रामचरितमानस मोतीः सुन्दरकाण्ड मंगलाचरण आ हनुमान्‌जीक समुद्र पार जायब

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

रामचरितमानस मोती

सुन्दरकाण्ड आरम्भ – पंचम सोपान-मंगलाचरण

श्लोक :
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्‌।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्‌॥१॥

शान्त, सनातन, अप्रमेय (प्रमाण सब सँ परे), निष्पाप, मोक्षरूप परमशान्ति देनिहार, ब्रह्मा, शम्भु आर शेषजी सँ निरन्तर सेवित, वेदान्त द्वारा जानय योग्य, सर्वव्यापक, देवता लोकनि मे सबसँ पैघ, माया सँ मनुष्य रूप मे देखायवला, समस्त पाप केँ हरयवला, करुणाक खान, रघुकुल मे श्रेष्ठ तथा राजा सभक शिरोमणि राम कहेनिहार जगदीश्वर केँ हम वन्दना करैत छी।

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥२॥

हे रघुनाथजी! हम सत्य कहैत छी आर फेर अपने सभक अन्तरात्मा छीहे (सब किछु जनिते छी) जे हमर हृदय मे दोसर कोनो इच्छा नहि अछि। हे रघुकुलश्रेष्ठ! हमरा अपन निर्भरा (पूर्ण) भक्ति दिअ आर हमर मन केँ काम आदि दोष सब सँ रहित कय दिअ।

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्‌।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥३॥

अतुल बल के धाम, सोनाक पर्वत (सुमेरु) के समान कान्तियुक्त शरीरवला, दैत्यरूपी वन केँ ध्वंस करबाक लेल अग्नि रूप, ज्ञानीजन मे अग्रगण्य, संपूर्ण गुण सभक निधान, बानर सभक स्वामी, श्री रघुनाथजीक प्रिय भक्त पवनपुत्र श्री हनुमान्‌जी केँ हम प्रणाम करैत छी।

हनुमान्‌जीक लंका लेल प्रस्थान, सुरसा सँ भेंट, छाया पकड़यवाली राक्षसीक वध

१. जाम्बवान्‌ केर सुन्दर वचन सुनिकय हनुमान्‌जीक हृदय केँ खूब नीक लगलनि। ओ बजलाह – “हे भाइ! अहाँ सब दुःख सहिकय, कन्द-मूल-फल खाकय ता धरि हमर बाट देखी जा धरि हम सीताजी केँ देखिकय घुरि नहि आबी। काज अवश्य होयत, कियैक त हमरा बहुते हर्ष भ’ रहल अछि।” ई कहिकय आ सब केँ मस्तक नमा आ हृदय मे श्री रघुनाथजी केँ धारण करैत हनुमान्‌जी हर्षित भए कय चलि देलाह।

२. समुद्र के तीर पर एकटा सुन्दर पर्वत छल। हनुमान्‌जी खेलहि मे ओहि उपर कूदिकय चढ़ि गेलाह आ बेर-बेर श्री रघुवीर केर स्मरण करैत अत्यन्त बलवान् हनुमान्‌जी ओहि पर्वत पर सँ बड़ा फुर्ती सँ फाँगि (उछैल) गेलाह। जाहि पर्वत पर हनुमान्‌जी पैर राखिकय चललाह, जेकरा उपर सँ ओ फँगलाह, से तुरन्ते पाताल तर धँसि गेल। जेना श्री रघुनाथजीक अमोघ बाण चलैत अछि, तहिना हनुमान्‌जी चललाह।

३. समुद्र हुनका श्री रघुनाथजीक दूत बुझि मैनाक पर्वत सँ कहलनि जे “हे मैनाक! अहाँ हिनकर थकावट दूर करयवला बनू, यानि अपना उपर हिनका विश्राम दियौन।” हनुमान्‌जी हुनका हाथ सँ छू देलाह, फेर प्रणाम कयकेँ कहलखिन – “भाइ! श्री रामचन्द्रजीक काज कएने बिना हमरा विश्राम कतय?”

४. देवता लोकनि पवनपुत्र हनुमान्‌जी केँ जाइत देखलखिन। हुनकर विशेष बल-बुद्धि केँ जनबाक लेल (परीक्षार्थ) ओ सब सुरसा नामक सर्प केर माता केँ पठेलखिन। ओ आबिकय हनुमान्‌जी सँ ई बात कहलखिन – “आइ देवता लोकनि हमरा भोजन देलनि अछि।”

५. ई वचन सुनिकय पवनकुमार हनुमान्‌जी कहलखिन – “श्री रामजी केर कार्य कयकेँ हम घुरि आबी आर सीताजीक खबरि प्रभु केँ सुना दियनि, तखन आबिकय हम तोहर मुँह मे अपने आबि जायब, तूँ हमरा खा लिहें। हम सत्य कहैत छियौ, एखन हमरा जाय दे।” जखन कोनो उपाय सँ ओ नहि जाय देलीह तखन हनुमान्‌जी कहलखिन – “तहन फेर हमरा खाइये ले!”

६. ओ योजनभर (चारि कोस मे) मुँह बेलक। त हनुमान्‌जी अपन शरीर केँ ओकरा सँ दोब्बर बढ़ा लेलाह। ओ सोलह योजन धरि मुंह बाबि लेलक। हनुमान्‌जी तुरन्ते बत्तीस योजन के भ’ गेलाह। जेना-जेना सुरसा मुख केर विस्तार बढ़बैत गेल, हनुमान्‌जी ओकर दुगूना रूप देखबैत गेलाह। ओ सौ योजन (चारि सौ कोस केर) मुख बाबि लेलक। त हनुमान्‌जी एकदमे छोट रूप धारण कय लेलनि। आर हुनकर मुंह मे पैसिकय फेर तुरन्त बाहर निकलि अयलाह आर हुनका सिर नमा प्रणाम करैत विदा माँगय लगलाह। ओ कहलखिन – “हम अहाँक बुद्धि-बल केर भेद पाबि लेलहुँ, जाहि लेल देवता सब हमरा पठौने रहथि। अहाँ श्री रामचन्द्रजीक सबटा काज करब, कियैक त अहाँ बल-बुद्धि केर भंडार छी।”

७. ई आशीर्वाद दयकय ओ चलि गेलीह, तखन हनुमान्‌जी हर्षित भ’ कय विदाह भेलाह। समुद्र मे एक गोट राक्षसी रहैत छल जे माया कय केँ आकाश मे उड़ैत पक्षी सब केँ पकड़ि लैत छल। आकाश मे जे जीव-जन्तु उड़ल करैक, ओ जल मे ओकर परछाई देखिकय वैह परछाई केँ पकड़ि लैत छल, जाहि सँ ओ जीव उड़ि नहि सकय आ जल मे खसि पड़ैत छलय, एहि तरहें ओ सदिखन आकाश मे उड़यवला जीव केँ खायल करैत छल। ओ सैह छल हनुमान्‌जी सँ सेहो कयलक। हनुमान्‌जी शीघ्रहि ओकर कपट केँ थाह पाबि गेलथि। पवनपुत्र धीरबुद्धि वीर श्री हनुमान्‌जी ओकरा मारिकय समुद्रक पार गेलथि। ओतय जाकय ओ वन केर शोभा देखलनि। मधु (पुष्प रस) केर लोभ सँ भँवरा गुंजार कय रहल छल।

हरिः हरः!!