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गरीबी कोना घटय – समय-सान्दर्भिक कविता

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कविताः गरीबी उन्मूलन

– प्रवीण नारायण चौधरी, विराटनगर, नेपाल

गरीबी कोनाक घटय

मंच जीवनक सजल
कवि लिखै अछि गजल
कल्पनाकेर संसारमे
माथ हरदम सोचय
काज बस कोना हुअय
गरीबीकेर नाम पर
कवित आर कथा लिखी
सुनि जेकर किछु मर्म
लोक जे कानय-बजय
मंत्रमुग्ध भऽ सब कियो
चारू दिशि ताली पीटय
भावनामे बहियो कियो
कानि-कानि छाती पीटय
मगर गरीबी कसैया
बेरसँ नहिये हँटय
गरीबी धरि ना घटय
दोहा भले चुप रहय
लेकिन मोन ई कानय
गरीबी कोनाक घटय
से आब कहु के सोचय
से आब कहु के करय

हरि: हर:!!

(वर्तमान राजनीतिमे गरीब आ गरीबी किवर्ड रहैछ – सबहक जुबान पर बस गरीबक मसीहा बनबाक आ घोषणापत्रसँ हर बेर समाधान निकालबाक वादा – लेकिन वोट पेला उपरान्त आइ देश निर्माणक एतेक वर्ष बितलोपर गरीबी जस के तस होयबाक बात सही मे आत्माकेँ कचोटैत अछि। फोटो – साभार आदरणीय बी एन झा, मधुबनी।)

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