लेख विचार
प्रेषित: नीलम झा निवेधा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
“विषय : मिथिलामे वटसावित्री व्रतकेँ महत्व आ विशेषता
मिथिलामे जेष्ठ मासक आमवाश्या तिथि क’ पूजल जाइत अछि #वटसावित्री_पावनि।मैथिल ललना लोकनि सोलहो श्रृंगार सँ सुसज्जित भए, नव वस्त्र आभूषण सँ लक, नुवा लहठी लगाए, सिन्दूर धसा काजर टीकुली,महावर, मेंहदी, खोंइछ जिनका जे संभव होइत छैन से कए वटवृक्षक पूजा करैत छथि।ई पावनि नव वियाहक प्रथम साल बड्ड विधिविधान सँ पूजल जाइत अछि । कतौ-कतौ पाँच बरख विधिविधान सँ पूजबाक रिवाज सेहो अछि। ओहिठाम सबैया लगाक छह बरख विधिविधान सँ पूजल जाइत अछि। ओकर बाद सधवा स्त्री जीवन भरि पूजैत छथि। जाहिमे ओहो सभ ओरियन जेना कए वटवृक्ष तर जाए अथवा वरक ठारि तोरि अँगनोमे करैत छथि। आ अक्षय वृक्ष सँ प्रार्थना करैत छथि स जे हुनक सोहाग हुनके सन अक्षय होइन।
एहि पूजामे नाना प्रकारक फल – केरा ,लीची, खीरा,सेब, संतोला आ सभसँ जरूरी आमक रहैत अछि कारण आमे सँ जल सेहो चढ़ैत अछि। मिठाई, सिन्दूर, पिठार ,अंकुरी, बेढ़लेल सुत। सुत सँ वटवृक्ष बेढ़ल जाइत अछि आ आम सँ घूरमी-घूरमी जल ढारल जाइत अछि। नव विवाहिता सातटा आम सँ सातबेर जल दैत छथिन। नव विवाहिता लेल पंद्रहटा बियैन जाहिमे चौदहटा उत्सर्ग कएल जाइत अछि आ ब्राह्मणक घरमे परसल जाइत अछि आ एकटा वरगाछके हौंकल लेल। अन्य पबनैतीन लेल बियैन एकटा। नव विवाहित लेल कनियाँ वर बाँसक फूलडालीमे, भूषणा सिन्दूर,बैरसीमे लाबा भरल, चौदहटा उड़ीदक बर पकाकए गाँथल। बैरसी आम सँ झाँपल। हरैदक गौरी बनैत अछि बरसाइतक पूर्व संध्यामे।
एहि पूजामे गौरी,साठी,बिसहरा आ वटसावित्रीक पूजा होइत अछि।मुदा चनाइके डाली पर अँकुरी,डालीपर चाउर जनेउ सुपारी आ दही रहैत अछि।अँचरी सेहो बन्हाइत अछि। पूजा के बाद बैरसीके बर आ वरक पात खोंटल जाइत अछि।विसहराके दूध लाबा चढ़ैत अछि।नग्रमे हकार परैत अछि आ अँकुरी तेल सिन्दूर, सुपारी परसल जाइत अछि। अहिवातीके अँकुरी खोंइछ दैत छथिन कनियाँ आ स्वंय सेहो लैत छथिन।अहिवातीके अनोन भोजन करबाएल जाइत अछि।
एहि पूजामे पहिल बेर नवविवाहिता एकबेर अरिपन पर थारी राखी खीर अहिवातीके संग भोजन करैत छथिन। आनबेर दुनु संध्या मुदा अनोन भोजन सेहो लोक करैत अछि।
महत्त्व
सावित्री अपन इच्छा सँ सत्यवानके वरण कएने रहैथ।हुनका इहो पता लाइग गेलनि जे ओ अल्पायु छथिन तैयो ओ वियाह केलनि।सती सावित्रीक पति सत्यवानक जाहि दिन मौत भगेलैन आ ओ धर्मराज सँ हुनक प्राण, संतानक वरदान, सासु ससुरक नेत्र आ राज्य, आ सहोदर मंगलनि। सत्यवानक पार्थिव शरीर वटवृक्ष तर राखल छल। जखन ओ वरदान लए अएलीह त’ ओ बहुत प्रसन्न रहैथ । ओहि दिन जेष्ठ मासक आमवाश्या तिथि रहैक।ओ वटवृक्षकें फूल पान फल लए पूजा केलैन। आ कर जोड़ी कहलैन :- हे अक्षय वृक्ष जहिना हमर स्वामीक रक्षा कएल तहिना आजुक तिथि जे अँहाक पूजा करत तकर स्वामीके अहाँ अक्षय क’ देबैक। ओकर भाग्य सोहाग धन बीत नैहर सासुर हमरे सन आबाद रहतैक। दूटा कथा सेहो सुनल जाइत अछि। एकटा ब्राह्मण आ नाग नागिन बला आ एकटा सती सावित्रीके।
