स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण
उत्तरकाण्ड – चारिम अध्याय
रावण केर श्वेतद्वीप जायब आ पराजित भ’ रामक हाथे मरबाक कामना करब, शम्बूक केर वध, लोकापवाद केर पसरब आ सीता केँ वनवास, सीताक वाल्मीकिक आश्रम मे जायब
।चौपाइ।
एक समय उन्मद लङ्केश । युद्धार्थी सञ्चर कत देश ॥१॥
नारद मुनि सौँ दरशन पाबि । पुछलनि तनिकाँ तट मे आबि ॥२॥
हमर समान कतय बलधाम । जत हम करब घोर सङ्ग्राम ॥३॥
मुनि कहलनि अछि श्वेतद्वीप । पुष्पक-रथ पथ सकल समीप ॥४॥
विष्णुभक्त वा तत्कर-मरण । श्वेतद्वीप तनिक हो शरण ॥५॥
एहन सृष्टि नहि दोसर ठाम । जय सकी तौँ हो सङ्ग्राम ॥६॥
शुनितहिँ रावण कयलनि गमन । हुनकर अनय करय के शमन ॥७॥
पुष्पक चलनहि द्वीप समीप । उतरि चलल तत असुर-अधीप ॥८॥
वनिता वृद्धा तनिकाँ धयल । पकड़ि घुमाओल दुर्गति कयल ॥९॥
के तोँ थिका एतय की काज । ककर पठाओल कह नहि लाज ॥१०॥
दशकन्धर उत्तर नहि बाज । महा मनोदुख तनिक समाज ॥११॥
बड़ अनुचित अयलहुँ एहिठाम । पाओल साहस-फल परिणाम ॥१२॥
जखना पाओल किछु अवकाश । गमहिँ पड़यला बड़ मन त्रास ॥१३॥
धिक अमरत्व कि गञ्जन ग्रस्त । दशमुख दुख-चिन्ता सौँ व्यस्त ॥१४॥
विष्णुक हाथ मरण से करब । नहि पुनि अमर-समर सञ्चरब ॥१५॥
तकरे हेतु दशानन जानि । सीता-हरण कयल हठ ठानि ॥१६॥
मातृ-बुद्धि ओ मन मे मानि । हुनि कर मरब असुरता हानि ॥१७॥
त्रिकालज्ञ प्रभु साक्षी राम । अन्त सकल विश्वक विश्राम ॥१८॥
स्तुति अगस्त्य मुनि बहुविध कयल । राम-सुपूजित निज पथ धयल ॥१९॥
सीतासङ्ग विषय-अनुरक्त । भासित बाहर चित्त विरक्त ॥२०॥
अनासक्त प्रभु कर गृह-काज । परमेश्वर लीला नर-व्याज ॥२१॥
रामचन्द्र काँ देलनि फेर । पुष्पक रथ पठबाय कुबेर ॥२२॥
पुष्पक रावण हरलनि जैह । तनिकाँ जीति छीनि लेल सैह ॥२३॥
यावत पृथिवी-स्थित प्रभु रहत । तावत पुष्पक अहँ काँ बहत ॥२४॥
पुष्पक काँ कहलनि रघुराज । अपनैँक जखन होयत गय काज ॥२५॥
स्मरण करब तखना हम अयब । अन्तर्हित रहु बड़ सुख पयब ॥२६॥
भावार्थः
भटकब ।” रावण विष्णुक हाथ सँ मरबाक एकटा उपाय जानिकय हठपूर्वक सीताक हरण कयलक । रावण सीता केँ माताक तुल्य मानलक आ सोचलक जे हुनका हाथ मरय सँ असुरता सँ मुक्ति भेटत । एतेक कहिकय मुनि अगस्त्य फेरो बहुत प्रकार सँ रामक स्तुति कयलनि – “अपने भूत, भविष्य आर वर्तमान तीनू काल केँ जनैत छी । अपने सभक मालिक छी । सब किछु देखैत रहैत छी । प्रलय भेला पर सब वस्तु अपनहिं मे लीन भ’ जाइत अछि ।” एहि तरहें स्तुति कयलाक बाद अगस्त्य मुनि राम सँ उचित आदर-सत्कार पाबिकय अपन रास्ता पकड़ि लेलनि । राम बाहर सँ लगैत रहथि जे सीताक संग विषयभोग मे लिप्त छथि, मुदा भीतर सँ एकदम विरक्त रहथि । राम गृहस्थ जीवनक सारा काज तँ करैत छलथि मुदा ओहि मे आसक्त नहि रहैत छलथि । परमेश्वर होइतहु मानवक छद्मवेश धारणकय लीला करैत छलथि । कुबेर फेर सँ अपन पुष्पक रथ राम केँ पठा देलनि । ओ सन्देश पठौलनि – “जाहि पुष्पक केँ रावण हैर लेने छल, तेकरा अपने रावण सँ छीनि लेलहुँ । तेँ जाबत धरि ई धरती रहत, ताबत धरि ई पुष्पकविमान अपनहिंक सवारी बनल रहत ।” राम पुष्पक सँ कहलनि – “जखन हमरा अहाँक प्रयोजन होयत तखन हम अहाँ केँ याद करब, अहाँ आबि जायब । अहाँ अदृश्य रूप मे रहू । एहि सँ पैघ सुख भेटत ।” ॥१-२६॥
।सोरठा।
कार्य्य अमानुष राम, करथि नृपति सन्नीति-युग ॥२७॥
नहि अनीति तहि ठाम, वसुधा शस्यमयी सतत ॥२८॥
रथ चढ़ि चढ़ि सभ देश, जाथि करथि सभ लोक सुख ॥२९॥
ककरहु हो न क्लेश, हनुमदादि सेवक सतत ॥३०॥
भावार्थः
अपन राजकाज राजनीति केर सिद्धान्त मुताबिक अलौकिक-असाधारण कौशल सँ चलबैत रहथि । ओतय कतहु अन्याय-अत्याचार केर नाम नहि छलैक । धरती सदिखन शस्यमयी (हराभरा) रहैत छल । राम रथ पर सवार भ’-भ’कय सब इलाका मे जाइत छलथि आर एहि सँ सब लोक सुख पबैत छल । केकरहु कोनो तकलीफ नहि रहैक । हनुमान आदि सेवक सदैव तत्पर रहैत छलथि ॥२७-३०॥
शम्बूक केर वध
।चौपाइ।
एक समय द्विज-तनयक मरण । ब्राह्मण कलुषित-अन्तष्करण ॥३१॥
धर्म्मक पालक श्री रघुनाथ । सकल वस्तु अछि अपनैँक हाथ ॥३२॥
हम निष्पाप कहल अछि आय । राजा-विषय पड़ल अन्याय ॥३३॥
पुत्र जिबथि तैँ होउ सहाय । विकल कहै छी करू उपाय ॥३४॥
लक्ष्मण रामक आज्ञा पाय । शूद्र एक वन देखल जाय ॥३५॥
विप्रक सन करइत आचरण । लक्ष्मण-कर तनिकर भेल मरण ॥३६॥
ब्राह्मण – बालक उठि बैसलाह । द्विज से धन्य कहाय लगलाह ॥३७॥
शिव – स्थापना कोटिक कयल । लोकाचारक सत्पथ धयल ॥३८॥
एक समय क्रीड़ा – आराम । सीता – सङ्ग नवल – घनश्याम ॥३९॥
कहल जानकी प्रभु किछु कहब । कत दिन महिमण्डल मे रहब ॥४०॥
देव देवगण कह कर जोड़ि । चलु वैकुण्ठ मर्त्यसुख छोड़ि ॥४१॥
बनि-मुनि-पत्नी काँ वसु देव । तनिकाँ सौँ हम आशिष लेब ॥४२॥
होइछ मन वन देखी जाय । अबितहुँ गङ्गा तीर्थ नहाय ॥४३॥
जे रुचि हो से करु प्रभु काज । कयल बहुत दिन पृथिवी-राज ॥४४॥
अयलहुँ जे मन कय सङ्कल्प । तकरो समय रहल अछि अल्प ॥४५॥
सीता-वचन शुनल प्रभु कान । की कर्त्तव्य धयल प्रभु ध्यान ॥४६॥
भावार्थः
एक दिन एक गोट ब्राह्मणक एक बेटा मरि गेल । ब्राह्मण केँ भारी शोक भेलनि । ओ रामक समक्ष विनती करय पहुँचि गेलाह – “हे राम, अपने धर्मक रक्षक थिकहुँ । सब व्यवस्था अपनहिंक हाथ मे अछि । हमर कहय लेल आयल छी जे हम कोनो पाप नहि कएने छी, फेर ई जे पुत्रशोक भेल अछि, ई अन्याय सँ मुक्ति लेल राजाक विषय बुझि अपने लग प्रार्थना करय आयल छी । हम अत्यन्त विकल भ’ अपने सँ पुत्र जियेबाक उपाय करय विनती कय रहल छी । हमर रक्षा कयल जाउ ।” ई सुनिकय रामजी लक्ष्मण केँ आज्ञा देलनि जे देखू कि बात छैक ? लक्ष्मण पता लगौलनि जे वन मे एक गोट शूद्ध अछि, जे ब्राह्मणक आचरण कय रहल अछि । लक्ष्मणक हाथ सँ ओकर मृत्यु भेलैक । फेर कि छल, ब्राह्मणक ओ मरल पुत्र जिबि उठल । ओ ब्राह्मण “धन्य-धन्य” कहय लागल । राम करोड़ों शिवलिंगक स्थापना कयलनि आर समाज मे प्रचलित परम्परा सभक पालन करैत रहलाह ॥३१-३८॥
लोकापवादक पसरब आ सीता केँ वनवास
एक समय नव मेघ-समान साँवला राम सीताक संग क्रीड़ा-उद्यान मे छलथि । सीताजी कहलखिन – हे प्रभु, एकटा बात कहबाक अछि । एहि धरती पर आर कतेक दिन रहबाक अछि ? हे प्रभु, देवता लोकनि हाथ जोड़िकय कहि रहल छथि जे मर्त्यलोकक सुखभोग छोड़िकय आब वैकुण्ठ चलू । वैकुण्ठ जाय सँ पहिने हम चाहैत छी जे वनवासी मुनि सभक पत्नी लोकनि केँ किछु दान दी आर हुनका सब सँ आशीर्वाद ली । मोन करैत अछि जे फेर जाकय वन देखितहुँ आ गंगा-स्नान करितहुँ । हे प्रभु, अहाँ केँ जे-जे काज करबाक इच्छा हो, कय लेल जाउ । अपने पृथ्वी पर बहुत दिन धरि राज कयलहुँ । मोन मे जे संकल्प लय केँ आयल रही तेकरो समय आब कनिकबे रहि गेल अछि ।” राम सीताक बात सुनलनि आ सोचय लगलाह जे कि करबाक चाही ॥३१-४६॥
।सोरठा।
कहइत छी एकान्त, करब लोक-अपवाद छल ॥४७॥
जनइत छी वृत्तान्त, त्यागब अहँ काँ देब वन ॥४८॥
जनमत युगल कुमार, गर्भवती अहँ सौँ वनहिँ ॥४९॥
होयत चरित उदार, शपथ करब अहँ आबि पुन ॥५०॥
भूमिक विवर समाय, जायब अहँ वैकुण्ठ पुन ॥५१॥
किछु दिन हमहुँ गमाय, जानकि तत अयबे करब ॥५२॥
भावार्थः
ओ सीता सँ कहलनि – “हम एकान्त मे एकटा गुप्त बात कहैत छी । हम लोक-अपवादक बहाना बनायब । अहाँ तँ सब हाल जनिते छी, अहाँ केँ वन मे त्यागि देब । वन मे अहाँ दुइ गोट कुमार केँ जन्म देब । ओ दुनू बहुत पैघ यशस्वी हेताह । अहाँ फेर घुरिकय शपथ लेब । फेर धरतीक दराउ मे समाकय अहाँ वैकुण्ठ चलि जायब । हे सीता, किछु दिन बाद हमहुँ ओतहि चलि आयब ।” ॥४७-५२॥
।पादाकुल दोहा।
।तिरहुति।
हास्यप्रौढ़ कथा पण्डित काँ, पुछलनि जखना राम ॥५३॥
कथा प्रसङ्ग पुछल की कहइछ, ग्राम-लोक सभ ठाम ॥५४॥
माता सभ काँ वा सीता काँ, जे छथि हमरा भाय ॥५५॥
लोक कहै अछि की से कहु कहु, हमर शपथ अहँ खाय ॥५६॥
विजय नाम एक हास्य-सभासद, कहलनि शुनु रघुनाथ ॥५७॥
शपथ खाय हम सत्य कहै छी, करइत छी नहि लाथ ॥५८॥
सीता का वन सौँ दशकन्धर, हरि लय गेल निज धाम ॥५९॥
से पुन पटरानी छथि सम्प्रति, केहन हृदय छथि राम ॥६०॥
धोबिनि रूसि गेल छलि घरसौँ, धोबि कहल खिसिआय ॥६१॥
जेहने नृपति प्रजा-गति तेहनि, राजा कर से न्याय ॥६२॥
जन सभ चूप भूप रघुनन्दन, कहलनि सभ काँ जाय ॥६३॥
नयन सजल लक्ष्मण काँ केवल, कहल रहस्य मंगाय ॥६४॥
लोकमध्य अपवाद शुनल अछि, सीता-कृत विस्तार ॥६५॥
सीता त्याग करब हम सम्प्रति, हमरा चित्त विचार ॥६६॥
प्रातहि सीता रथ चढ़ाय अहँ, लक्ष्मण सत्वर जाउ ॥६७॥
मुनि वाल्मीकिक आश्रम-वनमे, चित्रकूट पहुँचाउ ॥६८॥
जौँ अन्यथा करी तौँ हमरा, मारी अहँ तरुआरि ॥६९॥
हा विधि-कृत हमरा छुटइत छथि, सीता साध्वी नारि ॥७०॥
भावार्थः
एक समय दरबार मे रामजी मजाक-मजाक मे एकटा पंडित सँ पुछलन्हि – “पंडितजी, हम एनाही प्रसंगवश पुछैत छी । गामक लोक जेतय-तेतय कि बजैत अछि ? हमर माता लोकनिक सम्बन्ध मे, सीताक बारे मे या हमर भाइ भरतक बारे मे लोक कि बजैत अछि, से हमर शपथ खाकय ठीक-ठीक कहू ।” विजय नाम केर एकटा मजाकिया दरबारी कहलक – “हे प्रभु, सुनल जाउ । हम शपथपूर्वक सच-सच कहैत छी, कोनो छल नहि करैत छी । लोक बजैत अछि, सीता केँ हैरकय रावण अपन घर लय गेल छल । ओ घुरिकय आइ पटरानी बनल छथि । केहेन हृदय छन्हि राम केर ! एकटा धोबिन रुसिकय घर सँ निकलि गेल छल । घुरला पर धोबी तामश मे आबिकय कहलक – जेना राजा करैत छैक तेनाही प्रजा करैत छैक । जे राजा करैत अछि ओकरे उचित बुझल जाइत अछि ।” सुनिकय दरबाक लोक सब गुम भ’ गेल । राजा राम दरबारक सब लोक केँ जयबाक आज्ञा देलनि । राम लक्ष्मणक आँखि मे नोर देखि हुनका एकान्त मे बजाकय कहलनि – “प्रजाक बीच सीताक बारे एकटा पैघ अपवाद सुनल अछि । आब हम सीता केँ छोड़ि देबनि । यैह मोन मे निश्चय कयलहुँ अछि । हे लक्ष्मण, अहाँ भोर होइते देरी सीता केँ रथ पर चढ़ाकय जल्दी जाउ, आर चित्रकूट वन मे वाल्मीकि केर आश्रम मे पहुँचाकय ओतहि छोड़ि आउ । यदि हम एहि मे बाधा करी त हमरा तलवार सँ खत्म कय देब । हा, विधाताक केहेन विधान छन्हि ? सिता-सन-सती-साध्वी स्त्री केँ छोड़य पड़ि रहल अछि ।” ॥५३-७०॥
।सोरठा।
रथलय प्रातहिँ जाय, लक्ष्मण सहित सुमन्त्र तहँ ॥७१॥
प्रभु-अनुशासन पाय, वैदेही काँ कहल से ॥७२॥
भावार्थः
भोर होइतहि सुमन्त्र सहित लक्ष्मण रथ लय केँ सीता लग पहुँचलाह । रामक जेहेन आज्ञा छलन्हि, सीता केँ सुना देलनि ॥७१-७२॥
।मणिगुण छन्द।
चढ़ु चढ़ु रघुवर-घरनि सुरथ मे ॥७३॥
कहब सकल हम चलयित पथ मे ॥७४॥
हठ रथ चढ़लि प्रभुक रुचि मन लै ॥७५॥
अनमनि सनि चललिह बिनु जनलैँ ॥७६॥
सुरसरि उतरि जइति मुनिवन मे ॥७७॥
तखन प्रकट किछु लछमन मन मे ॥७८॥
बुझथि न प्रभुरुचि वर-छविसदना ॥७९॥
पुछल तखन लछमन विधुवदना ॥८०॥
भावार्थः
लक्ष्मणजी बजलाह – “हे रामक गृहिणी सीता, एहि रथ पर चढ़ू । सब बात हम रास्ता मे चलैत समय कहब ।” रामक एहेन इच्छा छन्हि, ई सोचिकय सीता हठात् रथ पर चढ़ि गेलिह । हुनका किछु बुझय मे नहि अयलनि जे कि बात छैक । ओ उदास छलिह । जखन ओ गंगा नदी केँ पार कय मुनिक आश्रम दिश चललिह तखन लक्ष्मणक मोन मे किछु भावनाक लहैर अयलनि । वनक शोभा देखय मे व्यस्त सीता केँ ई बोध नहि भेलन्हि जे रामक कि इच्छा छन्हि ॥७३-८०॥
।लवङ्मम छन्द।
देवर जनु करु खेद नयन जलधार की ॥८१॥
श्रीरघुवर-पद-कमल प्रेम-विस्तार की ॥८२॥
सत्वर घुरि घर चलब देखि मुनि-कामिनी ॥८३॥
सुन्दर नव-घनश्याम थिकहुँ सौदामिनी ॥८४॥
जौँ जनितौँ हम एहन नाथ सङ्ग आनितौँ ॥८५॥
नारि-सहित मुनिलोक सकल सन्मानितौँ ॥८६॥
जौँ कानब एहिठाम कहब अहँ भायकेँ ॥८७॥
ओत सभ मिलि मिलि सभ्यमे रहब लजायकेँ ॥८८॥
भावार्थः
तखन सीता लक्ष्मणजी सँ कहलखिन – “हे दिअर लक्ष्मण, अहाँक आँखि मे ई नोर केहेन ? कि रामजीक चरण-कमल मे जे गहींर प्रेम अचि तेँ बिछोह मे कानि रहल छी ? हम मुनि पत्नी लोकनि संग भेटिकय तुरत घर घुरि जायब । राम हमरा लेल नव सोहावन घनश्याम छथि आर हम हुनका लेल विद्युत केर चमक छी । यदि हम जनितहुँ जे अहाँ एहि तरहें कानय लागब त हम पतिदेवहि केँ संग अनितहुँ, जे पत्नी सहित मुनि लोकनिक पूजा करितथि । जँ अहाँ एखन एना कानब त हम अहाँक भाइ सँ कहि देब । अहाँ एहि तरहें कनैत सभ्य लोक सब सँ भेटब त अहाँ लज्जित होयब ॥८१-८८॥
।हंसी छन्द।
।तिरहुति देश।
हा वैदेही हा वैदेही, वचन कठिन मुखसौँ न किछु आबै ॥८९॥
सीता साध्वरी धीरा हंसी, अहँक सुकृत सुर नर मुनि गाबै ॥९०॥
ओ राजा आज्ञा के टारै, विधिक लिखल छल जन न घटाबै ॥९१॥
जे चाहै से से निर्व्वाहै, सुरपुर बस अथ नरक पठाबै ॥९२॥
भावार्थः
तखन लक्ष्मण बजलाह – “हा सीता, हमर मुँह सँ कठोर वचन निकलि नहि रहल अछि । हे सीता, अहाँ सती-साध्वी छी, गम्भीर छी, हँसी जेकाँ बिकायवाली छी । देवता सब, मुनि सब आ साधारण लोक सब अहाँक यश गबैत छथि । राम राजा छथि । हुनकर आज्ञा केँ के टालि सकैत अछि ? विधाता जे लिख देलनि तेकरा कोन आदमी मेटा सकैत अछि ? विधाता जे चाहैत छथि वैह कय देखबैत छथि । ओ चाहथि तँ स्वर्ग दय सकैत छथि या नरक पठा सकैत छथि ॥८९-९२॥
।अभिराम अहीर छन्दः।
हा न हमर किछु दोष-जानकि-परिहरु मानस-रोष ॥९३॥
शपथ देल रघुनाथ-जानकि – किछु न कयल हम लाथ ॥९४॥
की अपराध विचारि – जानकि – त्यागल गुणमति नारि ॥९५॥
कत मन करब कठोर – जानकि – नयन सतत बह नोर ॥९६॥
हमरे गुरु अपराध – जानकि – आनल वन बनि व्याध ॥९७॥
चललहुँ हम कय त्याग – जानकि – जाउ जतय मन लाग ॥९८॥
भावार्थः
हे सीता, एहि मे हमर कोनो अपराध नहि अछि । हमरा उपर मोन मे क्रोध नहि कयल जाउ । हे सीता, राम एना करबाक लेल शपथ देलनि अछि । हम कोनो बहाना बनाकय ई टालि नहि सकलहुँ । हे सीता, कोन अपराधक कारण राम एहेन गुणवती नारी केर त्याग कयलनि ? आब हम अपन कलेजा केँ कतेक मजबूत बनायब । हमरा आँखि सँ लगातार नोर बहि रहल अछि । ई हमरहि भारी अपराध थिक जे व्याध बनिकय हम अहाँ केँ वन मे अनलहुँ । हे सीता, अहाँ केँ एतय छोड़िकय जा रहल छी; अहाँक जेतय मोन हो, जाउ ।” ॥९३-९८॥
।चञ्चरी छन्द।
की करू कत जाउ हाय उपाय सूझ न नारि केँ ॥९९॥
नाथ भास्कर-वंश-पङ्कज-भानु देलनि टारि केँ ॥१००॥
भेल की अपराध से कह लोक के वन आबि केँ ॥१०१॥
आढ्य की जन रङ्क की दुख भोग देह इ पाबि केँ ॥१०२॥
भावार्थः
सीता कहलनि – “कि करू ? कतय जाउ ? एहि नारी केँ कोनो रास्ता नहि सुझाइत अछि । सूर्यवंश रूपी कमल लेल सूरज समान हमर पति राम हमरा त्यागि देलनि । एतय एने बिना कियो हमरा ई केना बतायत जे हमरा सँ कि अपराध भेल । धनी हो या गरीब, जे शरीर पबैत अछि ओकरा दुःख भोगहे टा पड़ैत छैक ॥९९-१०२॥
।अमृतगति छन्द।
कहलनि जायक वन मे । रघुवर की गुनि मन मे ॥१०३॥
झुकि झुकि ताकथि धरणी । बड़ दुख-सिन्धु न तरणी ॥१०४॥
हम मन भेलहुँ विकला । गति थिक विश्वक चपला ॥१०५॥
कहब न दूषण अनकाँ । सकल शुभाशुभ जनकाँ ॥१०६॥
भावार्थः
मन मे कि सोचिकय राम हमरा वन जेबाक लेल कहलनि ?” सीता झुकि-झुकिकय धरती दिश देखैत छथि आ कहैत छथि – “माँ, दुःखक समुद्र मे पड़ि गेल छी । कतहु नाव नहि भेटि रहल अछि । हम व्याकुल भ’ गेल छी । संसारक गति चंचल होइत अछि । हम कि सँ कि भ’ गेलहुँ । दोसर दोष नहि देब । लोक केँ नीक कि बेजाय जेहो फल भेटैत छैक, सब अपनहि करनीक होइत छैक ॥१०३-१०६॥
।विष्णुपद छन्द।
माय अवनि विष्णु-रमणि, वंश-तरणि शून्य-सरणि ॥१०७॥
हा मरब कष्ट तरब, शुष्क-वदनि साध्वि रमणि ॥१०८॥
आश मनक नाश क्षणक, घोर वनक भीतिजनक ॥१०९॥
नेत्रकमल मेघ सजल, माँथ धुनथि “चन्द्र” भनथि ॥११०॥
भावार्थः
हमर माता धरती छथि, पति विष्णु छथि, वंश सूर्यवंश अछि, तैयो हमर रास्ता सून्न अछि । हा, हम मरि जायब, तखनहि एहि दुःख सँ उद्धार होयत ।” कहैत-कहैत ओहि सती-साध्वी नारी सीताक चेहरा सुखा गेलनि । क्षण भरि मे मोनक आशा जाइत रहलनि । घोर वन हुनका भयाउन लागय लगलन्हि । हुनकर आँखि जल-भरल बादल जेकाँ बनि गेल । “चन्द्र” कवि कहैत छथि जे एहि तरहें सीता विलाप करय लगलिह – ॥१०७-११०॥
।तिरहुति ललित विपरीत।
।हरिपद छन्द।
रघुवर बड़ महराजे, कयल उचित नहि सम्प्रति काजे ॥१११॥
हुनकर रमणि कहाये, दुखित बसब हम घन वन जाये ॥११२॥
हम कि कहब दुख-भारे, विधिक लिखल छल जन के टारे ॥११३॥
समय न छुटय समाजे, एखनहु धरि मन उपगत लाजे ॥११४॥
गर्भ-भरालस अङ्गे, नहि परिचारिणि जनि एक सङ्गे ॥११५॥
मरितौँ गरल हम खाये, होइत बड़ गोट कुल अन्याये ॥११६॥
आब बचत नहि प्राणे, रघुवर-हृदय कि भेल पषाणे ॥११७॥
यहन करत के आने, हित-जन-वचन न धयलनि काने ॥११८॥
कत दिन काटब कानी, कयल कुटिल जन बड़ मन-हानी ॥११९॥
भूपति होथि न मित्रे, शुनितहिँ छलहुँ से देखल चरित्रे ॥१२०॥
भावार्थः
राम महान राजा छथि, तैयो ओ एखन ई उचित काज नहि कयलनि । हुनकर पत्नी कहाकय हम दुःख संग घना वन मे जा कय रहब । हम अपन वेदना कि सुनाउ ? विधाता यैह लिखने छलथि । एकरा के टालि सकैत छल ? एहेन समय नहि छल जे संग छूटय । एखन धरि मन लजाइये रहल छल । हमर देह गर्भक भार सँ अलसायल अछि । एकहु गोट परिचारिका संग मे नहि अछि । हम जहर खा कय मरि जयतहुँ, मगर एहि सँ दुइ गोट कुल मे कलंक लागि जायत । आब हमर प्राण नहि बचत । कि राम केर हृदय पाथर भ’ गेलन्हि ? एहेन काज हुनका सिवा आर के कय सकैत अछि ? ओ तँ अपन हितैषी सभक बातो नहि सुनलनि । कानि-कानिकय कतेक दिन गुजारी ? दुष्ट लोक सब हमर आशा पर पानि फेर देलक । सुनैत रही जे राजा केकरो मित्र नहि होइत छथि । आइ से प्रत्यक्ष देखि लेलहुँ ॥१११-१२०॥
।तिरहुति।
।पादाकुल दोहा छन्द।
करुणागार उदार प्राणपति, वन देल दोष लगाय रे ॥१२१॥
देवर-दोष विधिक हम की कहु, जनि घर धर्म्म न न्याय रे ॥१२२॥
हमरहि हेतु दशानन मारल, कपिगण सङ्ग लगाय रे ॥१२३॥
तखन पतिव्रत हमर देखल सभ, अनल मे गेलहुँ समाय रे ॥१२४॥
नैहर जौँ मिथिला चलि जायब, कहब बाप की माय रे ॥१२५॥
पुरुष-परशमणि-कर हम सोपल, अयली कि नाम हंसाय रे ॥१२६॥
सिरिस सुमन बरु होयत अशनि सन, अशनि तेहन भय जाय रे ॥१२७॥
से बरु होय होथि नहि अकरुण, अहँ काँ बड़का भाय रे ॥१२८॥
कि कहब कहय योगि नहि रहलहुँ, भेलहुँ सबहि काँ भार रे ॥१२९॥
कतहु रहब जानकि जन कहते, श्रीरघुनन्दन-दार रे ॥१३०॥
भावार्थः
हाय, हमर प्राणपति परम दयालु आ उदार राम हमरा कलंक लगाकय वन मे छोड़ि देलनि । हे दिअर, हम विधाता केँ कि दोष दियनि ? हुनका घर मे नै त धर्म अछि, न न्याय । राम कपि सभक संग लय केँ हमरहि खातिर रावण केँ मारलनि । फेर सभक सोझाँ हम अग्नि मे प्रवेश कयलहुँ सब कियो हमर पातिव्रत्यक जाँच कयलक । अगर हम अपन नैहर मिथिला चलि जाय त माय-बाप कि कहत ? यैह कहत जे ‘हम त पारसमणिक समान पुरुषोत्तम रामक हाथ मे सौंपल गेल रही आ ई कलंक लगाकय घुरि अयलहुँ’ । हे लक्ष्मण, भले शिरीषक फूल वज्र-समान भ’ जाय आ वज्र शिरीषक फूल-समान भ’ जाय, मुदा अहाँक जेठ भाइ एहेन निष्ठुर नहि भ’ सकैत छथि । कि कहू, हम कहय लायक नहि रहलहुँ । हम सभक लेल बलाय भ’ गेल छी । हम कतहु रहब, लोक हमरा जनकक बेटी आ रामक पत्नी तँ कहबे करत ॥-१३०॥
।वियोगि मालव छन्द।
रघुवर देल विपिन वास, ओ हुनि हास, नारि मरब हम वन त्रास ॥१३१॥
एकसरि नारि कतय जाउ, विष खाउ, विधि निर्दय कत गोहराउ ॥१३२॥
रघुवर-मन कि निर्दय, देल एत कय, हमरहि भाग कि दुखचय ॥१३३॥
विधिहुक विधि ओ रघुराज, किछु के बाज, प्रभु छथि कयलनि भल काज ॥१३४॥
भावार्थः
राम हमरा वनवास देलनि, एहि सँ हुनकर केवल उपहास हेतनि, मुदा हम त वन मे डरे सँ मरि जायब । हम असगर नारी कतय जायब ? कि जहर खा लिय’ ? निष्ठुर विधाता सँ कतेक मिन्नत करू । राम केर हृदय कतेक निष्ठुर छन्हि । हमर एहेन हाल कय देलनि । कि सबटा दुःख-दर्द हमरे लिखल छल ? रघुवंशी राजा राम विधातो केर विधाता छथि । हुनका विरूद्ध कियो कि बाजत ? ओ प्रभु छथि । ओ जे कयलनि से नीक कयलनि ।” ॥१३१-१३४॥
।दोबय छन्द।
लक्ष्मण सीता काँ पुन कहलनि अपनैँ काँ की कहबे ॥१३५॥
सर्व्वसहा जननी छथि अपनैँक, कठिन कष्ट सभ सहबे ॥१३६॥
ई आश्रम वाल्मीकि मुनिक थिक, गेलि जाय तत माता ॥१३७॥
दोष न हमर प्रणाम करै छी, साक्षी सकल विधाता ॥१३८॥
भावार्थः
धरती, जे सर्वसहा (सब पीड़ा केँ सहयवाली) कहाइत छथि, से अपनेक माता छथि । अपने सबटा घोर कष्टो केँ सहि लेब । ई वाल्मीकि केर आश्रम थिकन्हि, हे माता, ओतय जाउ । हमर कोनो अपराध नहि अछि । हम प्रणाम करैत छी । विधाता सब बातक साक्षी छथि ॥१३५-१३८॥
।बरबा छन्द।
लक्ष्मण कहि घर चलला, घुरि नहि ताक ॥१३९॥
पहुँचलाह रघुवर-तट, नहि मुख-वाक ॥१४०॥
भावार्थः
एतेक कहिकय लक्ष्मण चलि पड़लाह । घुरिकय देखबो तक नहि कयलनि । सीधा राम लग पहुँचलाह आ मुँह सँ बोलियो तक नहि निकललन्हि ॥१३९-१४०॥
।रूपक चौपाइ।
जननि धरणि सनि रघुवर सन पति ॥१४१॥
तिरहुति जनन सकल जन कह सति ॥१४२॥
हयत यहन गति छलहुँ कि जनइत ॥१४३॥
जनम बितत विधि कनयित कनयित ॥१४४॥
भावार्थः
“धरती-जेहेन माता छथि, राम-जेहेन पति छथि; मिथिला मे जन्म अछि, आर सब लोक सती कहैत छथि । तैयो एहेन गति होयत ई कहियो सोचनहियो नहि रही । हाय विधाता, कि हमर जिन्दगी कनिते-कनिते कटत ?”
सीताजीक वाल्मीकि आश्रम मे आयब
।चौपाइ।
आश्रम निकट एक जनि नारि । एहन के होइति भुवन दशचारि ॥१४५॥
विकला कनयित छथि एहि ठाम । के थिकि के पुछ परिचय नाम ॥१४६॥
शिष्य कहल मुनि कयलनि ध्यान । हुनकाँ सतत त्रिकालक ज्ञान ॥१४७॥
मुनि वाल्मीकि कहल लय आउ । पूजा हुनकर सविधि कराउ ॥१४८॥
थिकथि जानकी रघुवर-दार । जे हरलनि अछि अवनी-भार ॥१४९॥
मुनि-पत्नी सह कयल निवास । नयन सजल मुख आब न हास ॥१५०॥
बड़ आदर सभ कर नित आबि । किछु गुरु-कार्य्य एतय अछि भाबि ॥१५१॥
मानस-ध्यान करथि मुनि जैह । बाहर सीता देखथि सैह ॥१५२॥
देखि देखि सीता-व्यवहार । मुनि-पत्नी काँ प्रीति अपार ॥१५३॥
कनयित देखथिनि करथिनि चूप । जनमत तनय होयत से भूप ॥१५४॥
सोहर शुनब तनय-मुख हेरि । जन्म सुफल होयत से फेरि ॥१५५॥
की घन सन दृग चुप कर बूढ़ि । सुता विदेहक होइछि मूढ़ि ॥१५६॥
भावार्थः
एकटा शिष्य मुनि वाल्मीकि जी सँ कहलनि – “आश्रमक समीप एकटा नारी छथि । एहेन नारी त चौदहो भुवन मे कतहु नहि हेतिह । ओ विकल भ’ एतय कानि रहल छथि । ओ के छथि ? हुनकर परिचय आ नाम पुछबाक साहस के करत ?” शिष्यक ई बात सुनिकय मुनि वाल्मीनि ध्यान लगौलनि । हुनका तँ सदैव वर्तमान-भूत-भविष्य तीनू काल केर सारा हाल पता रहैत छन्हि । वाल्मीकि मुनि कहलनि – “हुनका लेने आर आ विधिपूर्वक हुनकर पूजा रचू । ओ जनकक बेटी आर ओहि राम केर पत्नी सीता छथि, जे राम रावण केँ मारिकय धरतीक भार दूर कयलनि ।” सीता वाल्मीकिक आश्रम मे आबिकय मुनि-पत्नी सभक संग रहय लगलिह । हुनकर आँखि नोर सँ भीजल रहैत छलन्हि तथा मुँह पर कखनहुँ प्रसन्नता नहि अबैत छलन्हि । वाल्मीकिक आश्रम मे बड़ा आदरक संग नित्य सब गोटे ई सोचिकय आबय जे गुरुक कोनो काज हेतनि । मुनि वाल्मीकि मन मे जे ध्यान करैत छलथि से सीताक रूप मे बाहर देखाय दैत छलन्हि । सीताक बरताव देखिकय मुनिक पत्नी लोकनि केँ सीताक प्रति परम अनुराग भ’ गेलन्हि । जखन ओ सब हुनका कानैत देखथि तखन सब कियो सान्त्वना देथि – “अहाँ केँ बेटा होयत आ ओ राजा बनत । बेटाक मुख देखि-देखिकय अहाँ सोहर (जन्मोत्सव-गीत) सुनब । फेर अहाँक जीवन सफल भ’ जायत ।” बूढ़ महिला सब दिलासा देथि – “आँखि सँ नोर बहबैत छी । कि विदेहक पुत्री भ’ अहाँ अज्ञानी बनैत छी ?” ॥१४५-१५६॥
।सोरठा।
त्यागि देल सभ भोग, आदिदेव सीता-रहित ॥१५७॥
सतत ज्ञान की योग, अतिविरक्त मुनि-व्रत-निरत ॥१५८॥
भावार्थः
ओम्हर आदिदेव राम सीताक विरम मे सब भोग केँ त्यागि देलनि । ओ सदा ज्ञान आ योग मे लागल रहथि, तथा परम विरागी मुनि लोकनिक व्रत धारण कएने रहथि ॥१५७-१५८॥
।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे उत्तरकाण्डे चतुर्थोऽध्यायः।
॥मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे उत्तरकाण्ड केर चारिम अध्याय समाप्त भेल॥
हरिः हरः!!

1 Comment
Eh kahani paidh bhavbihbal bho gelao. Sab lila prabhu ke rahait chhain, Lekin se baat jannai samanya manushya k bas m kahan? Jay Siya Ram.
त्यागि देल सभ भोग, आदिदेव सीता-रहित ॥१५७॥
सतत ज्ञान की योग, अतिविरक्त मुनि-व्रत-निरत ॥१५८॥