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रामचरितमानस मोतीः लंका जरेलाक बाद हनुमान्‌जी द्वारा सीताजी सँ विदाइ माँगब आर चूड़ामणि पायब

216 भ्यूज

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

रामचरितमानस मोती

लंका जरेलाक बाद हनुमान्‌जी द्वारा सीताजी सँ विदाइ माँगब आर चूड़ामणि पायब

१. पूँछ मिझा, थकावट दूर कयकेँ आर फेर छोट सन रूप धारण कय हनुमान्‌जी श्री जानकीजीक सोझाँ हाथ जोड़िकय ठाढ़ भ’ गेलथि। हनुमान्‌जी कहलखिन – हे माता! हमरा कोनो चिह्न (पहिचान) दिअ, जेना श्री रघुनाथजी हमरा देने रहथि।

२. तखन सीताजी चूड़ामणि उतारिकय देलखिन्ह। हनुमान्‌जी से हर्षपूर्वक लय लेलनि। जानकीजी कहलखिन्ह – “हे तात! हमर प्रणाम निवेदन करबनि आ एना कहबनि – हे प्रभु! यद्यपि अहाँ सब प्रकार सँ पूर्ण काम छी, अहाँक कोनो प्रकारक कामना नहि अछि, तथापि दीन (दुःखी) सब पर दया करब अहाँक विरद (नियम) अछि। आर, हम दीन छी, तेँ ओहि विरद केँ याद कयकेँ, हे नाथ! हमर भारी संकट केँ दूर करू।”

“हे तात! इन्द्रपुत्र जयन्तक कथा (घटना) सुनेबनि, प्रभु केँ हुनकर बाण केर प्रताप स्मरण करेबनि। यदि महीना भरि मे नाथ नहि अओता त फेर हमरा जिबैत नहि पओता। हे हनुमान्‌! कहू, हम केना प्राण राखू! हे तात! अहाँ सेहो आब जेबाक बात कहि रहल छी। अहाँ केँ देखि कय छाती ठंढा भेल छल। फेर हमरा लेल वैह दिन आ वैह राति!”

३. हनुमान्‌जी जानकीजी केँ बुझाकय अनेकों प्रकार सँ धीरज देलनि आ चरणकमल मे सिर मनाकय श्री रामजीक पास गमन कयलनि।

हरिः हरः!!

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