मैथिलीपुत्र प्रदीप रचित ‘श्री सीतावतरण महाकाव्य’ केर चारिम सर्ग

श्रीसीतावतरण महाकाव्य

– श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप रचित

पहिल महापर्व

चारिम सर्ग

मिथिला के ऋषि यागवलक्य
विदुषीगण परम विशिष्ट ।
कहथि श्रीसीताराम भक्ति सँ,
होइछ पूर्ण अभीष्ट॥७६॥

श्री शंकर भगवान तथा,
मा पारवतीजी केर।
तन, मन, धन सँ छला,
समर्पित सेवक भक्त कुबेर॥७७॥

चरणाश्रित भऽ रहथि सदच्छन,
आन न किछु अभिलाषा।
शिव-गौरी केर ध्यान-भजनमे,
लीन जनिक छल स्वासा॥७८॥

दोसर नहि किछु काज छलनि,
पूजथि नित शम्भू-भवानी।
हिनक देखि अभ्युदय,
करथि ईर्ष्या कतेक अभिमानी॥७९॥

स्वर्ग मर्त्य, पाताल तिनूठाँ,
कियो न हिनक समान।
तकरे कारण तिनू लोकमे,
छल हिनकर सम्मान॥८०॥

सोना केर शिव-लिंग बनाओल,
नीलमणिक श्रीश्यामा।
वैदुर्यक वटवृक्ष ताहितर,
पूजथि शिव, शिववामा॥८१॥

श्रीशिव स्तुति

१.
हे अम्बा पति शिव-शंकरदानी! प्रतिक्षण करी प्रणाम।
हम प्रतिक्षण करी प्रणाम॥
अद्वितीय रूद्र! एहि विश्वक अपने एकसर रचना करता।
सकल विश्व पालन करता एकसर संहारो करता॥
हम नमस्कार कय रहलहुँ अछि, छी भेल अहिंक शरणागत।
अति अज्ञान अन्हार मध्य आयल छी बनि कऽ आरत॥
सिद्धासन मे बैसि अहाँकेर करी सदा हम ध्यान।
हे अम्बा पति शिव शंकर दानी प्रतिक्षण करी प्रणाम॥
२.
अद्वितीय कवि, रूद्र, अग्नि छी अहीं वृहत हरि प्राण।
इन्द्र, मृत्यु, आदित्य, अनिल धाता एवं चेकितान॥
अविनाशी छी अहीं परम ईश्वर जनबा केर योग्य।
संसारक सर्वाश्रय, योगी हम अति मूढ़ अयोग्य॥
जानि सकी अपने केँ शंकर चाही पावन ज्ञान।
हे अम्बा पति शिव-शंशंकर दानी झुकि-झुकि करी प्रणाम॥
३.
अव्यय शाश्वत सत्य सनातन धर्म रक्षक पुरुषोत्तम।
अहीँ विष्णु छी अहीँ चतुर्मुख ब्रह्माजी सर्वोत्तम॥
छी प्रधान स्वामीशंभु अहाँ संसार नाभि सर्वेश्वर।
प्रकृति अहीँ छी परम प्रतिष्ठा परब्रह्म परमेश्वर॥
श्री शंभु जटाधर हे महेश! अपने छी परम महान।
हे अम्बा पति शिव-शंकर दानी झुकि-झुकि करी प्रणाम॥
४.
परम पुराण-पुरुष अपने आदित्य समान स्वरूप।
चिन्मय अव्यक्त तमोगुणसँ छी अतित अचिंतन रूप॥
आकाश ब्रह्ममय शून्य प्रकृति निर्गुण साकार भवेश।
सतत विकार रहित निर्मल संसार तत्त्व अखिलेश॥
अंधकार मे बनि प्रदीप चाहइ छी निर्मल ज्ञान।
हे अम्बापति, शिवशंकर दानी प्रतिछन करी प्रणाम॥
५.
श्रीरुद्र अनन्तशक्ति, योगेश्वर, ब्रह्म मूर्ति साकार।
उत्कृष्ट परम आश्रय स्वरूप मम नमन करी स्वीकार॥
भूतक अधिपति, महिपति महेश, हम सदिखन अहिँक शरणमे।
संसार बीज शिव-शंभु! मगन हम सदिखन अहीँक भजनमे॥
तन संयम हित, मन हो नियमित हे ईश्वर दया देखाबी।
अतिविश्वास हृदयमे लऽकऽ अहँक शरणमे आबी॥
हे औढ़रदानी शंभु उमापति करी सदा हम ध्यान।
हे अम्बापति शिव शंकर दानी प्रतिछन करी प्रणाम॥
६.
पाँच वदन त्रिनयन शंकर सदिकाल अहाँकेँ नमस्कार।
हे अर्द्ध नारीश्वर नमस्कार, हे अग्निरूप हर नमस्कार॥
संसार ज्योति, आकाश दीप, थिति, लयक संग निर्माण।
अम्बाक स्नेहयुत हम ‘प्रदीप’, प्रभु! प्रतिछन करी प्रणाम॥
हे जगदम्बा पति शंकर दानी प्रतिक्षण करी प्रणाम॥
हम प्रतिक्षण करी प्रणाम॥

भऽ प्रसन्न शिव-पारवती,
देलथिन सहर्ष वरदान।
अपन शरणमे राखि लेल,
गौरी शंकर भगवान॥८२॥

पारवती पति बुझलनि हिनका,
परम भक्त नहि शंका।
अति उदार कल्याणेश्वर,
दऽ देलखिन सोनक लंका॥८३॥

बिनु मंगनहि सभ किछु,
दऽ देलखिन सहृदय शंभु-भवानी।
जिनका पर हो कृपा दृष्टि,
मनवाञ्छित पाबथि प्राणी॥८४॥

एहिसँ पहिने किनको नहि,
छल भेटल एहन वरदान।
श्रीकुबेर भऽ गेल छला,
अतिनामी भक्त महान॥८५॥

बैमात्रेय भ्राता रावण,
ईर्ष्यातुर परम भयान।
लंका सहित कुबेरके,
छीनिलनि पुष्प विमान॥

छला महानिःस्पृह कुबेर,
ने चिन्ता ने अपमान।
तदपि त्रिशूलिनि कहल,
करू श्रीमहालक्ष्मी केर ध्यान॥८७॥

महालक्ष्मी अयलिह,
बजली-मोनक बात सुनाबू।
कहल कुबेर दयाकऽ अपने,
हमर बहिन भऽ आबू॥८८॥

मिथिला मे ऋषि पुण्डरीक,
सीरध्वज सुता कहायब।
अहुँक बहिन भऽ मिथिला केँ,
हम नइहर अपन बनायब॥८९॥

जखन छलहुँ हम ‘वेदवती’म
ओ कयने छल अपमान।
करब वंश विध्वंश,
दशानन दुष्टक नहि कल्याण॥९०॥

पहिने लक्ष्मीनिधि भऽ,
अपने, धरती परमे जाउ।
ओहिठाँ अग्रज होयब हमर,
मिथिलाकेँ अमर बनाउ॥९१॥

राजा जनक-सुनयना रानी,
पूज्यपिता आ माता।
हुनक पुत्र भऽ जोरी अपने,
मिथिला सँ प्रिय नाता॥९२॥

तकर बाद हम आयब,
अपने होयब अग्रज भ्राता।
ब्रह्म राम केर सार होयब,
लिखने छथि भाग्य विधाता॥९३॥

पारवती पति शंकरजी केर
अपने भक्त महान।
तकरे कारण अपनेपर
अछि हमरो सबहक ध्यान॥९४॥

जिनकापर शिव-शक्ति कृपा,
पाबथि श्रीरामक स्नेह।
परम तत्त्व ई गूढ़ बात,
से बूझथि मात्र विदेह॥९५॥

हम अपने केर बहिन बनब,
से दस वर्ष केर बाद।
मुदा न अपने राखब एहिले,
मनमे कोनो विषाद॥९६॥

पहिनहि सँ भऽ गेल छलनि,
ई अति पवित्र अनुबन्ध।
मिथिलावासी केँ सीता सँ
भाइ-बहिन सम्बन्ध॥९७॥

सिद्धि कुँवरि, लक्ष्मीनिधि केर,
जे प्रिया परम अनुगामी।
श्रीसीतारामक अटल भक्त,
अति पावन दुनू पराणी॥९८॥

जनक-सुनयना तनय संत,
लक्ष्मीनिधि मिथिलाधीश।
श्रीसीताजीक अग्रज,
धर्म धुरन्धर सौम्य मुनीश॥९९॥

लंकासँ उत्तम मिथिलाकेर,
जे भावी अधिकारी।
दिव्य शक्ति केर भ्राता भऽ कऽ,
रहितथि कोना भिखारी॥१००॥
श्री सीताराम, श्री सीताराम, जय सीताराम, जय सीताराम ।

श्री सीताराम, श्री सीताराम, जय सीताराम, जय सीताराम ॥

श्री सीताराम, श्री सीताराम, जय सीताराम, जय सीताराम ।

श्री सीताराम, श्री सीताराम, जय सीताराम, जय सीताराम॥