धन कें तीन गति होइछ -दान , भोग आ नाश

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लेख

प्रेषित : आभा झा

लेखनीकेँ धार –

” धन संचय उचित, किंतु एतबो नै जे भोग, दान, धर्मसँ वंचित भऽ करी “-

कहल गेल अछि कि धनमे लक्ष्मीक वास होइत अछि। धनक महत्व आजुकेँ समयमे ही नहिं, बल्कि प्राचीन समयसँ रहल अछि। धनक बिना ने कोनो यज्ञ होइत अछि ने कोनो अनुष्ठान। आजु धनक बल पर धर्मक व्यवसायीकरण भऽ रहल अछि। संतगण धन संचय आ वैभवशाली जीवन – शैलीक नब प्रतिमान गढ़ि रहल अछि। संत कबीरदास बड़ सहज भावसँ परमेश्वरसँ ई मांग रखला – ‘ साईं इतना दीजिए, जा मे कुटुम्ब समाय।मैं भी भूखा न रहूं, साधू ना भूखा जाय।।’ यानी ओ जन साधारणकेँ परिश्रमसँ ओतबे धन उपार्जनक लेल कहि रहल छथि, जतेकसँ ओकर दैनिक कार्यक पूर्ति भऽ जाए। आवश्यकतासँ बेसी धनक इच्छा ही तृष्णाकेँ रूप धारण कऽ लैत अछि आ अंततोगत्वा ई तृष्णा ही व्यक्तिकेँ नैतिक पतनक कारण बनैत अछि।
हमर संस्कृतिमे धनक अभावकेँ बहुत पैघ अभिशाप मानल गेल अछि। ई सत्य अछि कि दोसरक भलाईकेँ काजक लेल धनक आवश्यकता होइत छैक, ओतहि इहो सत्य अछि कि धनक बुराईकेँ अपना दिस खींचयकेँ क्षमता अकथनीय अछि। ई सच अछि कि धन मूल्यवान अछि। सभकेँ ओकर जरूरत अछि, मुदा ओकरे सभ किछु मानि लेनाइ स्वस्थ मन-मस्तिष्कक परिचायक नहिं कहल जा सकैत अछि। एहि मान्यताकेँ प्रभावक परिणाम अछि कि आजु जीवनक लेल धन नहिं रहि गेल अछि, धनक लेल जीवन भऽ गेल अछि। हर आदमी भाईचारा, सुख-शांति व ईमान बेची कऽ कोनो तरहें धन कमाबैकेँ पाछू लागल अछि। एहिसँ दुनियामे धन नहिं बढ़ल अछि बल्कि धनक नशा बढ़ल अछि, धनक लेल पागलपन बढ़ल अछि। एहिसँ दुख बढ़ल अछि, अशांति बढ़ल अछि, घमंड बढ़ल अछि आ हैवानियत बढ़ल अछि।
वेद कहैत अछि – पाई कमाऊ परंतु बड्ड नहिं, जतेक जरूरत अछि ओतबे कमाऊ। किछु दान सेहो करू, खाउ- पिबू आ ईश्वरक ध्यान, भगवानक भजन करू। अत्यधिक धनक चाहकेँ अपन दिलमे कखनो जड़ि नै पकड़ै दिय। याद राखू कि अहाँक दोस्त, परिवारक सदस्य आ अहाँक स्वास्थ्य पाईसँ कहीं बेसी अनमोल अछि।
धनक तीन गति होइत छैक – दान-भोग आ नाश। एहिमे सबसँ उत्तम गति दानक अछि। धनक दान, धन द्वारा अन्य वस्तु, दवाई, वस्त्र आदिक दान नीक मानल जाइत अछि। दोसर गति भोग अछि। जे धन अहाँक लऽग अछि, ओकर उचित भोग केनाइ, अपन घरक निर्माण, बच्चाक शिक्षा, विवाह, प्रतिदिन जीवनमे वस्तुकेँ संग्रह तथा जीवनकेँ सुख पूर्वक बिताबैकेँ लेल अपन धनक उपयोग केनाइ श्रेष्ठ अछि। जे व्यक्ति दान नै दैत अछि आ ने ओकर उपभोग करैत अछि ओ धन ओकरा लेल कोनो काजक नै रहैत अछि। हमर संस्कृतिमे दान देबयकेँ परंपरा आरंभसँ ही रहल अछि। ई जीवन केवल धन कमाबैकेँ लेल नहिं, बल्कि धन कमा कऽ ओकर उपयोग तथा उचित उपभोग सेहो करबाक चाही।
कंजूस व्यक्ति धरती पर भार अछि। ओहि धनक संचय करयकेँ कोन लाभ, जे मनुष्य मात्रकेँ काज ही नै आबि सकै। धन कमेनाइ नीक अछि, मुदा ओकरा दबा कऽ रखनाइ नीक नहिं। ‘ पूत सपूत तो क्यों धन संचय, पूत कपूत तो क्यों धन संचय – अगर बेटा योग्य अछि, तखन अपने आप अपन जीवनमे एतेक धन कमा लेत कि ओकरा देबयकेँ आवश्यकता नहिं आ अगर बेटा नालायक अछि, तखन ओकरा कतबो धन कियैक ने जमा कऽ दी, ओ सभक नाश कऽ देत।