कविता
– वन्दना चौधरी
बैसल छेलौं बहुत प्यासल,
व्याकुल एकटा गाछ के तर में
जे कखन ओ इनार स बान्हल डोरी
जाहि में छै एकटा डोल बान्हल,
ओ ऊपर आओत और हम अपन प्यास बुझेब।
तखने आओल एक झंझावात के आवाज़,
मोन त कुही भके कनेय लागल,
किये त आब हम पियासल रैह जेब।
ओ डोल जे हमरा लेल ऊपर आबि हमर प्यास मिटबैत,
अपन अमृत के धार स
ओकर डोरी टुइट गेल और,
ओ चैल गेल एक धरातल के अंधकार में,
कहियों नहि घुइर के अबै के लेल,
डोल त ओहि डोरी में फेर दोसर बन्हा जेत,
मुदा नै जैन कखन और कहिया,
ता धरि की हम पियासल रही,
की आगू बैढ़ ताकी अपन दोसर गंतव्य,
जतय हम भैर पोख,
पैन पी और क सकी अपन तन मन शीतल।

3 Comments
बहुत भावपूर्ण रचना छैक जतेक प्रशंसा कयल जाय काम पड़त। जीवन के संग संघर्ष के अटूट लागि छैक लेकिन एकरा पार करैत जीवन के चलायमान रखबाक जरुरत छैक।
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति👌👌
वास्तविक जीवन दर्शन !!!