वसंत मे बुझना जाइत अछि जेना स्वर्णिम आभा छिटैल हुए

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लेख

प्रेषित : नीलम झा ‘निवेधा’

#लेखनीक_धार
विषय:- “वसंत ऋतुमे प्रकृति अपन सुन्नरताक चहुंदिस पसारैत अछि”।

जखन सूर्यदेव उत्तरायण होइत छथि तऽ धीरे-धीरे जाड़ कम होमय लगैत अछि आ आगमन होइत अछि ऋतुराज वसंतक। जीवकेँ प्रकृति सँ संबंध बड्ड मधुर रहैत छैक। ताहुमे गूज-गूज अन्हरिया सन लगैत रहैत अछि जाड़क दिन आ कपकपाइत सन राति।धरा सतति ठिठुरैत रहैत छैथ ओ कुहेस सँ डुबल जाड़क शिशिर ऋतुमे। वसंतऋतु जखने धरा पर अपन पग रखैत छैथ त’ पाबस मास सोहनगर सन छटा नेने धूम मचौने वसंतीक बयार संग अबैत अछि ई मधुमास।
वसंत ऋतुक पैर  भू पर परितंहि वसुंधरा हर्षित भ’ जाइत छैथ। धरतीक कण-कणमे हर्षोल्लास पसरि जाइत अछि। पवन वसंती पिहू-पिहू रटैत झूमी-झूमी कए अबैत छैथ आ हिंडोला हिलबैत छैथ। ई दृश्य देखी जिनक पहु परदेश रहैत छथिन ओ विरहिनी सन अपन साजनक अनुपस्थितिमे विरह खन-खन सतबैत रहैत छैन से अनुभव करबैत रहैत छथिन।
एहिमे वसंत पंचमी के होइत अछि माँ ज्ञानदायिनी  सरस्वतीक पूजा। श्री पंचमी दिन दुनिया भरिमे माँ शारदेके पूजा खूम धूमधाम सँ मनाओल जाइत अछि।
भू देवी त’ नव कनियाँ सन सजल लगैत रहैत छथिन एहि वसंती बयारमे । नव तरू ,पल्लव सँ पल्लवित रहैत अछि लता वृक्ष। कोंढ़ी सभ कुसुमित होमए लगैत अछि। धरतीक कोणे-कोणमे हरियर-हरियर रंग शोभित भ’ जाइत अछि। तीसी भकारार सन फूलिकए लगैत अछि। सरिसोंके फूल सँ पीत वसन सन धराक कण-कण सुसज्जित रहैत अछि। एहि बीच रंग -रंगके दलिहन फसल सभ पाकिकए तैयार होइत अछि। कोयली आमक डारीपर कुहू-कुहू करैत अछि साँझ आ भोरमे। मौहकें फूल सँ घर आँगन मह-मह करैत रहैत अछि। एहि बीच होरी सेहो अबैत अछि फाल्गुन पूर्णिमा कए। ओहिमे रंग -विरंगक पकवान सभ बनैत अछि। रंग-गुलाल उड़ैत अछि। सभ जोगिरा गबैत अछि। आमक मज्जरक समूचा सुगंधित बास रहैत अछि सभतरि। माघ महीना सँ वैसाख तक रहैत अछि वसंत ऋतु। एहि बीच बहुतो शुभ कार्य सेहो होइत अछि आ बड्ड सोहनगर सेहो लगैत अछि ई शुभ कार्य सभ। फाल्गुनक शुभ कार्यमे लोक होरी गबैत छैथ। चैत्र महीनामे सेहो उपनायन होइत अछि। चैतमे चैतावर गबैत अछि लोक।रामनवमी, चैती दुर्गा आ चैती छैठ सेहो चैतमे होइत अछि। चैतक अंतमे जुइरशीतल। वैसाखक कार्यमे लोक चौमासा, छ:मासा, बरमासा गबैत छैथ जे कि अति रमणीय मनमोहक लगैत रहैत अछि।
मिलाजुला कए ई पाबस मधुमास सचमे ऋतुराज कहेबाक योग्य रहैत अछि। “वसंत ऋतुमे प्रकृति अपन सौंदर्य केर छटा चहुंओर स्वर्णिम आभा छिटैत सुन्नरता के पसारैत अछि”।