निखंड साड़ी आ काकी संग बरसाइत पाबनिक पूजा

मैथिली लघुकथा

– रूबी झा

बरसाइत पावैन छल। मीना कहली पति सँ सब आय नव नुवा पहिरै छै, हमरा त अहाँ किनो नै देलौं। पिछलो साल नैहर गेल रही भातिजक उपनयन में भेटल विदाई में नुवा उहे पहिर क’ केलौं। एते बात सुनि बजला विद्या नन्द (मीना के पति), “अगर अहाँ २०टा टका हर महिना बचेने रैहतौं त एकटा नुवा ल लैतौं”, मीना बजली ५ टका त कुनू महिना में बचिते नैह अहि, अहाँ २०टा टका के बात करै छी।दुनू गोटे बात करिते रहैथि कि मीना के पीतिया सास आबि गेलखिन, “कनियाँ चलब नै पूजा करय”, मीना जबाब देलखिन, “काकी कि जेब एकोटा निखंड नुवा नै अछि”। काकी कहलखिन यै कनियाँ चलु ना कुनू नुवा पहिर क, कि हेतै। हम त फूल-लोढ़ी तक केने रही अहाँक ससुर बला फेरलाहा धोती पहिर क। आब न फैशन चललैया एते सभ किछु में निखंडे नुवा-साड़ी चाही। कते लोक कीनत और कतय स कीनत। आय कि त बिवाह के दिन, आय कि त जनम दिन, तहन दुर्गापूजा और कालीपूजा में खोईंछ भरब ओहि में निखंड नुवा चाही, तहन ई गाछ तरक पावैन, बाप रे बाप! एहनो कहूँ भेलैया। हमरा त बिवाह के तारीखो यादो नहि अछि, हमरा जनमदिन वला तारीख सेहो नै बुझल अछि। हाँ माय कहै छल बैसाख महिना रहैय, ओहि बरख लाल काका सेहो मरल रहैथि, और अकाल बड भयंकर ओहि साल सेहो पड़ल रहैय। काकी केर प्रवचन खतम भेलैन, मीना तैयार भऽ पोरके सालक रखलाहा नुवा पहिरि काकी संगे विदा भ गेली पावैन करय लेल गाछ तर।