वाजसनेयिनाम्-एकोद्दिष्टपद्धतिः (मिथिला मे प्रचलित बरखीक पद्धति)

अथ वाजसनेयिनाम् एकोद्दिष्टपद्धतिः

‘इन्दुमती’ मैथिली-भाषाटीकाटिप्पणीभ्यां विभूषिता

पृष्ठ १ – वाजसनेयिनाम्-एकोद्दिष्टपद्धतिः

एकोद्दिष्टक सामग्री

अच्छिञ्जल, गङ्गाजल, गङ्गौट, पिड़ी बनेबाक हेतु बालु, रक्षोघ्नदीप, उत्सर्गदीप, कुश, तिल, जौ, धूप, अक्षत, सालिग्राम, तेकुशा – ६, मोड़ा – ६, औंठी – १, वीरनी – १, छिन्नमूल कुश – १, सपवित्र कुश – १, पैता – २, पूड़ा – ९ (कटहर या पलाश)

उपकरण सामग्री

केराक भालरि, अँकुरी (केराव या मूङ्ग), चाउर ५ ग्राम, पान, सुपारी, मखान, चानन, फूल (श्वेत या पीत), फलादि, वस्त्र, यज्ञोपवीत – २, स्त्रीक हेतु – सिन्दूर, चूड़ी आ ककवा

अन्नोत्सर्गक सामग्री

पायस वा भात, कुमारकर्तृक मे – असिद्धान्न वा मालपूआ या फल (केरा)। तरकारी (ओल, केरा, बरी), गाईक दूध, दही, घृत, मधु, सूत (टकुड़ीक), पान, सुपारी, फल, फूल (श्वेत या पीत), चानन, धूप-दीप, अङ्गार (आगि), कर्म-दक्षिणा

अथ कर्मारम्भः

श्राद्धसँ पूर्वदिनमे (१) नियमसँ रहि एकोद्दिष्ट श्राद्धदिन प्रातःकाल स्नानोत्तर द्वितीय वस्त्र (२) लय पंचदेवताक पूजन कय पञ्चगव्यादिसँ (३) श्राद्धदेशकेँ परिशुद्ध कय पितरक आसनसँ वामभागमे श्राद्धक वस्तु सभ राखि सपिण्ड (४) स्त्री द्वारा, वा अपनहि पाक सम्पादन करी, तदुत्तर हाथ (५) पैरधोय आचमन कय शुद्धकम्बलादि आसनपर बैसि (६) दीप बारि यदि पाचक पाक कयने होथि तँ हुनका ‘सिद्धम्’ ई पूछि दच्छिन ढार (७) बालुक पीड़ी बनाय, तेकुशा, तिल, जल लय पूवमुँह भय –

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वाऽवस्थाङ्गतोऽपि वा। यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः। ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु।

एहि मन्त्रें श्राद्धीय अन्न, आसन, उपकरण तथा अपन शरीर केँ जल सँ सिक्त कय ओहि कुशकेँ पूव भाग मे त्यागि दोसर तेकुशा, तिल, जल लय –

ॐ अद्यामुके मास्यमुके पक्षे अमुकतिथौ अमुकगोत्रस्य पितुः अमुकशर्मर्णः सांवत्सरिकैकोद्दिष्टश्राद्धमहङ्करिष्ये। (८)

(संख्या संकेत केर तात्पर्यः

१. पूर्व दिनमे मुण्डन, एकबेरि हविष्यान्न भोजन ओ ब्रह्मचर्यसँ रहब आवश्यक थिक।

२. वस्त्र उज्जर वा पीयर धारण कय संध्या, तर्पण तथा पञ्चदेवतापूजोत्तरे कर्मारम्भ करी।

३. आदिपदें प्रज्वलित अग्नि तथा चिक्कनि माटीक ग्रहण थिक।

४. ‘सपिण्ड’ पदें स्त्री-पुरुष दुनूक ग्रहण होइछ। ताँय सपिण्ड स्त्री हो या पुरुष, दुनू पाक करबाक अधिकारी होइ छथि।

५. पितरक कर्म मे सर्वत्र पादप्रक्षालन दक्षिण मुहें करी। ई बात तरंगिणी मे लिखल अछि।

६. एकोद्दिष्ट कर्म दक्षिणमुहें तथा वामा जांघ केँ आसन सँ किछु बाहर भूमि मे सटा केँ करी। तथाहि – भूमौ कृत्वा तथा जानु सव्यं पितृपरायणे’ इति श्राद्धपारिजातः।

७. चारि आङ्गुर ऊँच तथा एक हाथ नंबा-चौड़ा बहुत सुन्दर बालुक पीड़ी बनावी। तथाहि श्राद्ध-चिन्तामणिः – हस्तमात्रा तथा भूमिः चतुरंगुलमुच्छ्रिता पिण्डनिर्वापणार्थाय रमणीया विशेषतः॥

८. मायक एकोद्दिष्ट मे अमुकगोत्रायाः मातुः अमुकदेव्याः कर्तापुत्रनामकर्तृकमे अमुकगोत्रस्य मत्पुत्रत्वकरस्य इत्यादि विशेष ऊह करैक चाही।)

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पृष्ठ – २ – वाजसनेयिनाम्-एकोद्दिष्टपद्धतिः

एहि तरहें सङ्कल्प करी। तदुत्तर तीनि बेरि गायत्रीक जप कय –

ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः॥

ई तीन बेरि पढ़ी। तदनन्तर दक्षिणमुंह बैसि अपसभ्य भय वाम जांघ खसाय मोड़ा, तिल, जल लय पूर्वहिसँ राखल तिल, जलसँ सिक्त कयल मोड़ा रूप आसनकेँ –

ॐ अद्य (९) अमुकगोत्र पितः अमुकशर्मन्निदमासनन्ते स्वधा।

एहि मंत्रे पितरक आसनकेँ पितृतीर्थसँ उत्सर्ग करी। तदुत्तर – दोसर मोड़ा, तिल, जल लय –

ॐ अपहता असुरा रक्षाऽँसि वेदिषदः।

एहि मन्त्रें भोजनपात्रमे तिल छीड़ियाबी। तदुत्तर –

ॐ आयन्तु नः पितरः सोम्यासोऽग्निष्वाताः पथिभिर्द्देवयानैः। अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तोऽधिब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान्।

एहि मंत्र सँ पितरक आवाहन (१०) कय एकपूड़ामे दक्षिण मुहें पैताकेँ राखि –

ॐ शन्नो देवीरभीष्टय आपो भवन्तु पीतये। शँय्योरभिस्रवन्तु नः।

एहि मन्त्रें पितृतीर्थसँ (११) पूड़ामे जल दी। तदुत्तर तिल लय –

ॐ तिलोऽसि सोमदेवत्यो गोसवो देवनिर्मितः। प्रत्नमद्भिः पृक्तः स्वधया पितृन् लोकान् प्रीणाहि नः स्वधा।

एहि मन्त्रें तिल दय चानन, फूल विनामन्त्रहि दय अर्घपात्रकेँ वामहाथमे राखि (१२) पैताकेँ भोजनपात्रमे उत्तरमुहें राखि दोसर जलसँ पूड़ा ओ पैताकेँ सिक्तकय दहिनेहाथें पूड़ाकेँ झांपि –

ॐ या दिव्या आपः पयसा सम्बभूवुर्या आन्तरिक्षा उत पार्थिवीर्याः। हिरण्यवर्णा यज्ञियास्ता न आपः शिवाः सऽँ स्योनाः (१३) सुहवा भवन्तु।

ई मन्त्र पढ़ि दहिनहाथें मोड़ा, तिल, जल लय –

ॐ अद्यामुकगोत्र पितः अमुकशर्मन् एष तेऽर्घः स्वधा।

(संख्या-संकेत केर तात्पर्यः

९. मायक श्राद्धमे अमुकगोत्रे मातः अमुकदेवि। एवं कर्तापुत्रनामकर्तृक श्राद्धमे अमुक गोत्र मत्पुत्रत्वकर अमुकशर्मन् इत्यादि’। एहि तरहें अग्रिमी उत्सर्गवाक्य सभमे बुझक चाही।

१०. एकोद्दिष्ट मे कात्यायन पितरक आवाहन केँ निषेध कयने छथि, किन्तु ‘आयन्तु नः’ ई मूलोक्त आवाहन मंत्र नहि थिक ई ‘कातीयकल्प’ मे स्पष्ट अछि। ‘बहुवचनान्त’ पाठ आदरार्थ थीक। गोभिलगृह्यानुसारी ‘छन्दोग एकोद्दिष्ट’ मे ‘आयन्तु नः’ ई मंत्र नहि अछि।

११. औंठा आ’ तर्जनी आङुरक मध्यपितृतीर्थ कहबैछ।

१२. प्रादेश प्रमाण एक पातक पैता प्रचलित अछि। छन्दोगीक लेल २ पातक पैता छन्दोगपरिशिष्ट मे कहल गेल अछि। तथाहि – ‘अनन्तर-गर्भिणं साग्रं कौशं द्विदलमेव च। प्रादेशमात्रं विज्ञेयं पवित्रं यत्र कुत्रचित्॥’

१३. ‘स्योनाः’ मे श्राद्धविवेकादिकमतें दन्त्य सकार, आ’ कातीयश्राद्ध-सूत्र मे तालव्य शकारे पाठ अछि।)

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पृष्ठ ३ – वाजसनेयिनाम्-एकोद्दिष्टपद्धतिः

एहि मंत्रें अर्घकेँ उत्सर्ग कय तेकुशा (१४) हाथें पैता पर किछु जलकेँ खसाय पैताकेँ पूड़ामे राखि पितरक आसनसँ वामभागमे –

ॐ पित्रे स्थानमसि।

ई पढ़ि पूड़ाकेँ औन्हि दी। ओहि अर्घपात्रकेँ दक्षिणादान (१५) पर्यन्त नहि छूबाक चाही। तत्पश्चात् मोड़ा, तिल, जल लय गन्धादि उत्सर्ग करी –

ॐ अद्यामुकगोत्र पितः अमुकशर्मन्नेतानि गन्ध-पुष्प-धूप-दीप (१६) यज्ञोपवीत (१७) वासांसि ते स्वधा।

तदुत्तर पितरक भोजनपात्रमे जलसँ चतुष्कोण मण्डल कय एकपूड़ामे पहिलुक (तरकारीसहित) अन्न राखि ओहिमे तिल, घृत, मधु दय मोड़ा, तिल, जल लय –

ॐ इदमन्नमेतद् भूस्वामिपितृभ्यो नमः।

एहि मन्त्रें अपनासँ वामभागमे भूस्वामीकेँ अन्न उत्सर्ग करी। तदनन्तर सिद्ध ओ गरम अन्नकेँ अन्नपात्रसँ दुहू हाथें ग्रहण कय भास्वरमूर्ति पितरक ध्यान करैत भोजनपात्रमे पितृतीर्थसँ पुरुषक पेट भरक योग्य अन्न परसि जलक (१८) हाथें अन्नकेँ सरिआबी जाहिसँ अन्न छीटल नहि रहे। तदुत्तर अन्नपर तरकारी, दूध-दही घृत, तिल, मधु दय एक पूड़ामे तिल, घृत, जलभरि पीड़ीपर राखि भोजनपात्रक, अन्नमे अधोमुख दहिनहाथ लगाय –

ॐ मधु वाता ऋतायते मधुं क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः। मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः। मधु द्यौरस्तु नः पिता। मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमान् अस्तु सूर्यः माध्वीर्गावो भवन्तु नः। ॐ मधु मधु मधु।

ई मन्त्र पढ़ि अधोमुख वामहाथकेँ दहिनहाथक नीचाँ राखि दुहू हाथें अन्न स्पर्श कय –

ॐ पृथिवी ते पात्रं द्यौरपिधानं ब्राह्मणस्य मुखे अमृते अमृतं जुहोमि स्वाहा। ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्। समूढमस्य पां सुरे॥ ॐ कृष्णकव्यमिदं रक्ष मदीयम्।

ई पढ़ि वामहाथ सटे नहि दहिनहाथक औंठासँ ‘ॐ इदमन्नम्’ एहिसं अन्नमे औंठा लगाय ‘ॐ इमा आपः’ एहिसँ पूड़ाक जलमे औंठाकेँ लगाय ‘ॐ इदमाज्यम्’ एहि सँ घृतमिलल पूड़ाक जल केँ स्पर्श कय लगाय ‘ॐ इदं हविः’ एहिसँ पुनः भोजनपात्रक अन्नमे औंठा लगाय वामहाथकेँ पात्रमे पूर्ववत् सटे नहि दहिन हाथें तिल लय –

(संख्या-संकेतक तात्पर्यः

१४. उत्सर्ग मोड़ासँ और सभकार्य तेकुशाक हाथें करी।

१५. कर्मान्तपर्यन्त एहि पूड़ा केँ नहि छूबी। तथाहि गृह्यसूत्रे –

नोद्धरेत प्रथमं पात्रं पितृणामर्घपातितम्। आवृतास्तत्र तिष्ठन्ति पितरः शौनकोऽब्रवीत्॥

उद्धरेद् यदि तत् पात्रं विवृतं च यदा भवेत्। तदाऽऽसुरं भवेच्छ्राद्धं कुद्धैः पितृगणैर्गतैः॥

१६. दीप मे घृत तथा तिलक तेल प्रस्तस्त, अभाव मे सरिसवक तेल।

१७. स्त्रीक श्राद्धमे ‘सिन्दूराच्छादनानि’ योजना करयक चाही।

१८. तीर्थादि मे भूस्वामीकेँ अन्नोत्सर्ग करब अनावश्यक (अविहित) यतः –

अटव्यः पर्वताः पूण्या नद्यस्तीर्थानि यानि च। सर्वाण्यस्वामिकान्याहुर्नहि तेषु परिग्रहः॥ गृ. सं.)

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पृष्ठ ४ः वाजसनेयिनाम्-एकोद्दिष्टपद्धतिः

ॐ अपहता असुरा रक्षांसि वेदिषदः।

ई मंत्र पढ़ि भोजनपात्रपर तिलकेँ छिड़ियाय, वाम हाथकेँ पूर्ववत् अन्न पात्र मे सटे नहि दहिन हाथें मोड़ा, तिल, जल लय –

ॐ अद्यामुकगोत्र पितः अमुकशर्मन्निदनमन्नं सोपकरणन्ते स्वधा।

एहि मंत्रे अन्न उत्सर्गकय वामों हाथ उठाय गायत्रीक तीन बेर जपकय हाथ जोड़ि –

ॐ मधु वाता ऋतायते मधुं क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः। मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः। मधु द्यौरस्तु नः पिता। मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमान् अस्तु सूर्यः माध्वीर्गावो भवन्तु नः। ॐ मधु मधु मधु।

ॐ अन्नहीनं (१९) क्रियाहीनं विधिहीनं च यद् भवेत् तत्सर्वमच्छिद्रमस्तु।

तदुत्तर गायत्री पढ़ैत कुशपर (२०) बैसि पुनः –

ॐ मधु वाता ऋतायते मधुं क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः। मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः। मधु द्यौरस्तु नः पिता। मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमान् अस्तु सूर्यः माध्वीर्गावो भवन्तु नः। ॐ मधु मधु मधु।

संगहि –

ॐ कृणुष्व पाजः प्रसितिं न पृथ्वीं याहि राजेवामवाँ इभेन।
तृष्वीमनु प्रसितिं द्रुणानो अस्ताऽसि विध्य रक्षसस्तपिष्ठैः॥
तव भ्रमास आशुया पतन्त्यनु स्पृश धृषता शोशुचानः।
तपुँष्यग्ने जुह्वा पतङ्गान् असन्दितो वि सृज विष्वगुल्काः॥
प्रति स्पशो वि सृज तूर्णितमो भवा पायुर्विशो अस्या अदब्धः।
यो नो दूरे अघशँसो यो अन्त्यग्ने माकिष्टे व्यथिरा दधर्षीत्॥
उदग्ने तिष्ठ प्रत्याऽऽ तनुष्व न्यमित्राँ ओषतात् तिग्महेते।
यो नो अरातिँ ममिधान चक्रे नीचा तं धक्ष्यतसं न शुष्कम्॥
ऊर्ध्वा भव प्रति विध्याध्यस्मत् आविष्कृणुष्व दैव्यान्यग्ने।
अव स्थिरा तनुहि पातुजुनां जामिमजामिं प्र मृणीहि शत्रुन्॥

ई पढ़ि पीड़ीपर तिल छिड़ियाय –

ॐ उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमा: पितर: सोम्यास:।
असुं य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोsवन्तु पितरो हवेषु ॥
अंगिरसो न: पितरो नवग्वा अथर्वाणो भृगव: सोम्यास:।
तेषां वयँ सुमतौ यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम ॥
ये न: पूर्वे पितर: सोम्यासोsनूहिरे सोमपीथं वसिष्ठा:।
तोभिर्यम: सँ रराणो हवीँ ष्युशन्नुशद्भि: प्रतिकाममत्तु ॥*
त्वँ सोम प्र चिकितो मनीषा त्वँ रजिष्ठमनु नेषि पन्थाम् ।
तव प्रणीती पितरो न इन्दो देवेषु रत्नमभजन्त धीरा: ॥
त्वया हि न: पितर: सोम पूर्वे कर्माणि चकु: पवमान धीरा:।
वन्वन्नवात: परिधी१ँ रपोर्णु वीरेभिरश्वैर्मघवा भवा न: ॥
त्वँ सोम पितृभि: संविदानोsनु द्यावापृथिवी आ ततन्थ।
तस्मै त इन्दो हविषा विधेम वयँ स्याम पतयो रयीणाम॥
बर्हिषद: पितर ऊत्यर्वागिमा वो हव्या चकृमा जुषध्वम्।
त आ गतावसा शन्तमेनाथा न: शं योररपो दधात॥
आsहं पितृन्सुविदत्रा२ँ अवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णो:।
बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पितृवस्त इहागमिष्ठा:॥
उपहूता: पितर: सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिषु प्रियेषु।
त आ गमन्तु त इह श्रुवन्त्वधि ब्रुवन्तु तेsवन्त्वस्मान्॥
आ यन्तु न: पितर: सोम्यासोsग्निष्वात्ता: पथिभिर्देवयानै:।
अस्मिनन् यज्ञे स्वधया मदन्तोsधि ब्रुवन्तु तेsवन्त्वस्मान्॥
अग्निष्वात्ता: पितर एह गच्छत सद: सद: सदत सुप्रणीतय:।
अत्ता हवीँ षि प्रयतानि बर्हिष्यथा रयिँ सर्ववीरं दधातन ॥
ये अग्निष्वात्ता ये अनग्निष्वात्ता मध्ये दिव: स्वधया मादयन्ते ।
तेभ्य: स्वराडसुनीतिमेतां यथावशं तन्वं कल्पयाति ॥
अग्निष्वात्तानृतुमतो हवामहे नाराशँ से सोमपीथं य आशु:।
ते नो विप्रास: सुहवा भवन्तु वयँ स्याम पतयो रयीणाम् ॥

*पोथी मे एतहि धरिक पाठ कहल गेल अछि। पुनः सहस्रशीर्षा…. पुरुषसुक्तक पाठ –

(संख्या-संकेत केर तात्पर्यः

१९. पितृभक्ति आदि ग्रंथक मत छैन्ह जे अन्नोत्सर्गक बाद पहिने ‘ॐ अन्नहीनम्’ मंत्रपाठोत्तर ‘गायत्री’ तथा मधुवाता मंत्रक पाठ हो। आ’ ‘सुगतिसोपान’ ग्रंथक मत छैन्ह जे ‘गायत्री ओ मधुवाता’ मंत्रजपोत्तर ‘अन्नहीनं’ मंत्र पाठ हो। ततय श्राद्धविवेक ग्रंथ मे कहल गेल अछि जे प्रेतश्राद्ध मे ‘सुगतिसोपानानुसारें आ अन्यत्र पितृभक्तिग्रन्थानुसारे पाठ हो। मूलोक्त पाठ ठीक अछि।

२०. संकल्पवला कुश पर बैसव व्यवहार अछि।)

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पृष्ठ ५ः वाजसनेयिनाम्-एकोद्दिष्टपद्धतिः

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिँसर्वतः स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङगुलम्॥
पुरुषऽएवेदँ सर्वं यद् भूतं यच्च भाव्यम्।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥२॥
एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पुरुषः।
पादोઽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि॥३॥
त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः।
ततो विष्वङ व्यक्रामत्साशनानशनऽअभि॥४॥
ततो विराडजायत विराजोऽअधि पूरुषः।
स जातोऽअत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिमथो पुरः॥५॥
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम्।
पशूँस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये॥६॥
तस्माद्यज्ञात् सर्वहुतऽऋचः सामानि जज्ञिरे।
छन्दाँसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ॥७॥
तस्मादश्वाऽअजायन्त ये के चोभयादतः।
गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाताऽअजावयः॥८॥
तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः।
तेन देवाऽअयजन्त साध्याऽऋषयश्च ये॥९॥
यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्।
मुखं किमस्यासीत् किं बाहू किमूरू पादाऽउच्येते ॥१०॥
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद् भ्याँ शूद्रोऽअजायत ॥११॥
चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत।
श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादिग्निरजायत ॥१२॥
यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत।
वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्मऽइध्मः शरद्धविः॥१४॥
सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः।
देवा यद्यज्ञं तन्वानाऽअबध्नन् पुरुषं पशुम् ॥१५॥
यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥१६॥

ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः!!!

(पुरुषसूक्तक सेहो मात्र एक पंक्ति उद्धृत कयल गेल अछि पोथी मे, पूर्ण पाठ लेल पूरा रूप राखि रहल छी।)

आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम् ।
संक्रन्दनोऽनिमिष एकवीरः शतं सेना अजयत्साकमिन्द्रः ॥१॥
ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च।
ॐ नमस्तुभ्यं विरूपाक्ष नमस्तेऽनेकचक्षुषे। नमः पिनाकहस्ताय वज्रहस्ताय वै नमः।
ॐ सप्तव्याधा दशार्णषु मृगाः कालञ्जरे गिरौ। चक्रवाकाः सरद्वीपे हंसाः सरसि मानसे। तेऽपि जाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगाः। प्रस्थिता दूरमध्वानं यूयन्तेभ्योऽवसीदथ।
ॐ रुची रुची रुचिः।

तदुत्तर पिड़ीक पश्चिमभागमे एक तेकुशा राखि जलसँ सिक्त कय एक पूड़ामे तिल, घृत, मधुयुक्त अन्न राखि ओहिमे जल मिलाय मोड़ासँ –

ॐ अनग्निदग्धा ये जीवा ये प्रदग्धाः कुले मम। भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु तृप्ता यान्तु पराङ्गतिम्।

ई मन्त्र पढैत कुशपर अन्न खसाबी। तदुत्तर पूब मुंहें सव्यभय आचमन कय हरिस्मरण करी –

ॐ विष्णुर्विष्णुर्हरिर्हरिः।

तदुत्तर पुनः दक्षिण अपसव्य (२१) भय गायत्री ३ बेरि पढ़ि पुनः मधुव्वाता पाठ करी –

ॐ मधु वाता ऋतायते मधुं क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः। मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः। मधु द्यौरस्तु नः पिता। मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमान् अस्तु सूर्यः माध्वीर्गावो भवन्तु नः। ॐ मधु मधु मधु।

तदुत्तर पीड़ी परहक पूड़ा आदि हटाय पीड़ीकेँ सरियाय जलसँ सिक्त कय –

ॐ अपहृता असुरा रक्षाँसि वेदिषदः।

एहि मंत्रें दर्भपिञ्जलि (२२) कुशसँ पीड़ीक मध्यमे दक्षिण मुहें प्रादेश प्रमाण रेखा करी तथा ओहि कुश केँ ईशान कोन मे फेकि दी। तदुत्तर आगिक अङ्गोराकेँ रेखापर राखि –

(संख्या-संकेत केर तात्पर्यः

२१. बहुतो ग्रन्थ मे – ‘सव्येन गायत्रीं जपित्वा’ ई पाठ अछि, परन्तु ‘द्वैतपरिशिष्ट’ मे ‘अपसव्येन’ लिखल अछि। तात्पर्य ई जे ‘दक्षिणाभिमुख अपसव्येन’ ई गायत्री मंत्र पितर केँ सुनाओल जाइछ। एहिठाम समय रहे तँ आनो वेद-पुराणादि पितर केँ सुनाबी। ई बात गृह्यसूत्रादि मे कहल गेल अछि।

२२. दर्भपिञ्जलिः – दहिन हाथक औंठा ओ तर्जनी आङुर सँ तेकुशाक जड़ि भाग तथा वाम हाथक औंठा ओ तर्जनी आङुर सँ तेकुशाक छीप भाग धैल तेकुशा ‘दर्भपिञ्जली’ कहबैछ। – देखू श्राद्धचिन्तामणि)

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पृष्ठ ६ः वाजसनेयिनाम्-एकोद्दिष्टपद्धतिः

ॐ ये रूपाणि प्रतिमुञ्चाना असुराः सन्तः स्वधया चरन्ति परापुरो निपुरो ये भरन्त्यग्निष्ठाँल्लोकात् प्रणुदात्यस्मात्।

ई मंत्र पढ़ि रेखापर आगीक अङ्गोराकेँ घुमाय दक्षिण दिशामे फेकि दी।

तदुत्तर ओहि रेखापर छिन्नमूल कुश राखि जलसँ सिक्त कय पूब मुहें सव्य भय –

ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः॥

ई मंत्र तीन बेरि पढ़ि पुनः दक्षिण मुहें अपसव्य भय एक पूड़ामे जल, तिल, फूल दय पूड़ाकेँ बाम हाथमे राखि दहिनहाथें मोड़ा, तिल, जल लय –

ॐ अमुकगोत्रः पितः अमुकशर्मन्नत्रावनेनिक्ष्व ते स्वधा।

ई पढ़ि पूड़ाक जल केँ उत्सर्गि कुशक हाथें छिन्नमूल कुश पर थोड़ेक जल पूड़ासँ खसाय किछु (शेष) जल पूड़ा मे राखि पूड़ाकेँ पीड़ीपर राखि दी। तखन तिल (२३) घृत, मधु, तरकारी सहित अन्नक बेलक प्रमाण पिण्ड बनाय पुनः ओहिपर मधु, घृत, दय दहिन हाथसँ उठाय वामहाथमे राखि दहिन हाथें मोड़ा, तिल, जल लय –

ॐ अमुकगोत्र पितः अमुकशर्मन्नेष ते पिण्डः स्वधा॥

एहि वाक्यें छिन्न मूल कुशपर पिण्ड राखि छिन्नमूल कुशक जड़ि मे दुहू हाथ पोछि पूब मुहें सव्य भय दुइ बेरि आचमन तथा हरिस्मरण कय पुनः दक्षिण मुहें अपसव्य भय –

ॐ अत्र पितर्मादयस्व यथाभागमावृषायस्व॥

ई मंत्र पढ़ि वामभाग सँ उत्तर मुँहें मुँह घुमाय श्वास धारण कय –

ॐ अमिमदत् पिता यथाभाग मा वृषायिष्ट॥

ई पढ़ैत पश्चिम मुँहें श्वास त्यागि दी। तदुत्तर अवजेनावशिष्ट जल सहित पीड़ी पर राखल पूड़ाकेँ वामहाथमे राखि दहिन हाथें मोड़ा, तिल, जल लय –

ॐ अमुकगोत्र पितः अमुकशर्मन्नत्र प्रत्यवने निक्ष्व ते स्वधा॥

एहि वाक्यें पिण्डपर पूड़ाक प्रत्यवनेजन जल दी। तदुत्तर –

हड़िराकेँ नीचाँ ससारि (नींवी (२४) विस्रंस्य) पूब मुहें सव्यभय हाथ धोय हरिस्मरण कय पुनः दक्षिण मुहें अपसव्यभय वामहाथें टकुड़ीक सूतकेँ उठाय दहिन हाथें धय –

ॐ नमस्ते पिता रसाय, नमस्ते पितः शोषाय, नमस्ते पितर्जीवाय, नमस्ते पितः स्वधायै, नमस्ते पितर्घोराय, नमस्ते पितर्मन्यवे, नमस्ते पितः पितर्नमस्ते, गृहान्नः पितर्देहि, सतस्ते पितर्देष्म। ॐ एतत्ते पितर्वासः।

एहि मंत्रें पिण्डपर सूत दय मोड़ा, तिल, जल लय –

ॐ अमुकगोत्र पितः अमुकशर्मन्नेतद् वासः ते स्वधा॥

इहि मंत्रें सूतकेँ उत्सर्गकय बिना मंत्रहि चानन, फूल, धूप, दीप, पान सुपारी सभसँ पिण्डपूजन कय पिण्डक अवशिष्ट (भृत्यभाग) अन्न केँ पिण्डक चारूकात मे छिड़ियाय –

(संख्या-संकेत केर तात्पर्यः

२३. श्राद्धचिन्तामणिः ‘मध्वाज्य-तिल संयुक्तं सर्वव्यंजनसंयुतम्। उष्णमादाय पिडं तु कृत्वा बिल्वफलोपमम्॥’

२४. ‘नीवीं विस्त्रंस्य’ क अर्थ थिक – डाँण मे बान्हल कुशमुष्टि केँ खोलि दी। ई गो. सूत्र मे कहल अछि।)

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पृष्ठ ७ः वाजसनेयिनाम्-एकोद्दिष्टपद्धतिः

ॐ शिवा आपः सन्तु।

ई पढ़ि भोजनपात्रमे जल दी।

ॐ सौमनस्य मस्तु।

ई पढ़ि फूल दी।

ॐ अक्षतञ्चारिष्टमस्तु।

ई पढ़ि अक्षत दी। तदुत्तर पूड़ामे जल राखि मोड़ा, तिल, जल लय –

ॐ अद्यामुकगोत्रस्य पितुः अमुकशर्मणो दत्तैतदन्नपानादिकमुपतिष्ठताम्।

एहि मंत्रें पिण्डपर जल दी। तदुत्तर पूब मुहें सव्यभय एक पूड़ा जल हाथ मे लय दक्षिण दिश तकैत प्रसन्न मन सँ –

ॐ अघोरः पितास्तु।

ई पढ़ि पिण्डपर पश्चिमसँ पूबमुहें जलक धार दी। तदुत्तर पूबमुहें हाथ जोड़ि –

ॐ गोत्रं नो वर्द्धताम्, दातारो नोऽभिवर्द्धन्तां, वेदाः सन्ततिरेव च। श्रद्धा च नो मा व्यगमद्, बहुदेयञ्च नो अस्तु, अन्नञ्च नो बहु भवेदतिथींश्च लभेमहि॥ याचितारश्च नः सन्तु, मा च याचिष्म कञ्चन। एताः सत्याशिषः सन्तु।

एतावन्मात्र पढ़ि, दक्षिण मुहें अपसव्य भय पैतासहित तेकुशासँ पिण्डपरहक सूत, पान आदि हटा पिण्डपर पैतासहित ३ कुश दक्षिणमुहें राखि एक पूड़ा मे जल राखि उत्तर भागसँ दक्षिणमुहें पिण्डपर जलक धार अधोलिखित मंत्र पढ़ैत दी –

ॐ उर्ज्जं वहन्तीरमृतं घृतं पयः कीलालं परिस्रुतं, स्वध्यास्थ तर्पयत मे पितरम्।

तदुत्तर नम्र भय पिण्डकेँ सूंघि अन्यत्र राखि पिण्डाधार छिन्नमूल केँ आगि मे दय अर्घपात्रकेँ उलटाय अपसव्य भय दक्षिण मोड़ा, तिल, जल लय दक्षिणा करी –

ॐ अद्याऽमुकगोत्रस्य पितुरमुकशर्मणः कृतैतत् सांवत्सरिकैकोद्दिष्ट-श्राद्धप्रतिष्ठार्थम् एतावद् द्रव्यमूल्यकरजतं चन्द्रदैवतं यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणामहन्ददे।

तदुत्तर – सव्य भय पूब मुहें हाथ जोड़ि –

ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः॥

ई तीनि बेरि पढ़ि पुनः अपसव्य भय दीपकेँ मिझाय सव्यभय हाथ पैर धोय आचमन कय –

ॐ प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताऽध्वरेषु यत्। स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्ण स्यादिति श्रुतिः। ॐ विष्णुर्विष्णुर्हरिर्हरिः।

ई पढ़ि श्राद्धक वस्तु ब्राह्मणकेँ दी वा जलमे प्रवाह करी तथा पीड़ीक कोन ढाहि सूर्यकेँ प्रणाम करी।

इति ‘इन्दुमती’ टीकाटिप्पणीसहिता वाजसनेयिनामेकोद्दिष्टपद्धतिः समाप्ता।

हरिः हरः!!

(श्रद्धावान् पुत्र सभक लेल समर्पित, आधा भाग फेर दोसर दिन पूरा करब।)

हरिः हरः!!