मैथिली पोथी ‘किछु फुरा गेल हमरा’ पर साहित्यकार-समीक्षक दिलीप कुमार झा केँ कि फुरेलनि

पोथी समीक्षा

पोथीक नामः किछु फुरा गेल हमरा, रचनाकारः किसन कारीगर, समीक्षकः दिलीप कुमार झा

दिल्ली सँ श्री किशन कारीगर जीक कविता संग्रह आयल अछि। संग्रहक नाम अछि ‘किछु फूरा गेल हमरा’ । पोथीमे कुल बयालिस गोट कविता संग्रहित अछि। पाँच बर्ख पूर्ब प्रकाशित एहि पोथीक कविता सभ कविक प्रारंभिक अवस्थाक कविता सभ अछि से कवि अपनहुँ स्वीकार करै छथि। सिखबाक अवस्थामे प्राय: सभ कविक इएह स्थिति रहैत छैक से हिनको छनि तुकबन्दी सँ कविताक पांती जोड़नाइ। संग्रहक पहिल कविता अछि ‘आबि गेल नबका साल’, पांती देखियौ

कक्का बजला कहु कि हाल-चाल
काकी बजली आबि गेल नबका साल ।

जातिक जकरन मिथिलाक सभसँ पैघ समस्या अछि। ताहिपर कवि करगर प्रहार कयलनि अछि – “हम छी मिथिलाक मैथिल हमर ने कोनो जाति अछि” । वीर जवान सन देशभक्तिपूर्ण कविता सेहो आछि। एहि संग्रहमे बहुतरास हास्य कविता सभ सेहो अछि। बीच -बीच मे गंभीर विषय वस्तुपर सेहो कविता छनि जेना एकटा कविता छनि ‘किडनी चोर’ । बहुत मार्मिक कविता छनि।

कतेक छटपटाइत अछि करेजा/एकबेर किडनी बेच क’ त’ देखू।

हास्य कविता मे सेहो गंभीर विषय वस्तु उठेबाक प्रयास कयलनि अछि। हिनक संग्रह हमरा नीक लागल अछि।

कविता सभ सिखबाक अवस्थाक बोध करबैत अछि से स्वाभाविके कियो एकेबेर पकठोस नै भ’ जाइत अछि । जँ एकेबेर पकठोस भ’ क’ निकलैत अछि त’ ओकर सही मूल्यांकन नहि भ’ सकैत अछि । किछु ने किछु संदेह उत्पन्न करैत अछि जे एहि बेकतिक कहियो कविता कथा नहि पढ़लहुँ एकेबेर एहन सोंटल समधानल कविता, कथा ल’ क’ कतय सँ आबि गेल मुदा युग एहन छै जँ कियो बाजत त ओकर कपार फोड़ि देतै। रचना एकटा स्वाभाविक आ निरंतर प्रक्रिया अछि।

2013 के पछाति ई की लिखलनि से हमरा ज्ञात नहि अछि ई जखन अपन पछिला पाँच बरिसक रचना सँ सुधी पाठक केँ अवगत करेता तखन हिनक कविता केँ फरिछाक’ जानल जायत। हिनका बिषयक ज्ञान छनि, आम लोकक सभ सँ पसिनगर विधा हास्य मे ई रचना करै छथि से हिनका लोकप्रियता दिया सकैत छनि मुदा अनावश्यक तुकबन्दी सँ बाँचथि । गंभीर विषय केँ गंभीरता सँ उठाबथि। बेसी सँ बेसी पढ़थि आ मैथिलीक उत्तम रचनाकार बनथि ताहि शुभकामनाक संग।