रामचरितमानस मोतीः श्री रामजीक बानर सेनाक संग समुद्र तट पर पहुँचब

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

रामचरितमानस मोती

श्री रामजीक बानर सेनाक संग समुद्र तट पर पहुँचब

१. बानरराज सुग्रीव शीघ्रहि बानर सब केँ बजौलनि। सेनापति लोकनिक समूह आबि गेल। बानर-भालुक झुंड अनेक रंगक अछि आ ओकरा सब मे अतुलनीय बल छैक। ओ सब प्रभुक चरणकमल मे सिर नमबैत अछि। महान्‌ बलवान्‌ रीछ आ बानर गरजि रहल अछि। श्री रामजी बानर केर समस्त सेना केँ देखलनि। कमल नेत्र सँ कृपापूर्वक ओकरा सब पर अपन दृष्टि देलनि। राम कृपाक बल पाबि श्रेष्ठ बानर मानू पाँखिवला बड़का पर्वत बनि गेल छल। फेर श्री रामजी हर्षित भ’ कय प्रस्थान (कूच) कयलनि।

२. अनेकों सुन्दर आर शुभ शकुन होमय लागल। जिनकर कीर्ति सब मंगल सँ पूर्ण अछि, हुनक प्रस्थानक समय शकुन भेनाय, यैह नीति थिक। लीलाक मर्यादा थिक।

३. प्रभुक प्रस्थान जानकीजी सेहो बुझि गेलीह। हुनक बाम अंग फड़कि-फड़कि मानू कहि देलकन्हि जे श्री रामजी आबि रहल छथि। जानकीजी केँ जे सब शकुन होइत छलन्हि, वैह सब रावण लेल अपशकुन भेलैक।

४. सेना चलल। ओकर वर्णन के कय सकैत अछि? असंख्य बानर आ भालू सब गरजि रहल अछि। न’हे जेकर शस्त्र छैक, ओ इच्छानुसार सर्वत्र बेरोक-टोक चलयवला रीछ-बानर पर्वत आर वृक्ष सब केँ धारण कएने कियो आकाश मार्ग सँ आर कियो पृथ्वी पर चलल जा रहल अछि। ओ सिंह केर समान गर्जना कय रहल अछि। ओकरा सभक चलबाक आ गर्जन सँ दसो दिशाक हाथी विचलित होइत चिंग्घाड़ कय रहल अछि।

५. छंद :
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे॥
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं॥१॥

दिशा सभक हाथी चिंग्घाड़य लागल, पृथ्वी डोलय लागल, पर्वत काँपय लागल आर समुद्र खलबला उठल। गंधर्व, देवता, मुनि, नाग, किन्नर सब कियो मोन मे हर्षित भेलाह जे आब हमरा सभक दुःख टरि जायत। अनेकों करोड़ भयानक बानर योद्धा सब कटकटा रहल अछि आर करोड़ों बानर सब दौड़ि रहल अछि। ‘प्रबल प्रताप कोसलनाथ श्री रामचंद्रजी की जय हो’ एना नारा लगबैत ओ सब हुनकर गुणसमूह सब केँ गाबि रहल अछि।

सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ठ कठोर सो किमि सोहई॥
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी॥२॥

उदार, परम श्रेष्ठ एवं महान्‌ सर्पराज शेषजी सेहो सेनाक बोझ नहि सहि सकैत छथि, ओ बेर-बेर मोहित भ’ घबड़ा रहल छथि आ बेर-बेर कच्छप केर कठोर पीठ केँ दाँत सँ पकड़ि रहल छथि। एना करैत-करैत अर्थात्‌ बेर-बेर दाँत केँ गड़ाकय कच्छप केर पीठ पर लकीर सन खींचैत ओ केना शोभा दय रहल छथि मानू श्री रामचंद्रजीक सुन्दर प्रस्थान यात्रा केँ परम सोहाओन जानि ओकर अचल पवित्र कथा केँ सर्पराज शेषजी कच्छप केर पीठ पर लिखि रहल होइथ।

एहि प्रकारे कृपानिधान श्री रामजी समुद्र तट पर पहुँचि गेलाह। अनेकों रीछ-बानर वीर जहाँ-तहाँ फल खाय लागल।

हरिः हरः!!