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मिथिलानी कनियाँ (काव्य)

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काव्य

– काजल चौधरी, योग प्रशिक्षिका, नई दिल्ली

मिथिलानी कनियाँ

(कनियाँ = पुतोहु, daughter-in-law)

हम छी मिथिलानी कनियाँ
घूँघट लैपटौप संग रखय छी!

फायल मे माथा ओझराबी
क्लाइंट्स सभक दुःख केँ मेटाबी
घर आबि जखनहि पड़य छी
सासु ननदि के बोल सुनै छी!
हम छी मिथिला के नारी
करौछ आ मोबाइल दुनू रखय छी
हम छी मिथिलानी कनियाँ…..

एक हाथ सँ गाड़ीक स्टेरिंग
दोसर फुलक हार गुंथइ छी
औफिस के सब काज संगहि संग
घरक सबटा ध्यान रखय छी
हम छी मिथिला के बेटी
हाँसू-चक्कू संग रखय छी!
हम छी मिथिलानी कनियाँ…..

अंग्रेजी मे गिटपिट गिटपिट
संगहि हिन्दी बोल बजय छी
मैथिलीक तँ सोहरो गाबी
रंगोली अहिपन दुनू सजबय छी
हम छी मिथिलानी कनियाँ
कलम संग-संग झाड़ू रखय छी!
हम छी मिथिलानी कनियाँ…..

थाकल तन या मन उदास हो
मोनहि मे सब बात गुनय छी
चाहे नोर हो भरल आँखि मे
ठोर सदा मुस्की सँ भरय छी
हम छी मिथिलाक धिया
जन्म सिया जेना बितबय छी
हम छी मिथिलानी कनियाँ…..

(काजल जीक रचना केँ हम जेना बुझलहुँ…)

हरिः हरः!!

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