१.
३१ अक्टूबर २०२४, विराटनगर (दीपावली पाबनि दिन सँ शुभारम्भ)
वन्दना
– महाकवि विद्यापति
नन्दक नन्दन कदम्बक तरु-तर
धिरे धिरे मुरलि बजाव ।१।
समय सँकेत-निकेतन बइसल
बेरि बेरि बोलि पठाव ॥२॥
सामरि, तोरा लागि
अनुखन विकल मुरारि ।३।
जमुनाक तिर उपवन उदबेगल
फिरि फिरि ततहि निहारि ॥४॥
गोरस बेचए अबइत जाइत
जनि जनि पुछ बनमारि ।५।
तोंहे मतिमान, सुमति मधुसूदन
वचन सुनह किछु मोरा ॥६॥
भनइ विद्यापति सुन बरजौवति
बन्दह नन्द-किसोरा ॥७॥
नन्दक नन्दन – नन्द केर बेटा, श्रीकृष्ण
कदम्बक तरु-तर – कदम्ब गाछक नीचाँ मे
धिरे धिरे मुरलि बजाव – धीरे धीरे मुरली बजा रहल छथि
समय संकेत-निकेतन बइसल – राधा सँ भेटय अयबाक समय भेला पर निकेतन मे बैसि मुरलि बजा-बजा संकेत करैत छथि
सामरि – हे सुन्दरी – हे श्यामा
तोरा लागि – अहाँ लेल
अनुखन – प्रति क्षण
विकल मुरारि – मिलन लेल बेकल भेल कृष्ण
जमुनाक तिर – यमुनाक तट पर
उपवन – बगीचा मे
उदवेगल – उद्विग्न भेल, व्याकुल भेल
फिरि फिरि – बेर बेर
ततहि निहारि – ओम्हरहि तकैत छथि (जेम्हर सँ राधा अओती)
गोरस – गाय सँ प्राप्त दूध, दही, मक्खन, घी आदि
बेचए – बेचबाक लेल
अबइत जाइत – आबय आ जायवाली सँ
जनि जनि – प्रत्येक जनानी (महिला सब) सँ
पुछ बनमारि – वनमाली (श्रीकृष्ण) पुछैत रहैत छथि
तोंहे मतिमान सुमति मधुसूदन – हे सुमति (राधा) ! मधुसूदन (श्रीकृष्ण) मे अनुरक्त (राधा !) हे सुमति !!
वचन सुनहु किछु मोरा – हमर किछु बात सुनि लियह
भनइ विद्यापति सुन बरजौवति – विद्यापति कहि रहल छथि जे हे ब्रजवासी युवती लोकनि !!
बन्दह नन्द-किसोरा – भगवान् श्रीकृष्ण – नन्दकिशोर केर वन्दना करू !!
अनुवादः
नन्दक नन्दन (श्रीकृष्ण) कदम्ब गाछक नीचाँ धीरे-धीरे मुरलि बजा रहल छथि । राधा संग मिलनक बेर मे श्रीकृष्ण मिलन स्थान पर पहुँचिकय राधा केँ सेहो ओतय आबय लेल संकेत (इशारा) सँ बेर-बेर बोल (आवाज, मुरलिक धुन) पठा रहल छथि ॥१-२॥
हे सामरि ! हे सुन्दरी श्यामा !! अहाँ वास्ते प्रतिक्षण (हमेशा) मुरारी बेकल रहैत छथि । जमुनाक तट पर स्थित ओहि बगिया (उपवन) मे व्याकुल भ’ बेर बेर ओम्हर ताकि रहल छथि जेम्हर सँ अहाँ आयब । गोरस बेचय आबय-जायवाली प्रत्येक गोपी सब सँ वनमाली श्रीकृष्ण अहींक पुछारि कय रहल छथि ॥३-५॥
हे सुमति !! हमर किछु वचन सुनल जाउ । मधुसूदन सदिखन अपनहिं मे अनुरक्त (अनुराग सँ भरल) रहैत छथि । विद्यापति कहि रहल छथि से सुनू हे ब्रज विराजित युवती लोकनि, नन्दकिशोर केँ सदिखन वन्दना करू ।
हरिः हरः!!
नोटः हम बहुत समय खर्च कय केँ उपरोक्त विद्यापति पदावली केँ बुझबाक कोशिश मात्र कयलहुँ अछि । विज्ञजन सँ सुधार कय देबाक अपेक्षा सँ पोस्ट कय रहल छी ।
२.
२ नवम्बर २०२४, विराटनगर
राधा-वन्दना
– महाकवि विद्यापति
देख देख राधा रूप अपार
अपुरुब के बिहि आनि मिलाओल
खिति तल लावनि सार
देख देख राधा रूप अपार….
अंगहि अंग अनँग मुरछायत
हेरए पड़ए अथीर
मनमथ कोटि मथन करु जे जन
से हेरि महि-मधि गीर
देख देख राधा रूप अपार…..
कत कत लखिमी चरण-तल नेओछए
रंगिनि हेरि विभोरी
करू अभिलाख मनहि पद-पंकज
अहोनिसि कोर अगोरी
देख देख राधा रूप अपार….
अनुवाद –
राधाक अपार रूप केँ देखू त ! केहेन अपूर्व-अद्भुत रूप बिहि (ब्रह्माजी, विध-विधाता) द्वारा रचल गेल अछि, एना लगैछ मानू सबटा सुन्दरताक लावण्य सार (सौन्दर्य) केँ मिलाकय एहि खिति-तल (क्षितिज, पृथ्वी) पर आनल गेल हो ।
परमसुन्दरी राधाजीक अंग सब एतेक सुन्दर छन्हि जेकरा अनँगहु (कामदेवहु) द्वारा देखिते हुनकहु मन अथिर (अस्थिर) भ’ जाइत छन्हि आ ओ मुर्छित भ’ उठैत छथि । मनमथ कोटि (करोड़ों कामदेव) केर मथन करनिहार ‘जन’ यानि करोड़ों कामदेवक सुन्दरता केँ मर्दन कयनिहार श्रीकृष्ण सेहो राधाजीक सुन्दरता केँ देखिकय मोहित भ’ कय पृथ्वी पर खसि पड़ैत छथि – ‘महि-मधि गीर’ ।
कतेको रास लखिमि (लक्ष्मी) सब हिनकर चरणतल केँ निहुँछत छथि, अर्थात् स्वयं केँ हिनकर चरण मे निछावर करैत छथि । रंगिनी (सुन्दरी) लोकनि हिनकर सुन्दरता देखिकय अत्यन्त विभोर भेल छथि । सभक एतबा अभिलाषा (इच्छा) छन्हि जे हिनकहि पद-पंकज (चरणक धुलि) मे मन लागल रहय आ अहोनिशि (अहर्निश, राति-दिन) हिनकहि कोर (शरण) केँ ओगरने रही ।
हरिः हरः!!
नोटः हे विज्ञजन, विद्यापतिक शब्द-रचना केँ नीक सँ बुझनिहार विद्वान् लोकनि – हम अज्ञान द्वारा जेम्हर-तेम्हर सँ बुद्धि-युक्ति जोहि-जोहि कय अपना तरहें अनुवाद प्रस्तुत कयल जा रहल अछि । हमर मोन त खुब पगुराइत अछि एतबे मे, जेना कन्हा कुकुर माँड़हि तिरपित…. ! मुदा अपने सब एकरा आर नीक सँ व्याख्या कय सकी त बहुत नीक लागत । हम किछु गोटे केँ टैग कय रहल छी । हमरा लिल्लोह टा नहि करब । हमरे वला ठीक बुझाय त सेहो कहि देब त कनेक विश्वास बढ़त ।
