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मिथिलाभाषा रामायण – उत्तरकाण्ड – पाँचम अध्यायः सीताक विरह मे राम केर आध्यात्मिक चिन्तन व अन्य

638 भ्यूज

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण

उत्तरकाण्ड – पाँचम अध्याय

सीताक विरह मे राम केर आध्यात्मिक चिन्तन, शत्रुघ्न द्वारा लवणासुर केर वध आ मथुरा मे राजधानी बनायब, कुश आ लव केर जन्म एवं शिक्षा-दीक्षा, राम केर अश्वमेध यज्ञ करब, गुरुक संग कुश-लव आगमन

।सोरठा।

नहि अछि ककरो काज, राजकाज मन्त्री करथु ॥१॥
अहँ रहु हमर समाज, लक्ष्मणकाँ रघुनाथ कह ॥२॥

भावार्थः

राम लक्ष्मण सँ कहलनि – “हमरा केकरहु काज नहि अछि । मंत्री लोकनि राजकाज सम्हारथि । हे लक्ष्मण, मात्र अहाँ हमरा लग मे रहू ॥१-२॥

।तिरहुति।
।वियोगि मालव-छन्दः।
।गतप्रत्यागतबन्धोयम्।

कथक कथक नहि तट आब, जलज जलज मन वन दाव ॥३॥
कनक कनक सन मद कर, नयन नयन धनि मन पर ॥४॥
करक करक कय बैसलहुँ, मनमँ मनमँ दुख पैसलहुँ ॥५॥
थिकथि थिकथि सति जेहनि, कहक कहक की तेहनि ॥६॥

भावार्थः

गाबिकय कथा सुनबयवला कथक सब आब हमरा लग नहि आबय । पानि मे उत्पन्न होयबला कमल सेहो हमर मनरूपी वन मे आगिक समान अछि । सोना धतुर जेकाँ मद करैत अछि । राजनीति नहि, मात्र सीता केँ नयन याद करैत अछि । हाथ मे जे किछु करबाक काज छल ओ सब तमाम कय लेल गेल । अगाध दुःख मे समा गेल छी । हमर सीता केहेन सती छथि सेहो कि वर्णन कयल जा सकैत अछि ? ॥३-६॥

।दोबय छन्द।

अविकल भोग करू प्रारब्धक, करम लिखल परमान रे ॥७॥
के बुझ कोन छन देह सौँ जायत, चेतन अपन परान रे ॥८॥
कालहिँ विनश अमर अमरावति, नभ ग्रहगण रवि चान रे ॥९॥
जाय सुमेरु प्रलय प्रलयानल, जल विनु उदधि महान रे ॥१०॥
विनशय धरणि कतय धरणीधर, विभु परिशेष न आन रे ॥११॥
क्षणिक देह मे नेह निरर्थक, दुख-कारण अभिमान रे ॥१२॥
परमेश्वर माया-रस-विलसित, नर पामर की जान रे ॥१३॥
राम “चन्द्र” कह वृथा चिन्तना, करु ईश्वर-गुण-गान रे ॥१४॥

भावार्थः

पूर्वजन्म केर कर्मक भोग पूरा-पूरा कय लिय । जे ललाट मे लिखल रहैत अछि, से भ’ कय रहत । के जनैत अछि जे ई चैतन्यस्वरूप प्राण शरीर सँ कखन निकलि जायत । काल पाबिकय नहि मरयवला देव लोकनि हुनक नगरी अमरावती, आकाश, सूर्य-चन्द्रादि ग्रहगण सब नष्य भ’ जाइत अछि । प्रलयकाल मे सुमेरु सेहो प्रलयक आगि मे जरि जाइत अछि आर महासागर सेहो जलहीन भ’ जाइत अछि । धरती खत्म भ’ जाइत अछि । धरती केँ धारण करयवला शेषनाग आर कच्छप केर पतो तक नहि रहैछ । केवल सर्वव्यापक परमेश्वर टा शेष रहि जाइत छथि, आर किछु नहि बचैत अछि । ई शरीर जे क्षणहि भरि टिकयवला अछि, ताहि मे अनुराग करब बेकार अछि । अभिमान अर्थात् शरीर केँ ‘हम’ बुझि बैसनाइये दुःखक कारण छी । ईश्वर मायावश रस-विलास करैत छथि, ई नासमझ मनुष्य कि जानय गेल ! राम ‘चन्द्र’ कहैत छथि सांसारिक चिन्ता करब व्यर्थ अछि । ईश्वर केर भजन करू ॥७-१४॥

।दोबय योगिया छन्द।

ममता काँ परित्यागु, नहि तौँ दुर्ग्गति आगू ॥१५॥
यावत मलिन वासना रहती, तावत सुख नहि पयबे ॥१६॥
शुद्ध-वासना-युक्त जखन मन, तखन अभय-पद जयबे ॥१७॥
रजो-रेत-संयोग गर्भ मे, इन्द्रजाल की भारी ॥१८॥
सकल अवयव सहित चैतन्यक, बाहर बड़ व्यवहारी ॥१९॥
भव-सन्ताप-हरण परमेश्वर, व्यापक तन मे वासा ॥२०॥
अपना मे अपनहिँ अपनायब, जायब गति निस्त्रासा ॥२१॥
राज्य दार सुत आदि देह हठ, किछु संयोग न रहते ॥२२॥
क्षिति आदिक सङ्घात विलय मे, मृतक लोक जित कहते ॥२३॥
जनिकर जनम मरण नहि होइछ, निर्गुण ब्रह्म कहै छी ॥२४॥
छथि अपरोक्ष मनन करु निश्चय, जौँ भवमोक्ष चहै छी ॥२५॥
तिल मे तेल दुग्ध मे घृत सन, भूत भूत विज्ञाने ॥२६॥
मन सौँ मथन करू सुख पायब, विदित उपाय न आने ॥२७॥

भावार्थः

जाबत धरि चित्त मे खराब भावना रहत ताबत धरि सुख नहि भेटि सकैत अछि । जखन मोनक भावना निष्कलुष भ’ जायत तखन अभय पद (मोक्ष) भेटत । गर्भाशय मे रज आ वीर्य केर संयोग सँ कि अजीब जादू होइत छैक । जखन सब अंग सँ युक्त शरीर मे चैतन्य आबि जाइत छैक त बाहर भ’ कय ओ बड़ा दुनियावी भ’ जाइत अछि । परमेश्वर टा एहि जन्म-मरण केर कष्ट केँ दुर करयवला छथि । शरीर मे व्यापक रूप सँ हुनकहि निवास रहैत अछि । यदि अपना मे अपना केँ पकड़ि पायब तखन अभय पद पायब । राजपाट, पत्नी, पुत्रादि परिवार, शरीर – एकरा सभक आत्मा सँ कोनो संस्पर्श नहि रहि जायत । पृथ्वी, जल आदि पदार्थ सभक जखन प्रलयकाल मे लोप भ’ जायत तखन लोक त मरि जायत मुदा आत्मा जिबिते रहत । जेकर न जन्म होइत छैक आ न मरण, ओकरा निर्गुण ब्रह्म कहैत छैक । हुनकर साक्षात्कार भ’ सकैत अछि । यदि मोक्ष चाहैत छी त हुनकर चिन्तन-मनन करू । जाहि तरहें तिल मे तेल रहैत छैक आ दूध मे घी रहैत छैक, तहिना विज्ञानरूप आत्मा हरेक प्राणी मे रहैत अछि । ओहि विज्ञानस्वरूप आत्मा केँ मन सँ चिन्तन-मनन करू, तखनहि सुख भेटत, आर कोनो चारा (उपाय) नहि अछि ।” ॥१५-२७॥

।सोरठा।

लक्ष्मण जोड़ल हाथ, देव-देव करुणा-भवन ॥२८॥
क्षमाशील रघुनाथ, आत्मज्ञान-विवेक कहु ॥२९॥
तखन देव रघुराज, कहल सकल छल रहित तत ॥३०॥
लक्ष्मण-मन सभ काज, बनल विवेकी रहथि नित ॥३१॥

भावार्थः

लक्ष्मण ई सुनिकय हाथ जोड़िकय कहलनि – “हे देवहु केर देव, दयालु, क्षमाशील राम, हमरा किछु आध्यात्मिक उपदेश देल जाउ ।” तखन देव रघुराज सब किछु (सारा रहस्य) छल रहित भ’कय ओतय वर्णन कयलनि । लक्ष्मण केर मोनक सब कामना पूरा भेलन्हि । ओ सदिखन विवेकवान् ज्ञानी बनल रहलाह ॥२८-३१॥

।रूपमाला छन्द।

मिहिर सन गत-तिमिर, रघुवर सतत शून्य-निवास ॥३२॥
अन्यदोषाभीत कर धर तट, असीत विलास ॥३३॥
सरस सारस सन सलक्ष्मण, राज श्रीद्विजराज ॥३४॥
चिरवन-प्रियवास-वनचर, लसित सतत समाज ॥३५॥

भावार्थः

भगवान् राम सूर्यक समान, अन्धकार सँ हीन छथि, सदिखन शून्य मे (आकाश मे या एकान्त मे) निवास करैत छथि, अन्य दोषाभीत (यानि दोसरक अपवाद सँ डरायल, या ऐगला राति सँ डरायल) रहैत छथि, अपन कर (हाथ अथवा किरण) तटहि पर टा रखैत छथि, असीत (सीता अथवा शीत) केर बिना टा विचरण करैत छथि; प्रेमी सारस पक्षी समान सलक्ष्मण (लक्ष्मणजीक संग, अथवा सारस पक्षीक मादा लक्ष्मणाक संग) रहैत छथि; द्विजराज लोकनि (श्रेष्ठ पक्षी सब अथवा उत्कृष्ट ब्राह्मण लोकनि) सँ भूषित रहैत छथि, बहुतो दिन धरि वनहि मे प्रियगर निवास रहलनि अछि, आर सदैव वनचर सभक मंडली सँ शोभित रहैत छथि ॥३२-३५॥

शत्रुघ्न द्वारा लवणासुरक वध आ मथुरा मे राजधानी बनायब

।चौपाइ।

मुनिगण बहुत विकल एक समय । लवणासुर सौँ अनुखन सभय ॥३६॥
यमुनातीर मुनिक आवास । मुनिवृत्तिहु मे बाढ़ल त्रास ॥३७॥
भार्गव च्यवन चलल अगुआय । मुनि असंख्य लेल सङ्ग लगाय ॥३८॥
राघव-दर्शन कार्य्य प्रधान । रघुनन्दन कयलनि सन्मान ॥३९॥
बड़ स्वागत पुछलनि की काज । सभ मुनिजन आयल छी आज ॥४०॥
ब्राह्मण हमर सतत छथि देव । हुनकर टहल करब यश लेब ॥४१॥
सभ मुनि कृपा कयल अछि आइ । आज्ञा पाबि टहल मे जाइ ॥४२॥
हम छी ब्राह्मण-सभहिक भृत्य । करबे करब कहब जे कृत्य ॥४३॥
शुनि मुनि वचन कहय लगलाह । लवणासुरक कर्म्म अधलाह ॥४४॥
कृतयुग मध्य दैत्य मधु नाम । सुर-द्विजगणक भक्त सभठाम ॥४५॥
तनिकाँ देलनि शम्भु त्रिशूल । होयता भस्म अनलवत तूल ॥४६॥
रावण-अनुजा भार्य्या तनिक । कुम्भीनसी नाम छल जनिक ॥४७॥
तनि सौँ लवणासुर उत्पन्न । मुनि-हिंसक यज्ञादिक बन्न ॥४८॥
अयलहुँ शरण अशक्य पड़ाय । प्रभु रघुनन्दन होउ सहाय ॥४९॥
ई सङ्कट हरत के आन । अयलहुँ शरण ताकि भगवान ॥५०॥

भावार्थः

एक समय मुनि लोकनि लवणासुरक डर सँ हरदम त्रस्त आ दुःखी रहैत छलथि । मुनि लोकनिक आश्रम यमुनाक किनार पर छल । मुनि लोकनि केँ तपस्वी जेकाँ जीवन-निर्वाह करैत रहला पर सेहो भय बढ़िते गेलनि । भार्गव गोत्रक च्यवन ऋषि आगू चललाह । ओ असंख्य मुनि सब केँ अपना संग लय लेलनि । हुनक मुख्य उद्देश्य रहनि रामक दर्शन करब । राम हुनका लोकनिक खूब बढियाँ आवभगत कयलखिन । खूब स्वागत कयलखिन आ पुछलखिन – “आइ सब मुनि लोकनि अयला अछि । कि काज अछि ? ब्राह्मण हमरा सभक लेल हमेशा देवता छथि । हुनक सेवा हम करब आ यश प्राप्त करब । आइ सब मुनि लोकनि एतय पधारबाक कृपा कयलनि अछि । आज्ञा होय तँ अपनेक सेवा मे लागि जाय । हम ब्राह्मण लोकनिक सेवक छी । अपने लोकनि जे कोनो काज कहब, हम अवश्य करब ।” सुनिकय मुनि लोकनि लवणासुरक अत्याचारक वर्णन करय लगलाह । “सत्ययुग मे मधु नामक एक दैत्य छल । ओ सर्वत्र देवता लोकनि एवं ब्राह्मण लोकनिक प्रति भक्ति करैत छल । ओकरा शिवजी एक गोट त्रिशूल देलनि । ओ जेकरा लागत से रुइया जेकाँ आगि मे जरि जायत । रावणक छोट बहिन, जेकर नाम कुम्भीनसी छलैक, से ओकर पत्नी छल । ओकरहि गर्भ सँ लवणासुरक जन्म भेल । ओ मुनि सब पर हिंसा करय लागल आर यज्ञ आदि कर्म बन्द भ’ गेल । हम सब मजबूर भ’ कय भागि आयल छी । हे राम ! अहाँ हमरा लोकनि केँ सहयोग करू । हमरा सब केँ एहि विपत्ति सँ आर के बचायत ? तेँ तकैत-तकैत हम सब अपनहिंक शरण मे आयल छी ।” ॥३६-५०॥

।दोहा।

कहलनि सत्य-प्रतिज्ञ प्रभु, मरत दुष्ट निर्भीक ॥५१॥
नहि भय नहि भय सकल मुनि, लवणासुर की थीक ॥५२॥

भावार्थः

ई सुनिकय सत्यवादी भगवान कहलनि – “ई बेहया बदमाश अवश्य मरत । हे मुनि लोकनि, अपने सब केँ कोनो डर नहि, कोनो डर नहि । हमरा सामने मे ई लवणासुर कि थिक ?” ॥५१-५२॥

।जयकरी छन्द।

मुनिजन काँ प्रभु कयल बिदाय । तखन कहल प्रभु शुनु सभ भाय ॥५३॥
के मारत गय असुर प्रचण्ड । के धर समर तीर कोदण्ड ॥५४॥

भावार्थः

ई कहिकय राम मुनि लोकनि केँ विदा कयलनि । तेकर बाद अपन भाइ सब सँ कहलनि – “हे भाइ लोकनि, सुनय जाउ । एहि आततायी राक्षस केँ के मारब ? लड़ाइ वास्ते के तीर-धनुष उठायब ?” ॥५३-५४॥

।दोहा।

भरत राम महिपाल सौँ, प्रणत सुवचन उचार ॥५५॥
हम मारब खल लवण काँ, प्रभु – आज्ञा अनुसार ॥५६॥

भावार्थः

भरत राजा राम सँ विनयपूर्वक कहलनि – “अपनेक आज्ञा हो त हम एहि दुष्ट लवणासुर केँ मारब ।” ॥५५-५६॥

।रूपमाला।

कहल तत शत्रुघ्न करयुग जोड़ि केँ तहिठाम ॥५७॥
नाथ लक्ष्मण कयल बहु बेर असुर सौँ सङ्ग्राम ॥५८॥
भरत नन्दीग्राम मे कृश नियम-संयमवान ॥५९॥
हमहिँ लवणासुरक हन्ता होयब हे भगवान ॥६०॥

भावार्थः

तखन शत्रुघ्न ओतय दुनू हाथ जोड़िकय कहलनि – “हे प्रभु, लक्ष्मण तँ कतेको बेर राक्षस सब सँ लड़ाइ कय चुकल छथि । भरत सेहो नन्दिग्राम मे कठोर नियम-संयम सँ रहैत बहुत दुब्बर भ’ गेल छथि । तेँ हे भगवान्, लवणासुर केँ मारबाक मौका हमरा देल जाय ।” ॥५७-६०॥

।चौपाइ।

शुनि शत्रुघ्नक वचन गभीर । समुचित कहल देव रघुवीर ॥६१॥
तनिकाँ लेल अङ्क आरोपि । देल दिव्य शर रघुवर सोपि ॥६२॥
कहलनि यहिसौँ शत्रु विनाश । करु शत्रुघ्न लाब मन आश ॥६३॥
लक्ष्मण सौँ सम्भार अनेक । मँगबाओल कयलनि अभिषेक ॥६४॥
राजा भेलहुँ अहाँ मथुराक । सकल मनोहर धर्म्म-धुराक ॥६५॥
लवणासुरक विनाश-उपाय । जखना घर सौँ कानन जाय ॥६६॥
नाना जन्तु पकड़ि केँ खाय । के नहि तकरा डरय डराय ॥६७॥
तखनहिँ हुनकर रोकब द्वारि । धनुषबाणधर लेबनि मारि ॥६८॥
शङ्कर देल शूल घर धयल । लवणासुर हिंसापथ अयल ॥६९॥
जेहन रघूत्तम कहल उपाय । से शत्रुघ्न कयल विधि जाय ॥७०॥
आओत क्रुद्ध लड़त तनि मारि । मुनिजन-मनक कष्ट देब टारि ॥७१॥
ओ वन सुन्दर मधुवन नाम । ततहि करब अहँ सुन्दर धाम ॥७२॥
जायत घोड़ा पाँच हजार । तकर अर्द्ध रथ सहित सवार ॥७३॥
षटशत वारण वर सम्पत्ति । आओत तीनि अयुत तत पत्ति ॥७४॥
भ्राता काँ लेल हृदय लगाय । आशिष दय कहु कयल बिदाय ॥७५॥
जेहन रीति कहल छल राम । तेहने कयल जाय सङ्ग्राम ॥७६॥
मधुसुत काँ मारल सङ्ग्राम । मथुरा जनपद कयलनि धाम ॥७७॥
सीता जनमल सुत यमल । विधुमुख लोचन सौँ जित कमल ॥७८॥
मुनि-वनितागण सोहर गाब । हर्षक नोर नयन भरि आब ॥७९॥
तनिकर नामकरण मुनि कयल । कुश लव नाम क्रमहि सौँ धयल ॥८०॥
सीता-बालक युगल विनीत । भेला मुनिजन सौँ उपनीत ॥८१॥
क्रम क्रम विद्या पढ़लनि ढेरि । हो अभ्यास शुनथि एक बेर ॥८२॥
सीता-तनय रूप-गुण-अयन । विधि सौँ कयलनि वेदाध्ययन ॥८३॥
सकल रमायण देल पढ़ाय । मुनि वाल्मीकि सुप्रीति बढ़ाय ॥८४॥
स्वर-सम्पन्न सुयुगल कुमार । तन्त्रीलययुत गाब उदार ॥८५॥
वन चलयित मुनिजन जे शून । अति आश्चर्य्य मनहि मन गून ॥८६॥
वैदेही-सुत युगल समान । त्रिभुवन कतहु शुनल नहि गान ॥८७॥
मुनिजन शुनथि सहित अनुराग । समय समय गाबथि से राग ॥८८॥

भावार्थः

शत्रुघ्न ई गहींर बात सुनिकय भगवान् राम कहलखिन – अहाँ ठीक कहैत छी । फेर हुनका स्नेह सँ कोरा मे उठा लेलनि आ दिव्य बाण देलनि । ओ कहलनि – “एहि सँ अहाँ शत्रु केर संहार करब । हे शत्रुघ्न, अहाँ विजय केर आशा करू ।” लक्ष्मण केँ आदेश दय केँ हुनका सँ अभिषेकक समान मँगबौलनि आ शत्रुघ्नक अभिषेक कय देलनि कहलनि – “अहाँ मथुराक राजा भेलहुँ जे सब नगर सँ अधिक सुन्दर अछि तथा धर्म मे अगुआ अछि । आब लवणासुर केँ मारबाक उपाय कहैत छी । जखन ओ घर सँ निकलिकय जंगल मे जाइत अछि, भाँति-भाँतिक प्राणी सब केँ पकड़ि-पकड़िकय खाय लगैत अछि । ओकरा डर सँ के नहि भागि जाइछ ! एहने मौका पर अहाँ ओकर द्वार छेक लेब, आर धनुष-बाण चलाकय ओकरा मारि देब ।” लवणासुर शिव केर देल त्रिशूल घर राखिकय शिकार करय चलि पड़ल । तखन राम जेना कहने रहथि, शत्रुघ्न तेहने उपाय कयलनि । राम कहलनि – “ओ आयत आ तमसाकय लड़य लागत । ओकरा मारिकय अहाँ मुनि लोकनिक कष्ट केँ दूर करब । ओ जे सोहाओन जंगल मधुबन केर अछि ओतहि अहाँ अपन राजधानी बनायब । सवार-सहित पाँच हजार घोड़ा पठायब आर ओकर आधा रथ । छः सौ हाथी पठायब आ तीस हजार पैदल सैनिक ।” ई कहिकय राम शत्रुघ्न केँ गला सँ लगा लेलनि आ आशीर्वाद दय केँ विदा कयलनि । राम जेना कहने रहथि शत्रुघ्न ताहि अनुसार लड़ाइ कयलनि । मधुक पुत्र लवणासुर केँ लड़ाइ मे मारि देलनि आ मथुरा मे अपन राजधानी बनौलनि ॥६१-७७॥

कुश आ लव केर जन्म तथा शिक्षा-दीक्षा

सीता केँ जौआँ पुत्र भेलनि । दुनू बच्चाक मुँह चाँद जेकाँ आ आँखि कमल केँ पराजित करयवला छल । मुनि पत्नी लोकनि जन्मोत्सव गीत सोहर गाबय लगलिह । हुनक आँखि मे हर्षक नोर भरि अयलनि । वाल्मीकि ओहि दुनूक नामकरण-संस्कार कयलनि आ क्रमशः कुश तथा लव नाम रखलनि । कालक्रमेण सीताक दुनू कुमार केँ मुनि मुनि लोकनि उपनयन-संस्कार कयलनि । ओ दुनू कुमार खुबे रास विद्या सब पढ़लनि । जे एक बेर सुनैत छलथि से याद भ’ जाइत छलन्हि । रूप आ गुण सँ भरल सीताक दुनू पुत्र लोकनि ब्रह्माजी सँ वेद पढ़लनि । मुनि वाल्मीकि सारा रामायण पढ़ा देलखिन्ह । दुनू कुमारक गला बड मीठ रहनि । ओ सब वीणाक लय पर सुन्दर गबैत छलथि । वन मे जाइत मुनि सब सुनथि, ओ सब मनहि-मन बड़ा अचरज करथि । जेहेन गायन सीताक ई दुनू कुमार गाबथि ओना तीनू भुवन मे कतहु नहि सुनल गेल छल । मुनि लोकनि ओ गान बड़ा चाव सँ सुनथि आ स्वयं सेहो वैह राग गाबथि ॥७८-८८॥

।सोरठा।

प्रथमहिँ भैरव राग, मालकोश हिण्डोल पुन ॥८९॥
श्रवण मनोहर लाग, दीपक श्री ओ मेघ षट ॥९०॥

भावार्थः

भैरव, मालकोश, हिन्दोल, दीपक, श्री आर मेघ – ई छः राग सुनय मे बड नीक लगैत छल ॥८९-९०॥

।पादाकुल दोहा।

सुस्वर सरस सराग मधुरतर, सालङ्कार प्रमाण ॥९१॥
स्वर पद छन्द सुताल सुलय युत, युगलकुमार कर गान ॥९२॥

भावार्थः

ओ कुमार सब जे गबैत छलथि ताहि मे ठीक स्वर, रस, राग, अलंकार, छन्द, ताल आ लय रहैत छल ॥९१-९२॥

।चौपाइ।

स ऋ ग म प ध नी ई स्वर सात । स्वर-प्रस्तार वदन अवदात ॥९३॥
उच्च निषाद तथा गान्धार । नीच ऋषभ धैवत उच्चार ॥९४॥
स्वरित स्वर हो यहि सौँ आन । कुश लव शिव सुगीति काँ जान ॥९५॥
षड्ज स्वर रट मत्त मयूर । चातक रटय ऋषभ स्वर पूर ॥९६॥
अजा उचार करय गान्धार । मध्यम स्वर काँ क्रौञ्च उचार ॥९७॥
कोकिल पञ्चम स्वर कर गान । धैवत मण्डुक-वचन समान ॥९८॥
स्वर निषाद गर्ज्जित गजराज । राग कुशीलव-कण्ठसमाज ॥९९॥
हास्य शृङ्गार गीति शुभ बेरि । पञ्चम मध्यम स्वर काँ टेरि ॥१००॥
वीर रौद्र अद्भुत प्रस्ताव । षड्ज ऋषभ स्वर काँ से गाब ॥१०१॥
गीति करुणरस रीति विषाद । स्वर गान्धार प्रचार निषाद ॥१०२॥
गीत विभत्स भयानक जखन । धैवत स्वर उच्चारक तखन ॥१०३॥
एकइश गोट मूर्छना नाम । बाइश श्रुति सम्मति तेहिठाम ॥१०४॥
अथवा श्रुति कह चौदह गोटि । चौदह गोटि मूर्छना कोटि ॥१०५॥
रामायण कर कुश लव गान । हरिण हजार शुनथि दय कान ॥१०६॥
नहि तालक न राज अवमान । कुश लव कुशल सकल मत जान ॥१०७॥
अथ एक समय राम महिपाल । अश्वमेध मख करथि विशाल ॥१०८॥
विधि आरम्भ करय लगलाह । सकल निमन्त्रित मुनि चललाह ॥१०९॥
कनकमयी सीता निर्म्माय । यज्ञ कयल जन देखय जाय ॥११०॥
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यक जाति । मन घन उत्सव चल दिन राति ॥१११॥
मुनि वाल्मीकि कयल प्रस्थान । कुश लव शिष्य सङ्ग भगवान ॥११२॥
ऋषि बाटक लग जखन गेलाह । सुमुनि समाधि-विरत भेलाह ॥११३॥
कुश पुछलनि गुरु काँ तत जाय । ज्ञात सकल गुरु-सेवा पाय ॥११४॥
देही काँ संसृति सौँ बन्ध । अथवा मुक्ति-युक्ति निर्द्धन्ध ॥११५॥
कहल जाय गुरु हमरा आज । सेवक शिष्य अनन्य समाज ॥११६॥
मुनि वाल्मीकि कहय लगलाह । दिव्य समाधि सुखी जगलाह ॥११७॥
थिकथि चिदात्मा सतत अदेह । देह दृष्ट ई तनिकर गेह ॥११८॥
मन्त्री थिकथि तिनक अभिमान । अपनहिँ तनिकाँ कयल प्रधान ॥११९॥
तन-तादात्म्य चलल विस्तार । दृढ़ संकल्प निगड़ व्यवहार ॥१२०॥
पुत्र दार गृह आदि जतेक । सभ मे ममता बढ़ल अनेक ॥१२१॥
कय सङ्कल्प करथि पुन शोच । संसृति नाना तरहक रोच ॥१२२॥
उत्तम मध्यम अधम शरीर । सत्त्वरजस्तम सभ मे फीर ॥१२३॥
तमोवृद्धि पर गुण हो ह्रास । कृमिकीटादिक होथि प्रकाश ॥१२४॥
सत्त्व-रूप सङ्कल्प प्रधान । सद्‌व्यवहार विशुद्ध स्वभाव ॥१२५॥
बड़ सम्राज्य अदूर सुमोक्ष । विद्यमान सुख हो अपरोक्ष ॥१२६॥
रजोरूप सङ्कल्प प्रभाव । सद्‌व्यवहार विशुद्ध स्वभाव ॥१२७॥
पुत्र दार धन सम्पत्ति पाब । रजोगुणैक नृपति बनि आब ॥१२८॥
त्रिविध त्याग सङ्कल्प-विहीन । मन सौँ मनन न होयब दीन ॥१२९॥
वर्ष सहस्र बहुत तप करब । सुख दुख चक्र सतत सञ्चरब ॥१३०॥
रहथि पाँच मन ज्ञान समेत । मनि न विचेष्टा चलथि निकेत ॥१३१॥
कहथि परम गति श्रुति-सिद्धान्त । तनिक नाम कहथि बुध शान्त ॥१३२॥
जखन छुटत सङ्कल्पक जाल । जीव ब्रह्मता लह तत्काल ॥१३३॥
कुश लव कुशल रहब सभ ठाम । वृत्त सुषुप्त चित्त विश्राम ॥१३४॥

भावार्थः

स-रे-ग-म-प-ध-नि- ई सात स्वर होइत अछि, फेर एहि सातो केर प्रस्ताव (विभिन्न प्रकारक विन्यास) सँ हुनकर गला एकदम साफ भ’ गेल छलन्हि । निषाद आ गान्धार उच्च स्वर थिक; ऋषभ आ धैवत नीच स्वर थिक । एहि सँ भिन्न स्वर अर्थात् स, म, आर प, स्वरित छन्हि । कुश आ लव शैव-सिद्धान्तक अनुसार गबैत छलथि । षड्ज स्वर मे मतवाला मयूर बजैत अछि, ऋषभ स्वर मे चातक रहैत अछि, बकरी गान्धार स्वर केर उच्चारण करैत अछि, क्रौंच पक्षी मध्यम स्वर मे बजैत अछि, कोयल पंचम स्वर केर उच्चारण करैत अछि, बेंग धैवत स्वर उच्चारण करैछ, आर हाथी निषाद स्वर मे चिंघाड़ैत अछि । राग कुश-लव केर कंठ मे रहैत छन्हि । शुभ अवसर पर हास्य आ शृंगार रसक गीत पंचम आ मध्यम स्वर मे गायल जाइत अछि ।  वीर, रौद्र आ अद्भुत रस षड्ज आ ऋषभ स्वर मे गायल जाइत अछि । करुण रस केर विषाद-गीत गान्धार आ निषाद स्वर मे गायल जाइत अछि । जखन वीभत्स या भयानक रस मे गीता गेबाक हो तखन धैवत स्वर केँ अपनायल जाइछ । संगीत मे एक्कैस गोट मूर्च्छना होइत अछि आर बाइस गोट श्रुति सब । दोसर मत अछि जे चौदह गोट श्रुति होइछ आ चौदह गोट मूर्च्छना सब । जखन कुश आ लव रामायण गाबय लगैत छलथि त हजारों हिरन कान दय कय सुनय लगैत छल । नहि कतहु ताल टूटय, नहिये राग बिगड़य । कुश आ लव संगीतक सब मत केर ज्ञाता रहथि ॥९३-१०७॥

रामक अश्वमेध यज्ञ करब, गुरुक संग कुश आ लव केर ओतय प्रस्थान 

एक समय राजा राम अश्वमेध यज्ञक विशाल आयोजन कयलनि । यज्ञक कार्य शुरू भेल । जतेक मुनि सब आमंत्रित रहथि, सब यज्ञ देखय चललाह । सीताक स्वर्ण प्रतिमा बनाकय यज्ञ कयल गेल । सब लोक जा-जाकय देखलक । ब्राह्मण, क्षत्रिय आ वैश्य सब जातिक लोकक मन मे दिन-राति उछाह भरल रहैत छलैक । यज्ञ देखबाक लेल अपन शिष्य कुश आर लव केँ संग लेने मुनि वाल्मीकि सेहो चलि पड़लाह । जखन वाल्मीकि रास्ताक बगल मे समाधि लगाकय ओहि सँ निवृत्त भेलथि, कुश ओतय जाकय गुरु सँ पुछलनि – “गुरुक सेवाक अवसर पाबिकय हमरा सबटा ज्ञान प्राप्त भेल अछि । कि आत्मा केँ जन्म आ मरण केर बन्धन रहैत छैक ? अथवा ओ चिन्ता-रहित मुक्त रहैत अछि ? हे गुरु आइ हमरा ई बताउ । शिष्य अपनेक सेवक थिक आ एकान्त अवसर भेटल अछि ।” ई सुनिकय वाल्मीकि मुनि अलौकिक समाधि सँ जागिकय सुखपूर्वक कहय लगलाह – “चैतन्यस्वरूप आत्मा सदिखन शरीर सँ अलग होइत अछि । ई जे शरीर देखल जाइछ, से ओकर घर तिक । अभिमान ओहि आत्माक मंत्री थिक । आत्मा स्वयं ओकरा प्रधान बना देने अछि । आत्मा केँ शरीर सँ अभिन्नताक मिथ्या ज्ञान पसरि गेल । दृढ़ संकल्प अर्थात् कर्मक प्रति आग्रह बेड़ी जेहेन (बन्धन) थिक । बेटा, स्त्री, घर-द्वार आदि जेहो चीज सब अछि, सब मे ममता बढ़ैत चलि गेल । लोक स्वयं संकल्प करैछ आ स्वयं पछताइछ । संसार मे नाना प्रकारक आकर्षण रहैत छैक । जीव केँ सत्त्व, रजस् आ तमस् एहि तीन गुण सभक प्रभाव सँ क्रमशः उत्तम, मध्यम आ अधम कोटिक शरीर सब सँ गुजरय पड़ैत छैक । तमस् केर बढ़ला सँ गुण मे कमी आबि जाइत छैक आ कीड़ा-मकोड़ाक शरीर प्राप्त होइत छैक । पैघ सम्राज्य भेटला सँ, मोक्षक प्राप्ति नजदीक आबि जाइत छैक, आर प्रत्यक्ष सुख भेटय लगैत छैक । रजस्-प्रधान संकल्प भेला सँ नीक बरताव आ परम निश्छल स्वभाव भेटैत छैक । पुत्र, स्त्री आ धन-दौलत पबैत अछि आ रजोगुण वला राजा बनैत अछि । तीनू प्रकारक संकल्प सँ दूर रहू । मोन मे चिन्तन-मनन करैत रहू । कखनहुँ दीनता नहि आओत । हजार वर्ष धरि कठोर तपस्या करब; सुख आ दुःख केर चक्र मे सदिखन घुमैत रहब । जे पाँच इन्द्रिय, मन आ ज्ञान सँ युक्त रहैछ तथा खराब क्रिया सब मे बुद्धि नहि लगबैत अपन घर अर्थात् शरीर मे चलैत अछि, ओकर यैह अवस्था केँ वेद केर सिद्धान्त अनुसार परमगति कहल जाइत छैक । ओकरे विद्वान् लोक सब शान्त कहैत छथि । जखन संकल्प रूपी जाल छुटि जायत, तखन जीव तुरत ब्रह्म भ’ जायत । हे कुश आ लव, अहाँ लोकनि सबठाम प्रसन्न रहब, आब अहाँक सब वृत्ति सुषुप्त भ’ जायत, आर चित्त विश्रामावस्था मे चलि जायत ॥१०८-१३४॥

।इति चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे उत्तरकाण्डे पञ्चमोऽध्यायः।

॥मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे उत्तरकाण्डक पाँचम अध्याय समाप्त भेल॥

हरिः हरः!!

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