लेखनीक धार
“सम्पूर्ण संसार केर वातावरण एखन राममय भेल अछि, कतेक सौभाग्यशाली छी हम सभ जे समय केर साक्षी बनि रहल छी”।
भाग १
अयोध्या नगरी भगवान राम जन्म, बाललीला, तरुण राजकुमार, युवराज आ बादमे राजा प्रसंग श्रीराम सँ जुड़ल अछि।आगु चलि रामक चरित्रगाथा आ हुनक पत्नी सीताक धर्मनिष्ठाक कारणे अयोध्या कालांतरमे तिरथस्थलीक रूप ल’ लेलक आ प्रायः आठ हजार वर्ष सँ आर्यावर्तक पूण्यस्थली बनल अछि।
अयोध्याक राजा दशरथ केँ कोनो पुत्र नहि छलैन। पुत्र प्राप्ति हेतु यज्ञक अनुष्ठान कयलनि। गुरु वशिष्ठ, श्रृंगी ऋषि एवं ताहि समयक अन्य ऋषि-मुनि मिलि अहि यज्ञ केँ सम्पन्न कयलनि। अहि दिव्य आयोजनक सफलताक रूपमे राम, लक्ष्मण, भरत आ शत्रुघ्नक कालक्रमे जन्म भेल। नेनपनहि सँ राममे अलौकिक शक्ति आ आकर्षण देखना जाइत छल। कुल गुरु वशिष्ठ के देखरेख मे चारो भाइ के शिक्षा-दिक्षा भेल। आगु चलि विश्वामित्र ऋषि राजा दशरथ सँ आग्रह कय राम आ लक्ष्मण केँ अस्त्र-शस्त्र विद्याक प्रशिक्षण हेतु व्याघ्रसर( आधुनिक बक्सर) स्थित अपन आश्रम मे ल’ गेलाह ।दण्डकारण्यमे बढ़ैत आसुरी उत्पातक नियंत्रण विश्वामित्रक मुख्य उद्देश्य छलनि। ताहि हेतु ओ अन्य शिष्य सभ संग राम आ लक्ष्मण केँ युद्ध विद्या मे निपुण बनोलनि। आगु चलि राम एत्तहि ताड़का राक्षसीक बध केने छलाह।
आगु चलि दुनु भाइ गुरू विश्वामित्रक संरक्षणमे मिथिलाक राजधानी जनकपुर जाक’ सीता स्वयम्बरमे भाग लेलथि। पहिल बेर एत्तहि अपन अलौकिक शक्तिक परिचय दैत शिवधनुष तोड़लाह।जाहि शिवधनुष केँ उठाब’मे सब उपस्थित राजा असमर्थ भेलाह तकरा अति सहजता सँ श्रीराम उठाक’ प्रत्यंचा चढ़ा देलनि। तत्पश्चात ओत्तहि चारु भाय के जनक पुत्री सीता एवं हुनक अन्य तीन बहिन संग विवाह भेलनि आ ओ सभ खुशी पूर्वक अयोध्या गेलथि। युवराज राम निपुणता सँ राजकाजमे अपन पिताक सहयोग कर’ लगलाह।
तदंतर सतमाय कैकयीक प्रंपच सँ पिताक वचन पूर्ण करबाक हेतु राजगद्दी छोड़ि पत्नी सीता आ छोट भाय लक्ष्मण संग चौदह बरखक बनवास हेतु खुशी-खुशी विदा भ’ गेलाह ।अनुशासनक मर्यादा देखु। कोनो प्रश्न नहि कयलनि, कोनो आपत्ति नहि। अति कठिन जंगलक मार्ग पर बिनु कोनो शंका वा संशयके विदा भ’ गेलाह। एहन अद्भुत पितृभक्ति आ निस्वार्थ त्याग मानव सभ्यताक इतिहासमे अद्वितीय अछि।
आगु चलि जखन आश्रम सँ रावण सीताक अपहरण क’ लैत अछि तँ अहि पुरुष- पुंगवक अद्भुत व्यक्तित्व आ चरित्र परिलक्षित होइत अछि। जाहि कालमे राजा सभमे बहुविवाहक प्रथा छलैक, राम अपन पत्नी सीताक प्रति एकनिष्ठ रहलाह आ ओहि कठिन समयमे मात्र अपन छोट भाय लक्ष्मणक सहयोग सँ ओहि दुर्गम वनमे सीता केँ ताकि लंका पर विजय करैत रावण बध कयलनि आ अपन परम पुरुषार्थक परिचय देलनि।अहि अभियानक दौरान हुनक निस्वार्थ भाव सेहो देखना जाइत अछि। किसकिंधामे बालिके बधक पश्चात ओतुका राज-पाट सुग्रीव केँ सौंपि देलनि आ बालि पुत्र अंगद केँ किसकिंधाक युवराज घोषित कयलनि। तहिना लंका विजयक पश्चात विभिषण केँ ओतुका राजा घोषित कयलनि।
निर्धारित बनवासक अवधि समाप्त भेलाक बादहि ओ अयोध्या वापस भेलाह आ आगु सुचारू रुप सँ राज-पाट चलोलनि जे एखनहुँ रामराज्यक नाम सँ विख्यात अछि। हिनक विषद आध्यात्मिक आ व्यवहारिक ज्ञान परिचय विख्यात पुस्तक “योग वाशिष्ठ” सँ भेटैत अछि जाहिमे कयेको गूढ़ विषय पर हुनक स्पष्ट विचार देखना जाइत अछि।
अहि परमपुरुष केँ अपन जीवन कालमे सभ सँ कठिन निर्णय, राजधर्मक निर्वाह हेतु अपन पत्नी सीताक त्याग करैत निर्वासित करबाक छल। निर्णयक औचित्य एखनहु धरि विवादक विषय बनल अछि। ई मात्र एकटा राजा राज्योचित निर्णय छल वा पारिवारिक मर्यादाक उल्लंघन , तकर निर्णय समाज एखन धरि नहि क’ सकल अछि।
एहन विलक्षण व्यक्तित्व जनमानस केँ कौन तरहें प्रभावित आ प्रेरित कयने अछि तकर परिचय वर्तमान उत्साह, उमंग आ भक्ति सँ भेटि रहल अछि। हमसभ सत्ये बहुत भाग्यशाली छी जे अहि अद्भुत समयक साक्षी बनि रहल छी। संत समाज, शासक वर्ग आ वृहत राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण हेतु दान देबय वाला भक्त जनकेँ हार्दिक धन्यवाद।
जय सियाराम
