शिव कृपा केर अद्भुत सत्य कथा – ईश्वर सत्ता आ चमत्कारक अनुपम दृष्टान्त

स्वाध्याय आलेखः कृपानुभूति

‘स्वप्न मे देलनि महादेव किछु आदेश – जे साकार भेल’

– चन्द्रकला शर्मा
 
अनुवादः प्रवीण नारायण चौधरी
 
एहि घटनाक वृ्त्तान्त तऽ लगभग ४० वर्ष पहिनहि सँ आरम्भ भऽ जाइत अछि, जखन हमर समधी श्रीगोकुलचन्द शर्मा परिवारसहित हरिद्वार दर्शन लेल गेल छलाह। जाहि दिन हुनका नीलकण्ठ महादेवक दर्शन करय जेबाक छलन्हि, ताहि दिन भोरे जागय सँ पहिने हुनका सपना एलनि जे ओ दर्शन करय जा रहला अछि, रास्ता मे हुनका आगू-आगू तीन टा साधु चलल जा रहल अछि। कनी दूर आगू जाय ओहि मे सँ दुइ साधु क्रमशः दायाँ आ बायाँ दिशा केँ मुड़ैत अदृश्य भऽ जाइत अछि, मुदा तेसर साधु हुनका सोझाँ आबिकय ठाढ भऽ जाइत अछि आर कहैत अछि, “तूँ हमरा पाछाँ-पाछाँ कियैक चलैत आबि रहल छँ?”
 
शर्माजी कहलखिन – ओहिना महाराज! चरणधुलि भेटि जाय, एहि इच्छा सँ।
 
साधु कहला – “अच्छा! तखन एक काज कर।” फेर ओ कहलखिन जे – “आदेश करू महाराज”। तखन एकाएक ओ साधु चन्द्रमौलि, त्रिशूल-डमरू धारण कयने भगवान् शिवशंकर केर स्वरूप मे परिणत भऽ गेलाह आर बजलाह – “दीर्घकाल सँ हमर मन्दिरक छत नहि अछि। तूँ ओकरा पर छत बनबा दे।” एकरा बाद सपना टूटि गेलनि, लेकिन ओ स्वरूप हुनकर आँखि मे तथा ओ शब्द हुनकर कान मे ओहिना देखाय-सुनाय दैत रहलनि।
 
तखन अपन कारोबारक व्यस्तताक रहितो ओ ताहि मन्दिरक खोज मे लागल रहलाह। आठ वर्ष धरि ओ एहि सोच-विचार आर छानबीन मे लागल रहलाह, मुदा हुनका ओहेन मन्दिर कतहु नहि भेट रहल छलन्हि, जेकर छत नहि हो। उपास्यक आदेश केँ सेहो नकारल नहि जा सकैत छल। परेशान भऽ ओ प्रार्थना केलनि – “प्रभो! आदेश देलहुँ अछि तऽ मार्ग-दर्शन सेहो करू।” तखन एक विचित्र संयोग बनल, जाहि मे बीकानेरक्षेत्र (राजस्थान) मे रेलवे लाइनक नजदीक गंगाशहर रोडपर ओ मन्दिर दर्शायल गेलनि। तखन बीकानेर मे ओहि स्थानपर जाय केँ ओ देखलनि – ‘गोपेश्वर महादेव’ केर मन्दिर, ओहि प्राचीन मन्दिरक विशाल परिसर मे अन्य कोठली, बरामदा आदि तऽ छलय, मुदा जाहि स्थानपर शिवजी स्वयं शिवलिंगक रूप मे विराजमान छलाह, ओकर छत नहि छल। मात्र छोट-छोट चहरदिवारी टा छल। कतेको वर्ष सँ ओतय खुल्ले मे विधिवत् पूजा-अर्चना होइत चलि आबि रहल छल।
 
तखन ओ मन्दिरक कमिटीक मुखिया लोकक सोझाँ अपन उद्देश्य रखलनि, मुदा ओ सब हुनका सँ सहमत नहि भेल; कियैक तँ चिरकाल सँ ओतुका लोक मे ई धारणा छल कि जे कियो एहि मन्दिरक छत बनबाबैत अछि, ओ नष्ट भऽ जाइत अछि या फेर छत खैस पड़ैत छैक। जाहि कारण राजस्थानक राजा-महाराजा सेहो छत बनबेबाक साहस नहि कय सकलाह। तैँ एहि विचारधाराक अड़चन सँ हुनकर बहुत प्रयत्न केलोपर छत बनेबाक आज्ञा नहि भेटलनि।
 
अन्त मे शर्माजी श्रीगंगानगर (राजस्थान) गेला ओतय अपन मित्र श्रीराधेश्यामजी सँ भेटला, जे ओहि समय तत्कालीन सरकार मे विधायक छलाह, तखन श्रीराधेश्यामजी मन्दिरक ट्रस्ट केँ भरोस दियौलनि जे ई कोनो करोड़पति व्यक्ति नहि छथि आर नहिये एहि मे हिनकर कोनो स्वार्थ छन्हि, एना होइतय तऽ ई एतेक दूर अनभिज्ञ स्थानक बजाय अपन प्रान्त हरियाणा अथवा निवास चरखी दादरीये मे कियैक नहि मन्दिर बनबा लितैथ? हिनका भगवान् शिव केर आदेश पालन करबाक आज्ञा प्रदान कय देबाक चाही, तखन ओतय उपस्थित स्थानीय सज्जन श्रीपुरोहितजी सेहो हुनकर अनुमोदन कयलनि। तत्पश्चात् शर्माजी मन्दिरक हानि-लाभक दायित्व अपना ऊपर लैत छत बनबेबाक अनुमति प्राप्त कय लेलनि।
 
तदुपरान्त मन्दिरपर अति भव्य गगनचुम्बी गुम्बद बनिकय शोभायमान भऽ गेल। गुम्बद (छत) – निर्माणक सम्पन्नताक उपलक्ष्य मे १९८३ ई. केर जुलाई मास (श्रावणमास) मे उद्घाटन होयबाक छलय, ओहि सँ पहिल रात्रि केँ बीकानेर मे प्रचण्ड तूफान आबि गेल। तूफानक भयंकरता केँ देखैत रातिक अन्हार मे लोक काँपि रहल छल जे कहीं ई तूफानक कारण एहि मन्दिरक छत बनबेनाय त नहि? किछु लोक शर्माजी पर मिश्रित प्रतिक्रिया उल्हन-उपराग दय रहल छलाह; कियैक तँ ओ हुनका लोकनिक मान्यताक विरुद्ध कार्य कएने छलाह। जे किछु हो, छत ढहि जेबाक प्रबल आशंका छल। बवण्डर रुकल, दिन निकलल, लोक सब बाहर निकैलकय देखलक – दोकानक छत उड़ि गेल छलैक, गाछ उखैड़कय खैस पड़ल छलैक, मुदा महादेवक मन्दिरक मनोहर गुम्बद सोनारूपा कलशक मुकुट पहिरने मानू कहि रहल छलय – “हम नहि खसलहुँ अछि, ओ प्रलयंकार शिव तऽ रातिखन हमरा पर अपन स्वीकृतिक मोहर लगबय आयल छलाह।”
 
एहि समारोह मे शर्माजीक निकट सम्बन्धी लोकनि मे हम सेहो सम्मिलित रही। हम सबटा अपन आँखि सँ देखलहुँ, सब सँ विचित्र दृश्य तऽ ई छल जे ओहि सँ पैछला दिन जे गुम्बदपर अन्तिम चित्रकारी कय केँ जे कारीगर मुनहाइर साँझखन उतरल छलय, ओ एकटा खाली बाल्टी आ रंगक कूची ऊपरे छोड़ि आयल छलय, ओहो तक नहि खसल, जहिनाक तहिना पड़ल छलय।
 
ईश्वरक सत्ताक पार के पाबि सकल अछि? ओ कखन, केकरा सँ, कियैक आ कि करबाबैत छथि, ई ईश्वर टा जनैत छथि।
 
हरिः हरः!!