कठिन व्रत निराजल रहबाक कारण कहल गेल अछि जितिया पावनि बड्ड भारी

1908

अपना सभक ओहिठाम जखन लोक कोनो दुर्घटना सँ साफ साफ बचि जाइत अछि तऽ सभ कहैत छैक जे एकर माय खरजितिया पावनि कयने छलैक तें इ साफ साफ बचि गेल। अर्थात जितिया पावनि के महात्म्य मिथिला में बहुत बेसी छैक। अपन परिवार के सभ तरह सँ सुरक्षा के कामना करैत इ पावनि अत्यंत स्वच्छ आ आध्यायत्मिक वातावरण में मनाओल जाइत अछि। एकर उपवास आ पवित्रता के समायोजन अत्यंत कठिन होइत छैक कारण आरम्भ माछ, मड़ुआ आ नोनी साग सँ होइत छैक आ तकर बाद कठिन उपवास आरंभ होइत छैक, ओ तऽ संयोग छैक जे इ ब्रत स्त्रीगण धरि सीमित छैक आ वएह सभ एहेन कठिन ब्रत के करवा में सक्षम भऽ सकैत छैथि कारण अपना सभक ओहिठाम के स्त्रीगण के सहन करवाक क्षमता बहुत बेसी होइत छैन्ह संगहि आस्था के नाम पर ओ लोकनि कठिन सँ कठिन तपस्या कऽ सकैत छैथि। हिनक हिम्मत के, आस्था के प्रति समर्पण के बहुत गोटे कलमबद्ध कयने छैथि मुदा किछु गोटे हिनक आस्था के बिसरि कऽ “जितिया पावनि बड्ड भारी, धिया पूता के ठैकि सुताबी, अपने खयलनि भरि थारी” लिखने छैथि जकर प्रमाणिकता आइ धरि कतहु नहि भेटलैक अछि आ हमरा लोकनि कोनो स्थिति मे एहि आक्षेप में मानि नहिं सकैत छी जे कोनो माय अपन बच्चा के सुता कऽ अपने भरि पेट भोजन करतीह। ई पूर्णतया अस्वीकार करय योग्य अछि। हमरा अपन बाल्यावस्था के दृश्य ओहिना मोन अछि जे हमर माय इ पावनि करैत छलीह आ हमरा सभके चारि पाँच बजे भोर में उठा कऽ डिविया अथवा लालटेन लेसैत छलीह, ओहि लालटेन लेसवाक काल मटिया तेल के सुगंध समस्त वातावरण में पसरि जाइत छलैक आ ओकर गंध बड्ड सुंदर लगैत छलैक।हमरा लोकनि अर्ध निद्रा में रहैत छलहुँ मुदा हमर सभक करूणामयी माय केरा के पात में चूड़ा, दही, चीनी आ अम्मट परसि दैत छलखिन्ह आ हम सभ अपन आँखि मुनने सभटा चूड़ा दही खा लैत छलहुँ। एहि भोजनक स्वाद केर बखान नहिं कयल जा सकैत अछि। अपूर्व स्वाद होइत छलैक एहि चूड़ा दही के। एकरा पावनिक पवित्रता बुझू अथवा मायक हाथ के स्नेह आ ममता, ओठघन के भोजन के तुलना हमरा लोकनि जीवन में नहिं कऽ सकलहुँ आ यादगार एहेन जे ओ भोजन आइ धरि आँखि के सामने ओहिना चमकि रहल अछि। आन दिनक चूड़ा दही अथवा अम्मट मे ओ स्वाद नहिं। माय हमरा सभके बहुत स्नेह सँ खुआबैत छलीह मुदा हम सभ कहियो हुनका खाइत नहिं देखलियनि। ओठघन सँ एक दिन पहिले घर में माछ अवश्य बनैत छलैक। बाबूजी के तीन – तीन टा पोखरि तें माछ के कोनो कमी नहि। टोल पड़ोसक लेल सेहो माछक इन्तजाम हमरे पोखरि सँ होइत छलैक। अद्भुत होइत छलैक जीतिया पावनि अपन सभक गाम में। अत्यंत विधिवत रूप सँ। आइ एकर कथा पर नहिं जा कऽ मिथिला में एकर विशिष्टता पर ध्यान आकृष्ट कयल। हमरा लोकनि जीवन भरि नहिं बिसरि सकैत छी मिथिलाक एहि पवित्र पावैन के जाहि मे पुत्र के कुशलता के लेल इ पवित्र पावनि कयल जाइत अछि।
— कीर्ति नारायण झा –