व्याकरण सिर्फ भाषाक शुद्धता नहि जीवनक शुद्धता सेहो निर्धारित करैत अछिः मननीय बात

शुद्धताक पाठ सीखब परमावश्यक
 
किछु दिन पहिने परमादरणीय गुरुजीक मुख सँ किछु विशिष्ट बात सब सुनबाक अवसर भेटल छल। ओ कहि रहल छलाह जे शुद्धता आ स्वच्छताक पारस्परिक सम्बन्ध मनुष्यक रहन-सहन, स्वास्थ्य, जीवनशैली, जीवनचर्या आदि केँ उचित ढंग सँ मार्गनिर्देशन करैत छैक। एहि क्रम मे संस्कृत व्याकरण आ तेकर सूत्र सँ कठिन-सँ-कठिन इलाज केर बात सेहो ओ कहलनि। कनेक आश्चर्य लागल हमरा, विस्मित भेलहुँ जे व्याकरण, तेकर सूत्र आ ताहि सँ मनुष्यक रोगक इलाज? गुरुदेव कहलखिन जे शरीर पर केहनो जहर केर प्रभाव कियैक नहि भेल हो, व्याकरणक सूत्र सँ ओकर प्रभाव केँ निष्प्रभावी बनायल जा सकैत अछि। आब चूँकि हुनकर एहेन कतेको बेर चमत्कार हम स्वयं देखने आ भोगने रही, तैँ एहि सँ आगू किछु पूछबाक हिम्मत नहि भेल मुदा एहि दिशा मे निज अनुसंधान आगू बढेबाक लेल आत्मबल बढेलहुँ आ दृढनिश्चय कयलहुँ जे आखिर ई वर्ण-विचार, शब्द-विचार आ वाक्य-विचार केर गूढ शास्त्र ‘व्याकरण’ केर प्रभाव मनुष्यक जीवनशैली पर केना होइत अछि ई शोध करब।
 
अहाँ सेहो आश्चर्य नहि करब जे व्याकरण सँ सिर्फ शुद्ध-शुद्ध बाजब आ लिखब टा नहि बल्कि जीवन केँ सुसंगठित करबाक प्रेरणा सेहो भेटैत छैक। हमर व्यवहारिक शोध ई देखेलक जे जतेक अशुद्धताक पाछू पड़ब, रोगी बनब। यथा, प्याज-लहसूनयुक्त भोजन अशुद्ध मानल जाइत छैक। आब जँ अहाँ प्याज-लहसूनयुक्त भोजन करब तँ ओकर गन्ध मुंह, नाक आ माथ मे पैसबे टा करत। पेट मे, साँस मे, आन्तरिक पाचन ओ अन्य रासायनिक क्रियाक परिणामस्वरूप उत्सर्जी पदार्थ सँ लैत भोजनक असल ऊर्जा-तत्त्व यानि रक्त-कण धरि मे एकर गन्धक प्रभाव केँ अहाँ स्वयं अनुभव कय सकैत छी। धीरे-धीरे एहि दुर्गन्धक गन्ध सुगन्ध मे परिणति पाबि जाइत अछि, ई हमर-अहाँक विषय-अनुराग (आदति) केर आ नित्य व्यवहारक कारण होएत अछि, यथार्थतः ओ अपन असल गुण-धर्म यानि दुर्गन्धयुक्त रहिते अछि जेकर प्रभाव यथावत् – नित्य हमर अहाँक मनोमस्तिष्क आ स्वाँस प्रक्रिया यानि प्राण-तत्त्व तक केँ प्रभावित करैत अछि। आर एहि तरहें विचार, बात, वात, रक्त, क्रिया सब किछु ओ अपना ढंग सँ संचालित करैत अछि। ई सिर्फ एकटा उदाहरण देलहुँ, एहेन अशुद्ध बात-विचार-आहार अनेकों अछि हमरा-अहाँक जीवन मे। व्याकरणक सिद्धान्त मुताबिक एकरा शुद्ध करब, शुद्ध राखब, नियमित राखब अनिवार्य होयबाक कारण उचित कर्म उचित समय पर उचित नियम अनुरूप कयला सँ मनुष्य कदापि रोगयुक्त नहि होयत। ओकर विचार अपवित्र नहि हेतैक। ओकरा द्वारा कयल गेल कोनो क्रियाकलाप वा राखल गेल विचार अथवा बाजल गेल वाणी कदापि अशुद्ध नहि भऽ सकतैक। आर, यैह जीवनक यथार्थ अभीष्ट थिकैक।
 
व्याकरणक महत्व केँ उजागर करैत एकटा श्लोक भेटैत अछि – देखू एकर सुन्दरता आ विशिष्ट प्रभावः
 
यद्यपि बहु नाधीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम्।
स्वजनो श्वजनो माऽभूत्सकलं शकलं सकृत्शकृत्॥
 
पुत्र! जँ तुँ बहुत विद्वान नहि बनि पबैत छँ तैयो व्याकरण (अवश्य) पढ़े ताकि ‘स्वजन’ ‘श्वजन’ (कुत्ता) नहि बनथि और ‘सकल’ (सम्पूर्ण) ‘शकल’ (टूटि गेल) नहि बनय तथा ‘सकृत्’ (कोनो समय) ‘शकृत्’ (गोबरक गोइठाक घूर) नहि बनि जाय।
 
स्पष्ट छैक, शुद्धता-अशुद्धताक विचार सब ठाम करय पड़ैत छैक।
 
कनी दिन पूर्व एकटा कथा रखने रही, एक्के परिवार लेल भगवान् विष्णु ३ बेर अवतार लेलनि। पहिल हिरण्याक्ष, फेर हिरण्यकशिपु-प्रह्लाद आर पुनः राजा बलि सँ दान-ग्रहण करैत देवता लोकनिक स्थान सुरक्षित रखबाक लेल, शाश्वत सृष्टि केँ नियमित रखबाक लेल। एहि मे पहिल अवतार ‘वराह’ केर रूप मे भगवान् विष्णु लेलनि। से कियैक? से एहि लेल जे ओ महादैत्य (दानव कुलक राजा) हिरण्याक्ष केर ब्रह्माजी सँ वर-प्राप्ति उपरान्त अपन सबलताक दुरुपयोग करैत देवतादिक भोग सँ वंचित करबाक लेल यत्र-तत्र-सर्वत्र कूड़ा-करकट आ गंदगी पसारबाक काज अपनो करय आ अपन प्रजा सँ सेहो करबाबय। कहल जाइत छैक जे अशुद्धि जतय होयत, देवता कथमपि ओहि ठाम नहि औता आर कोनो हविष्य ग्रहण नहि करता। बस, हिरण्याक्ष केर अभिलाषा एकक्षत्र राज करबाक रहैक आर ओ कठोर तपस्या सँ जखन सब तरहक बल, राज आदि हासिल कय लेलक तऽ अपन गुरुजीक निर्देशन मुताबिक सौंसे गंदगी पसारय लागल। अशुद्धताक सहारा लैत ओ समस्त यज्ञ आ यज्ञ मे अर्पित हविष्य तक केँ अशुद्ध कय देवतादि केँ भोग सँ वंचित करैत हाहाकार मचा देलक। देवता केँ भोग नहि भेटला सँ त्राहिमाम् मचि गेल। सृष्टिक नियम टूटय लागल। सब कियो भगवान् सँ एहेन दुरूह समय रक्षामि-रक्षामि करैत सहयोग मंगलनि। तखन गंदगी साफ करबाक नियति सँ भगवान् विष्णु वराहरूप मे धराधाम एलाह आ समस्त संसार मे पसरल गंदगी केँ साफ कयलनि। हिरण्याक्ष केर वध कय देवता, ब्राह्मण, वेद आदिक रक्षा कयलनि।
 
आइ भारतदेशक उदाहरण लेल जाउ। कतेको सैकड़ों वर्ष सँ भारतदेश गुलामीक जंजीर मे बान्हल रहल अछि। कहियो यवन शासन, कहियो ब्रिटिश शासन, कहियो आन्तरिक उपद्रव, कहियो वर्चस्ववादक संघर्ष मे फँसल… अहाँ लगभग २५०० वर्षक इतिहास मे देखब तऽ यैह भेटत जे कोनो न कोनो तरहें भारत उद्वेलित रहल अछि। एतय प्रजा शान्ति आ सुखक दर्शन संभवतः अल्प-अल्प मात्र कयलनि अछि। भारत स्वतंत्रता प्राप्तिक बादहु अनेकों तरहक उपद्रवी सिद्धान्त आ नियम मे अन्तर्द्वंद्व झेलिते आबि रहल अछि। सिस्टम पूरा कोरप्ट – यानि – सब तंत्र पूरे भ्रष्टाचारिता मे आकंठ डूबल देखाइत अछि। मुदा हजारों वर्षक एहि द्वंद्वक समय मे बेर-बेर एहेन लोक सेहो होइत रहला अछि जे शुद्धताक नियम पर देश केँ स्वस्थ बनेबाक नीति अवलम्बन करैत छथि। एखनहुँ नरेन्द्र मोदी स्वच्छ भारत अभियान चलौलनि अछि। महात्मा गाँधीक अनुयायी बनिकय ओ ई काज करबाक दाबी कयलनि अछि। कहबाक तात्पर्य जे शुद्धता स्वास्थ्यक मूल आधारविन्दु थिक जेकर अनुशंसा बहुत पहिनहि सँ वेदविद् करैत आयल छथि। मुदा तेकरा छुआछुत आ ब्राह्मणवाद आदिक जामा पहिराकय आपस मे भिड़न्त करेबाक काज सेहो एतहि होइत देखिते रहैत छी। निष्कर्षतः अहाँ अपन निजी स्वास्थ्यक रक्षा लेल शुद्धताक पाठ कथमपि नहि बिसरू, बस। हमर ई बात जँ बुझि गेल होय, नीक लागय तऽ आरो लोक धरि जरूर पहुँचा देबैक। ॐ तत्सत्!
 
हरिः हरः!!