घनक उपयोग मानव कल्याण लेल होएबाक चाही

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लेख

प्रेषित : रिंकु झा

लेखनी के धार 🙏🏽

विषय -“धन संचय करब उचित” मूदा दान, पुण्य आर धर्म,कर्म स दूर भऽ क नहीं
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प्रत्येक मनुष्य के जीवन मे धन के विषेश महत्त्व छै।कारण धन सऽ मनुष्य अपन इच्छा आ आबश्यकता के पुर्ति करै छैथ। ओना तऽ मनुष्यक ईच्छा के अंत नहीं छै ।धैर वर्तमान स्थिति मे जाहि तरहे महंगाई बढि रहल छै धन के जरुरत सबहक जीवन मे मुख्य भूमिका निभा रहल अछि। शास्त्र के अनुसार मनुष्य के धन ओतबे उपार्जन करबाक चाहि जतेक के हुनका प्रयोजन छऐन्ह।जाहि स हुनकर जीवन -यापन सुचारू रूप स चलैन।आर ओहि मे स किछु सार्थक काज सेहो होई जेना दान -पुण्य।
ओना हमरा आंहा के संस्कृति मे धन संचय करब एक टा सामाजिक परंपरा अछि जे अदौ काल सऽ आबि रहल अछी, भबिष्य के लेल किछु बचा क राखब।एकर पाछू हमरा आंहा के घरक बुजुर्ग लोकनि के कहब छलऐन कि विपैत यानी मुसीबत कखनो कहि क नहीं आबै छै। ताहि हेतु आपैत -विपैत के लेल किछु धन संचय करबाक चाहि जे समय पर काज आबै ।किनको दोसर लग हाथ नै पसारी।
ईहे धन संचय करय के प्रवृत्ति के कारण बिषम परिस्थिति कोरोना महामारी के समय जतय विश्व के समस्त देश आर्थिक रुप स कठिन दौर स गुजैर रहल छल , ओहि समय अपन भारत जल्दी अहि कष्ट स ऊबैर गेल ।पुरा विश्व मे आर्थिक मंदी देखल गेल मुदा भारत के अर्थ व्यवस्था पर विशेष असर नहीं परल। ताहि हेतु सुविधा पुर्वक गुजर बसर भेला के बाद बचल किछु धन के भबिष्य लेल संचय करब उचित छै।जे भविष्य मे अक्समात बला संकट स बचाबै। किंतु जदी ई संचय करय के लालसा कोनो मनुष्य के भीतर बढि जाई आर तृष्णा के रुप लय लै छै आर ओ मनुष्य जदी धर्म -अधर्म के परवाह केने बिना सब किछु रहितो कष्ट करैथ कंजूस सेठ जंका व्यवहार  करय  त ओ धन संचय करब ब्यर्थ छै। जीवन भरि जाहि धन के उपार्जन मे पुरा समय गंवा देलहुं, ओहि धन के संचय करय मे चौकीदार जंका सतत् पहरा देलहुं,ने कोनो धर्म कर्म केलहुं ने कोनो दान -पुण्य केलहुं, जे धन ने आंहा के सुख देलक आर ने ओकर कोनो सार्थक उपयोग भेलै ,सगा -संबधी सब अहि सुख स बंचित रहल त ओ धन संचय करब बेकार छै। अगर कियो अपना आबै बला पीढ़ी के लेल धन संचय करै छैथ त ओ व्यर्थ  छै कारण अगर आंहा पहिले स अपना भावि पीढ़ी पर निक स ध्यान दय पढ़ा -लीखाक ओहि लाईक हुनका काबिल बना देने छीयै त ओ ई धन स्वयं अर्जन कय लेता हुनका लेल अहि संचित धन के कोनो मूल्य नहीं छै।आर जदी कोनो कारण बस अपना बाल -बच्चा के नीक संस्कार आर ज्ञान नहीं द पेलीयै त ओ एकहि दिन मे सब लूटा देता ।क़हबी छै “पूत सपूत त किए धन संचय”
“पूत कपूत त किए धन संचय”
मनुष्य के जीवन नश्वर छै।जीवन के अंत मे सत्कर्म संग जाई छै।तें अगर कियो सक्षम छैथ त हुनका यथाशक्ति दान पुण्य, धर्म कर्म करबाक चाहि।कारण अहि स धन में वृद्धि होईत छै। जेना नाव मे पानि भैर जाई छै त केवट ओहि पानि के बाहर निकाली दै छै जे नाव डुबय नहीं । तहिना धन के अगर नीक काज मे उपयोग नहीं हेतै त ओ नाश हेतै।केवल धन संचय केला स नहीं होई छै बल्कि ओहि धन के उचित भोग आर उपयोग हेबाक चाहि। अगर शरीर मे खुन के संचार ठीक स नै होइ त कतेक तरहक बिमारी शरीर मे होबै लगतै। ठीक ओहि तरहे अगर धन के सहि काज मे नहीं लगेब त ओ बेकार छै।जहिना भगवान देने छैथ तहिना ओहि के ख़र्च करु,दान -पुण्य करु ,मानव कल्याण मे खर्च करु,। भारतीय संस्कृति मे दान -पुण्य के परंपरा आदि काल स चली आबि रहल अछी।राजा हरिश्चंद्र, दानवीर कर्ण,राजा भोज आदि दानी पुरुष के जीवनक दान के महत्व के नहीं जनैत छैथ।