गीता ध्यान – Gita Meditation

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

गीता ध्यान

स्वामी स्वरूपानन्द द्वारा संस्कृत सँ अंग्रेजी मे अनुवादित श्रीमद्भागवद्गीता जे अद्वैत आश्रम सँ प्रकाशित अछि, जाहि पुस्तक केँ १९९९ सँ हम निरन्तर कइएको बेर पढ़ि रहल छी, बेर-बेर गीता आ ओकर महत्वपूर्ण सन्देश केँ जीवन मे ग्रहण करबाक प्रयत्न कय रहल छी, तेकर एकटा अति महत्वपूर्ण अध्याय ‘गीता ध्यान’ आइ अपने सभक संग मैथिली अनुवाद सहित राखि रहल छी। आशा करैत छी जे एहि अध्यायक समुचित लाभ मैथिली जिन्दाबाद केर पाठक जरूर उठा सकता। ध्यान ई रहय जे ‘स्वाध्याय’ केर अंश एतेक सहजो नहि होइत छैक जे गिलास मे पानि ढारिकय पीबि लेब, एहि लेल बहुत निश्चिन्त दिमाग सँ बेर-बेर पढ़ब आ मनन करब त निश्चित एकर उचित लाभ उठा सकब। मनुष्य जीवन लेल स्वाध्याय बड पैघ सम्पत्ति थिकैक। अस्तु! प्रस्तुत अछि गीता ध्यान।

गीता ध्यान – Gita Meditation

ॐ पार्थाय प्रतिबोधितां भगवता नारायणेन स्वयं
व्यासेन ग्रथितां पुराणमुनिना मध्ये महाभारतम्।
अद्वैतामृतवर्षिणीं भगवतीमष्टादशाध्यायिनी-
मम्ब त्वामनुसन्दधामि भगवद्गीते भवद्वेषिणीम्॥१॥

Om! O Bhagavad-Gita – with which Partha (Arjuna) was enlightened by the Lord Narayana Himself and which was incorporated in the Mahabharata by the ancient sage Vyasa – the blessed Mother, the Destroyer of rebirth, showering down the nectar Advaita, and consisting of eighteen chapters – upon Thee O Bhagavad-Gita! O loving Mother! I meditate.

ॐ ! हे भगवद्गीता – जिनका सँ पार्थ (अर्जुन) स्वयं भगवान् नारायण द्वारा प्रबुद्ध भेल छलथि आ जिनका महाभारत मे समाहित कयल गेल छल प्राचीन ऋषि व्यास द्वारा – धन्य माता, पुनर्जन्म विनाशक, अमृत अद्वैत वर्षा करैत, आ अठारह अध्याय सँ युक्त – हे भगवद-गीता ! हे स्नेही माँ ! अहाँ पर हम ध्यान करैत छी।

नमोऽस्तुते व्यास विशालबुद्धे फुल्लारविन्दायतपत्रनेत्र।
येन त्वया भारततैलपूर्णः प्रज्वालितो ज्ञानमयः प्रदीपः॥२॥

Salutation to Thee, O Vyasa, of mighty intellect and with eyes large like the petals of a full-blown lotus by whom was lighted the lamp of wisdom, full of the Mahabharata-oil.

अहाँ केँ बेर-बेर प्रणाम हे व्यासजी! पराक्रमी बुद्धि केर आ पूर्ण कमलक पंखुड़ी सदृश पैघ आँखिवला, जिनका द्वारा महाभारत-तैल सँ भरल प्रज्ञाक दीप प्रज्वलित भेल छल।

प्रपन्नपारिजाताय तोत्रवेत्रैकपाणये।
ज्ञानमुद्राय कृष्णाय गीतामृतदुहे नमः॥३॥

Salutation to Krishna! The Holder of Gyanamudra, granter of desires of those who take refuge in Him, the milker of the Gita-nectar, in whose hand is the cane for driving cows.

कृष्णजी केँ प्रणाम! ज्ञानमुद्राक धारक, हुनक शरण मे रहनिहारक कामना पूरा करनिहार (दाता), गीता-अमृत केर दुहयवला, जिनकर हाथ मे गाय चराबयवला बेंत (छड़ी) अछि।

सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः।
पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्॥४॥

All the Upanishads are the cows, the Son of the cowherd is the milker, Partha is the calf, man of purified intellect are the drinkers and the supreme nectar Gita is the milk.

सब उपनिषद गाय थिक, गोपालक पुत्र दुहनिहार, पार्थ बछड़ा, शुद्ध बुद्धिक पुरुष पीनिहार आ परम अमृत गीता दूध थिक ।

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥५॥

I salute Krishna, the Guru of the Universe, God, the son of Vasudeva, the Destroyer of Kamsa and Chanura, the supreme bliss of Devaki.

ब्रह्माण्डक गुरु भगवान् वासुदेवक पुत्र कंस एवं चाणुर केर नाशक, देवकीक परम आनंद कृष्ण केँ प्रणाम।

भीष्मद्रोणतटा जयद्रथजला गान्धारनीलोत्पला।
शल्यग्राहवती कृपेण वहनी कर्णेन वेलाकुला॥
अश्वत्थामविकर्णघोरमकरा दुर्योधनावर्तिनी।
सोत्तीर्णा खलु पाण्डवै रणनदी कैवर्तकः केशवः॥६॥

The battle-river – with Bhishma and Drona as its banks, and Jayadratha as the water, with the king of Gandhara as the blue water-lily, and Shalya as the shark, with Kripa as the current and Karna as the breakers, with Ashwatthama and Vikarna as terrible Makaras and Duryodhana as the whirlpool in it – was indeed crossed over by the Pandavas, with Keshava as the ferryman.

युद्ध-नदी – जकर तट भीष्म आ द्रोण, आ जल जयद्रथ, नील जलकुंभीक रूप मे गंधारक राजा, आ शार्क केर रूप मे शल्य, धाराक रूप मे कृपाचार्य आ भंगक केर रूप मे कर्ण, अश्वत्थाम आ विकर्ण जेहेन भयंकर मकर आ दुर्योधन जेहेन ओहि मे भंवर – सचमुच पांडव द्वारा पार कयल गेल छल, केशव जेहेन फेरी चालक (नाव खेबैया) केर संग।

पाराशर्यवचः सरोजममलं गीतार्थगन्धोत्कटं
नानाख्यानककेसरं हरिकथासम्बोधनाबोधितम्।
लोके सज्जनषट्पदैरहरहः पेपीयमानं मुदा
भूयाद्भारतपङ्कजं कलिमलप्रध्वंसिनः श्रेयसे॥७॥

May the taintless lotus of the Mahabharata – growing on the waters of the words of Parashara’s son, having the Gita as its strong sweet fragrance, with many a narrative on Hari and drunk joyously day after day by the Bhramara of the good and the pure in the world – be productive of the supreme good to him who is eager to destroy the taint of Kali (Kaliyug)!

महाभारतक निर्मल कमल – पराशर पुत्र केर वचनक जल पर उगैत, गीता केर अपन प्रबल मधुर सुगन्धक रूप मे, हरि पर अनेक कथ्यक संग दिन-ब-दिन एहि संसारक शुभ आ शुद्ध भ्रमर द्वारा आनन्दपूर्वक रसपान करैत – कलि (कलियुग) केर कलंक केँ नाश करय लेल आतुर लोक लेल परम भलाई केर उत्पादक बनू !

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम्।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्॥८॥

I salute that All-bliss Madhava whose compassion makes the mute eloquent and the cripple cross mountains.

हम ओहि सर्वानन्द माधव केँ प्रणाम करैत छी जिनकर करुणा मूक केँ वाक्पटु आ अपंग केँ पर्वत पार करबैत अछि।

यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै-
र्वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः।
ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो
यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः॥९॥

Salutations to that God whom the Creator Brahma, Varuna, Indra, Rudra, and the Maruts praise with divine hymns; Whom the singers of Sama sing, by the Vedas, with their full complement of parts, consecutive sections, and Upanishads; Whom the Yogis see with their minds absorbed in Him through perfection in meditation, and Whose limit the hosts of Devas and Asuras know not.

सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र, रुद्र, आ मरुत लोकनि दिव्य स्तोत्र सँ जाहि भगवानक स्तुति करैत छथि, हुनका नमस्कार; जिनकर महिमा केँ सामवेदी गायक सब वेद द्वारा, ओकर पूर्ण पूरक भाग आ लगातार खण्ड आ उपनिषद मे गबैत छथि; जिनका योगी ध्यान मे सिद्धिक माध्यम सँ हुनकहि मे लीन भेल मन (अन्तर्दृष्टि) सँ देखैत छथि, आर जिनकर सीमा देव-असुर गण सब केँ बुझल तक नहि छन्हि।

हरिः हरः!!