटि गेलिह । उपर सँ फाँक मे लोक सब एकटा अद्भुत दृश्य देखलक । शेषनागक फन पर पृथ्वीदेवी बैसल छलथि । पृथ्वीदेवी ‘पुत्री, पुत्री’ कहि शोर करैत सीता केँ कोरा मे लय लेलिह । शेषनाग-सहित ओ पाताल चलि गेलिह आ जाइत समय ओहि फाँकक मुँह माटि सँ मुना गेल ॥६५-६८॥

।चौपाइ।

कयल अमरगण सुमनक वृष्टि । उठि गेल महि सौँ सीता-सृष्टि ॥६९॥
सतीशिरोमणि एहनि के आन । धन्या कहि कहि कर जन ध्यान ॥७०॥
सीता-गुण-गण सब जन गाब । रघुनन्दन-मन चिन्ता आब ॥७१॥
प्रभुक स्रवित लोचन मुख ताकि । बाँचथि राम सभहि मन चाँकि ॥७२॥
मारुतसुत स्वामिनि कहि कान । सभ सौँ हा हत विधि बलवान ॥७३॥
रामचन्द्र मूर्छित खसलाह । शोक-समुद्र विवश भसलाह ॥७४॥
रघुवर निकट विकल जन आब । कनइत प्रभु प्रभु कहथि जगाब ॥७५॥
क्षण मे भय गेल आनक आन । जगलहुँ अनमन सन भगवान ॥७६॥
करुण कलाप अश्व-क्रतु छन्न । विहित यज्ञविधि भय गेल बन्न ॥७७॥
ऋषि ब्राह्मणगण बहुत बुझाब । नहि प्रभु उचित शोक-प्रस्ताव ॥७८॥
विद्यमान छथि युगल-कुमार । कनइत छथि करु नयन उघार ॥७९॥
नहि उन्मीलित होयत आँखि । विश्व सवन गिरि शक के राखि ॥८०॥
प्रभु पुन सजल उघारल आँखि । हा वैदेही सति सति भाखि ॥८१॥
क्षमा कयल अहँ कत अपराध । अनुचित वचन कहल नहि आध ॥८२॥
अहँक वियोग सहब नहि आब । मुख सुख कानन शोकज दाव ॥८३॥
सहा न सहल अवज्ञा आज । देखल कर्म्म होइछ मन लाज ॥८४॥
छल अधीन मे दिव्य विभूति । ततहु चलल खल जन छल जूति ॥८५॥
बन्धुक वचन धयल नहि कान । राजा घर मे दैव प्रधान ॥८६॥
जे छल मखविधि शेष सुकाज । कयल पूर रघुवर महराज ॥८७॥
ऋत्विक मुनि काँ कयल विदाय । धनरत्नादि – तुष्ट समुदाय ॥८८॥

भावार्थः

देवता लोकनि फूल बरसौलनि । धरती पर सँ सीताक लीला समाप्त भ’ गेल । लोक सब याद करय लागल – एहेन सतीशिरोमणि आर के होयत ? धन्य छथि, ओ धन्य छथि ! सब गोटे सीताक गुण गाबय लागल । मुदा राम चिन्ता मे डूबि गेलाह । अजस्र नोर बहबैत रामक चेहरा केँ देखिकय लोक चिन्ता करय लागल जे राम कहीं प्राणत्याग नहि कय देथि । हनुमानजी “हे स्वामिनी” चिकरि-चिकरिकय कानय लगलाह – “हाय, विधाता सब सँ उपर होइत छथि ।” राम बेहोश भ’ कय खसि पड़लाह । विवश भ’ शोक-समुद्र मे बहि गेलाह । व्याकुल भ’ कय लोक सब राम लग आबय आ “हे प्रभु – हे प्रभु” कहिकय हुनका होश मे आनय । अरे, क्षणहि भरि मे कि सँ कि भ’ गेल ! होश मे अयला पर प्रभु राम अन्यमनस्क सन लगैत छथि । अश्वमेध यज्ञक उछाह मे करुण भाव पसैर गेल । यज्ञक क्रिया बन्द भ’ गेल । ऋषि लोकनि आ ब्राह्मण लोकनि भाँति-भाँति रूप सँ हुनका बुझा रहल छथि – “हे प्रभु, एखन शोकक अवसर नहि अछि । ई दुनू पुत्र मौजूद छथि । ओ सब कानि रहल छथि । अपने आँखि खोलू । यदि अपने आँखि नहि खोलब त ई अश्वमेध यज्ञ केँ के सम्हारि सकत ?” राम फेर नोर सँ भरल आँखि खोललनि आर बिलखय लगलाह – “हा वैदेही, हा सती !! हमर कतेक अपराध अहाँ क्षमा कयलहुँ । एकहु टा अनुचित बात तक नहि बजलहुँ । आब हम अहाँक वियोग सहि नहि सकब । अहाँ केँ वनवास देबाक शोकक आगि सँ हमर मुँह सुखा रहल अछि । पृथ्वी अहाँक अवहेलना नहि सहलनि । ओ जे किछु कयलनि, हम देखलहुँ । हमरा लाज भ’ रहल अछि । हाय, सीता रूपी जे दिव्य विभूति हमर हाथ मे रहथि तिनकहु हम दुर्जन सभक चाइल सँ गमा देलहुँ । बन्धु केर बात नहि मानलहुँ । राजाक घर मे सेहो दैवे प्रधान होइत छथि ।” यज्ञ मे जे-जे कर्म बाकी रहि गेल छल, राम तेकरा पूरा कयलनि । ऋत्विज व मुनि सब केँ विदा कयलनि । सब वर्ग केँ स्वर्णमुद्रा, रत्न आदि सँ सन्तुष्ट कयलनि ॥६९-८८॥

।तिरहुति गीत।

कत हम कहब हुनक गुण, हा पुन पुन, ॥८९॥
भय गेल हमर विषय शुन ॥९०॥
खलक वचन शुनि वन देल, की मन भेल, ॥९१॥
रमणि परशमणि कत गेल ॥९२॥
एत छति जौँ हम जनितहुँ, की मनितहुँ, ॥९३॥
अरजि अरजि दुख कनितहुँ ॥९४॥
लगइत छल गृह गृहसन, विधि परसन, ॥९५॥
दुर्लभ पुन हुनि दरशन ॥९६॥
गुणवति रमणि बिसरलनि, दुख पड़लनि, ॥९७॥
उचित धरणि धनि हरलनि ॥९८॥
आब कि हम सुख पायब, कत जायब, ॥९९॥
चिन्तित जनम गमायब ॥१००॥
करब न हम नृपतिक सुख, बड़ मन दुख, ॥१०१॥
कत विधु कत जानकि – मुख ॥१०२॥
धरणी – गर्भ चलक बेरि, ई मुख हेरि, ॥१०३॥
कयल प्रणाम बहुत बेरि ॥१०४॥
सुखित सतत ओ रहतीह, दुख कहतीह, ॥१०५॥
सर्वसहा सनि सहतीह ॥१०६॥
हमहिँ वियोग-विकल मन, नहि सुख छन, ॥१०७॥
विफल बुझल मन जन धन ॥१०८॥
रहितहुँ सुखित मिलित लोक, की सुरलोक, ॥१०९॥
विधि लिखल केँ जन रोक ॥११०॥

भावार्थः

फेर राम विलाप करय लगलाह – “हम सीताक गुण केँ बेर-बेर कतेक वर्णन करब ? हमर दुनिया उजैड़ गेल । दुर्जन सभक बात सुनिकय हमर अहाँ केँ वन पठा देलहुँ । केहेन कुमति भ’ गेल हमर ? कतय गेलथि हमर ओ पारसमणिक समान गृहिणी ? यदि हम जनितहुँ जे एहेन अनर्थ भ’ जायत त दुर्जन सभक बात नहि मानितहुँ, अपने सँ अरज-अरजिकय दुःख नहि झेलितहुँ । सीता छलिह त घर घर-जेकाँ लगैत छल, आर लगैत छल जे विधाता प्रसन्न छथि । मुदा आब त हुनकर दर्शनो दुर्लभ भ’ गेल । हमर गुणवती प्रिया हमरा बिसरि गेलिह । हुनका बहुते दुःख उठबय पड़लन्हि । पृथ्वी जे सीता केँ हमरा सँ छिनिकय लय गेलिह से उचिते कयलिह । आब हमरा कि सुख भेटत ? सुझाइत नहि अछि जे कतय जाय ? चिन्ता मे पूरा जिनगी बिताबय पड़त । आब हम राजसुख नहि भोगब । मोन मे बड व्यथा अछि । कतय चाँच आ कतय सीताक मुखमंडल ! जखन ओ पृथ्वीक गर्भ मे समाय लगलिह, त हम हुनकर ओ मुखकमल देखिकय बेर-बेर प्रणाम कयलहुँ । ओ सदा सुखी रहती । अपन दुःख केकरो सँ नहि कहती, अपन माता सर्वसहा पृथ्वीक समान अपनहि मन मे मात्र सहैत रहती । हमहीं हुनकर वियोग सँ तड़पि रहल छी । क्षणहु भरि लेल चैन नहि अछि । सब लोक, सारा धन-दौलत बेकार लगैत अछि । चकवा-चकवी जेकाँ सीता संग रहितहुँ त स्वर्गक सुख भेटितय, मुदा विधाता जे लिख देलनि तेकरा के टाइर सकैत अछि ? ॥८९-११०॥

।दोबय छन्द।

पामर सङ्ग बसि बसि हँसि हँसि, हम कयल उचित नहि कर्म्म रे ॥१११॥
वैदेही सनि वनिता त्यागल, नहि क्षति गुनल अधर्म्म रे ॥११२॥
बड़ अपराध कयल हम हुनकर, नहि हो महि सौँ माँगि रे ॥११३॥
वैदेहीक वियोग जन्म भरि, रहल हृदय मे साँगि रे ॥११४॥
हा कत तेहन वदन हम देखब, कतय हुनक सन आँखि रे ॥११५॥
कतय शुनब ओ मधुर वचन हम, धिक धिक जीवन राखि रे ॥११६॥
कत गोट क्षमा क्षमा-तनयाकाँ, कयल मनहुँ नहि कोप रे ॥११७॥
आब आब सद्भाव चित्त मे, भेल मनोरथ लोप रे ॥११८॥

भावार्थः

हम नादानी सँ रहि-रहिकय आ हँसी-मजाक कय-कयकेँ अपन उचित कर्तव्य मे चूक कयलहुँ । सीता-जेहेन सती केँ त्यागलहुँ, न अपन हानि बुझि पेलहुँ आ न अधर्म । हम हुनकर बड पैघ अपराध कयलहुँ अछि । पृथ्वी देवी सँ वाप मँगबाक मुँहों नहि रहल हमर । सीताक विरह हमर हृदय मे काँट जेकाँ जीवन भरि गड़ैत रहि जायत । हाय, ओहेन मुँह आब फेर कतय देखब, आर हुनका जेहेन आँखि कतय भेटत ? ओ मीठ बाजब कतय सुनब ? आब एहि जीवन केँ बचनाय धिक्कार अछि । क्षमा (पृथ्वी) केर बेटी मे कतेक क्षमा रहनि ! ओ मनहु मे क्रोध नहि कयलिह । आब हमर मन मे सद्बुद्धि आयल अछि, मुदा आब त हमर सब कामना माटि मे मिलि गेल ।” ॥१११-११८॥

रामजीक उदास भ’ आध्यात्म-चिन्तन मे लीन होयब तथा माता लोकनि केँ उपदेश देब 

।चौपाइ।

कयलनि यज्ञक्रियाक समाप्त । सीता-शोक हृदय दुख व्याप्त ॥११९॥
चलला विमन अपन पुर राम । कुश लव सङ्ग लेल तहिठाम ॥१२०॥
सुखनिवास मे सुख नहि आब । चिन्तित सतत विकल पछताब ॥१२१॥
अयला राम धाम गत-राम । कयलनि तनय सहित विसराम ॥१२२॥
पौषक शर सन रघुवर-सद्म । तन भय कर थर थर गतपद्म ॥१२३॥
रहथि रहस्य विषय परित्याग । ब्रह्मज्ञान ध्यान मन लाग ॥१२४॥
कौशल्या गेली तहिठाम । नारायण बुझि कयल प्रणाम ॥१२५॥
प्रभु परमेश्वर कहू कतेक । अपनैँ पुत्र पुण्य-अतिरेक ॥१२६॥
आयल समय आयु-अवसान । कहल जाय भव-नाशन ज्ञान ॥१२७॥
शुनि दयालु कहलनि शुनु माय । पूर्व्व तीन पथ देल शुनाय ॥१२८॥
कर्म्म ज्ञान पुन भक्ति सुयोग । तेसर सुलभ शमन भव-रोग ॥१२९॥
हिंसा दम्भादिक उद्देश । भेद-दृष्टि छथि सेवक वेश ॥१३०॥
से तामस जन हमर कहाब । गुण-कृत हुनकर उचित स्वभाव ॥१३१॥
चाहथि फलभोगक अभिलाष । धन यश काम सतत मन राख ॥१३२॥
प्रतिमादिक मे पूजन करथि । राजस भक्त नाम अनुसरथि ॥१३३॥
परमेश्वर मे अर्प्पित कर्म्म । कर्म्मक्षय हो पाबी शर्म्म ॥१३४॥
करथि भेदमति थिक कर्त्तव्य । सात्त्विक भक्त नाम धर्त्तव्य ॥१३५॥
एहि सौँ योग देब की आन । भक्ति-पथक छथि योग प्रधान ॥१३६॥
गुणातीत भय हमरहि पाब । सतत कामना-हीन स्वभाव ॥१३७॥
कर्म्मयोग थिक परम प्रशस्त । हिंसा दोषादिक हो अस्त ॥१३८॥

भावार्थः

राम अश्वमेध यज्ञ केँ कोहुना पूरा कयलनि । सीताक विरह केर वेदना हुनक हृदय पर छा गेल छलन्हि । राम विखिन्न मन सँ अपन राजधानी चललाह आ ओतय कुश तथा लव केँ सेहो संग कय लेलनि । वैराग्य-घर मे पर्यन्त हुनका चैन नहि भेटलन्हि । सदिखन चिन्ता मे डूबल व्याकुल भ’ पछताइत रहैत छलथि । आनन्दहीन राम अपन भवन मे अयलाह आ पुत्र लोकनिक संग विश्राम कयलनि । रामक भवन मानू पूस मासक सरोवर हो, जेतय सब कमल गैल गेल छल आ शरीर भय सँ थरथर काँपि रहल छल । सब विषय-वासना केँ छोड़ि राम एकान्त मे रहय लगलाह । हुनकर मन सदिखन आध्यात्मिक चिन्तन मे लागल रहैत छलन्हि । कौशल्य, हुनका लग अयलिह । हुनका नारायण बुझिकय प्रणाम कयलिह, आ कहलनि – “हे प्रभु परमेश्वर, हम कतेक सुनाउ ! हम परम पुण्यवती छी जे अपने हमर पुत्र भेलहुँ । आब हमर आयुक अन्तकाल आबि गेल अछि । एहेन ज्ञान देल जाउ जाहि सँ संसारक बन्धन टूटि जाय ।” ई सुनिकय दयालु रामजी कहलनि – “हे माता, सुनल जाउ । हम तीन रास्ता बता चुकल छी – कर्मयोग, ज्ञानयोग आ भक्तियोग । एहि मे तेसर भक्तियोग सब सँ आसान अछि आर ओहि सँ जन्म-मरण केर दुःख दूर होइत अछि । जे हिंसा, दम्भ आदिक उद्देश्य सँ भेदभाव राखैत हमर सेवा करैत अछि, से हमर तामस भक्त कहाइत अछि । तमोगुणहि अनुरूप ओकर स्वभाव होइत छैक । जे फल केर इच्छा करैत अछि; धन, यश आ कामोपभोग मे सदिखन रुचि रखैत अछि, आर हमर प्रतिमा आदिक पूजा करैत अछि, से हमर राजस भक्त कहाइत अछि । जे अपन सब कर्म परमेश्वर केँ समर्पित कय केँ करैत अछि जाहि सँ कि कर्मक क्षय हो आ सुख भेटय, तथा ई कर्म करब हमर कर्तव्य अछि, एना बुझैत कर्म करैत अछि, से हमर सात्त्विक भक्त थिक । एहि तीनू योग केर सिवा आ कि योग बताउ ? एहि मे भक्तिपरक योग प्रधान अछि । जे कर्मयोगी होइत अछि ओ तीनू गुण सँ मुक्त भ’ कय हमरा प्राप्त करैत अछि । ओ स्वभावतः सब कामना सँ हीन होइत अछि । कर्मयोग परम प्रशंसनीय मार्ग थिक । एहि सँ हिंसा आदि दोष दूर होइत अछि ॥११९-१३८॥

।हरिपद छन्द।

हम अनन्तगुण-आलय मे जनि, मनोवृत्ति दृढ़ जाय ॥१३९॥
गुणगण शुनि शुनि जनि सुरसरि-जल, सागर मध्य समाय ॥१४०॥
निर्गुण भक्ति योग-लक्षण से, भक्ति अहेतु विचरथि ॥१४१॥
सालोक्यादिक मुक्तिहुँ काँ जे, देलहुँ ग्रहण न करथि ॥१४२॥
दर्शन हमर कथन गुण पूजन, मति वन्दन जन भक्त ॥१४३॥
सकल भूत मे हमर भावना, सङ्ग असक्त विरक्त ॥१४४॥
सभहिक मान दीन-अनुकम्पा, मैत्री सौँ सभ अपनैँ ॥१४५॥
सय्यँम नियम शील सन्तोषित, सन्मर्य्यादा थपनैँ ॥१४६॥
श्रवण करथि वेदान्त-सुवाक्यक, कीर्त्तन हमरा नामक ॥१४७॥
ऋजुता सौँ सतसङ्ग निरन्तर, त्याग अहम्मति-गामक ॥१४८॥
हमरा धर्म्मक अनुरत गुणगण, श्रवण करति नित कान ॥१४९॥
जेहन वायुवश गन्ध निजाश्रय, नासायुग मे आन ॥१५०॥
सकल भूत मे रहथि व्यवस्थित, आत्मा केवल जान ॥१५१॥
योगाभ्यास चित्त निर्म्मल हो, अनुभव दृढ़ विज्ञान ॥१५२॥
एहि सौँ आन सकल पूजादिक, बाहर बाहर जानब ॥१५३॥
क्रिया-जनित कत भेद द्रव्य सौँ, हमरे तोषण मानब ॥१५४॥
तावत प्रतिमादिक पूजा मे, स्थिति कल्याण निमित्त ॥१५५॥
यावत सकल एक आत्मा मे, भासित हो नहि चित्त ॥१५६॥
जनिकाँ भेदबुद्धि होइछ मन, मरणक तनिकहि त्रास ॥१५७॥
हमरा एक-बुद्धि सौँ देखू, पूरत सभ मन-आश ॥१५८॥
ईश्वर जीवन भेद नहि मानब, भक्ति ज्ञान शुभ योग ॥१५९॥
दुइ योगहु मे एक ग्रहण करु, पायब नहि दुखभोग ॥१६०॥
सकल हृदिस्थित जननी हमरहि, पुत्रभाव करु मन मे ॥१६१॥
कौशल्या कुशला सति कयलनि, पड़लनि न भव-बन्धन मे ॥१६२॥

भावार्थः

हमर गुण सब केँ सुनैत-सुनैत जिनक चित्त अनन्त गुणक खजाना रूप मे हमरा मे ओहि तरहें समाज जाइछ जेना गंगाक जल समुद्र मे, से सगुण भक्त छथि । निर्गुण भक्तियोगक लक्षण ई अछिः एहेन भक्त हमरा मे अहैतुकी भक्ति करैत छथि । सालोक्य, सायुज्य आदि मोक्ष भेटलो पर से ग्रहण नहि करैत छथि । हमर भक्त लोकनि हमरहि दर्शन, कीर्तन, गुणवर्णन, पूजन आ चन्दन करैत छथि । अर्थात् सब जीवक ईश्वर हमरे बुझैत छथि । आसक्ति सँ दूर विरक्त रहैत छथि । सभक सम्मान करैत छथि । दीन-दुःखी सब पर दया करैत छथि । मित्रता कय केँ सब केँ अपन बना लैत छथि । सदिखन संयम आ नियम केर पालन करैत छथि । सन्तोषपूर्वक मर्यादा बनेने रहैत छथि । आध्यात्मिक, दर्शन, वेदान्त केर वाक्य सब श्रवण करैत छथि । हमर नामक कीर्तन करैत छथि । सरल हृदय सँ नीक लोक सभक संग करैत छथि । अहंकार केर त्याग करैत छथि । हमर धर्म मे अनुराज रखैत छथि । नित्य हमर गुण सभक श्रवण करैत छथि । जाहि तरहें अपन आधार फूल मे विद्यमान सौरभ केँ वायु नाक मे पहुँचाबैत अछि ताहि तरहें ओ लोकनि सेहो प्राणी सब मे विद्यमान आत्माक अनुभव करैत छथि । योगाभ्यास सँ चित्त निर्मल होइत अछि । ज्ञानानुभूति दृढ़ होइत अछि । एकर अलावा जेहो पूजा आदि विधि सब अछि से सब बाह्य क्रिया थिक । पदार्थ सब मे क्रिया सब सँ जे भेद उत्पन्न होइत अछि, ओहि सँ हमरहि तुष्टि होइत अछि । प्रतिमा आदिक पूजा मे आस्था ताबत धरि कल्याणार्थ अपेक्षित अछि जाबत धरि एक्कहि आत्मा मे सब पदार्थक अस्तित्वक भान नहि हो । जेकरा मन मे भेद बुद्धि अछि, मरण केर भय तेकरे होइत अछि । हमरा अनन्य भाव सँ देखू, तखनहि मोनक सबटा आशा पूरा होयत । ईश्वर आ जीव मे भेद नहि मनबाक चाही । भक्तियोग आ ज्ञानयोग दुनू कल्याणकारक अछि । एहि दुनू मे सँ कोनो एक केँ अपना लेब त दुःख नहि होयत । हे माता, सब प्राणीक हृदय मे रहयवला हमरा मे पुत्रभाव सँ भक्ति कयल जाउ । कुशल सती कौशल्या ओहिना कयलनि, जेकर फलस्वरूप ओ भव-बन्धन मे नहि पड़लिह ।” ॥१३९-१६२॥

।सोरठा।

शुनि शुनि तिनु जनि माय, पाय दिव्य उपदेश काँ ॥१६३॥
तन तजि तनवर पाय, जाय स्वर्ग्ग दशरथ मिललि ॥१६४॥

भावार्थः

तीनू माता लोकनि ई सुनि-सुनिकय आर अपूर्व उपदेश पाबिकय भौतिक शरीर केँ त्यागिकय तथा दिव्य शरीर पाबिकय स्वर्ग गेलथि एवं ओतय फेर दशरथजी संग जा मिललथि ॥१६३-१६४॥

।इति चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे उत्तरकाण्डे षष्ठोऽध्यायः।

॥मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिलाभाषा रामायण मे उत्तरकाण्डक छठम अध्याय समाप्त भेल॥

हरिः हरः!!

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