घोघ: एक मर्यादा

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लेख

– उग्रनाथ झा

घोघ -एक मर्यादा

मिथिला में घोघ एक सभ्य सुशील संस्कार के रूप में स्थापित छल आ एखनो तक किछु हद तक अछि । मुदा भौतिक परंपरावादी दौर में घोघ पसंद नै कयल जाएत अछि । एकरा पुरूषक द्वारा थोपल गेल दमनकारी प्रथा से हो कहल जाए लागल अछि । जे दुखद अछि ।

घोघ स्त्रीगणक एकटा मर्यादा आ लज्जा के प्रतिक छल । ओना कहल जाएत छैक सुहाग कखनो उघार नहि रहैय ताहि लेल मिथिला में बेटी पुतोहु़ के पहिने माथ झापब अनिवार्य रहैत छल किएक त माथ के बीचों बीच सुहागक पहिल निशान सिंदूर रहैत छल त सदति माथ झापल रहै छल । ताहि लेल जे आहिबाती लोकनि दैनिक गौड़ी पूजै छली तखनहु़ सिन्दूर आंचर सं झांपि के चढबै छली ।आब त माथ में सिंदूरे नहि , कनपट्टी के केशक तर में सिक्कि बराबर त ओ झपले की उघारे की ? कहबाक तात्पर्य जे माथ झपबाक विशिष्टता आदि काल सं रहल अछि।
आब आबै छि घोघ पर बाप भाई पति एवं पुत्रवत पुरूष के छोड़ी अन्य पुरूष यथा ससुर भैसुर वा परोसी महिला में घरेलू छोड़ी बाहर के महिला सं घोघ तनबाक परंपरा एकटा लक्ष्मण रेखा छलै । बात व्यवहार सम्मान के मर्यादा छलै । घरक बुढ़ बूजूर्ग महिला दूनू के बीचक कड़ी रहैत छली जे अपना बुद्धि विवेक सं तारतम्य स्थापित करैत छली । जे आपसी सद्भाव के जन्म दैत छल सामंजस्य स्थापित करैत छल ।बात करबाक बंदिश सं एकटा दायरा छलै । जे एक दोसरा के आदर सम्मान के पात्र बनबैत छलै । मुदा आब जहन साड़ीए नहि त घोघ कतय सं । जे एक दोसरा सं बातचीत के स्वतँत्रता , बेटी पुतोहु़़ में अंतर नहि के चख्कर में बहुते जगह वाक कटुता आ पारिवारिक विखंडन पहिले के अपेक्षा तीव्र गति स से हो जन्म देमय लागल अछि ।पहिने जहन नव कनिया गाम गमाईत जाईथ त रिक्शा में ओहार लगाओल जाएत छल । ओहि ओहार स़ एतेक फायदा रहैत छल जे बाट घाट आफद आसमानि में दस लोक तैयार भ जाए छल हे कनिया बहुरिया छै बैचारी के दिक्कत नै होए मदद क दहिन । एखनो एहि तरहक देखल जाएं छैक ।लेकिन मोडर्नीटी के आब त सीधे कहि दैत बड फैशन वाली छै देखलिहीन केना उतान छलै भोग दहिन।खैर समयक परिवर्तन छैक ।

किछु लोग के साड़ी उबाउ लगै छैन आ घोघ विपैत । स्वाभाविक छैक जहन पहिरबाक आदतिए नै त सम्हारय में दिक्कत सहजहि । किछु लोक कहैत छथि साड़ी में त पेट पाजर देखाईते रहै छै । जौ हमरा अपना पहिरयै नै आओत त धोती के ढेका त डेग डेग पर खुजबे ने करत । फैशन के दुनिया में प्लेट पर प्लेट सजायब , पीने पर पीने लगाया तो शरीर उघार त हेबे करतै ।

सोचियौ पहिलुका लोक जखन टेलर के चलनसाईर नहि रहै त साया नै रहै लोक कोपिन पहिरै । सम्हरै की नै ? ब्लाऊज नै पहिरै तखनहु़ घोघ मरौद तेहन कारहै जे दुनू आंखि छोड़ी शरिर के कोनो अंग देखनाय सेहंता रहै छलै । रहल काज राज के त ऊखरि ढेकी चलेनाय , ठांव पीढ़ी बाल बच्चा नंगों चंगो सब करै छलै ।ओ जमाना छल पहिरै के रिआज छलै ।करै जाई छल ।स्कुल में शिक्षिका छली साड़ी में रहैत छली पेट पाजर सब झापल । हमर दाई (मैंया)छल कहै जाई छथिन्ह जे ओकरा सं गाम जेठ पद कियो नै रहथिन्ह तकर बाबजूद कियो हुनकर मुंह नै देखलखिन्ह । जे एखन तक चर्चा के बिषय अछि। लेकिन आब ई बात हम अपने घर में कहबै पालन करै त मारि मारि के हनुमान जी बना देता । ओ समय छल आब दोसर बरसात छैक । तै ई कहि देनाय साड़ी पेट पाजर उघार ओ त उल्टा पल्ला आ पीन के कमाल ।

सेएह परिस्थिती घोतीयो के संग छैक । मुदा जे आऩद धोती आ कुर्ता में छै ओ मोडर्न परिधान में नै छैक । जहन धोती पहिरैय के अभ्यास नै छल त फिरिशानी होईत छल लेकिन जहन एंकर अभ्यास शुरु केलहु त महत्व पता चलल आब धोती पहिर दिल्ली झारखंड सहित मिथिला के खतेखो जगह घूमि आयलहुँ । कोनो दिक्कत नहि । राजा महाराजा घोती में कतेक युद्ध लड़ी लेलाह । कतेक विरांगना सब साड़ी में युद्ध लड़ली । जहन सहज बुझेलन्हि तखनहि ने ?

तै जे मोन करै पहिरू ओढू खाऊं पिबू । मुदा आपना कमी के नुकेबा लेल परिधान विशेष के लपेटा में जूनि आनू ।।
विचार व्यक्तिगत अछि अन्यथा नहि लेब ।।

सादर ।।