मानव जीवन आ चारि आश्रमः ज्ञान सँ भरल पठनीय आ मननीय आलेख

आश्रम चतुष्टयपर एक विहंगम दृष्टि
 
– स्वामी श्रीविज्ञानानन्दजी सरस्वती
 
(मूल आलेखः हिन्दी, अनुवादः प्रवीण नारायण चौधरी)
 
चारि वर्ण आ चारि आश्रम प्राचीनकालिक अछि अर्थात् वैदिक कालीन अछि। एहि लेल मनुस्मृति मे कहलो गेल छैक जे ‍-
 
चातुर्वर्ण्यं त्रयो लोकाश्चत्वारश्चाश्रमाः पृथक्।
भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात्प्रसिध्यति॥
 
– मनुस्मृति १२/९७
 
वेदक कथनानुसार चारि वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आ शूद्र), तीन लोक (भूलोक, अन्तरिक्षलोक आ द्युलोक), चारि आश्रम (ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम आर संन्यासाश्रम) तथा भूत, भव्य ओ भविष्य – ई तिनू काल वेदहि सँ सिद्ध होइत अछि, मुदा एहि प्रसंग मे हम मात्र आश्रम-चतुष्टय केर सम्बन्ध मे संछिप्त विचार प्रस्तुत करबाक प्रयास करब।
 
आश्रम शब्द ‘आ+श्रम्+आधारे घञ्’ सँ निष्पन्न होएछ, जेकर अर्थ छैक ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ आर संन्यास आश्रम आदि। एकरा अलावे ऋषि-मुनि केर निवासस्थान, साधु-संन्यासी लोकनिक मठ, तपोवन तथा विद्यार्थीक निवासस्थान आदि सेहो आश्रमपद केर अर्थ थिक। मनुष्य-जीवन मे सेहो साधारणतः चारि गोट अवस्था होएत छैक – किशोरावस्था, युवावस्था, प्रौढावस्था आ वृद्धावस्था। एहि तरहें चारि आश्रम सेहो छैक – ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम आर संन्यासाश्रम।
 
शास्त्र मे कहल गेल छैक ‘शतायुर्वै पुरुषः’ मनुष्यक आयु अन्यून सौ वर्ष मानल गेलैक अछि, मुदा सौ वर्ष धरि मनुष्य एक्के अवस्था मे बनल रहय – से बात हमरा लोकनिक आर्य ऋषि लोकनि केँ मंजूर नहि छलन्हि। यैह कारण छैक जे उक्त सौ वर्षक समय केँ २५-२५ वर्ष कय केँ चारि आश्रमक रूप मे विभाजित कयल गेल। जेना २५ वर्ष धरि ब्रह्मचर्याश्रम, २५ वर्ष धरि गृहस्थाश्रम, २५ वर्ष धरि वानप्रस्थाश्रम आर २५ वर्ष धरि संन्यास- आश्रम निर्धारित कयल गेल अछि। कारण ई छैक जे मानव-जीवन मात्र जागतिक भोग-विलास वास्ते नहि भेटल अछि, प्रत्युत अभ्युदय (उत्तरोत्तर उन्नति) आर निःश्रेयस (अनात्मबंध सँ मुक्ति) केर प्राप्तिक लेल भेटल अछि। ताहि हेतु एना विधान कयल गेल अछि।
 
१. ब्रह्मचर्याश्रम – प्रथम आश्रम ब्रह्मचर्याश्रम थिक। प्राचीन वैदिक काल केर मर्यादाक अनुसार बालक केर यज्ञोपवित-संस्कार कय केँ विद्याध्ययनक लेल आचार्यकुल या गुरुकुल मे पठा देल जाइत छल। आचार्यकुल मे ब्रह्मचारीक नियम-संयमपूर्वक रहिकय विद्याध्ययन करबाक होइत छल। ब्रह्मचारी केँ आलस्य, प्रमाद तथा दीर्घसूत्रता आदि दोष केँ परित्याग करबाक होइत छल। ब्रह्मचर्यक पालनपूर्वक मात्र उच्च शिक्षा प्राप्त कय लेबाक होइत छल। विद्या आ ब्रह्मचर्यक पालन सँ मात्र आयु, बल, पराक्रम, कीर्ति, यश तथा ब्रह्मवर्चस आदि गुण प्राप्त करब होइत छल। यैह कारण शास्त्र मे कहलो गेल अछि –
 
प्रथमे नार्जिता विद्या द्वितीये नार्जितं धनम्।
तृतीये नार्जितं पुण्यं चतुर्थे किं करिष्यति॥
 
– चाणक्यनीति ९३
 
जे पहिल अवस्था मे अर्थात् किशोर-अवस्था मे विद्या नहि पढलक, द्वितीय अवस्था यानी युवावस्था मे धन नहि कमेलक आ तृतीय अवस्था अर्थात् प्रौढावस्था मे धर्म नहि कमेलक अछि अर्थात् मोक्षप्राप्तिक लेल कोनो उपाय नहि कयलक अछि, ओ भला चारिम अवस्था मे यानी बुढापा मे किछु कि कय सकत? अर्थात् किछुओ नहि कय सकत। एहि पर मनु महाराज कहलनि अछि –
 
नित्यं स्नात्वा शुचिः कुर्याद् देवर्षिपितृतर्पणम्।
देवताभ्यर्चनं चैव समिदाधानमेव च॥
 
– मनुस्मृति २/१७६
 
ब्रह्मचारी केँ चाही जे ओ नित्य प्रातःकाल उठिकय नित्यकर्म सँ निवृत्त भऽ कय शुद्ध-पवित्र भऽ देवता, ऋषि और परलोकवासी पितरक तर्पण करय तथा देवता लोकनिक पूजा-अर्चना करय। सन्ध्या-वन्दन तथा अग्निहोत्रादि यज्ञकार्य अवश्य कयल करय। ब्रह्मचारी दुइ तरहक होइत अछि – एक उपकुर्वाण आर दोसर नैष्ठिक। एहि लेल गरुड़पुराण मे कहलो गेल अछि –
 
ब्रह्मचार्युपकुर्वाणो नैष्ठिको ब्रह्मतत्परः॥
योऽधीत्य विधिवद्वेदान् गृहस्थाश्रममाव्रजेत्।
उपकुर्वाणको ज्ञेयो नैष्ठिको मरणान्तकः॥४९/६-७॥
 
जे विधिवत् वेद-वेदांग आदि विद्या सभक अध्ययन पूर्ण कयलाक बाद मे गृहस्थाश्रम मे प्रवेश करैत अछि, ओकरा उपकुर्वाण ब्रह्मचारी कहल जाइत छैक, मुदा जे आजीवन ब्रह्मचारी रहिकय समस्त वेद-वेदान्तादिक विद्या सभ अध्ययन पूर्ण कय केँ ब्रह्मचर्याश्रम सँ सीधा संन्यासाश्रम मे प्रवेश कय जाइत अछि, ओ नैष्ठिक ब्रह्मचारी कहाइत अछि। एहि लेल समस्त वेदादिक शास्त्रक अध्ययन कराकय आचार्य-गुरु स्वयं समावर्तन-संस्कार कराकय अपन अन्तेवासी उपकुर्वाण ब्रह्मचारी केँ लक्ष्य करैत दीक्षान्त भाषण करैते गृहस्थीसम्बन्धी किछु खास-खास बात सभ केँ उल्लेख करैत कहैत छथि –
 
सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः।…. (तैत्तिरीय उपनिषद् १/११)
 
हे सौम्य! तूँ सदैव सत्य बजिहें। धर्मक आचरण करिहें। स्वाध्याय मे कदापि प्रमाद जुनि करिहें। आचार्य केँ जे प्रिय होइन्ह वैह दक्षिणा मे दिहें आर हुनकहि आदेशानुसार गृहस्थाश्रम मे प्रवेश करिहें। गृहस्थाश्रम मे प्रवेश कय सन्तति-सूत्र केँ अक्षुण्ण बनेने रखिहें, ओ कहियो लोप होमय नहि दिहें। धर्मपालन मे प्रमाद (बहानापूर्वक मना) नहि करिहें। अपन ऐश्वर्य केँ बढेबा मे प्रमाद जुनि करिहें। देवता आर पितर केर प्रति जे तोहर कर्तव्य छौक, से सदिखन ध्यान मे रखिहें आर यथासमय ओकर उद्देश्य सँ कार्य सम्पन्न करिहें। आदि। एकरा बाद समावर्तन-संस्कार कयल गेल उपकुर्वाण ब्रह्मचारीगण अपन-अपन घर मे जा कय विवाह-संस्कार कय केँ गृहस्थाश्रम मे प्रवेश करैत अछि।
 
२. गृहस्थाश्रम – गृहस्थाश्रम दोसर आश्रम थिक, जाहि मे लोक विवाहादि कय केँ गृहस्थ-धर्मक पालन करैत अछि। विवाह-संस्कार पितृ-ऋण सँ उऋण भेलाक लेल कयल जाइत अछि। कारण ई छैक जे मनुष्य तीन ऋण सँ ऋणी बनिकय जन्म लैत अछि। अर्थात् देव-ऋण, ऋषि-ऋण आर पितृ-ऋण – ई ऋण थिक। एहि ऋण केँ चुकेबाक लेल हवन-यज्ञादिक द्वारा देव-ऋण, वेद-शास्त्रक अध्ययन-अध्यापन आदि कार्यक द्वारा ऋषि-ऋण आर विवाहित पत्नी सँ पुत्रोत्पत्ति आदि कार्यक द्वारा पितृ-ऋण चुकायल जाइत छैक। मनुष्य कर्मयोनि मे होयबाक कारण ओहिपर ई तीनू ऋण लागू होइत छैक, इतर योनि मे नहि।
 
विवाह-संस्कार हमरा लोकनिक वैयक्तिक ओ सामाजिक जीवन केँ सुव्यस्थित बनेने रखबाक लेल एकटा महत्वपूर्ण व्यवस्था थिक। एहि सँ स्त्री-पुरुष सुसंस्कृत तथा सभ्य बनैत अछि आर धर्मात्मा बनैत अछि। अतः विवाह संस्कारक मुख्य उद्देश्य छैक – सन्तान उत्पन्न करब आ धीरे-धीरे ओकरा सब केँ जीवनोन्नतिक दिशा मे लऽ जाकय निवृत्तिमार्ग दिश अग्रसर केनाय, जाहि सँ आगू चलिकय ओ मुक्ति-मोक्ष केँ प्राप्त कय मनुष्य-जीवन केँ धन्य बना सकत।
 
३. वानप्रस्थाश्रम – वानप्रस्थाश्रम तेसर आश्रम थिक। गृहस्थाश्रमक कार्य पूर्ण भऽ गेलापर एहि आश्रम मे प्रवेश करबाक विधान अछि। गृहस्थाश्रम केर संस्कार नितान्त प्रबल होयबाक कारण संन्यास-धर्म केर ठीक-ठीक पालन नहि भऽ सकैत अछि। एहि लेल गृहस्थाश्रम केर संस्कार केँ निस्तेज-दुर्बल बनेबाक लेल बीच मे ई वानप्रस्थाश्रम केर विधान कयल गेल अछि। अपन पुत्रक पुत्र अर्थात् पौत्र केर मुंह देखि लेलापर पितृ-ऋण चुक्ता भऽ जाइछ। वानप्रस्थाश्रम सब सँ बेसी कठोर होइछ; एहि मे तप, त्याग, व्रत, अग्निहोत्र, जप, ध्यान तथा समाधि आदिक पर्याप्त मात्रा मे अभ्यास करब होएत छैक। तप आ साधनाक द्वारा शरीर केँ सुखा देनाय होइत छैक। केवल यैह नहि, किंतु आरण्यक, उपनिषद् तथा दर्शन, पुराण आदि ग्रन्थक अध्ययन, ग्रन्थ-निर्माण, देश-सुधार, राष्ट्र-निर्माण आदि कार्य मे योगदान करब आदि सेहो एहि वानप्रस्थाश्रम मे रहिकय कयल जाइछ। अरण्य मे वास कयला सँ आत्मबल बढैत छैक, एहि सँ मोक्ष-साधना तीव्रगति सँ आगू बढैत छैक, जाहि सँ यतिधर्म केर लेल ओ अधिकारी बनि जाइत अछि।
 
४. संन्यासाश्रम – संन्यास शब्द ‘सम्+नि+अस्+घञ्’ सँ निष्पन्न होएछ, जेकर अर्थ छैक सम्यक् प्रकारेण परित्याग। अर्थात् जागतिक विषय-वस्तु सँ पराङ्मुख भऽ गेनाय, छोड़ि देनाय या पूर्णतया परित्याग कय देनाय। दारा, पुत्र, इष्ट-मित्र आदि सब सम्बन्धी लोकनि सँ सम्बन्ध तोड़ि देनाय आदि सब संन्यास-धर्मक अन्तर्गत अबैत छैक। समस्त सांसारिक कामना, वासना तथा एषणा सभक परित्याग कय केँ पूर्ण वैराग्य धारण करब संन्यास थिक। गीता मे कहलो गेल छैक –
 
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः
 
– गीता १८/२
 
समस्त काम्य कर्म केर परित्याग कय देबाक नाम संन्यास थिक।
 
वेद मे सेहो कहल गेल छैक –
 
य इन्द्र यतयस्त्वा भृगवो ये तुष्टुवुः।
ममेदुग्र श्रुधी हवम्॥ऋक्. ८/६/१८॥
 
हे इन्द्र! परमात्मन् प्रभो! जे ‘यतयः’ वैदिक संन्यासीगण और भृगुवंशी श्रेष्ठ पुरुषगण आत्मकल्याण (आत्मोद्धार) केर लेल अहाँ स्तुति-उपासना करैत छथि – भजैत छथि, मोक्षक इच्छा करयवला हम सेहो अहाँक उपासना करैत छी। अहाँ हमर स्तुति केँ सुनू आर हमरा आध्यात्मिक साधना मे सफलता प्रदान करू, सिद्धि देल जाउ।
 
अन्यत्र सेहो गेल छैक –
 
यद्देवा यतयो तथा भुवनान्यपिन्वत्॥ऋक्. १०/७२/७॥
 
एहि मन्त्र मे ‘यतयः’ शब्द संन्यासीक लेल आयल छैक; कियैक तँ संन्यासी टा केँ यति – संन्यासी तथा परिव्राजक आदि नाम सँ संबोधन कयल जाइत छैक।
 
एहि ऋग्वेद मे आगुओ कहल गेल छैक –
 
मुनयो वातरशनाः पिशङ्गा वसते मला।
वातस्यानु ध्राजिं यन्ति यद्देवासो अविक्षत्॥
उन्मदिता मौनेयेन वाताँ आ तस्थिमा वयम्।
शरीरेदुस्माकं यूयं मर्तासो अभिपश्यथ॥ऋक. १०/१३६/२-३॥
 
वातरशनक वंशज संन्यासीगण कषायवस्त्र धारण करैत छथि। ओ सब यति – संन्यासीगण देवस्वरूप केँ प्राप्त भऽ कय हिरण्यगर्भक गतिक अनुगामी भेलाह अछि। हम संसारक समस्त लौकिक व्यवहार केँ परित्याग कय केँ उन्मत्तवत् आनन्दपरिपूर्ण परमहंस दशा केँ प्राप्त भऽ गेल छी। हम प्राणक जन्म-मरणरूप धर्मक ऊपर जन्म-मरण सँ रहित ब्रह्म केर लोक मे चढि गेल छी। हे मनुष्य लोकनि! अहाँ सब हमर (ब्रह्मलोकमय) शरीर टा केँ देखैत छी, वास्तव मे तँ हमर व्यष्टि-उपाधिक आत्मतत्त्व तऽ समष्टि ब्रह्मस्वरूप टा भऽ गेल अछि।
 
अतः संन्यासधर्म वैदिक अछि, एहि मे किंचित् मात्र सन्देह नहि छैक। मनुस्मृति ६/३३ मे कहल गेल छैक –
 
चतुर्थमायुषो भागं त्यक्त्वा सङ्गान्परिव्रजेत॥
 
आयुक तेसर भाग केर बोन (वन) मे बिताकय आयुक चारिम भाग मे सर्वसंग केर परित्याग कय संन्यास धारण करू।
 
उक्त प्रमाण सँ स्पष्ट भऽ जाइत छैक जे संन्यास-धर्म वैदिक अछि, अवैदिक नहि। तैँ ‘यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत्॥’ (नारदपरिव्राजकोपनिषद् ३/७७) अर्थात् जाहि दिन तीव्र वैराग्य उत्पन्न भऽ जाय, ओहि दिन संन्यास धारण करू। तात्पर्य ई अछि जे ब्रह्मचर्य, गृहस्थ आर वानप्रस्थ आदि तिनू आश्रम केर क्रमशः अतिक्रम करैत अन्तिम संन्यास-आश्रम मे प्रवेश करबाक लेल कहल गेल अछि। मुदा एहेन विधान तऽ उपकुर्वाण ब्रह्मचारी लोकनिक लेल अछि कियैक तँ वैह टा प्रत्येक आश्रम मे निवास करैत अन्त मे संन्यास-आश्रम मे प्रवेश करैत छथि, मुदा नैष्ठिक ब्रह्मचारीक लेल ई नियम नहि अछि, ओ तऽ ब्रह्मचर्याश्रम सँ सीधे संन्यासाश्रम मे प्रवेश करबाक विधान अनुसरण करैत छथि। जेना कहल गेल छैक – ‘ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत।’ अर्थात् ब्रह्मचर्याश्रम सँ संन्यासाश्रम मे प्रवेश करथि – एहेन विधान अछि।
 
बृहदारण्यक श्रुति मे महर्षि याज्ञवल्क्य तथा मैत्रेयी केर एक लम्बा संवाद आयल अछि, जे हुनक संन्यास-धारणक सम्बन्ध मे अछि। महर्षि याज्ञवल्क्य केर दुइ पत्नी छलन्हि – कात्यायनी आ मैत्रेयी। याज्ञवल्क्यजी मैत्रेयी सँ कहलखिन – ‘हे कल्याणि! आब हम एहि गृहस्थाश्रम सँ ऊपर उठिकय संन्यास-आश्रम मे प्रवेश करय चाहैत छी। अतएव अहाँ दुनू गोटा सँ हम अनुमति चाहैत छी आर सम्पत्ति केँ सेहो अहाँ दुनू गोटा मे बँटवारा कय देबय चाहि रहल छी। तेकर बाद हम बोन दिश चलि जायब।’
 
ई सुनिकय मैत्रेयी याज्ञवल्क्य सँ कहलखिन, “भगवन्! यदि धन-धान्य सँ परिपूर्ण सारा पृथ्वी हमर भऽ जायत त कि ओहि सँ हम अमर बनि सकैत छी?” याज्ञवल्क्य कहलखिन, “नहि मैत्रेयी! नहि। धन सँ तऽ अहाँक जीवन धनिक जेहेन बीतत, अमरत्व या अमृतत्त्व केर प्राप्ति नहि भऽ सकत।” तखन मैत्रेयी हुनका सँ कहलखिन –
 
येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूहीति॥ (बृहदारण्यकोपनिषद् ४/५/४)
 
जाहि धन-सम्पत्ति सँ हम अमर नहि बनि सकैत छी तखन ओ लइये कय हम कि करब? तैँ, हे भगवन्! जे किछु अमरत्वक विषय मे अहाँ जनैत छी, से बातक हमरा उपदेश करू।
 
तखन याज्ञवल्क्यजी मैत्रेयी केँ एक लम्बा सारगर्भित उपदेश दय केँ अपन विपुल सम्पत्ति केँ दुनू पत्नी मे उचित बँटवारा कय केँ अपन वचनक अनुसार घरक परित्याग कय विद्वत्-संन्यास धारण कयलनि आर परिव्राज्य जीवन व्यतीत कयलनि।
 
संन्यासीक आवश्यक कर्तव्य
 
ध्यानं शौचं तथा भिक्षा नित्यमेकान्तशीलता।
भिक्षोश्चत्वारि कर्माणि पञ्चमं नोपपद्यते॥
 
संन्यासीक प्रथम कर्तव्य थिक ध्यान। अतः नित्यप्रति पर्याप्तमात्रा मे ब्रह्म केर ध्यान करय। दोसर कर्तव्य थिक आत्मशुद्धि करब, अर्थात् मल, विक्षेप तथा आवरण आदिक दूरीकरण करब। संन्यासीक तेसर कर्म थिक क्षुधाक निवृत्तिक लेल भिक्षा ग्रहण करब आर चारिम कर्म थिक एकान्तवास करब; कियैक तँ एकान्त मे मात्र ब्रह्मध्यान-रूप ब्रह्माभ्यास ठीक सँ भऽ पबैत अछि। पाँचम कर्म संन्यासीक नहि बतायल गेल अछि; लेकिन हाँ, मनुस्मृति – ६/४४-६० मे कथित नियम केर पालन अवश्य करबाक चाही जाहि सँ यति – संन्यासी कैवल्यमोक्ष केँ अनायास प्राप्त भऽ सकय; कियैक तँ एहि मे मानव-जीवनक परिपूर्णता निहित अछि।
 
हरिः हरः!!