अर्थ आ रहस्यक भेद (श्रीमद्भगवद्गीताक एक श्लोक केर रहस्य)

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अर्थ आ रहस्यक भेद

(श्रीमद्भगवद्गीताक एक श्लोक केर रहस्य)

– ब्रह्मलीन परम श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका (अनुवादः प्रवीण नारायण चौधरी)
 
एकटा बड़ा सन्तोषी, सदाचारी आर विद्वान् ब्राह्मण छलाह, मुदा छलाह ओ गरीब। हुनक पत्नी बड़ा पतिव्रता, विदुषी, तत्त्वज्ञान सँ सम्पन्न आ जीवन्मुक्त छलीह। ओहि देशक राजा सेहो तत्त्वज्ञानी, जीवन्मुक्त महात्मा छलाह। ब्राह्मणपत्नी एक दिन विचार केली – हमर पतिदेव सन्तोषी, सदाचारी आ विद्वान् छथि, ताहि हेतु ओ मुक्तिक अधिकारी तऽ छथिये, हिनका जँ हमरा लोकनिक जीवन्मुक्त राजा संग भेंट भऽ जाइन्ह तँ ईहो जल्दिये तत्त्वज्ञानी-जीवन्मुक्त भऽ भऽ सकैत छथि। ई सोचिकय ओ पति संग प्रार्थना केलीह – ‘पतिदेव! आइ-काल्हि अपन शरीरनिर्वहनक लेल बहुत तंगी भऽ गेल अछि आर आमद केर कोनो रस्तो नहि देखाइछ। सुनल जाइत अछि जे एतुका राजा बड़ा सदाचारी, जीवन्मुक्त महात्मा छथि तथा ब्राह्मणक आदर-सत्कार करयवला आ परम उदार छथि, अहाँ हुनका संग एक बेर भेट लेब तऽ ओ अहाँक उचित सत्कार कय सकैत छथि आर शास्त्रविधिक अनुसार जँ राजा बिना याचना कएने किछु देथि तऽ ओ ब्राह्मणक लेल अमृतक समान थिक। से अहाँ जनिते छी।’
 
पण्डितजी कहलखिन – ‘अहाँक कहब ठीक अछि; मुदा हम जा धरि केकरो कोनो उपकार नहि कय दी, ताबत धरि अयाचक वृत्ति सँ पर्यन्त – बिना मंगने ओकरा सँ दान लय केँ जीवन-निर्वाह करब निन्दास्पद बुझैत छी; तैँ हम एना नहि करब, चाहे हमरा भूखहि कियैक न रहय पड़य।’
 
ब्राह्मणपत्नी बजलीह – ‘अहाँ विद्वान् थिकहुँ, राजाक यथोचित उपदेश दय हुनकर उपकार कय सकैत छी।’ ई बात पण्डितजी केँ किछु रुचलनि, मुदा हुनकर मोन राजा लग जेबाक नहि भऽ रहल छलन्हि। अन्त मे पत्नीक बहुत कहलापर ओ राजी भऽ गेलाह आर राजसभा मे चलि गेलाह। पण्डितजीक सद्गुण आ सदाचरणक ख्याति देश भरि मे पसरल छल। राजा द्वारा पण्डितजीक बड़ा आदर-सत्कार कयल गेल। कुशलक्षेम-प्रश्नोत्तरक अनन्तर राजा बहुते-रास स्वर्णमुद्रा मंगबाकय पण्डितजी केँ भेंट कयलन्हि। पण्डितजी ओहि सबकेँ अस्वीकार करैत कहलखिन – ‘राजन! अहाँ बड़ा उदार छी, हम ई जनैत छी। मुदा हमरो एकटा नियम अछि, हम केकरो कोनो उपकार कएने बिना ओकरा सँ अयाचितरूप मे पर्यन्त धनि नहि लैत छी। अहाँ हमरा कोनो काज सौंपू आर ताहि सँ हम अहाँ केँ सन्तोष करा सकी, तेकरा बाद अपने जँ किछु देब तऽ ओ लेल जा सकैत अछि।’ राजा कहलखिन – ‘पण्डितजी! बहुत नीक। अहाँ सदाचारी ब्राह्मण छी। हम अहाँ सँ गीताक रहस्य सुनय चाहैत छी। अहाँ हमरा कृपापूर्वक गीताक बारहम अध्यायक सोलहम श्लोकक भावसहित स्पष्ट अर्थ बुझाउ।’
 
पण्डितजी पहिने श्लोक पढलाह, फेर ओकर शब्दार्थ बतेलन्हि –
 
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।
सर्वारम्भापरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥१२-१६॥
 
‘जे पुरुष आकांक्षा सँ रहित, बाहर-भीतर सँ शुद्ध, चतुर, पक्षपात सँ रहित आर दुःख सँ छूटल अछि, ओ सब आरम्भक त्यागी हमर भक्त हमरा प्रिय अछि।’
 
तदनन्तर ओ श्लोकक भावार्थ एहि तरहें बताबय लगलाह –
 
जेकरा कोनो प्रकारक इच्छा, स्पृहा आर कामना नहि हो, जे आप्तकाम हो आ जेकरा कोनो बातक परवाह नहि हो, ओकरा ‘अनपेक्ष’ कहल जाइछ।
 
जेकर अन्तःकरण एकदम पवित्र हो, जेकर बाहरक व्यवहार सेहो उद्वेगरहित, पवित्र आर न्याययुक्त हो; जेकर दर्शन, भाषण, स्पर्श आर वार्तालाप सँ मात्र लोक पवित्र भऽ जाय, ओ ‘शुचि’ थिक।
 
जाहि महान् कार्यक लेल मनुष्य-शरीर भेटल अछि, ओकरा प्राप्त कय लेनाय अर्थात् भगवान् केँ प्राप्त कय लेनाय मनुष्यक यथार्थ ‘दक्षता’ थिक; जे अपन काज बना लैत अछि, वैह ‘दक्ष’ कहाइत अछि।
 
जे गवाही दैत समय आर न्याय या पंचायत करैत समय कुटुम्बी, मित्र, बन्धु, आदिक दृष्टि सँ या राग, द्वेष, लोभ, मोह आ भय आदिक वश भऽ कय केकरहु पक्षपात नहि करैछ – सदा सर्वथा पक्षपातरहित रहैत अछि, वैह ‘उदासीन’ कहाइत अछि।
 
कोनो तरहक भारी-सँ-भारी दुःख अथवा दुःखक हेतु प्राप्त भेलोपर जे दुखी नहि होइत अछि अर्थात् जेकर अन्तःकरण मे कहियो कोनो तरहक विषाद, दुःख या शोक नहि होएत छैक, वैह ‘गतव्यथ’ थिक।
 
जे बाहर-भीतर केर सब कर्म केँ त्यागिकय सिर्फ प्रारब्ध पर टा निर्भर रहैत अछि, ओ स्वार्थक सिद्धिक लेल किछुओ कर्म नहि करैत अछि; अपना-आप जे किछु भेटि गेल, ताहि मे सन्तुष्ट रहैत अछि तथा प्रारब्धवश होयवाली क्रिया मे जेकरा कर्तापनक अभिमान नहि छैक, एहेन बाहर आ भीतरक त्यागी केँ ‘सर्वारम्भपरित्यागी’ कहल जाइत छैक।
 
पण्डितजीक उपर्युक्त भावार्थ बता देलापर राजा अत्यन्त नम्रता सँ कहलखिन, ‘महाराजजी! अपने बड़ा सुन्दर अर्थ बतेलहुँ। अहाँ कथन सर्वथा युक्तियुक्त आर शास्त्रसंगत अछि। तथापि हमर एहेन अनुमान अछि जे श्लोकक बहुत सुन्दर अर्थ बतेलाक बादो अपने एकर रहस्य सँ अनभिज्ञ छी।’ पण्डितजी खौंझाइत बजलाह – ‘रहस्य नहि जनैत रहितहुँ तँ भावसहित अर्थ कोना बता सकितहुँ? हमरा गीताक बावन गोट टीका कण्ठस्थ अछि। एकर अलावे कोनो विशेष रहस्य हो तऽ आर से अपने जनैत होइ तऽ अहीं बताबी।’
 
राजा एकर उत्तर नहि दय बड़ा विनम्र वाणी मे कहलखिन – ‘पण्डितजी! हमरा अहाँक शास्त्रसम्मत सुन्दर व्याख्या सँ बड़ा सन्तोष भेल अछि; हम अहाँक बहुत आभारी छी। तैँ हमर देल गेल भेंट अहाँ कृपया स्वीकार कयल जाउ।’
 
पण्डितजी कहलखिन – ‘राजन! जखन अहाँ हमरा लेल ई कहलहुँ जे हम रहस्य सँ अनभिज्ञ छी, तखन सन्तोषक बात कतय रहल? ई त मात्र कहइये टा लेल सन्तोष थिक। अहाँ केँ जा धरि सन्तोष नहि भऽ जाय, ता धरि अहाँ सँ किछु नहि लेबय चाहैत छी।’
 
राजाक बहुत अनुनय-विनय केलोपर पण्डितजी हुनकर भेंट स्वीकार नहि कयलनि आर ओ घर वापस चलि एलाह। ओम्हर राजा एक विश्वासपात्र गुप्तचर केँ बजाकय कहलखिन – ‘ई ब्राह्मण देवता बड़ा त्यागी, सदाचारी आर स्वाभिमानी विद्वान् छथि। अहाँ हिनकर पाछाँ जाय केँ देखू, घरपर हिनकर केहेन-कि व्यवहार आ वार्तालाप होइत छन्हि आर फेर ओहि बातक सूचना हमरा देल जाउ।’ राजाक आदेश पाबिकय गुप्तचर हुनकर पाछू भऽ लेलनि आर हुनकर सब व्यवहार-वार्तालाप देखैत रहलाह।
 
पण्डितजी घर वापस भेलापर पत्नीक पूछलापर राजसभाक सब कथा आद्योपान्त हुनका सुना देलनि। पत्नी विनय आ प्रेम सँ कहलखिन – ‘स्वामिन्! राजा जे किछु कहलनि से तऽ उचिते प्रतीत होइत अछि। अहाँ केँ तामस नहि करक चाहैत छल।’
 
पण्डितजी – (कनेक क्रोधावेश मे आबिकय आ व्यथित-सन भऽ कय) वाह! अहाँ सेहो राजाएक बातक समर्थन कय रहल छी!
 
पत्नी – नाथ! अहीं तऽ कहल करैत छी जे न्याययुक्त बातक समर्थन करक चाही।
 
पण्डितजी – (किछु आरो उत्तेजना सँ, मुदा ओकरा दबबैत) कि राजाक ई कहब न्याययुक्त अछि जे हमर व्याख्या तऽ सुन्दर अछि, मुदा हम एकर रहसय केँ नहि बुझैत छी?
 
पत्नी – नाथ! अहाँ क्षमा करू। राजाक बात तँ बहुत ठीक अछि। कोनो श्लोकक व्याख्या करब तऽ सहज अछि मुदा ओकर यथार्थ रहस्य बुझब बहुत दुर्लभ अछि।
 
पण्डितजी – केना?
 
पत्नी – जेना ग्रामोफोन पर चूड़ी चढा देल जाइत अछि, ओ वैह गाना गाबि दैत अछि, मुदा ओकर रहस्य केँ ओ थोड़े न बुझैत अछि।
 
पण्डितजी – एह! त कि हम ग्रामोफोन जेकाँ छी?
 
पत्नी – जे पुरुष दोसर केँ उपदेश-आदेश तऽ बड़ा नीक जेकाँ करैत अछि, लेकिन स्वयं ओकरा मे ओ बात चरितार्थ नहि होइक तँ अहीं बताउ, ग्रामोफोन आर ओकरा मे कि अन्तर भेल? राजाक पूछलापर अहाँ श्लोकक जे व्याख्या कएलहुँ, कि ओ सब बात अहाँ मे चरितार्थ होइत अछि?
 
पण्डितजी – कियैक नहि? कोन बात हमरा मे नहि अछि?
 
पत्नी – अहाँ शान्ति सँ हमर निवेदन सुनू। हमर प्रार्थना अछि – अहाँ ओहि श्लोकक प्रत्येक पद केर अर्थ फेरो हमरा बताउ। ‘अनपेक्ष’ केर कि भाव छैक?
 
पण्डितजी – जेकरा कोनो तरहक इच्छा, स्पृहा आर कामना नहि हो, जे आप्तकाम हो आ जेकरा कोनो बातक परवाह नहि हो, ओ ‘अनपेक्ष’ कहाइत अछि।
 
पत्नी – कि अहाँ एहेन छी?
 
पण्डितजी – कियैक नहि? हमरा तऽ कोनो इच्छा, स्पृहा आर कामना नहि अछि। हम तऽ अहींक अनुरोध कयलापर राजा लग गेल रही। आर राजाक अनुनय-विनय केलोपर हम हुनका सँ किछुओ नहि लेलहुँ।
 
पत्नी – बहुत नीक! सत्य छैक, अहाँ हमरे आग्रह पर गेल रही। ई अहाँक हमरा पर दया छल। अच्छा ‘शुचि’ केर कि अभिप्राय अछि?
 
पण्डितजी – जेकर अन्तःकरण अत्यन्त पवित्र हो, जेकर बाहरक व्यवहार सेहो उद्वेगरहित, पवित्र आ न्याययुक्त हो; जेकर दर्शन, भाषण, स्पर्श आर वार्तालाप सँ मात्र लोक पवित्र भऽ जाय, ओ ‘शुचि’ थिक।
 
पत्नी – कि अहाँ बाहर-भीतर सँ एहि तरहें शुद्ध छी? कि अहाँक दर्शन, भाषण, स्पर्श आ वार्तालाप कयला सँ मनुष्य पवित्र भऽ जाइत अछि? कि अहाँक अन्तःकरण मे कोनो विकार नहि होएत अछि? कि अहाँक बाहरक व्यवहार उद्वेगरहित, न्याययुक्त आ पवित्र अछि? यदि एहेन अछि तऽ फेर अहाँक मोन मे क्रोध तथा उद्वेग कियैक भेल आर राजा सँ अहाँ अहंकारक वचन कियैक कहल?
 
पण्डितजी – (विनम्र भऽ कय) ठीक छैक, एहि गुणक तऽ हमरा मे कमी अछि।
 
पत्नी – अच्छा, ‘दक्ष’ केर अहाँ कोन भाव बतेलहुँ?
 
पण्डितजी – जाहि महान् कार्य केर वास्ते मनुष्य शरीर भेटल अछि, तेकरा प्राप्त कय लेनाय अर्थात् भगवान् केँ प्राप्त कय लेनाय मनुष्यक यथार्थ दक्षता थिक, जे अपन काज बना लैत अछि, वैह दक्ष कहाइत अछि।
 
पत्नी – तऽ कि अहाँ जाहि महान् कार्यक लेल संसार मे आयल छलहुँ, ओकरा पूरा कय चुकल छी? कि अहाँ परमपद केँ प्राप्त कय लेलहुँ? नहि तऽ, फेर राजाक कहब उचिते अछि।
 
पण्डितजी – अहाँक कथन सत्य अछि। हमरा मे ई गुण सेहो नहि अछि।
 
पत्नी – ‘उदासीन’ पदक कि अभिप्राय छैक?
 
पण्डितजी – जे गवाही दैत समय, न्याय या पंचायत करैत समय कुटुम्बी, मित्र, बन्धु आदिक दृष्टि सँ या राग, द्वेष, लोभ, मोह एवं भय आदि केर वश भऽ कय केकरहु पक्षपात नहि करैछ – सदा-सर्वथा पक्षपातरहित रहैत अछि, वैह ‘उदासीन’ कहाइत अछि।
 
पत्नी – कि अहाँ पक्षपातरहित छी? कि अहाँ राजाक सम्मुख अपन पक्षक समर्थन नहि केलहुँ? कि अहाँ राजाक एहि कथन पर जे अहाँ श्लोकक रहस्य केँ नहि बुझैत छी, एहि बातपर गम्भीरतापूर्वक ध्यान देलहुँ? नहि तँ, फेर राजाक कहब केना उचित नहि छैक?
 
पण्डितजी – (सरल आ शुद्ध हृदय सँ अपन कमी केँ विनम्र भाव सँ स्वीकार करैत) अहाँ सच कहि रहल छी। सचमुच अहाँ हमर आँखि खोलि देलहुँ।
 
पक्षपातरहित होबक तऽ हमरा मे बड़ा अभाव अछि। कतहु वाद-विवाद होइत अछि तऽ हम अपन पक्ष केँ दुर्बल बुझियोकय अपन पक्ष केर दुराग्रह केँ नहि छोड़ैत छी।
 
पत्नी – अच्छा ‘गतव्यथ’ केर अहाँ कि अर्थ कहैत छी?
 
पण्डितजी – कोनो तरहक भारी-सँ-भारी दुःख अथवा दुःखक हेतु प्राप्त भेलोपर जे दुखी नहि होएत अछि अर्थात् जेकर अन्तःकरण मे कहियो कोनो तरहक विषाद, दुःख या शोक नहि होइत छैक, ओ ‘गतव्यथ’ भेल।
 
पत्नी – कि अहाँ चित्त मे कोनो व्यथा नहि होइत अछि? यदि नहि होइतय तऽ फेर राजाक वचनपर आर हमर समर्थन केलापर अहाँ केँ एतेक उद्वेग आर व्यथा कियैक होबक चाही?
 
पण्डितजी – अहाँक कहब सत्य अछि। ई भाव हमरा मे एकदम्मे नहि अछि। मोन केर बिपरीत भेलापर प्रत्येक पदपर मात्र व्यथा टा नहि भय, उद्वेग, ईर्ष्या, शोक आदि विकार सेहो हमरा मे पर्याप्त मात्रा मे देखाय पड़ैत अछि।
 
पत्नी – अच्छा, ‘सर्वारम्भपरित्यागी’ सँ अहाँ कि बुझैत छी?
 
पण्डितजी – जे बाहर-भीतरक समस्त कर्म सभ केँ त्यागिकय मात्र प्रारब्धपर टा निर्भर रहैत अछि, अपन स्वार्थक सिद्धिक लेल किछुओ कर्म नहि करैत अछि, अपने-आप जे किछु प्राप्त भऽ जाइक, ताहि मे सन्तुष्ट रहैत अछि तथा प्रारब्धवश होमयवाली क्रिया सभ मे जेकरा कर्तापनक अभिमान नहि छैक, एहेन बाहर आ भीतरक त्यागी केँ ‘सर्वारम्भपरित्यागी’ कहल जाइत छैक।
 
पत्नी – बहुत सुन्दर व्याख्या अछि, मुदा बताउ कि अहाँ बाहर आ भीतर सँ सब कर्म सभक त्याग कय देलहुँ? आर कि अहाँक अन्तःकरण मे कोनो सांसारिक संकल्प नहि रहैत अछि? यदि नहि, तऽ फेर अहाँ केँ एतेक अहंकार कियैक होबक चाही? बाहर सँ तऽ अहाँ सब कर्म करिते छी।
 
पण्डितजी – सत्य छैक, ई बात तऽ हमरा मे एकदम्मे नहि घटैत अछि। हम अपन सब त्रुटि केँ बुझि गेलहुँ, सचमुच हम आइ धरि सिर्फ अर्थहि टा करैत छलहुँ। रहस्य सँ अनभिज्ञ छलहुँ। आब किछु-किछु बुझय मे आबि रहल अछि। तैँ, अहाँ अनुमति दी, आब हम बाहर आर भीतर सँ सब किछु त्यागिकय सच्चा संन्यासी बनय लेल जाइत छी।
 
एतेक कहिकय पण्डितजी सब किछु छोड़िकय घर सँ जाय लगलाह……
 
पत्नी – महाराजजी! हम सेहो अहींक अनुगमन करय चाहैत छी।
 
पण्डितजी – हम अपना संग कोनो झंझट केँ नहि राखय चाहैत छी। फेर स्त्री केँ तऽ रखबे कोना करू?
 
पत्नी – नाथ! हमरा अहाँ झंझट नहि बुझू। हम अहाँक साधना मे कोनो विघ्न नहि करब। हम जे अहाँ केँ राजा लग पठेने रही से धनक लेल नहि। धन केँ हम एकटा निमित्त बनेने रही। हमर उद्देश्य तऽ यैह छल जे अहाँ जीवनक मुख्य लक्ष्य केँ प्राप्त कय ली।
 
राजा तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महात्मा पुरुष छथि। अहाँ धर्मज्ञ, सदाचारी, त्यागी, सन्तोषी, विद्वान् तऽ छीहे, तत्त्वज्ञ राजाक संग-प्रभाव सँ अहाँ केँ परमात्माक प्राप्ति सेहो भऽ जायत – यैह लक्ष्य सँ हम अहाँ केँ ओतय पठेने छलहुँ।
 
आब जँ अहाँक आज्ञा हो तऽ हम सेहो अहाँक संग चलय चाहैत छी।
 
पण्डितजी – (कृतज्ञताक संग) हम आब एहि बात केँ बुझि गेलहुँ। सचमुच अहाँ सँ कोनो हानि नहि होयत। अहीं तऽ हमर सच्चा उपकार करयवाली परम सुहृद थिकहुँ। वस्तुतः सच्चा सुहृद वैह थिक जे अपन प्रिय सम्बन्धी केँ परमात्माक प्राप्ति मे सहायता करैत अछि। चलू, अहाँ तऽ ओत्तहु परमात्माक प्राप्ति मे हमरा सहयोगे करब।
 
तदनन्तर ओ दुनू गोटे सब किछु त्यागिकय घर सँ निकैल गेलाह।
 
एम्हर गुप्तचर जखन ओहि दुनूक परस्पर बातचीत सुनलक आ जे घटना देखलक, ओ सबटा राजाक पास जाय केँ जहिना-के-तहिना कहि देलक। राजा अपन राज्य, कोष आदि सबटा तँ पहिनहि अपन पुत्र केँ सम्हार दय देने रहथि, आब गुप्तचरक बात सुनिकय ओहो राज्य छोड़िकय चलि देलनि। ओहि रास्ता मे सम्मुख अबैत ब्राह्मणदम्पती सँ भेटलाह। राजा बड़ा हर्षक संग हुनका सँ कहलनि – ‘पण्डितजी महाराज! आब अहाँ गीताक ओहि श्लोकक रहस्य बुझलहुँ।’
 
पण्डितजी बड़ा नम्रता भरल शब्द मे उत्तर देलखिन – ‘एखन बुझलहुँ हँ नहि, बुझय लेल जा रहल छी।’
 
राजा सेहो हुनकहि संग चलि पड़लाह। तीनू एक एकान्त पवित्र देश मे जाय केँ निवास करय लगलाह। राजा आ ब्राह्मणपत्नी तऽ तत्त्वज्ञानी जीवन्मुक्त महात्मा छलाहे। हुनका लोकनिक संगतक प्रभाव सँ पण्डितजी सेहो परमात्मा केँ प्राप्त भऽ गेलाह।
 
(ई कथा गीताक बारहम अध्यायक सोलहम श्लोकक निवृत्तिपरक अर्थ कय केँ बतायल गेल अछि। एकर जे प्रवृत्तिपरक अर्थ होइत अछि, ओ एहि सँ भिन्न अछि।)
 
हरिः हरः!!