वाजसनेयिनां विवाहपद्धतिः – मैथिल ब्राह्मण व अन्य समुदाय मे वैवाहिक रीतिक शास्त्रीय विधान

महामत्तक-ठक्कुर-दत्तरामविरचिता
वाजसनेयिनां विवाहपद्धतिः
इन्दुमती टीका टिप्पणीभ्यां विभूषिता

सम्पादकः
श्री रामचन्द्र झा, व्याकरणाचार्यः

आत्म निवेदन

कन्यादान

वस्तुतः कन्यादानक अर्थ विवाह संस्कार थिक। १६ संस्कारान्तर्गत विवाहसंस्कार प्रमुख मानल गेल अछि। कन्याक हेतु ई संस्कार उपनयनस्थानीये थिक। तंदाह मनुः – “वैवाहिको विधिः स्त्रीणामौपनायनकः स्मृतः” – अर्थात् स्त्रीक विवाहे स्त्रीक उपनयन संस्कार कहल गेल अछि। जेना उपनयनसंस्कारोत्तर कुमार ब्राह्मण कहबैत छथि, तहिना विवाहोत्तर कुमारी ब्राह्मणी कहबैत छथि।

उपर्युक्त मनुक वचन सँ स्पष्ट सिद्ध होइछ जे कन्यादान एक प्रकारक विशिष्ट संस्कार थिक – गो, पृथिवी, दासी, दासादि दानवत् कन्यादान दान नहि थिक। गवादि दान मे दानकर्त्ता तत्तद्विषयक अपन संपूर्ण सत्त्वक (१) दान करैत छथि। अतएव दान लेनिहार व्यक्ति ‘हमर गाय थिक’ कहय लगैत छथि। मुदा कन्यादान प्रतिग्रहीता या तत्पक्षीय कन्याक श्वसुरादि कियो ई नहि कहि सकैत छथि जे ‘ई कन्या हमर थिक।’ कियैक तँ कन्यादान वाक्य मे ‘स्वसत्त्वनिवृत्तिपूर्वक’ क निवेश नहि भेल रहैत छैक। दानवाक्य देखू – “इमां कान्यां सालङ्कारां…. पत्नीत्वेन त्वामहं सम्प्रददे” एहिना यदि गोदान वाक्य मे – “इमां गां दुग्धपानकारयित्वेन त्वामहं सम्प्रददे” कहल जाय तँ दानप्रतिग्रहीता ओहि गायक केवल दूधमात्रक अधिकारी भय सकैत छथि। गाय तँ दानकर्ताक बनले रहतैह्न।

[संख्या संकेत (१) केर तात्पर्यः

“स्वत्त्वनिवृत्तिपूर्वकपरसत्त्वोत्पत्यनुकूलव्यापारो दाधात्वर्थः” – ई दाधात्वर्थ – प्रयोगकर्ताक इच्छापर निर्भर रहैछ। अतएव ‘रजकस्य वस्त्रं ददाति’ मे दाधातुक योग रहलो पर चतुर्थी (रजकाय वस्त्रं ददाति) नहि होइछ।]

पद्धतिकारी कन्यादान केँ विवाहसंस्कार मानि “अथ विवाहपद्धतिः” लिखलैह्न अछि। लोको मे निमण्त्रणादि पत्र मे ‘शुभविवाहः’ लिखबाक प्रथा अछि।

कन्यादानक माहात्म्य स्मृत्यादि मे उल्लेखित अछि। मुदा ओकरा गवादि दानवत् दान नहि बुझबाक चाही। कन्या पर कन्याक पिताक पितृत्व सदा-सर्वदा बनले रहैत छन्हि। (१) एहिलेल प्रायः मिथिलाक शिष्टो मैथिल कन्याक पतिगृह मे भोजन करैत छथि। मैथिल निबन्धकारो एहि विषय मे मौनव्रती बनल छथि। अस्तु, “महाजनो येन गतः स पन्थाः”।

कन्याक वर्षविचार

उपनयनक वर्षविचारक प्रसंग मे – आषोडशाद् ब्राह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते’ अर्थात् १६ वर्ष तक ब्राह्मणक सावित्री नष्ट नहि होइत छन्हि, ई मनु कहलन्हि अछि। शास्त्र मे – “ब्राह्मणो न हन्तव्यः” इत्यादि विधि-निषेध स्थल मे ब्राह्मण पद सँ ब्राह्मणियोंक ग्रहण होइछ। तखन तँ – “वैवाहिको विधिः स्त्रीणामौपनायनिकः स्मृतः” अर्थात् स्त्रीक विवाह संस्कारे स्त्रीक उपनयन संस्कार थिक। एहि मनुक वचन सँ १६ वर्ष पर्यन्त कुमारियोक विवाह-काल मानल जा सकैछ।

[संख्या संकेत (१) केर तात्पर्य –

पुत्राभाव मे कन्याक पुत्रे (दोहित्रे) पुत्रवत् धनाधिकारी सेहो होइत छथि। शास्त्रो मे कहल अछि – “श्राद्धे (मातामहश्राद्धे) तु त्रीणि प्रशस्तानि दोहित्रादेः कुतपस्तिलाः॥”]

ऋतुमती कन्यादानक घोर विरोध (देखू पृष्ठ ३) प्रसंग मे प्रायः मनु महाराज खिसिया केँ कहने छथि – “काम-मारणात् तिष्ठेद्(१) गृहे कन्यर्तुमत्यपि। न चैवेनां प्रयच्छेतु गुणहीनाय कर्हिचित्॥” अर्थात् गुणवान वर यदि नहि भेटथि तँ जीवनपर्यन्त ऋतुमती कन्या केँ घर मे बरु राखि ली मुदा मूर्ख केँ कन्या नहि दी।

एहि सबकेँ देख-सुनिकेँ हम प्रस्तुत विवाह-पद्धतिक पृष्ठ १९ मे प्राचीन निबन्धानुसार विवाहसंस्कार सँ पहिने ऋतु शानत्यर्थ “विवाहाङ्गोदानविधिः” प्रकाश मे आनल अछि। आशा अछि गुरुजन एकर समादर करताह या करैत हेताह।

व्यवहार आ पद्धति

कन्या-वर उभय पक्षक सम्मति सँ विवाहक दिन-मूहूर्तानुसार दलानपर बरियाती आबि जाइत छथि, मुदा आंगनमे गीतनाद ताबत तक नहि होइछ, यावत तक वर अपना हाथ सँ आज्ञाक पान नहि उठबैत छथि। देखू कतेक दूरदर्शी ई व्यवहार अछि।

भय सकैत अछि जे वर केँ कन्या हार्दिक पसन्द नहि होह्नि, ताँय हुनका सँ आज्ञास्वरूप पान उठेलाक पश्चाते आंगनमे वैवाहिक कार्यारम्भ होइछ।

वर परिछनि

परिछनक कालमे नाना प्रकारक हास्यविनोद सँ स्त्रीवर्गादि वरक मनोगत भाव लैत विवाह मंडप पर वर केँ लबैत छथि। मंडपपर पहिने वरक अर्हणा (पूजन) होइछ।

[संख्या संकेत (१) केर तात्पर्य –

एहि सँ सिद्ध होइछ जे – त्रयस्ते नरकं यान्ति दृष्ट्वा कन्यां रजस्वलाम्” ई संवर्तक क वचन एहि स्थिति मे मान्य नहि थिक।]

वरपूजनोत्तर पद्धति मे अछि – “ततो वरः कौतुकागरात् कन्यामानीय मण्डपे” अर्थात् विवाह सँ पहिनहि वर आँखि खोलिकेँ कन्याक निरीक्षण (पसन्द) कय स्वयं दश लोकक बीचमे कन्याक कनगुरिया(१) आंगुर पकड़िकेँ मंडप पर लाबथि – पाछू ई नहि कहथि जे हमरा स्वीकार नहि छल। मण्डप पर अयलाक पश्चात् कन्यादान सँ पूर्वहि पद्धति कहैछ – “ॐ परस्पर समञ्जेथाम्” अर्थात् विवाह सँ पूर्व कन्या-वर दुहू गोटय परस्पर मुंहक देखा-देखी सेहो कय लिय – पसन्द नहि हो तँ उठि जाउ। एकरे नाम थिक स्वयं वर विवाह’ अर्थात् वर-कन्या विवाह सँ पूर्वहि एक-दोसरकेँ वरण करैत छथि। आदि सँ अन्त तक श्मारोहण, हृदयालम्भन आदि सँ वर केँ पूर्ण आश्वस्त करा केँ कन्यादान कयल जाइछ। ई थिक हम मिथिलाक व्यवहार आ पद्धति।

[संख्या-संकेत १ केर तात्पर्यः

चतुर्थी कर्मपर्यन्त पाणिग्रहण संस्कार अपूर्ण रहैछ, अत एव कुलदेवताक दर्शनार्थ एहि घर सँ ओहि घर जेबाक काल वर कन्याक हाथ नहि पकड़ि कनगुरिया आंगुर पकड़ैत छथि।

इहो कनिष्ठिकांगुलिग्रहणक व्यवहार शास्त्रानुमादिते पक्ष थिक। देखू पृष्ठ – २

दुर्भाग्यवश चतुर्थीक कर्मान्त सँ पूर्व कोनो विघटन भय जाय तँ ओहि कन्याक विवाह दोसर वर सँ शास्त्रसम्मत भय सकैछ। देखू – ‘वरान्तराय कन्या देया न वा’। पृष्ठ १ ]

आम महुक विवाह

कन्यादान सँ पुर्व आम अथवा महु वृक्षक विवाह बहुत प्रचलित प्रायः एहि लेल अछि जे मिथिला मे वर-वधूक जन्म-कुण्डलीक मेलापक नहि होइछ। मेलापक मे मंगली-मंगला दुष्ट योगक सम्भावना रहैत छैक। तन्निवारणार्थे विवाह सँ पूर्व घट या वृक्ष-विवाह शास्त्र मे कहल गेल छैक तेकरे प्रतिरूपक ई ‘आम-महुक विवाह’ प्रचलित अछि। कन्या-विवाह सँ पहिने कन्या सिन्दूरादि सँ आम-वृक्षक वरण करैत छथि। ई देखल गेल अछि जे मंगली कन्या जाहि वृक्षक वरण करैत छथि ओ वृक्ष असमय मे सुखा जाइत छैक।

मधुश्रावणी

नवविवाहिताक विशिष्ट ऋतु-पर्व सर्वत्र श्रावण मे मनाओल जाइछ। काशी मे ई स्त्रीवर्गादि सोल्लास मनबैत छथि। शास्त्रो मे नवविवाहिताक हेतु श्रावण मे मंगलागौरीक (१) पूजन-माहात्म्य विशेष वर्णित अछि। परन्तु अपना ओहि ठाम पैरक औंठाक दगेबाक अशास्त्रीय प्रथाक जनक प्रायः यवनशासन काले थिक। दागल साँढ़ केँ मुसलमान नहि काटैत-मारैत छैक। ओकरा सबहक मतें ओ दागल साँढ़ हिन्दूक काफिर देवता पर चढ़ल रहैत छैक। यवन सम्राज्य काल मे दोला-प्रथा छलैक। सुन्दरी कन्याकेँ सब जबरदस्ती उठालैत छलैक, एहि सँ बचबाक हेतु प्रायः लोक विवाहोत्तर कन्याक पैरक औंठा केँ दगवा दैत छलथिह्न। ओहि समय मे परदाप्रथा चरम सीमा पर छल। दोलाक प्रस्ताव उठला पर लोक कन्याक पैरक औंठा मात्र केँ देखाय विपत्ति सँ मुक्त भय जाइत छलाह। आब स्वतंत्र भारत मे एहि गर्हित प्रथाकेँ हंटा देल जाय।

श्री काशीपतिः पातु वः

विद्वच्चरणचञ्चरीकः

पं. रामचन्द्र झा

काशीपुरी, वि. सं. २०३२ ।

[संख्या संकेत (१) केर तात्पर्यः

स्कान्दे – विवाहानन्तरं चाद्ये श्रावणे शुक्लपक्षके। प्रथमं भौमवारस्य व्रतमेतत्तु कारयेत॥ यस्यानष्ठानमात्रेण अवैधव्यं प्रजायतै। द्रष्टव्य वर्षकृत्य प्रथम भाग पृष्ठ ३६९]

अथ मिथिलामही-मण्डलान्तर्गत ‘तरौनी’ ग्रामवासि-श्रीमत्तेजनारायण-मोदनारायण-सूर्यनारायण-झा महोदयत्रयानुज-चिरंजीवी श्री-विद्या-भारती-प्रदीप-सरस्वती-सन्ततिचतुष्टयजनक-पण्डित श्रीमदनन्तलाल झा शर्मात्मज-श्री रामचन्द्र झा व्याकरणाचार्य सुसम्पादित-सटिप्पण-‘इन्दुमती’ नामक मिथिलाभाषानूदित – वाजसनेयिनां विवाहपद्धत्यारम्भः –

विवाह समीक्षा

‘तरुवनी’ नगराधिनिवासिना सततमप्यधिकाशिप्रवासिना।
सुहृदनन्तकनिष्ठप्रसूनुना धरिणिजापदयोरियमर्प्यते॥

(१) वरान्तराय कन्या देया न वा?

बौधायनः – ‘बलादपहृता कन्या मन्त्रैर्यदि न संस्कृता। अन्यस्मै विधिवद् देया यथा कन्या तथैव सा॥’ (बलादिति छलादेरुपलक्षणम्)। वसिष्ठः – ‘कुलशीलविहीनस्य पण्ढादिपतितस्य च। अपस्मारिविधर्मस्य रोगिणां वेषधारिणम्। दत्तामपि हरेत् कन्यां सगोत्रोढां तथैव च॥’ यमः – ‘नोदकेन न वा वाचा कन्यायाः पतिरिष्यते। पाणिग्रहणसंस्कारात् पतित्वं सप्तमे पदे॥’ लघुहारीतः – स्वगोत्राद् भ्रस्यते नारी विवाहात् सप्तमे पदे। पतिगोत्रेण कर्तव्या तस्याः सर्वक्रिया ततः॥’

वस्तुवस्तु – चतुर्थीकर्मणो विवाहाङ्गत्वाद् अत्र (मिथिलायाम्) पितृगोत्रनिवृत्तिः पतिगोत्रप्राप्तिश्च चतुर्थी-कर्मनिवृत्त्यन्तरमेव। तथा हि वृहस्पतिः – ‘चतुर्थीहोममन्त्रेण त्वङ्मांसरुधिरेन्दियैः। भर्त्रा संयुज्यते नारी तद्गोत्रा तेन सा भवेत॥’ अन्यच्च, गृह्यान्तरभाष्योधृतवचनम् – ‘विवाहे चैव निर्वृत्ते चतुर्थेऽहनि रात्रिषु। एकत्वमागतो भर्तुः गोत्रं पिण्डे च सूतके॥’ वसिष्ठोऽपि – ‘अद्भिर्वाचा च दत्तायां मृत ऊर्ध्व वरो यदि। न च मन्त्रोपनीता स्यात् कुमारी पितुरेव सा॥’ इति। स्वगोत्राद् भ्रश्यते नारी विवाहत् सप्तमे पदे।’ इत्युपर्युक्त लघुहारीतादिवचनं तु शाखान्तरविषयकम्, तत्र चतुर्थीहोममन्त्रलिङ्गसंवादविरहात्।

एतेन चतुर्थीकर्मसंस्कारात् पूर्वं मृते प्रवजिते पलायिते वा वरे वरान्तराय कन्यादानकर्तृकं पुनर्दानं सङ्गच्छते। यत्तु – ‘सकृदंशो नितति सकृत् कन्या प्रदीयते। सकृदाह ददानीति त्रीण्येतानि सकृत् सकृत्॥’ इति मन्त्रादिभिरुक्तं तत् पाणिग्रहणान्तसंस्कारवत्कन्याविषयमिति तत्त्वविदः।

(२) वरपरीक्षण (परिछनि) विचारः –

(प्राचीन समय मे उपनयन संस्कारोत्तर कम सँ कम १२ वर्ष पर्यन्त गुरुकुल मे अध्ययन कयलाक उपरान्त विवाह संस्कार कराओल जाइत छल। ओहि समयक भग्नावशेष परिछनि एखनहु प्रचलित अछि। अतएव परिछनि काल मे सर्वप्रथम उच्छिष्ट पान खुएबाक तात्पर्य ई जे ब्रह्मचारी वर क तप (तेज) कम भय जान्हु, जाहि सँ कदाचित् खिसिया केँ श्रापो (शापो) देथि तँ तद्भोगी हम लेकिन नहि होइ। तदुपरान्त नकधरी सँ श्वासावरुद्धेन ब्रह्मचर्य क परीक्षा कयल जाइछ। ततः गृहस्थाश्रम क समुपयुक्त वस्तु सभ क ग्रामीण नाम पूछि पूछि ‘गृहकार्य मे पटु छथि कि नहि’ एकर परीक्षा होइछ। एवं रूपेण परिछनि काल मे ग्रामभेद सँ अनेको विधिभेद देखना जाइछ। न्यूनाधिक विधिभेदेन परिछनि सभ देश मे प्रचलित अछि।)

तथाहि पारस्करः – ‘ग्रामवचनं च कुर्युः’ तत्र ग्रामवचनं – लोकवचनम्, इति भर्तृयज्ञः। यतः स्वकुलवृद्धाः स्त्रियः पूर्वपुरुषानुष्ठीयमानं सदाचारं स्मरन्ति, तस्मात्तयोः विवाह‍-श्मशानयोः ग्रामः प्रमाणं सदाचार बोधकमित्यर्थः इति हरिहरः। एवं च सूत्रे अनुपनिबद्धमपि – वरागमने नासिकाधारणम्, वधू-वरयोः करमूले कङ्कणबन्धनम्, गले मालाधारणम्, उभयोर्वस्त्रान्ते ग्रन्थिकरणम्, कनिष्ठांगुलिग्रहणकरणम्, दध्यादिलापनादि (चुमान), ताश्च यत्समरन्ति तदपि कर्तव्यमिति, गदाधरः।

(३) मण्डपादिविधानम् –
महामत्तकः – कन्याहस्तेन षोडशहस्तपरीमितमण्डपं तद्दक्षिणदिशि पश्चिमां दिशमाश्रित्य मण्डप-संलग्नमुत्तराभिमुख कौतुकागारं मण्डपाद् बहिः ऐशान्यां जामातृचतुर्हस्तमितसिकतादि परिष्कृतां तुष-केश शर्करादि शून्यां वेणुनिर्मितां वेदीश्च कारयेत्।
वशिष्ठः – षोडशारत्निकं मानं (चतुविंशांगुलोऽरत्निः) चतुर्द्वारोपशोभितम्। मण्डपं तोरणैर्युक्तं तत्र वेदीं प्रकल्पयेत्। अष्ट हस्तं तु र चयेन्मण्डपं वा द्विष्ट्करम्।
सप्तर्षिः – मङ्गलेषु च सर्वेषु मण्डपो गृहवामतः। कार्यः षोडशहस्तो वा ह्यूनहस्तो दशावधिः। स्तम्भैश्चतुर्भिरेवात्र वेदीमध्ये प्रतिष्ठिता। इति।
(४) विवाहे प्रशस्तमासादिकम् –
नारदः – माघ-फाल्गुन-वैशाख-ज्येष्ठमासाः शुभावहाः। कार्तिको मार्गशीर्षश्च मध्यमौ निन्दिताः परे॥
रस्नकोशः – जन्मर्क्षे जन्मदिवसे जन्ममासे शुभं त्यजेत्। ज्येष्ठे मास्यादिगर्भस्य शुभं वर्ज्यं स्त्रिया अपि॥
पराशरः – द्वौ ज्येष्ठौ मध्यमौ प्रोक्ताचेकज्येष्ठं शुभावहम्। ज्येष्ठत्रयं न कुर्वीत विवाहे सर्वसम्मतम्॥ इति।
(५) कन्यावर्षविचारः –
ज्योतिर्निबन्धे – षडब्दमध्ये नोद्वाह्या कन्या वर्षद्वयं यतः। सोमो भुङ्ते ततस्तद्वद्गन्धर्वश्च तथाऽनलाः॥
राजमार्तण्डे – अयुग्मे दुर्भगा नारी युग्मे तु विधवा भवेत्। तस्माद् गर्भान्विते युग्मे विवाहे सा पतिव्रता॥
अत्र सर्वसङ्ग्रहवाक्यान्युक्तानि गदाधरेण – अष्टवर्षा भवेद् गौरी नववर्षा तु रोहिणी। दशवर्षा भवेत् कन्या तत ऊर्ध्व रजस्वला। (ऊर्ध्व – द्वादशवर्षे, इति संस्कारमयुखः)। प्राप्ते तु द्वादशे वर्षे यः कन्यां न प्रयच्छति। मासि मासि रजस्तस्याः पिता पिबति शोणितम्॥ *१
उद्वहेत त्रिंशदब्दस्तु कन्यां द्वादशवार्षिकीम्। त्र्यष्टवर्षोऽष्टवर्षां वा धर्मे सीदति सत्वरः॥ एकविंशति वर्षो वा सप्तवर्षामवाप्नुयात्। वर्षरेकगुणां भार्यामुद्वहेत् त्रिगुणः स्वयम्॥ त्रिंशद्वर्षो दशाब्दां च भार्यां विन्दति नग्निकाम्। तस्मादुद्वाहयेत् कन्यां यावन्नर्तुमती*२ भवेत।॥
*१ – अन्यच्च अपराकें संवर्तः – “माता चैव पिता चैव ज्येष्ठो भ्राता तथैव च। त्रयस्ते नरकं यान्ति दृष्ट्वा कन्यां रजस्वलाम्॥ यस्तां विवाहयेत् कन्यां ब्राह्मणो मदमोहितः। असंभाष्यो ह्यपङ्तेयः स विप्रो वृषलीपतिः॥” इति।
*२ – वात्स्यायनः – ‘अन्तःपुष्पं भवत्येव पनसोदुम्बरादिवत्॥’ एवञ्च एकादशवर्षोत्तरं कन्या अन्तःपुष्पवती भवति। तस्मादेकादशवर्षात् प्रागेवोद्वहेदिति प्राञ्चः। योग्यवराऽलाभे कन्यावयीरतिक्रमणमपि न दोषाय भवतीत्याह।
मनुः – ‘काममामरणात्तिष्ठेद् गृहे कन्यर्तुमत्यपि। न चैवेनां गुणहीनाय कर्हिचित्॥’
केचित्तु – ‘वैवाहिकी विधिस्त्रीणामौपनायनिकः स्मृतः’ इति मनुवचनेन स्त्रीणां विवाहस्यौपनायनिकत्वाति देशाद् ‘आषोडशाद् ब्राह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते’ इतिवद् आषोडशात् कन्याविवाहोऽपि शास्त्रविहित एवेति वदन्ति। (अत्र रजोधर्मशान्तिरावश्यकी)

(८) कुलीनकन्याविचारः –

वशिष्ठः – ‘विद्याप्रणष्टा पुनरभ्युपैति जातिप्रणाशे त्विह सर्वनाशः। कुलापदेशेन् हयोऽपि पुज्यस्तस्मात् कुलीनां स्त्रियमुद्वहन्ति॥’
नारदः – ‘ब्राह्मणक्षत्त्रियविशां शूद्राणं च परिग्रहे। सजातिः श्रेयसी भार्या सजातिश्च पतिः स्त्रियाः॥’
विष्णुः – ‘द्विजस्य भार्या शूद्रा तु धर्मार्थन्न भवेत् क्वचित्। रत्यर्थमेव सा तस्य रागार्थस्य प्रकीर्तितः॥’ इति।

(९) विवाहे ज्येष्ठकनिष्ठविचारः –

(जेठ सहोदरभाइ यदि सन्तानोत्पादक शक्तिशून्य ‘नपुंसक’ होथि अथवा १२ वर्ष सँ निरन्तर पाश्चात्य देशमे वास करैत होथि, वा जातिबहिष्कृत (पतित), भिक्षुक अथवा योगी भय गेल होथि तँ तादृश जेठ भाइक रहलो उत्तर छोट भाइ विवाह कय सकैत छथि। एवं अन्यान्यो अंग-भंग तथा विशेष कारण सँ यदि जेठ भाइ विवाह करबामे असमर्थ होथि तँ हुनक आज्ञापत्रलय छोट भाइ विवाह कय सकैत छथि।)

तथाहि शातातपः – ‘क्लीवे देशान्तरस्थे च पतिते भिक्षुकेऽपि वा। योगशास्त्राभियुक्ते च नो दोषः परिवेदने॥ जड-मूकान्ध-वधिर-कुब्ज-वामन-षण्ढकान्। अतिवृद्धानभार्यांश्च कृषिशक्तान्नृपस्य च॥ धनवृद्धिप्रसक्तांश्च कामतः कारिणस्तथा कुहकांस्तस्करांश्चापि परिविन्दन्न दुष्यति॥’ (इदं कन्याविषयेऽपि बोध्यम्)।
गर्गः – ‘ज्येष्ठे तिष्ठति सौंदर्ये न कुर्याद् दारसंग्रहम्। आवसक्थं तथाऽऽधानं पतितस्वन्यथा भवेत्॥’
शातातपः – ‘पितृव्यपुत्रान् सापत्नान् परमातृसुतांस्तथा। दाराऽग्निहोत्रसंयोगे न दोषः परिवेदने॥’ इति।

(१०) निषिद्धविवाहविचारः –

(एकहि दिनमे दुइ सहोदर कन्या तथा भाइक विवाह निषेध कयल गेल अछि। तथा एकहि वरकें दुइ सहोदर कन्याँ – पूर्व स्त्री जीवित रहलापर – विवाह नहि कराबी। एवं चतुर्थीक मध्य मे द्वितीय सहोदर कन्या वा पुत्रक विवाह नहि हो।)

नारदः – ‘प्रत्युद्वाहो नैव कार्यो नैकस्मै दुहितृद्वयम्। नैवेकजन्यग्रोः पुंसोरेकजन्ये च कन्यके॥ नैवं कदाचिदुद्वाहो नैकदा मुण्डनद्वयम्॥’
अन्यञ्चः – ‘एकोदरप्रसूतानामेकस्मिन् वासरे पुनः। विवाहं नैव कुर्वीत मुण्डनोपरि मुण्डनम्॥’
मेघातिथिः – ‘पृथङ्मातृजयोः कार्यो विवाहस्त्वेकवासरे। एकस्मिन् मण्डपे कार्यः पृथग्वेदिकयोस्तथा॥’
नारदः – ‘पुत्रोद्वाहात् परं पुत्री विवाहो न ऋतुत्रये। न तयोर्व्रतमुद्वाहान्मुणडनादपि मुण्डनम्॥
सारावलीः – ‘फाल्गुने चैत्रमासे तु पुत्रोद्वाहोपनयने। भेदाब्दस्य कुर्वीत नर्तुत्रयविलम्बनम्॥’
वशिष्ठः – ‘द्विशोभनं त्वेकगृहेऽपि नेष्टं शुभं तु पश्चान्नवभिर्दिनैस्तु। आवश्यकं शोभनमुत्सवो वा द्वारेऽथवाऽऽचार्यविभेदतो वा॥ सङ्कटे तु कपर्दिकारिकायां विशेषः – उद्वाह्य पुत्री न पिता विदध्यात् पुत्र्यन्तरस्योद्वहनं कदापि। यावच्चतुर्थं दिनमत्र पूर्वं समाप्य चान्योद्वहनं विदध्यात्॥’ इति।

(११) कुत्सितकन्यालक्षणम् –

मनुः – ‘नोद्वहेत् कपिलां कन्यां नाऽकाङ्गी न रोगिणीम्। नाऽलोमिकां नाऽतिलोमां न वाचाटां न पिङ्गलाम्।’
मनुः – ‘यस्यास्तु न भवेद् भ्राता न विज्ञापयेत् वा पिता। नोपयच्छेत् तां प्राज्ञः पुत्रिकाधर्मशङ्कया॥’
गौडनिबन्धे – ‘मातुर्यन्नाम गुह्यं स्यात् सुप्रसिद्धमथापि वा। तन्नाम्नी या भवेत् कन्या मातृनाम्नी प्रचक्षते। प्रमादाद् यदि गृहीयात् प्रायश्चितं समाचरेत्। ततश्चान्द्रायणं कृत्वा तां कन्यां*१ परिवर्जयेत्॥’ इति।

*१ केर तात्पर्यः समानार्षगोत्रजविवाहे प्रायश्चितं, तदाह शातातपः – ‘समानप्रवरां कन्यामेकगोत्रमथाऽपि वा। विवाहयति यो मूढस्तस्य वक्ष्यामि निष्कृतिम्। उत्सृज्य तां ततो भार्यो मातृवत् परिपालयेत्॥ इति।

(१२) विवाहावसरे प्राप्ताऽशौचविचारः –

याज्ञवल्क्यः – ‘दाने विवाहे यज्ञ च संग्रामे देशविप्लवे। आपद्यपि च कष्टायां सद्यःशौचं विधीयते॥’ सङ्कल्पितमाशौचेऽपि कर्तव्यं, तथाहि विष्णुः – ‘व्रत-यज्ञ-विवाहेषु श्राद्धे होमेऽर्चने जपे। आरब्धे सूतकं*१ न स्यादनारम्भे तु सूतकम्॥ आरम्भ उक्तो हारीतेन – ‘आरम्भो वरणं यज्ञे संकल्पो व्रतजापयोः। नान्दीश्राद्धं विवाहादौ श्राद्धे पाकपरिक्रिया॥’ इति। (सूतकपदमशौचमात्रोपलक्षकम्। विवाहावित्यादिपदोपादानात्-उपनयनादिपरिग्रहः।)
वृहस्पतिः – ‘विवाहोत्सवयज्ञषु त्वन्तरामृतसूतके। पूर्वसङ्कल्पितार्थेषु न दोषः परिकीर्तितः॥’ षट्त्रिंशन्मते ‘विवाहोत्सवयज्ञषु त्वन्तरामृतसूतके। परैरन्नं प्रदातव्यं भोक्तव्यं च द्विजोत्तमैः॥’ इति।
चतुर्थिमध्ये रोजोयोगे द्युपस्थिते विधिविशेषमाह, यज्ञपार्श्वे –
‘विवाहहोमे प्रक्रान्ते यदि कन्या रजस्वला*२। त्रिरात्रं दम्पती स्यातां पृथक्शय्यासनाशनौ॥ चतुर्थेऽहनि सुस्नातौ तस्मिन्नग्नौ यथाविधि॥’ (जुहुयातामिति शेषः)।

*१ केर तात्पर्यः अशौचकर्मप्रतिरोधमात्र एवेति तदाशयः।
*२ केर तात्पर्यः वृद्धयाज्ञवल्क्यः – ‘विवाहे वितिते तन्त्रे होमकाले ह्युपस्थिते। कन्याय ऋतुरागच्छेत् कथं कुर्वन्ति याज्ञिकाः। स्नापयित्वा तु तां कन्यामर्चयित्वा यथाविधि। हुत्वाज्यं चैव लाजांश्च ततस्तन्त्रं प्रवर्तयेत्॥’ ‘हुत्वा चाज्याहुतीस्तत्रे’ति यज्ञपार्श्वः। गायक्या होम इति पशुपतिः।

(१३) कन्यापतिगृहे भोजननिषेधकालः –

आदित्यपुराणे – ‘विष्णुं जामातरं मन्ये तस्य कोपं क कारयेत्। अप्रजायां तु कन्यायां नाश्नीयात्तस्य वै गृहे॥’ भविष्येऽपि – ‘अप्रजायां तु कन्यायां न भुञ्जीत कदाचन*१। दौहित्रस्य मुखं दृष्ट्वा किमर्थमनुशोचति॥’ इति।

*१ केर तात्पर्यः तत्त्वविदस्तु एतन्न मन्यन्ते। द्र. प्राग् आत्मनिवेदने।

(१४) विवाहावरसप्रसङ्गे सत्याऽसत्यभाषणविचारः –

भारते – ‘विवाहकाले रतिसम्प्रयोगे प्राणात्यये सर्वधनापहारे। विप्रस्य चार्थे ह्यनृतं वदेत पञ्चानृतान्याहुरपातकानि॥’
देवीभागवते – ‘सत्य न सत्यं खलु यत्र हिंसा, दयान्वितं चानृतमेव सत्यम्। हितं नराणां भवतीह येन, तदेव सत्यं मुनिनात्र गीतम्॥’
भविष्ये – ‘विवाहादिक्रियाकाले तत्क्रियासिद्धिकारणम्। यः प्रयच्छति धर्मज्ञः सोऽश्वमेधफलं लभेत्॥’
यमः – ‘कन्याप्रदाने यज्ञे वा अन्यस्मिन् धर्मसङ्कटे। विघ्नमाचरते यस्तु तमाहुर्ब्रह्मघातकम्॥’ इति।

(१५) द्वितीयविवाहे कालविशेषः –

संग्रहे – ‘प्रमदामृतवासरादितः पुनरुद्वाहवरस्य च। विषमे परिवत्सरे शुभौ युगले चापि मृतिप्रदो भवेत्॥’
दक्षः – ‘अनाश्रमी न तिष्ठेद् दिनमेकमपि द्विजः। आश्रमेण विना तिष्ठन् प्रायश्चीत्ती भवेद्धि सः॥’
इत्येकदेशिमतम् – ‘भार्यामृतवासरान्मासत्रयं विवाहो न प्रशस्त इति सर्वनिबन्धस्वरसः॥’

(१६) विवाहे प्रतिकूलम् –

मेघातिथिः – ‘वाग्दानानन्तरं यत्र कुलयोः कस्यचिन्मृतिः। तदा संवत्सरादूर्ध्व विवाहः शुभदो भवेत्॥’
स्मृतिसारावलिः – ‘पितुरब्दमशौचं स्यात्तद्दर्धं मातुरेव च। मासत्रयं तु भार्यायास्तदर्द्ध भ्रातृपुत्रयोः। अन्येषां तु सपिण्डानामाशौचं मासमीरितम्। तदन्ते शान्तिकं कृत्वा ततो लग्नं विधीयते॥’
ज्योतिःप्रकाशेः – ‘प्रतिकूलेऽपि कर्तव्यो विवाहो मासतः परः। शान्तिं विधाय गां दत्त्वा वाग्दानादि चरेत् पुनः।’
ज्योतिःसागरेः – ‘दुर्भिक्षे राष्ट्रभङ्गे च पित्रोर्वा प्राणसंशये। प्रौढायामपि कन्यायां नानुकूल्यं प्रतीक्षते॥’

(१७) हवनविचारः –

भरद्वाजः – ‘कुरौः सम्मार्जयेद् भूमिं शुद्धामादौ शुचिस्ततः। हस्तमात्रां चतुरस्रां गोमयेनोपलेपयेत्॥’
अङ्गिराः – ‘कपालैर्भिन्नपात्रैर्वा आयसैर्गोमयेन वा। नाग्निप्रणयनं कार्यं यजमानभयावहम्॥ शुभं पात्रं तु कांस्यं स्यात् तेनाग्निं प्रणयेद् बुधः। तस्याऽभावे शरावेण नवेनाभिमुखे च तम्॥’
यमः – ‘न पाणिना न शूर्पेण न च मेध्वाऽजिनादिभिः। मुखेनोपघमेदग्निं मुखादेव व्यजायत॥ पटकेन भवेद् व्याधिः शूर्पेण घननाशनम्। पाणिना मृत्युमाप्नोति कर्मसिद्धिर्मुखेन तु॥’ इन्धनलक्षणं तत्रैव – ‘नाङ्गुष्ठादधिका कार्या समित्स्थूलतया क्वचित्। न वियुक्ता त्वचा चैव न सटीका न पाटिता॥’ प्रादेशान्नाधिका नोना’ इत्यादि।
कात्यायनः – ‘आज्यस्थाली तु कर्तव्या तैजसद्रव्यसम्भवा। माहेयी वाऽपि कर्तव्यां नित्यं सर्वाऽग्निकर्मसु॥’ खादिरो वाऽथ पालाशो द्वितन्तिः स्रुवः स्मृतः। स्रुग्गाहुमात्रा विज्ञेया वृत्तस्तु प्रग्रहयोस्तयोः॥ स्रुवाग्रे घ्राणवत् खातं द्वयङ्गुष्ठपरिमण्डलम्। जुह्वा शराववत् खातं सनिर्वाहं षडङ्गुलम्॥ एकस्तेनैव जुहुयात्। तथाहि यमः – ‘श्राद्धे हवनकाले च दद्यादेकेन पाणिना। उभाभ्यां तर्पणे दद्यातिदि धर्मो व्यवस्थितः॥ पुनश्च तत्रैव ‘बाह्यहोमप्रदाता च पाषाणे दर्दुरो भवेत्। स्रुवधारणप्राह तत्रैव – चतुरङ्गुलं च परित्यज्य अग्रे चैव द्विरष्टकम्। चतुरङ्गुलं च तन्मध्ये धारयेच्छङ्खमुद्रया॥ हीयते जयमानो वै स्रुवमूलस्य दर्शनात्। तस्मात् संगोपयेन्मूलं होमकाले स्रुवस्य तु॥’ उच्चैः मन्त्रमुच्चार्य होतव्यं तथाहि सांवपराणे – ‘क्षुत्तृट्क्रोधत्वरायुक्तो हीनमन्त्रैर्जुहोति यः। अग्रवृद्धे सधूमे वा सोऽन्यः स्यादन्यजन्मनि॥’
पूर्णाहुतिलक्षणं शौनकः – ‘अथ पूर्णाहुतिं दद्याद् गन्धपुष्पफलान्विताम्। साक्षतामूदर्धकायस्तु समपाच्छक्रदिङ्मुखः॥’
अग्निपुराणे – ‘मूर्धानं दिविमन्त्रेण संस्रवेण च धारया। दद्यादुत्थाय पूर्णो वै नोपविश्य कदाचन॥’
गोभिलः – ‘न मुक्तकेशो जुहुयान्नातिपातितजानुकः उत्तानेनैव हस्तेन अङ्गष्ठाग्रेण पीडितम्॥ संहताङ्गलिपाणिस्तु वाग्यतो जुहुयाद्घविः॥’ इति।

(१८) ब्रह्मकुशपरिमाणविचारः –

अङ्गिरा – ‘पञ्चाशद्भिर्भवेद् ब्रह्मा तदर्धेन तु विष्टरः। ऊर्ध्वकेशो भवेद् ब्रह्मा अधःकेशस्तु विष्टरः॥’ पुनश्च तत्रैव – ‘दक्षावर्त्तो भवेद् ब्रह्मा वामावर्त्तोऽथ विष्टरः॥’
कालिकापुराणे – ‘द्विरावृत्त्याऽथ मध्ये वै अर्धावृत्त्यान्तदेशतः। ग्रन्थिः प्रदक्षिणावर्तः स ब्रह्मग्रन्तसंज्ञकः॥’
शान्तिदीपिकायान्तु – ‘सप्तभिर्नवभिर्वाऽपि सार्धद्वितयवेष्टितम्। ओङ्कारेणैव मन्त्रेण द्विजः कुर्यात् कुशद्विजम्॥’ अत्र सप्तभिरित्यादिप्रपञ्चनमात्रं न तु संख्यानियमः। उक्तं हि कात्यायेन यज्ञवास्तुनि (दर्भजुटिकाहोमे) – ‘मुष्टयां च स्तम्बे दर्भवटौ तथा। दर्भसंख्या न विहिता विष्टरास्तरणेष्वपि॥’ इति।

(१९) ब्रह्मदक्षिणार्थपूर्णपात्रविचारः –

पूर्णपात्रलक्षणमङ्गिरायां – ‘चतुर्मुष्टिर्भवेत् कुञ्चिश्चतुः कुञ्चिस्तु पुष्कलम्। पुष्कलानि च चत्वारि पूर्णपात्रमुदाहृतम्॥’ एवञ्च ६४ मुट्ठी आरब चाउर सँ भरल पूर्णपात्र हो। यदि एहि मे असमर्थ होइ तँ पेट भरक योग (अर्थात् कच्ची आधो सेर, पक्की पाँचो कनमा) सँ अवश्य पूर्णपात्र बनाबी। तथाहि यज्ञपार्श्वे – ‘यावताऽन्नेन भोक्तुस्तु तृप्तिः पूर्णैव जायते। तं वरार्थमतः कुर्यात् पूर्णपात्रमिति स्थितिः॥’

(२०) दूर्वाक्षतमन्त्रः –

ॐ आब्रह्मन्! ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामराष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्योऽतिव्याधि महारथो जायतां दोग्ध्री धेनुर्बोढानड्वानाशुः सप्तिः पुरन्ध्रिर्योषा जिष्णू रथेष्ठाः सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायतां निकामे निकामे नः पर्यन्यो व्यर्षतु फलवत्यो न ओषधयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम्॥
(ॐ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव॥) (व्याख्याः वाजसनेयि उपनयनपद्धतिमे देखू)।

(२१) चतुर्थीकर्मविवेकः –

विवाहोत्तर चारिम दिनक रात्र्यन्त मे चतुर्थीकर्म घरे मे विहित अछि। (तथाहि – पारस्करे – ‘चतुर्थ्यामपररात्रेऽभ्यन्तरतोऽग्निमुपसमाधाय…’ इत्यादि। एवं – ‘ग्राम्यवचनं च कुर्युः’ इति च तत्रैव॥) एवं च मौहक, चुमान, गौरीपूजन आदि कालमे यावद् विधि यत्तत् गामक हो, वर अवश्य करथि। विवाहादि चतुर्थीकर्मान्त (चारिम दिन पर्यन्त) मौहकादि समकाल मे स्पृष्टास्पृष्ट दोष नहि होइछ।

तदाह वृहस्पतिः – ‘तीर्थे विवाहे यात्रायां संग्रामे देशविप्लवे। नगरग्रामदाहे च स्पृष्टास्पृष्टिने दुष्यति॥’
गालवः – ‘एकयानसमारोह एकपात्रे च भोजनम्। विवाहे पथि यात्रायां कृत्वा विप्रो न दोषभाक्॥’
पास्करः – विवाहदिनमारभ्य – ‘त्रिरात्रमक्षारा*१ लवणाशिनौ स्यातामधः*२ शयीतां संवत्सरं न मिथुन मुपेयातां द्वादशरात्रं षड्‌रात्रं त्रिरात्रमन्ततः॥’ अत्र सूत्रे त्रिरात्रपक्षाश्रयणेऽपि चतुर्थीकर्मानन्तरं पश्चम्यादिरात्रावभिगमनम्*३, इति हरिहरः।

एवं च – पञ्चमरात्रौ वरः – घृतमधुयुक्तं दुग्धं पीत्वा*३ (स्त्रियं तु लघ्वाहारादिना*४ स्वापेक्षयाऽल्पबलाँ विधाय) ताम्बूलरागरञ्जितमुखो मनोहारि-सुगन्धलेपचन्दनादिचर्चितसुरम्ये वाससी परिधाय चारुचटुलकवया ताँ वसीकृत्य पूर्वशिरस्काँ*५ सौम्यावनताँ खट्वादिकां शय्याँ तथा सहाशीत*६। तत्र दक्षिणभागे वधू, उत्तरभागो वरः स्वपेत्, येन पुरुषस्य वामभागे स्त्री भवेदिति*७।

तत्र संयोगसमये स्त्रिया मननि यस्य स्मृतिर्ध्यानं वा जायते तत्सदृशमेवापत्यमुत्पद्यते। तथोक्तं बृहत्संहितायाम् – “जात्यं मनोभवसुखं सुभगस्य सर्वमाभासमात्रमितरस्य मनोवियोगात्। चित्तेन भावयति दूरगतापि यं स्त्री गर्भ बिभर्ति सदृशं पुरुषस्य तस्य॥” इति। अत एव कौतुकागारे आदर्शचरितानां पुंसां स्त्रीणां च चित्राणि कुड्ये संरक्ष्यन्ते विलिखन्ति च (कोबरं) इति। समाचारः।

(तस्मात् विवाहोत्तर चारि दिन रात्रि पर्यन्त वर-वधू दुहू गोटय – अलोन हविष्यान्न (पायसादि) भोजन करथि। तथा रातिमे भूमिपर दुहूगोटय (एकहि ओछाओन पर) सूतथि, किन्तु ब्रह्मचर्य सँ रहथि। तदुत्तर पाँचम रात्रिमे वर – घृत, मधु, मिष्ठान्नादि भोजनोत्तर हाथ-पैर धोय लाल टूह-टू नवीन वस्त्र पहिरि, अतर, फुलेल, पुष्पमालादि सँ अलंकृत भय गुलाबी खिल्ली सँ मुंह लाल करैत कौतुकागार (कोबर) मे प्रवेश करथि….।)

*१ – अक्षारं च अलवणं च ‘अक्षारालवणम्’।
*२ – अधः – भूमौ, खट्वाव्युदासार्थोऽधः शब्दः।
*३ – एष च तृतीयो नियमः – ‘त्रिंशद्वर्षोद्वहेत् कन्यां हृद्यां द्वादशवार्षिकीम्’ इत्येवं मन्त्रादिनाऽभिहित-पुंयोगवयस्का कामुकी चेद् वधूस्तदैव। अत एवाह भगवान् धन्वन्तरिः – ‘स्तोकां (अल्पवयस्काम्) तु न स्त्रियं गच्चन्नातुरां न रजस्वलाम्। नातिवालां न कुपितामप्रशस्तां च गर्भिणीम्॥’ भविष्ये – ‘रजोदर्शनतः पूर्वे न स्त्रीसंसर्गामाचरेत्। संसर्गे यदि कुर्वीत नरकं परिपच्यते॥’ इति।
*४ – यतो वृहस्पतिः – स्त्रियाः शुक्रेऽधिके स्त्री स्यात् पुमान् पुंसोऽधिके भवेत्। तस्माच्छुक्रविवृध्यर्थे वृष्यं स्निग्धं च भक्षयेत्॥ लघ्वाहारां स्त्रियं कुर्यादेवं तं जनयेत् सुतम्॥’ इति।
*५ – गर्गः – स्वगृहे प्राक्‌शिराः शेते आयुष्यं दक्षिणा शिराः। प्रत्यक्‌शिराः प्रवासे तु न कदाचिदुदक् शिराः॥’
*६ – वृद्धशातातपः – ‘द्वावेतावशुची स्यातां दम्पती शयने गतौ। शयनादुत्थिता नारी शुचिः, स्यादशुचिः पुमान्॥’
*७ – मार्कण्डेयपुराणे – ‘स्त्रीपुंसोर्युक्तयोस्तात्! सहैकासनसंस्थयोः। करोति मुखभङ्गं यो नरकं स व्रजेद् ध्रुवम्॥ कामतोऽकामतो वाऽपि पश्येद् यः सुरतोन्मुखम्। स्त्रीविच्छेदो भवेत्तस्य ध्रुवं स्पतसु जन्मसु॥ कामिनां निर्विकाराणामेतच्छास्त्रनिदर्शनम्। निर्विकारस्य हि शिशोर्न दोषः कश्चिदेव हि॥’ इति। (देखू, चौखम्बा प्रकाशित ‘अनंगरंग’ – टीकाकार – अहींक रामचन्द्र झा)

विवाह-समीक्षा

(२२) हविष्यान्न (पायस) भोजनविचारः –

(विवाहोत्तर वर हविष्यान्न केँ अधोलिखित मंत्र सँ अभिमंत्रित कय, भोजन करथि। तदुत्तर भोजनक अवशिष्ट (ऐंट) अन्न वधू केँ भोजनक हेतु देथि। मंत्र यथा –

प्रजापतिर्ऋषिरनुष्टुप्छन्दोऽन्नन्देवताऽन्नानुमंत्रणे विनियोगः। ॐ अन्नपाशेन मणिना प्राणसूत्रेण पृश्निना वध्नामि सत्यग्रन्थिना मनश्च हृदयश्च ते॥ प्रजापतिर्ऋषिरनुष्टुप्छन्दः प्रार्थ्यमानदेवता दम्पत्यो हृदयैक्यप्रार्थने विनियोगः। ॐ यदेतद्धृदयन्तव तदस्तु हृदयं मम यदिदं मम तदस्तु हृदयं तव। प्रजापतिर्ऋषिर्द्विपाद्गायत्त्रीच्छन्दोऽन्नन्देवताऽन्नस्तुतौ विनियोगः। ॐ अन्नं प्राणस्य षड्विशस्तेन बध्नामि त्वाऽसौ। इति।

अथ मातृकापूजाविधिः

कृतनित्यक्रियो व्रती पञ्चदेवतां विष्णुं च सम्पूज्य कुड्ये फलके वा स्थापितरक्षिकासु गणपति-दुर्गासहित-षोडशमातृर्मृन्मयीं श्रियं च पूजयेत्। तत्र संकल्पः। कुशत्रयतिलजलान्यादाय –

ॐ अद्यामुकमासीय-अमुकपक्षीय-अमुकतिथौ, अमुकगोत्रायाः अस्याः श्री अमुककुमारिकायाः कारयितव्यविवाहकर्मणि गणपतिदुर्गाश्रीसहिताः षोडशमातृरहं पूजयिष्यते। ततः प्रमरक्षिकामारभ्य क्रमेण –

ॐ गणपतिरसि। ॐ दुर्गाऽसि। १. ॐ गौर्यसि। २. ॐ पद्मासि। ३. ॐ शच्यसि। ४. ॐ मेधासि। ५. ॐ सावित्र्यसि। ६. ॐ विजयासि। ७. ॐ जयासि। ८. ॐ देवसेनासि। ९. ॐ स्वधासि। १०. ॐ स्वाहासि। ११. ॐ मातरः स्थ। १२. ॐ लोकमातरः स्थ। १३. ॐ हृष्टिरसि। १४. ॐ पुष्टिरसि। १५. ॐ तुष्टिरसि। १६. ॐ आत्मकुलदेवतासि। ॐ श्रीरसि।

इति प्रत्येकं स्पष्ट्वा अक्षतान्यादाय –

ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमन्तनो त्वरिष्टं यज्ञसमिमं दधातु विश्वेदेवास इह मादयन्तामों प्रतिष्ठ। ॐ गणपतिदुर्गाश्रीसहिताः षोडशमातर इह सुप्रतिष्ठिता भवन्तु। इति सर्वेषामेकदैव प्राणप्रतिष्ठां कुर्यात् (छन्दोगानां प्राणप्रतिष्ठामन्त्रस्तु – ॐ वाङ्मनः प्राणोऽपानो व्यातश्चक्षुः श्रोत्रं शर्म वर्म भूतिः प्रतिष्ठाः। इति।) ततोऽक्षतान्यादाय प्रथमरक्षिकाक्रमेण – ॐ भूर्भुवः स्वः गणपते इहागच्छ इह तिष्ठेत्यावाह्य एतानि पाद्यादीनि ॐ गणपतये नमः। इनमनुलेपनम…। इदमक्षतम….। इदं पुष्पम्…. एतानि गन्धपुष्पधूपदीपताम्बूलयथाभागवासोनैवेद्यानि ॐ गणपतये नमः। ततः ॐ भूर्भुवः स्वः दुर्गे इहागच्छ इह तिष्ठेत्यावाह्य ॐ दुर्गायै नमः इति पञ्चोपचारैः पूजयेत्। ततः ॐ भूर्भुवः स्वः गौरि इहागच्छ इह तिष्ठेत्यावाह्य ॐ गौर्यै नमः इति पञ्चोपचारैः पूजयेत्। एवं भूर्भुवः… पद्ये इहागच्छ…. ॐ पद्मायै नमः। ॐ भूर्भुवः…. शचि इहागच्छ… ॐ शच्यै नमः। ॐ भूर्भुवः… मेधे इहागच्छ… ॐ मेधायै नमः। ॐ भूर्भुवः…. सावित्रि इहागच्छ… ॐ सावित्र्यै नमः। ॐ भूर्भुवः… विजये इहागच्छ… ॐ विजयायै नमः। ॐ भूर्भुवः… जये इहागच्छ… ॐ जयायै नमः। ॐ भूर्भुवः…. देवसेने इहागच्छ…. ॐ देवसेनायै नमः। ॐ भूर्भुवः…. स्वधे इहागच्छ… ॐ स्वधायै नमः। ॐ भूर्भुवः…. स्वाहे इहागच्छ.. ॐ स्वाहायै नमः। ॐ भूर्भुवः…. मातर इहागच्छ…. ॐ मातृभ्यो नमः। ॐ भूर्भुवः…. लोकमातर इहागच्छ…. ॐ लोकमातृभ्यो नमः। ॐ भूर्भुवः …. हृष्टे इहागच्छ… ॐ हृष्ट्यै नमः। ॐ भूर्भुवः …. पुष्टे इहागच्छ…. ॐ पुष्टयै नमः। ॐ भूर्भुवः …. तुष्टे इहागच्छ… ॐ तुष्टयै नमः। ॐ भूर्भुवः ….. आत्मकुलदेवते इहागच्छ…. ॐ आत्मकुलदेवतायै नमः। ततः ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीरिहागच्छ इह तिष्ठेत्यावाह्य एतानि पाद्यादीनि ॐ श्रियै नमः। एवं चन्दन-सिन्दूर-रक्तवस्त्रादिभिः पूजयेत्। ततो घृतेन उत्तरोत्तरक्रमेण भित्तौ तिस्रः पञ्च सप्त वा धारा देयास्ताश्च सवृन्तकदलीफलेन पूगीफलेन वा प्रतीछेदनेन –

ॐ वसोः पवित्रमसि शतधारं वसोः परित्रमसि सहस्रधारम्।
देवस्त्वया सविता पुनातु वसोः पवित्रेण शतधारेण सुप्त्वा कामधुक्षः॥

इति प्रतिमन्त्राते धारा देया।

छन्दोगानां वसोर्धामन्त्रस्तु –

ॐ एतमुत्यं मदच्युतं शतधारं वृषभं दियो दुहं विश्वावसूनि बिभ्रतम्।

सहस्रधारं वृषभम्पयोदुहं प्रिय देवाय जन्मने।
ऋतेन ऋतजातो विवावृघे राजा देवऋतं बृहत्॥

ततः ॐ गणपतिदुर्गासहिताः षोडशमातरः पूजिताः स्थ क्षमध्वं स्वस्थानं गच्छत। इत्येकदेव विसर्जयेत्। ततः ॐ श्रीर्मयि रमस्वेति श्रियमपि विसर्जयेत्।

ततो दक्षिणा –

कुशत्रयतिलजलान्यादाय – ॐ अद्य कृतैतद् गणपतिदुर्गाश्रीसहितषोडशमातृपूजनकर्मप्रतिष्ठार्थमेतावद् द्रव्यमूल्यकहिरण्यमग्निदैवतं यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणामहं ददे। इति।

ॐ स्वस्तीति प्रतिवचनम्।*१

इति मातृकापूजाविधिः।

*१ ‍- अत्र आभ्युदयिकश्राद्धस्य विवाहकर्मणोऽनाङ्गत्वात् तन्नाचरन्ति तज्ज्ञाः। तथाहि भविष्ये – ‘निषेककाले सोमे च सीमन्तोन्नयने तथा। एतेष्वेव प्रधानेषु श्राद्धं कर्माङ्गमिष्यते॥ इति॥
वस्तुतस्तु एककर्तृकेषु संस्कारेषु आभ्युदयिकश्राद्धं सकृदेव तन्त्रेणैवेति विवाहे तदकरणेऽपि न काप्यनुपपत्तिरिति। तथा हि कात्यायनः – ‘असकृद्यानि कर्माणि क्रियन्ते कर्मकारिभिः। प्रतिप्रयोगं नैव स्युर्मातरः श्राद्धमेव च’ (मातृपूजनमेव च)॥ इति॥

अथ वाजसनेयिनां विवाहपद्धतिः

सन्धिविग्रहमन्त्रीन्द्रदेवादित्यतनूद्भवः। भूमिपालशिरोरत्नरञ्जिताङ्घ्रिसरोरुहः॥
सन्धिविग्रहिकः श्रमद्वीरेश्वरसहोदरः। महामत्तकः श्रीमान् विराजतिगणेश्वरः॥
श्रीमता रामदत्तेन मन्त्रिणा तस्य सूनुना। पद्धतिः क्रियते रम्या धर्म्या वाजसनेयिनाम्॥

श्रीजानकीचरणकञ्जमरन्दभङ्गः, ‘श्रीरामचन्द्र’ सुकृती जनतोपकृत्यै।
टीकां तनोति वचसा सरऽतिरम्यां स्वर्गश्चिताञ्च मनसेन्दुमतीं दधानः॥

अथ विवाहाङ्गगोदानविधिः*१

अथ मातृकापूजानन्तरं कन्यादानकर्ता प्राङ्मुख उपविश्य गन्धपुष्पाक्षतैः ॐ एतावद्द्रव्यमूल्यकगव्यै नमः॥३॥ कोशोपरि ॐ ब्राह्मणाय नमः॥३॥ इति त्रिः सम्पूज्य कुशत्रयतिलजलान्यादाय ॐ अद्य अमुके मासि अमुके पक्षे अमुकतिथौ अमुकगोत्रायाः (अस्याः) श्री अमुककुमारिकायाः कारयितव्यविवाहकर्मणि प्राप्तरजोदर्शनसूचितारिष्टनिरासद्वारा श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थम् एतावद्द्रव्यमूल्यकगामेकां रुद्रदैवतां यथानामगोत्राय ब्राह्मणायऽहं ददे।

इत्युत्सृज्य –

ॐ अद्य कृतैतद् गोदानप्रतिष्ठार्थमेतावद्द्रव्यमूल्यकहिरण्यमग्निदैवतं यथानागोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणामहं ददे। इति दक्षिणां दद्यात्, ब्राह्मणाय प्रतिपाद्येच्च।

*१. अन्तःपुष्पं भवत्येव पनसोदुम्बरादिवत्। इति कात्यायनादिवचनाद् द्वादशवर्षोत्तर-कन्याविवाहे विवाहाङ्गगोदानमिदमिति तज्ज्ञाः। प्राचीनपद्धतिबहिर्भूतोऽयं गोदानविधिः।

हारीतः – ‘पितृगृहे च या कन्या रजः पश्यत्यसंस्कृता। सा कन्या वृषली ज्ञेया तत्पतिर्वृषलीपतिः॥’ अत एव शान्तिं कृत्वेन् तादृशीं कन्यामुद्वहेत्। तथा हि आश्वलायनः – कन्यायामृतुमतीं शुद्धां कृत्वा निष्कृतिमात्मनः। शुद्धिं च कारयित्वा तामुद्वहेदनृशंस्यधीः॥ पिता ऋृतून् स्वपुत्र्यास्तु गणयेदादितः सुधीः। दानावधि गृहे यत्नात् पालयेच्च रजोवतीम्॥ दद्यात् तदृतुसंख्या गाः शक्तः कन्यापिता यदि। दातव्यैकाऽपि निःस्वेन दाने तस्या यथाविधि॥

मदनपारिजाते – ‘विवाहे वितते यज्ञे होमकाले ह्युपस्थिते। कन्यामृतुमतीं दृष्ट्वा कथं कुर्वन्ति याज्ञिकाः॥ स्नापयित्वा तु तां कन्यामर्चयित्वा यथाविधि। युञ्जानामाहुतिं कृत्वा ततस्तन्त्रं प्रवर्तयेत॥ (‘युञ्जानः प्रथमम्’ इत्यनेन मन्त्रेणाहुतिं हुत्वेत्यर्थः।) यद्वा ‘विवाहहोमे प्रक्रान्ते यदि कन्या रजस्वला। त्रिरात्रं दम्पती स्यातां पृथक् शय्यासनाशनौ॥ चतुर्थेऽहनि सुस्नातौ तस्मिन्नग्नौ यथाविधि॥’ (जुहुयातामिति शेषः।)

वाजसनेयिनां विवाहपद्धतिः

अथ पूगादिदानम्*१

तत्र पश्चिमाभिमुखः (कश्चित् कन्याभ्राता, तत्समः अन्यो वा) पूर्वाभिमुखाय वराय पूग-चन्दन-दुर्वाक्षत-यज्ञोपवीत-वस्त्राण्यादाय*२ –

कन्याक भाइ वा तत् सदृश अन्यो व्यक्ति डालामे – पान, सुपारी, चानन, दूवि, अक्षत, यज्ञोपवीत, वस्त्र आदि लय –

ॐ तस्मिन् कालेऽग्निसान्निध्ये स्नातः स्नाते ह्यरोगिणि। अव्यङ्गेऽपतितेऽक्लीबे पिता तुभ्यं*३ प्रदास्यति। श्री*४ अमुकनाम्नीं कन्याम्।

*१ ई पूगादिदानम् विवाहसँ पूर्व (सिद्धान्तोत्तर हथधरी कालमे) करी। तथाहि गदाधरभाष्ये – ततः (सिद्धान्तोत्तरं) वरगृहे गत्वा वरवरणं कार्यम्। तत् गणपतिं स्मृत्वा, देशकालौ संकीर्त्य ॐ अद्य अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ करिष्यमाणविवाहाङ्गं वरणं करिष्ये’ इति संकल्प ‘उपवीतादिद्रव्यैस्त्वां वृणे’ इति (पठित्वा) तानि द्रव्याणि वराय दत्त्वा पादौ प्रकाल्य चन्दनादिभिः पूजां कुर्यात् (विष्णुं जामातरं अन्ये’ इति स्मरणात्।)

इति पठित्वा – उपनयेत्। ततो वरः – (ई पढ़ि वर केँ देथि। तदुत्तर वर) –

ॐ ऋृतवस्थ ऋृतावृध ऋृतुष्ठास्थ ऋृतावृधः।
घृतश्चुतो विराजो नाम कामदुघा अक्षीयमाणाः॥

इति मन्त्रेण दूर्वाक्षतादिकं गृहीत्वा शिरशि निदध्यात्।

ई मंत्र पढ़ि दूर्वाक्षतादि केँ विनम्रभाव सँ मस्तक मे लगाय, ग्रहण करथि।

*२. अत्र वरणे देयानि द्रव्याण्यह ‘चन्द्रेश्वरः’ – ‘उपवीतं’ फलं पुष्पं वासांसि विविधानि च। देयं वराय वरणे कन्या-भ्रात्रा द्विजेन वा॥’ इति।

*३. यदि कन्याक भाइ सँ अतिरिक्त अन्य व्यक्ति वरण करथि तँ – ‘पिता तुभ्य प्रदास्यति’क स्थान मे ‍- ‘दाता तुभ्यं प्रदास्यति’ ई पढ़थि।

*४. अमुकक स्थान मे कन्याक नाम ली।

[अत्र*१ वरः प्रथमम् एकं कन्यायाः परिधानवस्त्रं गृहीत्वा –

‘ॐ जरां गच्छ परिधत्स्व वासो भवाकृष्टीनाममिशस्तिपावा।
शतं च जीव शरदः सुवर्च्चा रयिं च पुत्राननुसंव्ययस्वायुष्मतीदं परिधत्स्व वासः॥’

(श्रीमद्वीरेश्वरविरचित-दशकर्मपद्धतिमे पूगादि-वरण व्यवस्था रहलो उत्तर सम्प्रति हथधरी काल मे यथापद्धति सँ कार्य नहि होइछ।)

*१. पद्धति मे अग्निस्थापनोत्तर वस्त्रपरिधानविधि लिखल अछि। किन्तु वर्तमान आचार देखि एहि ठाम ( ) कोष्ठान्तर्गत प्रकरण राखब आवश्यक बुझना गेल अछि।

इत्यनेन मन्त्रेण कुमारीं परिधापयति। ततो द्वितीयम्*१ उत्तरीयवस्त्रं गृहीत्वा –

‘ॐ या अकृन्तन्नवयं या अतन्वत याश्च देवीस्तन्तूनभितो ततन्थ।
तास्त्वा देवीर्जरसे संव्ययस्वायुष्मतीदं परिधत्स्व वासः॥’
इति मन्त्रेण तस्यै दद्यात्।
ततो वरः स्वकीयं धौतवस्त्रं गृहीत्वा –
‘ॐ परिधास्यै यशोधास्यै दीर्घायुत्वाय जरदष्टिरस्मि।
शतं च जीवामि शरदः पुरुषी रायस्पोषमभिसंख्ययिष्यै॥’
इति मन्त्रेण एकं, द्वितीयं तु –
‘ॐ यशसा मा द्यावापृथिवी यशसेन्द्रा बृहस्पती।
यशो भगश्च माऽविद्यशो मा प्रतिपद्यताम्॥’
इत्यनेन मन्त्रेण परिदधाति।]

*१. कन्याक द्वितीय वस्त्र सँ बहुतो व्यक्ति ‘ओढ़नी’ मानैत छथि, किन्तु हरिहर-गदाधर भाष्य मे द्वितीय वस्त्र सँ ‘डेढ़िया’ (साया) क निर्देश कयलन्हि अछि। तथाहि तत्र – ‘वाससी = द्व वस्त्रे – अन्तरीयोत्तरीयत्वेन परिधाप्य’। एवं च तदनुसरेण कन्या डेढ़िया युक्त साड़ी पहिरथि ई सिद्ध होइछ।

कश्यपः – ‘अहतं यन्त्रनिर्मुक्तं वासः प्रोक्तं स्वयंभुवा शस्तं तन्मङ्गले नूनं तावत्कालं न सर्वदा॥’

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अथ कङ्कणबन्धनम्

तत्र आचाराद अष्टौ ब्राह्मणः उद्खले धान्यं दत्त्वा त्रिः सहस्रशीर्षेत्यादि षोडशमन्त्रानम पठित्वा मुशलेन त्रिः, अवहत्य तदक्षतादिकमादाय दधियुक्तं कृत्वा आम्रपत्रे निधाय वर-दक्षिणकरमूले कङ्कणं बन्धेयुः।

परिछनिक बाद आचारात् आठ (विवाहित) ब्राह्मण ऊखरि मे गह्मड़ी दय एकहि बेरि आठो गोटय (अपना २ हाथमे सुपारी लय) मूसरकेँ धरथि (एहि कालमे नौआ टकुड़ीक सूतसँ आठो ब्राह्मण काँ वेष्टित करैत अछि इहो प्राचीन आचार देखना जाइछ) तदुत्तर अगिला संपूर्ण सहस्रशीर्षाक मंत्र केँ तीनि बेरि पढ़थि तथा प्रति मंत्रान्त मे एकहि बेरि सभ गोटय कूटथि, एवं बाद मे उखरिक चाऊरकेँ लय दही मे मिलाय आमक पल्लव मे सूत सँ बाह्नि वरक दहिन हाथक मूल (गट्टा) मे बाह्नथि।

सहस्रशीर्षाक मंत्र यथा –

ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।
स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङुलम् ॥१॥

पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् ।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥२॥

एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः ।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥३॥

त्रिपादूर्ध्व उदैत्पूरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः ।
ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि ॥४॥

तस्माद्विराळजायत विराजो अधि पूरुषः ।
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥५॥

यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत ।
वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः ॥६॥

तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन्पुरुषं जातमग्रतः ।
तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये ॥७॥

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् ।
पशून्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्यान् ग्राम्याश्च ये ॥८॥

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ।
छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ॥९॥

तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः ।
गावोः ह जज्ञिरे तस्मात् तस्माज्जाता अजावयः ॥१०॥

यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् ।
मुखं किमस्य कौ बाहू का ऊरू पादा उच्येते ॥११॥

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः ।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत ॥१२॥

चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत ।
मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत ॥१३॥

नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत ।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन् ॥१४॥

सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः ।
देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन्पुरुषं पशुम् ॥१५॥

यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥१६॥

अथ विवाहः

विवाहदिने कृतनित्यक्रियेण जामातृपित्रा मातृकापूजापूर्वकाम्युदयिकं कर्त्तव्यम्। कन्या-पिता स्नातः शुचिः शुक्लाम्बरघरः कृतनित्यक्रियः मातृकापूजाभ्युदयिके*१ कृत्वा, अर्हणा*२ वेलायां मण्डपे प्रत्यङ्मुखः*३ आचम्य उत्तिष्ठन्, प्राङ्मुखमूर्ध्वजानुं वरं सम्बोध्य –

विवाहक दिनमे वरक पिता नित्यकर्मोत्तर मातृकापूजा ओ आभ्युदयिक श्राद्ध करथि। एवं कन्याक पिता (अभाव मे कन्यादानकर्ता) स्नान, सन्ध्या, तर्पण कय नवीन उज्जर (आचारात् पीयर आ कुसुमरक्त) वस्त्र पहिरि, द्वितीयवस्त्र लय – पञ्चदेवता-विष्णुक पूजा करथि। तदुत्तर मातृकापूजा तथा आभ्युदयिकश्राद्ध कय – अर्घ्य तथा मधुपर्क आदि सँ वरक पूजन (सत्कार) क समयमे विवाहमण्डप पर आबि तीनि बेरि आचमन कय पश्चिममुहें उठलसन भेल, पूवमुहें पहिनहि सँ (चुक्कीमाली) भेल बैसल वर केँ सम्बोधन कय –

ॐ साधु भवान् आस्ताम् अर्चयिष्यामो भवन्तम्।

इति ब्रुयात्। ततो वरः – (ई कहथि । तदुत्तर वर) –

ॐ अर्चय।

इति प्रत्युत्तरं दद्यात्। (ई उत्तर देथि।)

तदनन्तरं यजमानः वरोपवेशनार्थ शुद्धमासनं दत्त्वा ‘विष्टरो विष्टरो विष्टरः’ इत्यन्येनोक्ते विष्टरमादाय –

तदुत्तर कन्यादानकर्त्ता वर केँ बैसक हेतु शुद्ध कम्बलादि आसन दय ‘विष्टरो विष्टरो विष्टरः’ ई अन्य*४ (पुरोहित) क कथनानन्तर हाथ मे विष्टर लय*५ –

ॐ विष्टरः प्रतिगृह्यताम्।

इति वरस्य हस्तयोर्विष्टरं दद्यात्। ततो वरः –

ई पढ़ि वरक दुहू हाथ मे विष्टर देथि। तदुत्तर वर –

ॐ विष्टरः प्रतिगृह्णामि।

इत्यमिधाय विष्टरं गृहीत्वा – (ई पढ़ि विष्टय लय) –

ॐ वर्ष्मोऽसि समानानामुद्यतामिव सूर्यः। इमं तमभितिष्ठामि यो मा कश्चाभिदासति।

इति मन्त्रान्ते एनं विष्टरम् – उत्तराग्रमासनतले निधाय – उपविशति*६। ततः यजमानः ‘पाद्यं पाद्यं पाद्यम्’ इत्यन्येनोक्ते पाद्यमञ्जलिमादाय –

ई मंत्र पढ़ि आसनक तरमे उत्तराग्र विष्टर राखि ओहिपर बैसथि। तदुत्तर कन्यादानकर्त्ता ‘पाद्यं पाद्यं पाद्यम्’ एहि तरहें पुरोहितक बजला उत्तर –

ॐ पाद्यं प्रतिगृह्यताम्।

इति वदेत्। ततो वरः – (ई कहथि। तदुत्तर वर) –

ॐ पाद्यं प्रतिगृह्णामि।

इत्यभिधाय यजमानाञ्जलितः अञ्जलिना पाद्यमादाय –

ई कहि कन्यादानकर्त्ताक अंजलि सँ अपना अंजलि मे जल लय –

ॐ विराजो दोहोऽसि विराजो दोहमशीय मयि पाद्यायै विराजो दोहः।

इति दक्षिणं पादं*७ प्रक्षालति। ततः पुनरपि अन्येन पाद्यम् ३ इति तिरुक्ते यजमानाऽर्पित पाद्योदकमादाय ‘विराजो दोहोऽसि….’ मन्त्रेण वामपादं प्रक्षालेत्।

ततः पूर्ववद् विष्टरान्तरं गृहीत्वा ‘वर्ष्मोऽसि समानानामुद्यतामि सूर्यः…’ इति पूर्वोक्तमन्त्रेणैव चरणयोरधस्ताद् उत्तराग्रं वरो दद्यात्। ततः ‘अर्घोऽर्घोऽर्घः’ इत्यन्येनोक्ते (सति) यजमानः दूर्वाक्षत-फल-चन्दन-जल-युताऽर्घपात्रं (शङ्खं) गृहीत्वा –

ई मंत्र पढ़ि वर दहिन पयर केँ धोथि। तदुत्तर पुनः पूर्वोक्त क्रमेण (अर्थात् पाद्यम् ३ ई पुरोहितक कथनानन्तर कन्यादानकर्त्ता ‘ॐ पाद्यं प्रतिगृह्यताम्’ ई कहथि, तदुत्तर ‘ॐ पाद्यं प्रतिगृह्णामि’ ई कहि – ‘ॐ विराजो दोहः’ इत्यादि पूर्वोक्त मंत्र पढ़ि कन्यादानकर्त्ताक हाथ सँ जल लय वाम पयर केँ धोथि।

तदुत्तर पूर्वोक्तक्रमेण, अर्थात् विष्टरः ३ ई पुरोहितक कथनानन्तर कन्यादानकर्ता ‘ॐ विष्टरः प्रतिगृह्यताम्’ ई कहथि, तदनन्तर वर ‘ॐ विष्टरं प्रतिगृह्णामि’ ई कहि कन्यादानकर्त्ताक हाथ सँ विष्टर लय, ‘ॐ वर्ष्मोऽसि..’ इत्यादि पूर्वोक्त मंत्र पढ़ि दुहू पयरक तर मे उत्तराग्र विष्टर केँ राखथि।

तदुत्तर ‘ॐ अर्घोऽर्घोऽर्घः’*८ ई पुरोहितक कथनानन्तर कन्यादानकर्त्ता शंख मे दूवि, अक्षत, सुपारी, चानन और जल लय –

ॐ अर्घः प्रतिगृह्यताम्।

इति वदेत्। ततो वरः – (ई कहथि। तदुत्तर वर) –

ॐ अर्घं प्रतिगृह्णामि।

इत्यभिधाय यजमानहस्ताद् अर्घं गृहीत्वा –

ई कहि, कन्यादानकर्त्ताक हाथ सँ शङ्ख लय –

‘ॐ आपस्थ युष्माभिः सर्वान् कामानवाप्नवानि*९।’

इति शिरशि शङ्खस्थ किञ्चिद् अक्षतादिकं दत्त्वा अर्घपात्रस्थजलमैशान्यां त्यजन् पठति –

ई मंत्र पढ़ि शंखक किंचिद् अक्षतादि केँ मस्तक पर दय, शंखक जल केँ ईशान कोन मे फेंकैत अगिला मंत्र पढ़थि –

ॐ समुद्रं वः प्रहिणोमि स्वां योनिमभिगच्छत अरिष्टा*१० अस्माकं वीरा मा परासेचि मत्पयः।

*१. ‘प्रातर्वृद्धिनिमित्तकम्’ कन्यादानकर्त्ता तथा वरक पिता प्रातःकाल (९ बजेक भीतर) आभ्युदयिकश्राद्ध करथि। यदि संयोगात् अनिश्चित समय मे वर उपस्थित कयल जाथि (यथा सौराठ सभा सँ) तँ ‘कर्मादिषु च सर्वेषु मातरः सगुणाधिपः। पूजनीयाः प्रयानेन पूजिताः पूजयन्ति ताः॥’ एहि कात्यायनक वचन सँ मातृकापूजा अवश्य करथि।

*२. आचार्यः, ऋत्विक्, वैवाह्यः (वरः), राजा, प्रियः (सखा) स्नातकः, इति षट् अर्घ्याः भवन्ति।

*३. शंखः – प्राङ्मुखायाभिरूपाय वशय शुचिसन्निधौ। दद्यात् प्रत्यङ्मुखः कन्यां क्षणे लक्षणसंयुते।

*४. यद्यपि अन्यपदें कन्यादानकर्त्ता ओ वरसँ अतिरिक्त सभक ग्रहण हो तथापि निश्चयोपस्थितत्वात ‘पुरोहितक’ नाम देल अछि।

*५. पचीस कुशक विष्टर बनाबी, अभाव मे तीनियों कुशक विहित अछि।

*६. पारस्करमते पुनः अत्रैव पूर्ववद् विष्टरान्तरं गृहीत्वा तदुपरि वरः उपविश्यति। किन्तु मिथिलापद्धतौ पादप्रक्षालनान्तरं दृश्यते। तद् बीजं मृग्यम्।

*७. ‘ब्राह्मणश्चेद् दक्षिणं प्रथमम्।’ इति पारस्करोक्त्या ब्राह्मणादितरः क्षत्रियादिश्चेत्तदा सव्यं पादं (वामपादं) प्रथमं प्रक्षालयेत्।

*८. अर्घ्यलक्षणमाह कात्यायनः – ‘साक्षातं सुममो युक्तमुदकं दधिसंयुतम्।’ इति।

*९. ‘आवाप्नुवानि’ इति पाठस्तु प्रामादिकः।

*१०. हरिहरभाष्ये ‘अरिष्टास्माकम्’ इति दृश्यते, तत्र सन्धिरार्घः। पारस्करे तु मूलोक्तपाठ एव समुपलभ्यते।

ततः ‘आचमनीयम्, आचमनीयम्, आचमनीयम्’ इत्यन्येनोक्ते यजमानः आचमनीयमादाय –

तदुत्तर ‘आचमनीयम् ३’ ई तीनि बेरि पुरोहितक कथनानन्तर कन्यादानकर्त्ता आचमनीय मे जल लय –

ॐ आचमनीयं प्रतिगृह्यताम्।

इति वदेत। ततो वरः (ई कहथि। तदुत्तर वर) –

ॐ आचमनीयम् प्रतिगृह्णामि।

इत्यभिधाय, यजमानहस्ताद् – आचमनीयं गृहीत्वा –

ई कहि, कन्यादानकर्त्ताक हाथ सँ आचमनीय केँ लय –

ॐ आमागन् यशसा संसृज वर्चसा। तं मा कुरु प्रियं प्रजानामाधिपतिं पशूनामरिष्टिं तनूनाम्।

इत्यनेन सकृदाचामति। द्विः तूष्णिम्। ततो यजमानः ‘मधुपर्को मधुपर्को मधुपर्कः’ इत्यन्ते नोक्ते काँस्यपात्रस्य दधि-मधु-घृतानि काँस्यपात्रपिहितानि मधुपर्कमादाय*१ –

ई मंत्र पढ़ि एक बेरि वर आचमन करथि। तदुत्तर बिना मंत्रहिं चुपचाप दुइ बेरि पुनः आचमन करथि। तदुत्तर मधुपर्क-३ ई तीनि बेरि पुरोहितक कथनानन्तर कन्यादानकर्त्ता काँसाक पात्र मे काँसाक पात्र सँ झाँपल दही, मधु, घृत मिलाओल मधुपर्ककेँ हाथ मे लय –

ॐ मधुपर्कः प्रतिगृह्यताम्।

इति वदेत्। ततो वरः (ई कहथि। तदुत्तर वर) –

ॐ मधुपर्कं प्रतिगृह्णामि।

इत्यभिधाय – (ई कहि) –

ॐ मित्रस्य त्वा चक्षुषा प्रतीक्षे।

इति मंत्रेण दातृकरस्थमेव प्रतीक्ष्य –

ई मंत्र पढ़िकेँ वर कन्यादानकर्त्ताक हाथहि मे मधुपर्क उघारिकेँ देखि –

ॐ देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यां प्रतिगृह्णामि।

इति मंत्रेण अञ्जलिना प्रतिगृह्य –

ई मंत्र पढि दुहू हाथें मधुपर्कक थारी लय, वाम हाथ मे राखि –

ॐ नमः श्यावास्यायाऽन्नशने*२ यत्त आविद्धं तत्ते निष्कृन्तामि।

इत्यनामिकया प्रदक्षिणमालोड्य अनामिकाङ्गष्ठाभ्यां भूमौ किञ्चिन्निःक्षिपेत्। पुनः तथैव (द्विवारमालोड्य) द्विः प्रत्येकं क्षिपेत्। ततः –

ई मंत्र पढ़ि अनामिका आंगुर सँ प्रदक्षिणक्रमे मधुपर्क केँ मिलाय (लाड़ि) अनामिका ओ औंठा दुहू आंगुर सँ किञ्चित् मधुपर्क केँ भूमिपर एक बेरि खसाबथि। तदुत्तर पुनः ‘ॐ नमः श्यावा’ इत्यादि पूर्वोक्त मंत्र केँ दुई बेर पढ़ि प्रति मन्त्रान्तमे उक्तरीत्या मधुपर्क केँ लाड़ि केँ पूर्ववत् भूमिपर प्रक्षेप करथि। तदुत्तर पुनः वर –

ॐ यन्मधुनो मधव्यं परमं रूपमन्नाद्यम्। तेनाहं मधुनो मधव्येन परमेण रूपेणान्नाद्येन परमो*३ मधव्योऽन्नादोऽसानि।

इत्यनामिकाङ्गुष्ठाभ्यां मधुपर्क प्राश्नाति। पुनः अनेनैव मन्त्रेण वारद्वयमुच्छिष्ट*४ एव प्राश्नाति। ततः मधुपर्कशेषम् – असञ्चदेशे धारयेत्*५। ततः आचम्य।

ई मंत्र पढि अनामिका और औंठा आंगुर सँँ एक बेरि मधुपर्कक प्राशन (भोजन) करथि। तदुत्तर पुनः दुइ बेरि ‘ॐ यन्मधुनो….’ इत्यादि पूर्वोक्त मंत्र पढ़ि २ प्रति मंत्रान्त मे मधुपर्कक प्राशन करथि। तदुत्तर मधुपर्कक थारी केँ असंचरदेश (एकान्तस्थान) मे राखि आचमन कय –

ॐ वाङ् म आस्येऽस्तु।

इति कराग्रेण मुखं स्पृशति। (ई मंत्र पढ़ि पाँचो आँगुर सँ मुंहक स्पर्श करथि।)

ॐ नसोर्मे प्राणोऽस्तु।

इति तर्जन्यंगुष्ठाभ्यां नासिकाच्छिद्रद्वयं युगपत् स्पृश्यति।

ई मंत्र पढ़ि तर्जनी और औंठा दुहू आँगुर सँ नाकक दुहू पूड़ाक स्पर्श एकहि बेर करथि।

ॐ अक्षोर्मे चक्षुरस्तु।

इत्यनामिकाङ्गुष्ठाभ्याम् अक्षिद्वयं स्पृशति।

ई मंत्र पढ़ि अनामिका ओ औंठा आँगुर सँ एकहि बेर दुहू आँखिक स्पर्श करथि।

ॐ कर्णयोमें श्रोत्रमस्तु*६।

इति कर्णौ। (ई मंत्र पढ़ि दुहू कानक स्पर्श करथि।) –

ॐ बाह्वोर्मे बलमस्तु*७।

इत्यंशौ। (ई मंत्र पढ़ि दुहू बाँहिक स्पर्श कय) –

ॐ ऊर्वोर्मे ओजोऽस्तु।

इति ऊरूद्वयं युगपदेव स्पृशति। (ई मंत्र पढ़ि एकहि बेरि दुहू जाङ्घक स्पर्श करथि।)

*१. केनहस्तेन आदायेति चेत् – अत्र वाचस्पतिः ‘कर्मोपदिन्यते यत्र कर्त्तरङ्गन्न चोच्यते दक्षिणस्तत्र विज्ञेयः कर्मणां पारगः करः॥’ इति।

*२. अन्नशने – अद्यत इत्यन्नं ‘तस्याशने’ ह्रस्वश्छान्दसः। ‘अन्यसने’ इति पाठस्तु प्रामादिक एव।

*३. परमः – सर्वेभ्यो गुणाधिकः। मधव्यः – मधुपर्कार्हः।

*४. मनुः – ताम्बूलेक्षुफले चैव भुक्तस्नेहानुलेपने। मधुपर्के च सोमे च नोच्छिष्टं मनुरव्रवीत्॥ एवञ्च मधुपर्कप्राशनोच्छिष्टमुखेन कथं मन्त्रोच्चारणामिति निरस्तम्।

*५. अत्र पास्करः – ‘सर्वे वा प्राश्नीयात्’। प्राग् नाऽसञ्चरे निनयेत्॥ ‘अग्नि-प्रणीतयोर्मध्यदेशः’ असञ्चरदेशः।

*६. इति दक्षिणं श्रोत्रं संमृश्य पुनः ‘ॐ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु’ इति पठित्वा वामं स्पृशति। इति हरिहरः।

*७. इति दक्षिणं बाहुमभिमृश्य पुनः ‘ॐ बाह्वोर्मे बलमस्तु’ इति पठित्वा वामं स्पृशति। इत्यपि हरिहरः।

ॐ अरिष्टानि मेऽङ्गानि तनूस्तन्वा मे सह सन्तु।

इति शिःप्रभृतीनि पादान्तानि सर्वाण्यङ्गान्युमाभ्यां हस्ताम्पामालमेत्। ततः नापिते वराञ्जलौ तृणमेकं दत्त्वा – ‘गौर्गौर्गौः’ इत्यभिहिते वरः –

ई पढ़ि मस्तक सँ पयर पर्यन्त दुहू हाथ सँ संपूर्ण शरीरक स्पर्श करथि । तदुत्तर नौआ वरक हाथ मे एकटा तृण (खढ़) केँ राखि – ‘गौर्गौर्गौः’ ई शब्दोच्चारण करय। तदुत्तर वर –

ॐ माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसाऽऽदित्यानाममृतस्य नाभिः प्रणुवोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट। मम*१ च, अमुकशर्मणो यजमानस्य*२ च पाप्मा हतः, ॐ उत्सृजत तृणान्यत्तु।

इति तृणं क्षित्वा गामुत्सृजेत्*३।

ई मंत्र पढ़ि, हाथ खढ़ केँ तोड़ि देथि। तथा (मण्डपक समीप बान्हल) गायक बन्धन खोलि देथि।

*१. अपन नाम

*२. कन्यादाताक नाम

‘मम च’ सँ आगाँ ‘अमुष्य च’ ई पाठान्तर उपलब्ध होइछ। तत्र ‘अमुष्य च’ एकरे पर्यायान्तर – ‘अमुकशर्मण यजमानस्य’ थिक।

*३. न तु गामालभेत । गोरालम्भः (हननम्) कलिवर्जिते काले भवति । तथाहि – ‘यज्ञाधानं गवालम्भं संन्यासं पलैतृकम् । देधराच्च सुतोत्पतिः कलौ पञ्च विवर्जयेत्॥’ इति। एवं याज्ञवल्क्येऽपि – ‘अस्वर्ग्ये लोकविद्विष्टं धर्ममप्याचरेन्नहि’।

ततो वरः मण्डपे परिष्कृतभूमौ कुशण्डिकामारमेत्॥ तत्र क्रमः – कुशैर्हस्तमात्रपरिमित-चतुस्रां भूमिं परिसमुह्य (पांसूनपसार्य) तान् कुशान् ऐशान्यां परित्यज्य गोमयोदकेन उपलिप्य स्फ्येन स्रुवमूलेन वा प्रादेशमात्रं तिस्रो रेखाः कत्वा यथोल्लिखिताभ्यो रेखाभ्यः अनामिकाङ्गुष्ठाभ्यां मृदम् उद्धृत्य जलेन आभ्युक्ष्व कांस्यपात्रेण*१ अग्निमादाय प्रत्यङ्मुखम् (तूष्णीम्) अग्नेः उपसमाधानं कुर्यात्। ततः तद्रक्षार्थं किञ्चित् नियुज्य तत्र कौतुकागाराद् वरः*२ कान्यामानयेत्।

तदुत्तर वर मण्डपक पवित्रभूमिपर कुशण्डिका करथि। क्रम यथा – तीनि कुश सँ एक हाथ सरि भूमि केँ बढ़ारि, कुश केँ ईशान कोण मे फेकि, गायक गोबर सँ स्थान केँ नीपि, स्रुवक जड़ि सँ वा स्फ्यसँ प्रादेशप्रमाण उत्तरोत्तरक्रमे तीनिटा रेखाकय, यथाक्रम तीनू रेखापर सँ अनामिका ओ औंठा दुहू आङ्गुर सँ मांटि केँ हटाय, जल सँ सिक्तकय, कांसाक पात्र मे अग्नि केँ लय, पात्र केँ पश्चिमाभिमुखकय, बिना मंत्रहि अग्निक स्थापन करथि। तदुत्तर अग्निरक्षार्थ (सुलगबाक हेतु आमक इन्धन) अग्निपर दय कोहबरक घर सँ कन्या केँ लाबथि।*३

*१. अङ्गिराः – शुभं पात्रं तु कास्यं स्यात् तेनाग्निं प्रणयेद् बुधः। तस्याभावे शरावेण नवेनाभिमुखे च तम्॥

२. अत्र गदाधरः – कौतुकागाराद् मातुलादिः कन्यानयनं करोति। (अत एव दक्षिणमिथिलायां क्वचिद् व्यवहारोऽयं दृश्यते।) सा च आगत्य प्रत्यङ्मुखौ उपविशति। अत्र वधूवरयोर्मध्ये वस्त्रेण अन्तर्द्धानम्। ‘परस्परं समञ्जेथाम्’ इति अन्तः पटस्यापसारणम्, वधूवरयोः समञ्जनम्। ततः सम्मुखीकरणं ‘समञ्जनं तु’ इति वरपठितमन्त्रेण।

३. कोहवरघर मे कन्या पूर्वहि सँ स्नानोत्तर अतर-फुलेल, आदि लगाय, पिताक देल आभूषण आदि सँ अलंकृत भय, गौरीक पूजा कय सौभाग्यक कामना करैत विनम्र भाव सँ बैसल रहथि।

*-*१

अथ कन्यादाता अहतवस्त्रचतुष्टयं वराय प्रयच्छति। वरश्च तेषु एकं कन्यायाः परिधानवस्त्रं-गृहीत्वा – अथानन्तर कन्यादानकर्त्ता (एक डाला मे) वरक अहत (नवीन) धोती-तौनी तथा कन्याक साड़ी, द्वितीय वस्त्र (साया) लय चारुटा वस्त्र वर केँ देथि। ओहि मे सँ वर पहिने कन्याक साड़ी हाथ मे लय –

ॐ जरां गच्छ परिधत्स्व वासो भवाकृष्टीनामभिशस्तिपावा। शतं च जीव शरदः सुवर्चा रयिं च पुत्राननुसंव्यस्वायुष्मतीदं परिधत्स्व वासः।

इति पठित्वा परिधानवस्त्रं तस्यै दद्यात्। ततो वरः द्वितीयम् उत्तरीयवस्त्रं गृहीत्वा – ई मंत्र पढ़ि कन्या केँ पहिरक हेतु देथि। तदुत्तर वर कन्याक द्वितीय वस्त्र (साया) केँ हाथ मे लय –

ॐ या अकृन्तन्नवयं या अतन्वत् याश्च देवीस्तन्तूनमितो ततन्थ। तास्त्वा देवीर्जरसे संव्ययस्वायुष्मतीदं परिधत्स्व वासः।

इति पठित्वा तस्यै दद्यात्। (ई मंत्र पढि कन्या केँ देथि।)

ततो वरः स्वकीर्य धौतवस्त्रं गृहीत्वा – (तदुत्तर वर हाथ मे अपन धोती लय) –

ॐ परिधास्यै यशो धास्यै दीर्घायुत्वाय जरदष्टिरस्मि। शतं च जीवामि शरदः पुरुची रायस्पीषमभिसंव्ययिष्ये।

इति पठित्वा स्वयं परिधत्ते। (ई मंत्र पढि केँ स्वयं वस्त्र पहिरथि।) –

ततः उत्तरीयं गृहीत्वा – (तदुत्तर हाथ मे अपन द्वितीयवस्त्र तौनी लय) –

ॐ यशसा मा द्यावापृथिवी यशसेन्द्रा बृहस्पती। यशो भगश्च माऽविद्यशो मा प्रतिपद्यताम्।

इति पठित्वा परिदधाति। (ई मंत्र पढ़ि धारण करथि।)

*-*२

१. प्रचुर आचरात् आइ-काल्हि कन्या वर केँ पूर्वहिं नवीन वस्त्र पहिराओल जाइछ। अतः यदि पूर्वहिं पहिर नेने होथि तँ एहि ठाम पहिरेबाक आचार देखना जाइछ। अतः यदि एहिठाम पहिरेबाक विचार नहि हो तँ *-* एहि चिह्नान्तर्गत मंत्र नहि पढ़ी अथवा वस्त्रक स्पर्श कय केँ वर यथाक्रम सँ मंत्र सभकेँ पढ़ि लेथि।

२. कन्यादान सँ पूर्वहि ‘परस्परं समञ्जेथाम्’ पद्धति मे कहल गेल अछि, अतः पद्धतियोक आशय अछि जे कन्या-वर केँ परस्पर आग्रह पूर्वक मुंह देखा-देखी करबिऐह्न अन्यथा वर्तमान अप-टु-डेट (अंग्रेजी सभ्यता प्रचलित) युग मे कुत्रचित्त विवाहोत्तर विकट परिस्थिति उत्पन्न भय जाइछ।

ततो वरस्य कन्याश्च द्विराचमनम्। ततः कन्याप्रदेन ‘ॐ परस्परं समञ्जेयम्’। इति प्रैषान्तरं कन्यावरयोः परस्पराभिमुखीकरणम्।

ततः कन्यासम्मुखीभूतो वरः –

तदुत्तर वर और कन्या दुहू गोटय दुइ वेरि आचमन करथि। तदुत्तर कन्यादान कर्त्ता – ‘ॐ परस्परं समञ्जेयम्’ ई वर केँ कहथि। तदुत्तर (विधिकरी) कन्या मुँह उघारि केँ वर केँ देखाबथि तथा कन्यों केँ वरक मुँह देखाबथि।

ओहीकाल मे कन्याक सम्मुखभेल वर –

ॐ समञ्जन्तु विश्वेदेवाः समापो हृदयानि नौ। सम्मातरिश्वा सन्धाता समुदेष्ट्री दधानु नौ।

इति पठति। ततः कन्याप्रदकर्तृकं जन्मग्रन्थिबन्धनम्।

ई मन्त्र पढ़थि। तदुत्तर कन्यादानकर्ता वरक द्वितीय वस्त्र मे जन्मग्रन्थि बाह्नथि।

अथ कन्यादानम्

ततः दाता कुशहस्तः*१ – शङ्खस्थ-दूर्वाऽक्षत-फल-चन्दन-जलान्यादाय, जामातृदक्षिणकरोपरि कन्यादक्षिणकरं निधाय –

तदुत्तर कन्यादानकर्ता तेकुशाक हाथें शंख मे – दूवि, अक्षत, सुपारी, चानन, तथा जल लय वरक दहिन हाथपर कन्याक दहिन हाथ केँ (उठल सन भेल*२) –

ॐ दाताऽहं वरुणो राजा द्रव्यमादित्यदैवतम्। विप्रोऽसौ विष्णुरूपेण प्रतिगृह्णात्वयं विधिः।

इति पठित्वा – प्रवराध्यायपूर्वकम्*३ (ई पढ़ि प्रवराध्याय पाठपूर्वक) –

ॐ अद्य अमुकमासीय-अमुकपक्षीय-अमुकतिथौ-अमुकगोत्रस्य-अमुकप्रवरस्य-अमुकशर्मणः*४ प्रपौत्राय, अमुकगोत्रस्य-अमुकप्रवरस्य-अमुकशर्मणः*५ पौत्राय, अमुकगोत्रस्य-अमुकप्रवरस्य-अमुकशर्मणः*६ पुत्राय,

अमुकगोत्रस्य*७ अमुकप्रवरस्य अमुकशर्मणः*८ प्रपौत्रीम्, अमुकगोत्रस्य अमुकप्रवरस्य अमुकशर्मणः*९ पौत्रीम्, अमुकगोत्रस्य अमुकप्रवरस्य अमुकशर्मणः*१० पुत्रीम्।

एवं त्रिरुचार्य*११ (एवं प्रकारे तीनि बेर उभय पक्षक त्रिपुरुषानुक्रमेण गोत्रप्रवर*१२ तथा नामोच्चारण कय –

अमुकगोत्राय*१३ अमुकप्रवराय अमुकशर्मणे*१४ ब्राह्मणाय वराय तुभ्यम् –

अमुकगोत्राम्*१५ अमुकप्रवराम् अमुकनाम्नीम्*१६ इमां कन्यां सालङ्कारां प्रजापतिदेवतां स्वर्गकामः*१७ पत्नीत्वेनाऽहं सम्प्रददे।

इति पठित्वा शङ्खस्थदूर्वाक्षतादिकं कन्यादक्षिणहस्तगृहीत-वरदक्षिणकरे क्षिपेत् ‘ॐ स्वस्ति’ इति प्रतिवचनम्। ततो वरः –

ई मंत्र पढ़ि शंखक दुर्वाक्षत आदि वर-कन्याक एकत्रित हाथ पर देथि तथा वर – ‘ॐ स्वस्ति’ ई कहि –

ॐ द्यौस्त्वा ददातु पृथिवी त्वा प्रतिगृह्णातु।

इत्यनेन मन्त्रेण तां प्रतिगृह्णीयात्। (ई मंत्र पढि कन्यादान स्वीकार करथि।)

ततः कन्याप्रदः कुशहस्तेन शङ्खस्थ दूर्वाऽक्षत-फल-चन्दन-जल-दक्षिणाद्रव्यमादाय –

तदुत्तर कन्यादानकर्ता तेकुशाक हाथें शंख मे दूवि, अक्षत, सुपारी, चानन, जल तथा दक्षिणाक द्रव्य लय*१८ –

ॐ अद्य कृतैतत् कन्यादानप्रतिष्ठार्थम् – एतावद् द्रव्यमूल्यक-हिरण्यमग्नि-दैवतम्-अमुकगोत्राय*१९-अमुकप्रवराय-अमुकशर्मेणे*२० ब्राह्मणाय वराय दक्षिणां तुभ्यमहं सम्प्रददे।

इति दक्षिणां दद्यात्। ‘ॐ स्वस्ति’ इति प्रतिवचनम्। ततः –

ई मंत्र पढ़ि दक्षिणा देथि। तदुत्तर वर – ‘ॐ स्वस्ति’ ई कहि, दक्षिणा लय –

ॐ कोऽदात् कस्मा अदात् कामोऽदात् कामायाऽदात्। कामो दाता कामः प्रतिग्रहीता कामैतत्ते।

इति वरः पठति। ततस्तां पाणौ गृहीत्वा – ( ई मंत्र पढ़ि, वधूक दुहू हाथ केँ धय) –

ॐ यदैषि मनसा दूरं दिशोऽनुपवमानो वा। हिरण्यपर्णो वैकर्ण्यः स त्वा मन्मनसां करोतु। (श्री अमुकदेवि*२१)

इति वरः पठन् निष्क्रामति। निष्क्रमणप्रभृति कश्चन पुरुषो दक्षिणस्कन्धे वारिपूर्णं कलशं गृहीत्वा वेदि दक्षिणस्या दिशि (अभिषेकपर्यन्तं) वाग्यतः तिष्ठेत्। ततः कन्याप्रदः –

ई मंत्र पढि वधू-वर दुहू गोटे अग्निक समीप भय केँ बैसथि। ओही काल मे वेदीक दहिन भाग मे कोनो पुरुष आम्रपल्लवादि सँ विभूषित जलपूर्ण कलश केँ दहिन काह्न पर लय केँ चुपचाप ठाढ़ होथि। तदुत्तर कन्यादानकर्ता –

ॐ परस्परं समीक्षेथाम्।

इति प्रैषेण समीक्षयति। ततः प्रेषितो वरः समीक्षमाणां वधुं समीक्षमाणः –

ई वर केँ कहथि। तदुत्तर वर वधूक मुंह केँ देखैत –

ॐ अघोरचक्षुर्पतिघ्न्येधि शिवा पशुभ्यः सुमनाः सुवर्च्चा।
वीरसुर्देवकामा स्योना शन्नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे॥१॥
सोमः प्रथमो विविदे गन्धर्वो विविद उत्तरः।
तृतीयोऽग्निष्टे पतिस्तुरायस्ते मनुष्यजाः॥२॥
सोमोऽददद् गन्धर्वाय गन्धर्वोऽदददग्नये।
रयिं च पुत्राँश्चादादग्निर्मह्यमथो इमाम्॥३॥
सा नः पूषा शिवतमा मेरय सा नऽऊरू उशता विहर।
यस्यामुशन्तः प्रहराम शेषं यस्यामुकामा बहवो निविष्टयै॥४॥

इति चतुरो मन्त्रान् पठति मन्त्रान्ते परस्परनिरीक्षणम्। ततः दम्पत्योरग्नेः प्रदक्षिणकरणम्।

उपर्युक्त चारू मंत्रकेँ पढ़थि तथा मंत्रक अन्त मे वर वधू दुहू गोटय परस्पर मुंह निरीक्षण (देखा-देखी) करथि। तदुत्तर दुहू गोटे अग्निक प्रदक्षिणा करथि।

*इति कन्यादानम्*

*१. ‘सर्वत्र प्राङ्मुखो दाता प्रतिग्राही उदङ्मुखः। एष एव विधिर्दाने विपर्ययः॥’ इति वचनात् ‘वरः प्राङ्मुख उपविशेत, तस्य पुरस्तात् प्रत्यङ्मुखी कन्यां पुरस्कृत्य दाता उपविशेत्’ इति आश्वलायनगृह्यपरिशिष्टवचनम्।

*२. विधानपारिजाते वृहस्पतिः – ‘चतुष्पादं गृहं कन्यां दासीं छत्रं रथं तरूम्। तिष्ठन्नेतान् द्विजो दद्याद् भूम्यादीनुपविश्य च॥’ ब्रह्मपुराणे – ‘मासपक्षतिथीनां च निमित्तानां च सर्वसः। उल्लेखनमकुर्वाणो न तस्य फलभाग् भवेत्॥’

*३. मत्स्यपुराणे – तुलापुरुषदाने च तथा च हाटकाचले। कन्यादाने तथोत्सर्गे कीर्तयेत् प्रवरादिकम्॥
कात्यायनः – नान्दीमुखे विवाहे च प्रपितामहपूर्वकम्। वाक्यमुच्चारयेद् धीमानन्यत्र पितृपूर्वकम्।

*४. वरक प्रपितामहक नाम।

*५. वरक पितामहक नाम।

*६. वरक पिताक नाम।

*७. कन्यापक्षक गोत्र ओ प्रवरक नाम।

*८. कन्याक प्रपितामहक नाम।

*९. कन्याक पितामहक नाम।

*१०. कन्याक पिताक नाम। यदि कन्याक पिते कन्यादान करथि तँ ‘मम श्री अमुकशर्मणः पुत्रीम्’ ई पढ़थि।

*११. आश्वलायनः – उभयस्यापि पक्षस्य पैतापौत्रीन् त्रिरभ्यसेत्। (पैतापौत्रीति रूपमुभयपदवृद्धया) अत्रेदमवधेयम् – मासादीनामुल्लेखः सकृदेव, आवृत्तौ प्रमाणाऽभावात्। एवं वरकन्ययोर्गोत्रादिकीर्तनमपि सकृदेव, उक्तयुक्तः उभयोः प्रपितामहादिकीर्तनं तु त्रिरावर्तते।

*१२. कन्या-वर उभयपक्षक गोत्र तथा प्रवरोच्चारण अधोनिर्दिष्ट प्रवराध्याय सँ करी –

१. शाण्डिल्यगोत्रस्य शाण्डिल्यासितदेवलेति त्रिप्रवरस्य। २. वत्सगोत्रस्य – और्वचन्यवनभार्गवजामदग्न्याप्नवानेति पञ्चप्रवरस्य। ३. काश्यपगोत्रस्य काश्यपावत्सारनैध्रुवेति त्रिप्रवरस्य। ४. पराशरगोत्रस्य शक्तिवशिष्ठपराशरेति त्रिप्रवरस्य। ५. भारद्वाजगोत्रस्य भारद्वाजाङ्गिरसबार्हस्पत्येति त्रिप्रवरस्य। ६. कात्यायनगोत्रस्य कात्यायनविष्ण्वङ्गिसेति त्रिप्रवरस्य। ७. सावर्णिगोत्रस्य और्वच्यवनभार्गवजामदग्न्याप्नवानेति पञ्चप्रवरस्य। ८. अलाबुकाक्षगोत्रस्य सागरगौतमवशिष्ठेति त्रिप्रवरस्य। ९. कौशिकगोत्रस्य कौशिकात्रिजमदग्न्येति त्रिप्रवरस्य। १०. गार्ग्यगोत्रस्य गार्ग्यधृतकौशिकमाण्डव्याथर्ववैशम्पायनेति पञ्चप्रवरस्य। ११. गौतमगोत्रस्य अङ्गिरोवशिष्ठबार्हस्पत्येति त्रिप्रवरस्य। १२. कृष्णात्रेयगोत्रस्य कृष्णात्रेयाप्नवानसारस्वतेति त्रिप्रवरस्य। १३. मौद्गल्यगोत्रस्य मौद्गल्याङ्गिरसबार्हस्पत्येति त्रिप्रवरस्य। १४. वशिष्ठगोत्रस्य वशिष्ठात्रिसाङ्कतीति त्रिप्रवरस्य। १५. कौण्डिल्यगोत्रस्य आस्तीककौशिककौण्डिल्येति त्रिप्रवरस्य। १६. उपमन्युगोत्रस्य उपमन्युकपिलविरक्तेति त्रिप्रवरस्य। १७. तण्डिगोत्रस्य – आङ्गिरसगौरवीतसाङ्कृत्येति त्रिप्रवरस्य। १८. विष्णुवृद्धिगोत्रस्य विष्णुवृद्धिपौरुकुत्सत्रसदस्यवेति त्रिप्रवरस्य।

*१३. वरक गोत्र ओ प्रवरक नाम।

*१४. वरक नाम।

*१५. कन्याक गोत्र ओ प्रवरक नाम।

*१६. कन्याक नाम। (सोतिपुरा मे एहिठाम वरक नामानुरूपेण कन्याक नाम राखि – जेना घुटर नाम वर रहैत छथि तँ कन्याक नाम ‘घुटरप्रिया’ राखि, तन्नामग्रहणेनैव कन्यादान होइछ। कन्यादानात् प्राक् वरानुरूपनामकरणे बीजं मृग्यम।)

अत्र राजमार्तण्डे – ‘मातृनाम्नी यदा कन्या विवाहे कुलहा हि या। विप्रैर्नामान्तरं कार्य तस्याः पित्रोरनुज्ञया॥’

*१७. कन्याक पिता सँ अतिरिक्त व्यक्ति यदि कन्यादान करथि तँ – ‘कन्यापितृगत-स्वर्गेकामः’ ई पढ़थि।

*१८. कन्यादानक दक्षिणा मे सुवर्णदान अथवा गोदान विशेष प्रशस्त अछि, अतः तत्काले यदि सुवर्णदान करी तँ – एतावद् द्रव्यमूल्यकहिरण्यमग्निदैवतम्’ केर स्थान मे – ‘इमं सुवर्णम्-अग्निदैवतम्’ एहि तरहें पढ़ी आ यदि गोदान करी तँ – ‘इमां गां रुद्रदैवताम्’ ई पढ़ी।

*१९. वरक गोत्र ओ प्रवरक नाम।

*२०. वरक नाम।

*२१. कन्याक नाम।

अथ हवनप्रकरणम्

ततः पश्चादग्नेः नूतनवस्त्रवेष्टित-तृणपुञ्जे कटे वा दक्षिणपादेन प्रवृत्त्य उपविसति वरः। वरदक्षिणवतो वध्वा उपवेशनम्। ततो वरः –

तदुत्तर वर-वधू दुहू गोटय स्थापित अग्निक प्रदक्षिणक्रमेण अग्निक पश्चिमभाग जाय नवीन वस्त्र सँ वेष्टि बोरा अथवा चटाई रूप कल्पित आसन पर (कम्बलक आसन सेहो विहित अछि) पहिने दहिन पैर राखि केँ बैसथि तथा वधू केँ अपना सँ दहिन भाग मे बैसावथि। तदुत्तर वर –

*-*

पुष्प-चन्दन-ताम्बूल-वस्त्राण्यादाय*१ – (फूल, चानन, पान, वस्त्र, आदि वरण सामग्री लय) –

ॐ अद्य कर्तव्य-विवाहाङ्गहोमकर्मणि कृताकृतावेक्षणरूप-ब्रह्मकर्मकर्तुम्-अमुक-गोत्रम्*२-अमुकशर्मणं ब्राह्मणाम्-एभिः पुष्प-चन्दन-ताम्बूल-यज्ञोपवीत-वासोभिः ब्रह्मत्वेन त्वामाहं वृणे।

*१. कुशक ब्रह्मापक्ष मे ‘ॐ अद्य कर्तव्यविवाहाङ्गहोमकर्मणि कृताकृतावेक्षणरूपकर्मकर्तु त्वं मे ब्रह्मा भव’ ई पढ़ि, आसनपर प्रदक्षिणक्रमे कुशक ब्रह्मा केँ बैसाबथि। एहि पक्ष मे वरण ओ प्रतिवचन नहि होइत अछि। अतः एहि *-* चिह्नान्तर्गत पाठ नहि पढ़थि।

*२. ब्रह्माक गोत्र ओ नाम ली।

इति ब्रह्माणं वृणुयात्। ‘ॐ वृतोऽस्मि’ इति प्रतिवचनम्। ‘ॐ यथा विहितं कर्म कुरु’ इति यजमानेनोक्ते ‘ॐ करवाणि’ इति प्रतिवचनम्।

ई पढ़ि ब्रह्मा केँ वरण देथि। तदुत्तर ब्रह्मा – ‘ॐ वृत्तोऽस्मि’ ई कहथि। पुनः – ‘ॐ यथाविहितं कर्म कुरु’ ई वरक कथनानन्तर ब्रह्मा ‘ॐ करवाणि’ ई कहि धोती पहिर लेथि।

ततो वरः – अग्नेः दक्षिणतः शुद्धमासनं दत्त्वा तदुपरि प्राग्-अग्नान् कुशान् आस्तीर्य अग्नि प्रदक्षिणं कारयित्वा –

तदुत्तर स्थापित अग्नि सँ दक्षिणभाग मे ब्रह्मा केँ शुद्ध आसन (चटुआ) दय, ओहिपर पूब मुहें तीनिटा कुश केँ पसारि, ब्रह्मा केँ अग्निक प्रदक्षिणक्रम मे आनि –

ॐ अस्मिन् कर्मणि त्वं मे ब्रह्मा भव।

इत्यभिधाय – ‘ॐ भवानि’ इति तेनोक्ते ब्रह्माणमुदङ्मुखं तत्रोपवेशयेत्।

ई ब्रह्मा केँ कही। ततः ‘ॐ भवानि’ ई ब्रह्माक कथनानन्तर कल्पित आसन पर ब्रह्मा केँ उत्तर मुहें बैसाबी।

*-*

ततः प्रणीतापात्रं पुरतः कृत्वा वारिणा परिपूर्य कुशैराच्छाद्य ब्रह्मणो मुखमवोलक्य अग्नेः उत्तरतः कुशोपरि निदध्यात्।

तदनन्तर प्रणीतापात्र केँ आगू मे राखि, जल सँ भरि कुश सँ झाँपि, ब्रह्माक मुख केँ देखि, अग्नि सँ उत्तर भाग मे कुशपर राखी।

अथ परिस्तरणम् –

बर्हिषः चतुर्थभागमादाय आग्नेयाद् ईशानान्तम्, ब्रह्मणः अग्निपर्यन्तम् नैऋ ताद् वायव्यान्तम् अग्नितः प्रणीतापर्यन्तम्।

ततः अग्नेः उत्तरतः पश्चिमदिशि पवित्रच्छेदनार्थ कुशत्रयम्, पवित्रकरणार्थ साग्रमनन्तरगर्भिकुशपत्रद्वयम्, आज्यस्थाली, सम्मार्जनकुशाः, वेणीरूपोपयमनकुशाः, समिधः तिस्रः, स्रुवः, आज्यम् (गव्यम्) षट्पञ्चाशदुत्तर-वरमुष्टिशतद्वयावच्छिन्न-आमतण्डुल-पूर्णपात्रम्, एतानि पवित्रच्छेदनकुशानां पूर्व-पूर्व-दिशि क्रमेण आसादनीयानि।

अथ तस्यामेव दिशि – असाधारण वस्तून्युपकल्पनीयामि। तत्र शमी-पलाश-मिश्रा लाजाः दृषदुपलं, कन्याभ्राता, शूर्पः (दृढः पुरुषः) अन्यदपि तदुपयुक्तद्रव्यम्।

तदुत्तर वर बर्हिष*१ (चौंसठि कुश) के चतुर्थभाग (सोलह) कुश लय, अग्निकोण सँ ईशानकोण पर्यन्त, ब्रह्मा सँ अग्रनि पर्यन्त, नैऋत्यकोण सँ वायव्यकोण पर्यन्त, अग्नि सँ प्रणीता पर्यन्त कुशक परिस्तरण करथि*२।

*१. ‘चतुः षष्ठिर्भवेद् बर्हिः’ इति कात्यायनः।

*२. अग्निकोण सँ – नैर्ऋृत्य, वायव्य, ईशान पर्यन्त १६ । ब्रह्मा सँ अग्निपर्यन्त १६ । नैर्ऋृत्य सँ – अग्नि, ईशान, वायव्य पर्यन्त १६ । एवं अग्नि सँ प्रणीता पर्यन्त १६ कुशक परिस्तरण करी। चारि-चारि (चारि-चौका सोलह) कुशक परिस्तरण सेहो व्यवहार अछि, किन्तु ‘परिस्तरणं परिस्तरणम्’ इति परिस्तरणार्थ सँ विरुद्ध बुझना जाइछ, किञ्च तथा सति चतुर्तभागोपादान व्यर्थ होएत अन्यथा ‘षोडश कुशनादाय’ इत्येव ब्रूयात्। अस्मन्मते तु – चारू बेर सोलह २ कुशक परिस्तरण कयला उत्तर बर्हिष् (६४ कुश) के उपादान सफल होइछ। अत एव ‘परिस्तरणक्रमेण बर्हिरुत्थाप्य’ इहो वक्ष्यमाणोक्त मूलग्रन्थ संगत होएत।

तदुत्तर अग्निक उत्तर-पश्चिम भाग मे पैताछेदनार्थ तीन कुश, पैता बनेबाक हेतु छीपसहित दुइ पात कुश, घृतक पात्र, स्रुव-सम्मार्जनक हेतु तीनि टा कुश, बिरनी, तीनि टा समित्, स्रुव, गायक घृत, ब्रह्मदक्षिणाक हेतु २५६ मुट्ठी आरब चाऊर सँ पूर्णपात्र*१ एहि सभ केँ पूर्वपूर्वक्रमे राखथि।

एहि सभक उत्तर भाग मे दोसरो उपयुक्त वस्तु सभ केँ राखी। यथा – समी-पत्र मिलल धानक लावा, प्रस्थर, कन्याक भाइ, सूप (कोनियाँ), नौआ, हवनक इन्धन, आदि।

ततः पवित्रच्छेदनकुशैः स्वप्रादेशमात्रे पवित्रे*२ छित्त्वा (प्रोक्षणीपात्रं प्रणीतासन्निधौ निधाय) सपवित्रकरेण प्रणीतोदकं त्रिः प्रोक्षणीपात्रे निधाय द्वाभ्यामनामिकाङ्गुष्ठाभ्याम्-उत्तराग्रे पवित्रे गृहीत्वा त्रिरुत्पवनम्। ततः प्रोक्षणीपात्रं वामहस्ते कृत्वा दक्षिण-अनामिकाङ्गुष्ठाभ्यां गृहीतपवित्राभ्यां प्रोक्षणीजलं त्रिः उत्क्षिप्य प्रणीतोदकेन प्रोक्षणीम् अभिषिच्य प्रोक्षणीजलेन आसादितवस्तूनि अभिषिच्य अग्नि प्रणीतयोः मध्ये प्रोक्षणीपात्रं निदध्यात्।

तत आज्यस्थाल्याम् आज्यं कृत्वा अधिश्रित्य ज्वलत् तृणम् आदाय आज्यस्योपरि प्रदक्षिणं भ्रामयित्वा नह्नौं क्षिपेत्। ततः त्रिः स्रुवं प्रतप्य*३ सम्मार्जनकुशानाम्-अग्रैः अन्तरतः, मूलैः बाह्यतः स्रुवं समृज्य, प्रणीतोदकेन अभ्युक्ष्य, पुनः पूर्ववत् त्रिः प्रतप्य स्वदक्षिणतः कुशोपरि निदध्यात्। ततः अग्नितः प्रदक्षिणक्रमेण आज्यमवतार्य-अग्रतो निदध्यात्। ततः प्रोक्षणीवत् त्रिः उत्पवनम्, अवेक्ष्य सत्यपद्रव्ये तन्निरस्य पूर्ववत् प्रोक्षणी उत्पवनम्।

तदुत्तर पवित्रछेदनकुश सँ प्रादेशप्रमाण दुइ पात कुश केँ तोड़ि, पैता बनाय, प्रोक्षणीपात्र केँ प्रणीतापात्र लग राखि पैताक हाथें प्रणीताक जल केँ प्रोक्षणीपात्र मे तीनि बेरि दय, अनामिका ओ औंठा आङ्गुर सँ उत्तराग्र पैता केँ धय, तीनि बेरि मस्तक पर जल केँ सिक्त करी। तदुत्तर प्रोक्षणीपात्र केँ बामहाथ मे लय दहिनहाथक अनामिका ओ औंठा सँ पैता केँ धय, तीनि बेरि उपर केँ जल फेकि, प्रणीतापात्रक जल सँ प्रोक्षणीपात्र केँ ओ प्रोक्षणीपात्रक जल सँ समीपक राखल सब वस्तु केँ सिक्तकय, अग्नि ओ प्रणीतापात्रक मध्य मे प्रोक्षणीपात्र केँ राखी।

तदुत्तर घृतक पात्रमे घृत राखि अग्निपर चढ़ाय, धधकैत तृण केँ घृत पर प्रदक्षिणक्रमे घुमाय, अग्निमे फेकि दी। तदुत्तर स्रुव केँ अग्र सँ मूलपर्यन्त सम्मार्जन कय (झारि) तथा प्रणीताक जल सँ सिक्त कय, पुनः तीनि बेरि तप्तकय, अपना सँ दक्षिणभाग मे कुशपर राखि दी। तदुत्तर अग्नि पर सँ घृतपात्र केँ प्रदक्षिणक्रमे उतारि, आगाँ मे राखि प्रोक्षणीक जलवत् (पैताक हाथें) तीनि बेरि मस्तक पर घृत केँ प्रक्षेप करी। तदुत्तर घृत मे यदि अपद्रव्य (अविहित वस्तु) हो तँ ओकरा बाहर कय, पुनः प्रोक्षणीपात्रक जल केँ ३ बेरि मस्तक पर प्रक्षेप करी।

ततः उपयनमकुशान् वामहस्ते कृत्वा उत्तिष्ठन् प्रजापतिं मनसा ध्यात्वा तूष्णींम् अग्नौ घृताक्ताः समिधः तिस्रः प्रक्षिपेत्। ततः उपविश्य सपवित्र-प्रोक्षणी उदकेन प्रदक्षिणक्रमेण अग्निं पर्युक्ष्य प्रणीतापात्रे पवित्रे निधाय कुशेन ब्रह्मणान्वारब्धः पातितदक्षिणजानुः*४ समिद्धतमे अग्नौ स्रवेणाज्याहुतार्जुहुपात्। तत्र आधारादारभ्य १२ आहुतिषु तत्तदाहुत्यनन्तरं स्रु वावस्थित-हुतशेषघृतस्य प्रोक्षणीपात्रे प्रक्षेपः –

तदुत्तर उपयमनकुश (वीरनी) केँ बामहाथ मे लय प्रजापतिक मानसिक ध्यान करैत, उठल सन भेल तीनि टा समित्*५ केँ घृत मे भिजाय, चुपचाप अग्नि मे दी। तदुत्तर पुनः बैसि, पैताक हाथें प्रोक्षणीपात्रक जल सँ प्रदक्षिणक्रमे अग्नि केँ सिक्त कय, प्रणीतापात्र मे पैता केँ राखि, दहिन जांघ केँ खसाय, अपना सँ ब्रह्मापर्यन्त कुशक द्वारा सम्बन्ध कय प्रज्वलित*६ अग्नि मे स्रुवक हाथें घृत सँ अगिला १२ मन्त्र सँ हवन*७ करी। तथा प्रति हवनक अन्त मे स्रुवक अवशिष्ट घृत केँ प्रोक्षणीपात्र मे प्रक्षेप करी –

ॐ प्रजापतये स्वाहा, इदं प्रजापतये॥१॥
इति मनसा। (ई मंत्र मनहिमन पढ़ि केँ हवन करी)

ॐ इन्द्राय स्वाहा, इदमिन्द्राय॥२॥
इत्याधारौ। (ई दुहू आधार नामक हवन थिक)

ॐ अग्नये स्वाहा, इदमग्नये॥३॥
ॐ सोमाय स्वाहा, इदं सोमाय॥४॥
इत्याज्यभागौ। (ई दुहू ३ आ ४ आज्यभागनामक हवन थिक)

ॐ भूः स्वाहा, इदं भूः॥५॥
ॐ भुवः स्वाहा, इदं भुवः॥६॥
ॐ स्वः स्वाहा, इदं स्वः॥७॥
एताः महाव्याहृतयः। (ई तीनू महाव्याहृति नामक हवन थिक)

ॐ त्वन्नोऽअग्ने वरुणस्य विद्वान् देवस्य हेडोऽअवयासिसीष्ठाः। यजिष्ठे वह्नितमः शोशुचानो विश्वाद्वेषांसि प्रमुमुग्ध्यस्मत् स्वाहा, इदमग्नीवरुणाभ्याम्॥८॥

ॐ सत्त्वन्नोऽअग्नेऽअवमो भवो तीने दिष्टोऽअस्या उषसो व्युष्ठौ। अवयक्ष्व नो वरुणंरराणो ब्रीहि मृडीकंसुहवो नऽएधि स्वाहा, इदमग्नीवरुणाभ्याम्॥९॥

ॐ आयश्चाग्नेऽस्य नभि शस्तिपाश्च सत्यमित्त्व मयाऽअसि। अयानो यज्ञंवहास्ययानो धेहि भेषजं स्वाहा, इदमग्नये॥१०॥

ॐ ये ते शतँव्वरुण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः। तेभिर्न्नोऽअद्य सवितोऽत विष्णुर्व्विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वर्क्काः स्वाहा, इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो मरुद्भ्यः स्वर्क्केभ्यः॥११॥

ॐ उदुत्तमँव्वरुण पाशमस्मदवाधमं विमध्यमं श्रथाय। अथावयमादित्यव्रते तवानागसोऽअदित्ये स्याम स्वाहा, इदं वरुणाय॥१२॥

एताः सर्वप्रायश्चित्तसंज्ञकाः। (ई पाँचो ८ सँ १२ सर्वप्रायश्चित नामक हवन थिक)

हवनक आगू भाग क्रमशः…..

*१. पूर्णपात्रक विचार ‘विवाह-समीक्षा’ मे देखू।

*२. कात्यायनः – ‘अनन्तर्गभिणं साग्रं कौशं द्विदलमेव

बाकी बाद मे…..

क्रमशः – मैथिली जिन्दाबाद पर प्रकाशनार्थ आगूक भाग क्रमिक रूप सँ पोस्ट करब। धन्यवाद!!

हरिः हरः!!