मैथिलीक पहिल गल्पकार : डॉ मनमोहन झा

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मैथिल यायावर, मधेपुरा/८ अक्टूबर २०२३/मैथिली जिंदाबाद

साहित्य जीवनक यथार्थ चित्र थिक आ व्यक्तित्वक चरित्र थिक। जीवनक दोसर अर्थ होइत अछि प्रगति।आ प्रगतिक अर्थ होइत अछि आगू बढब। तखन फेर साहित्य गतिहीन कोनाके भ सकैत अछि।

प्रगति, परिवर्तन, विकास — इएह थिक साहित्यक क्रम आ जीबित साहित्यक लक्षण। एखन एहि वर्तमान समय मे संस्कृत भाषा आ साहित्य प्रायः मृतप्राय सन स्थिति मे बुझाइत अछि। कारण जे ओकर प्रगति रुकि गेलैक। ओकर रचनात्मकता प्रायः नगण्य आ की शून्य भ गेल अछि।

मैथिली गद्य साहित्यक ओ धारा जे कहियो मैथिल हृदय के खूब चहटगर लगैत रहै, कालांतर मे चमचमाइन भए गेल। कारण जे अंग्रेजी, हिंदी आ बंगलाक गल्प साहित्यक जे परिचय लोकके प्राप्त भेलैक ओ लोकक अभिरुचि के दोसर दिस घुमा देलकै।

एकटा एहेन समय एलय जे जनता किछु ठोसगर वस्तुक अपेक्षा करै लगलै। कारण जे मात्र बत्तीसो दांत देखाके ओकरा संतुष्ट करब प्रायः कठिन भ गेल रहै। किएक त तखन के समय मे शरद, रवीन्द्र, प्रेमचंद,चेखव संगे ओ हेनरी आ गोर्कीक प्रभाव बहुत ज्यादा बढल रहै।

आ एहेन तरहक स्थिति मे मापदंडक एहेन परिवर्तन गल्प के गल्पक रुप मे ग्रहण करबाक लेल बाध्य क देलकै। परिणाम ई भेलय जे मैथिलीओ भाषा मे नीक नीक गल्पकारक प्रादुर्भाव हुए लगलै। मुदा, भावात्मक धरातल पर जौं श्रेष्ठ आ मैथिलीक पहिल गल्पकार डॉ मनमोहन झा के कहल जाए त अतिशयोक्ति नहिं। कारण जे हुनका गल्प साहित्यमे मनोवैज्ञानिक प्रभाव सेहो देखार पड़ैत अछि। निस्संदेह हरिमोहन झा अपनहिं बहुत पैघ गल्पकार छलाह। मुदा, मनोवैज्ञानिक आधार पर रचना करब, कोनो भी गल्पकार के श्रेष्ठतम बनबैत अछि।

स्वयं हिंदी भाषा आ साहित्य के प्रकांड पंडित प्रेमचंद अपनहिं ई मानैत छलाह जे “वर्तमान आख्यायिकाक आधारे मनोविज्ञान थिक।घटना आओर पात्र त ओहि मनोवैज्ञानिक सत्य के थिर करबाक निमित्त आनल जाइत अछि,ते ओकर स्थान पूर्णरूपेण गौण छैक।”

‘अश्रुकण’क प्रकाशन मैथिली गल्प साहित्यमे क्रांतिक सृजन क देलकै। मैथिली साहित्यक इतिहासक एकटा अपूर्व घटना थिक — अश्रुकण !

कुल गोट सात टा गल्पक एहि संग्रह “अश्रुकण” मे गल्पकार डॉ मनमोहन झाक अद्भुत प्रतिभाक परिचय प्राप्त होइत अछि।

“एना”, “चन्द्रहार”, “मीनाक्षी”, “झगड़ा” आओर “बारह वर्षक बाद” मनमोहनक खूब प्रसिद्ध गल्प थिक।

मानव हृदय मे युग युग से आबि रहल शाश्वत भावना के अंगीकार केनिहार शुद्ध गल्पकार छलाह मनमोहन झा।ओ नर नारीक मध्य संचरित स्नेह ,जे कि दिवाकर जकां सत्य अछि, कहियो मेटा नहिं सकैत अछि, से हुनकर विषय परिदृश्य मे घुमैत रहैत छलऐन। कारण जे सृष्टिक आदिसं वर्तमान समय धरि प्रत्येक विचारक एहि विशेष महत्वक विषय पर सोचलक अछि आ सोचैत रहताह। मनमोहन झा के नारी हृदयक अपूर्व परिचय प्राप्त छलऐन।

मनमोहन झा के भाषा के शुद्ध साहित्यिक भाषाक रुप मे देखल परेखल गेल अछि। जहिना प्रसाद आ रविन्द्रक भाषा हिन्दी साहित्य मे अपन एकटा अलग पहिचान रखैत अछि, तहिना, मूल्यांकन कयला पर देखल गेल जे मनमोहनोक भाषा ओहि तरहक मापदंड पर ठाढ रहल अछि।

कोनो भी भाषाक गल्पकारक अपन एकटा अलग शैली होइत अछि। कारण जे,ई कहल जाइत छैक जे शैली व्यक्तिक व्यक्तित्वक प्रतिबिम्ब होइत अछि।ते हमरा बुझला मे मनमोहन झाक शैली हुनक सुसंस्कृत व्यक्तित्वक स्पष्ट परिचय दैत अछि।

फ़ाइल फ़ोटो

मैथिली भाषा आ साहित्यक क्षेत्र मे बहुत रास गल्पकार भेलाह,जाहि मे मुख्य रूप से हरिमोहन झा, राधाकृष्ण “बहेड़ा”,किरण,किसुन, यात्री,रेणु,धीरेश्वर झा धीरेन्द्र, सोमदेव, जीवकांत,धूमकेतु, मधुकर गंगाधर, मार्कण्डेय,मणिपद्म, मायानंद मिश्र, ललित,प्रभास कुमार चौधरी,राजकमल चौधरी, गंगेश गुंजन, रामानंद रेणु , सुधांशु शेखर चौधरी आ सुभाष चन्द्र यादव आदिक नाम नीक गल्पकारक रुप मे लेल जाइए। मुदा, मनोवैज्ञानिक आधार पर रचनाक उत्कृष्टता के देखैत मैथिलीक पहिल गल्पकार डॉ मनमोहन झाके कहब आ की मानब अतिशयोक्ति नहिं होएत।

जौं मनमोहनक सूझबूझ के देखबाक मोन होए त एक बेर अबस्से हुनक एना आ चन्द्रहार आ मीनाक्षी के पढबाक जतन करी। तखन मनोवैज्ञानिक आधार पर ओकर समग्र रचना क्रम के देखैत ओहि गल्प के मूल्यांकन करी।

विश्व साहित्यक इतिहासक एकटा अपूर्व परिचय थिक —

डॉ मनमोहन झा।