प्रकृतिक देल अनमोल उपहार वा वरदान धातृ

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लेखनीक धार- लेख

प्रेषित : इला झा

प्रकृतिक अनमोल उपहार धातृ (आंवला)

धातृक गाछ भारतीय संस्कृति मे रचल – बसल अछि। ई वृक्ष समस्त भारतक जंगल आ बगीचा मे भेटैत छैक।

वाराणसीक धातृ सभसँ नीक मानल जाइत छैक। धातृ बीस वा पच्चीस फुटक झारीय पौधा होइत छैक जकर फल हरियर, चिक्कन आ गुद्देदार होइत छैक। भारतीय पुराणक अनुसार एक बेर ब्रह्मा विष्णुके स्मरण मे ध्यानमग्न रहथि आ भावविभोर भ’ हुनक आँखि सँ अनवरत नोर झहर’ लगलैन ओहि अश्रुस्राव सँ जमीन पर आंवला गाछक प्रादुर्भाव भेलैक।

एकर फल कसैला होइत छैक।धातृमे अद्भुत स्वाद विशेषता होइत छैक। चरक के अनुसार शारीरिक अवनति के रोक’मे धातृक स्थान केँ प्राथमिकता देल गेल छैक।

प्राचीन ग्रंथकार एकरा शिव(कल्याणकारी), व्यवस्था(अवस्था केँ बनाक’ राख’वाला) आ धातृ (माताक समान रक्षा कर’वाला) कहल गेल छैक।

आमतौर पर धातृ केँ भारतीय करौंदा सेहो कहल जाइत छैक।कयेको स्वास्थ्य फायदाके कारण “ सुपरफूड” कहल जाइत छैक अहिमे पोषण घनत्व बहुत होइत छैक। अहिमे पाँच अलग-अलग स्वाद जेना तेखगर, कसाईन, मीठ, तीत, खटगरक अलावा अन्य स्वाद सेहो भरल रहैत छैक। ई मोन आ शरीर केँ पोषित करैत अछि, आ दिव्य औषधि अछि। आंवला केँ संस्कृतमे अमालकी कहल जाइत छैक जकर अर्थ अछि “जीवन अमृत”।

धातृमे पर्याप्त मात्रामे घुलनशील फाइबर होइत छैक। ई फाइबर आंतक गतिकेँ नियमित करैत छैक। विटामिन- सी अधिक मात्रामे भेला के कारण आवश्यक खनिज के नीक मात्रामे अवशोषित कर’ मे मददि करैत छैक ताहि कारण ई विभिन्न हेल्थ सप्लिमेंट्सक संग तालमेल रखैत अछि। याददाश्त बढ’ब’मे सहायक होइत अछि।

कार्तिक मासमे फल लगैत छैक आ ओहि महिना धातृ गाछ तर ब्राह्मण भोजन केँ कल्याणकारी मानल गेल छैक आ एकर सेवन गुणकारी मानल जाइत अछि।

आंवलाक अत्यधिक सेवन कखनो काल अवगुण सेहो करैत छैक जेना जिनका एलर्जी छन्हि हुनका रक्तस्राव होइत छनि संगहि जिनका मधुमेह छनि हुनका एकर अत्यधिक सेवन सँ बल्डशुगर बहुत कम भ’ जाइत छैक।
धातृक प्रयाप्त मात्रामे वृक्षारोपणक अभाव देखल जाइत छैक।
अधिकांश क्षेत्र मे एखनहुँ बहुत अभाव छैक।

पोषकता सँ भरपूर धातृ पौधाक बाहुल्यता पर हमरा सभके ध्यान देबाक चाही। आउ हमसभ मिलिजुलि अहि अमृततुल्य पौधा के हरेक क्षेत्रमे लगाबी आ एकर भरपूर संरक्षण करी।

©इला झा
बंगलुरू