दिनक आरम्भ आ पुस्तक संग दोस्ती – स्वाध्यायक परम्परा

शुभ दिनक शुरुआत शुभ कार्य सँ…
 
नित्य भोरे उठि करदर्शन, आत्मदर्शन, ईश्वरदर्शन, पृथ्वी-प्रणाम, तुलसी-दर्शन, सूर्य-दर्शन, प्रकृति-दर्शन आ वायू-पान, जल-पान, नित्यकर्म आदि संपन्न कय अहाँ सदैव स्वाध्याय करू। पुस्तक सब सँ पैघ मित्र होएत छैक, कियैक? कियैक तँ पुस्तक मे सदिखन एक सँ बढिकय एक ज्ञानक बात भेटैत छैक। जहिना एकटा नीक मित्र सदिखन नीक रस्ता देखबैत अछि तहिना कोनो विषय पर लिखल पोथी, वा कोनो लेख सामग्री चाहे कतहु उपलब्ध हो, ताहि सब केँ ध्यानपूर्वक पढू आ मनन करू। स्वाध्याय केर एक अन्य रूप ईहो छैक जे आत्मा, अपन भीतर निहित मूल-तत्त्व जे अहाँक सनातन स्वरूप थिक तेकरा संग परमात्मा तत्त्व पर विमर्श केनाय, ई काज प्रारंभिक ज्ञान भेट गेलाक बाद आत्मदर्शन करबाक क्रम मे गंभीर चिन्तक-विचारक सब लेल मात्र संभव अछि, ई अपन अनुभव कहि रहल छी। अहाँ अपनहि आप केर मूल तत्त्व ‘आत्मा’ सँ बहुत काल शिष्यत्व ग्रहण कय नहि बिता सकैत छी, कारण ई मोन आ बुद्धि अपन कार्यक्षेत्र मे ततेक बेसी रमण-भ्रमण करय लगैत अछि जे एकरा सांसारिकता मे बड़ा बदतर ढंग सँ बझेने रहैत छैक। हमरा स्नेह देनिहार एक आध्यात्मिक गुरुदेव बड नीक सँ आत्माक संग सनातन सब दिन चलयवला १७ मित्रक कथा कहैत रहैत छथि, आर हमहुँ अपने सब केँ ई आख्यान सुनबैत रहैत छी। ये मन बड़ा चंचल है….. ई थिर भऽ गेल त बहुत रास उपलब्धि ओहिना भेटि सकैत अछि अपना सब केँ।
 
त बात कय रहल छलहुँ स्वाध्यायक – ताहि पर फेर केन्द्रित होइ। कोनो पोथी उठाउ आ अध्ययन-मनन चालू करू। ई बात विशेष रूप सँ हम कामकाजी महिला आ पुरुष लेल कय रहलहुँ अछि, विद्यार्थीवर्ग लेल कोर्स (पाठ्यक्रम) निर्धारित अछि तेकरे सब किछु बुझू। आत्मा-परमात्मा केर मीमांसा आ विवेचना लेल अहाँक समय बाद मे आओत। ओना, विद्यार्थी मे सेहो जँ ध्रुव या प्रह्लाद बनि सकब, अयाचीपुत्र शंकर बनि सकब, विद्यापति समान बालक बनि सकब, एक सँ बढिकय एक महापुरुष जिनकर बाल्यकाल सेहो सूर्य समान जाज्ज्वल्यमान बनब तखन आत्मा-परमात्मा पर अधिकार बहुत बच्चहि सँ होयब स्वाभाविक छैक। स्वाध्याय आ नीक-नीक पुस्तक संग मित्रता अहाँ कोनो उमेर मे कय सकैत छी। ध्यान ई राखू जे कोनो सामग्री पढयकाल मे बुझबाक काज मस्तिष्क कय रहल अछि। बिना बुझने मनन कार्य नहि कय सकब, ताहि हेतु बुझनाय बड जरूरी छैक। यैह द्वारे कहल गेल छैक जे बिना गुरू ज्ञान संभव नहि। गुरू रहता त मार्गदर्शन कय देता। नहि बुझयवला पाँतिक अर्थ सेहो बुझा देता। प्रारम्भिक पढाई मे व्याकरण सिखबैत अछि, शब्दार्थ सिखबैत अछि, वाक्य संरचना केर अभ्यास करबैत अछि आर क्रमशः बड़का-बड़का लेख-आलेख आ वर्णनात्मक अभिलेख, प्रतिवेदन आदि तैयार करबाबैत अछि। यैह त पाठ्य पुस्तक सभ मे भेटैत अछि। भाषा एक सँ अनेक पढबैत अछि, ऐच्छिक, अनिवार्य आ प्रतिष्ठाक रूप मे आरो विशिष्टता ग्रहण करय लेल सीख दैत अछि। तहिना, स्वाध्याय लेल अ-आ सँ अलंकार धरिक बात क्रमिक रूप मे बुझब तखनहि मनन कय सकब। मनन कयला उत्तर अन्तर्दृष्टि भेटत। अन्तर्दृष्टि सँ दूर-दूर धरिक अदृश्य चीज केँ बड़ा नजदीक सँ अहाँ सेकेन्ड (क्षणहि) मे देखय लागब।
 
आब आजुक एकटा उदाहरण दैत लेख केँ समेटय चाहब – आइ “मैथिल प्रवाहिका” नामक पोथी हमरा हाथ लागल यैह स्वाध्याय लेल। विषय-सूची मे तकलहुँ अपन रुचिक लेख। पृष्ठ २३ पर भेट गेल “विश्व वाङ्गमय में वेद की उपादेयता और गौरवशाली मिथिला का महत्व”। आह! एतेक बेहतरीन लेख लिखने छथि “अमीरी नाथ झा अमर” जेकरा लेल धन्यवाद करब से शब्द नहि भेटैछ। अत्यन्त रोचक शैली मे वेद आ एकर समस्त अंग सभक शिक्षा देलनि अछि। आर वेद तथा वर्तमान युग केर बीच एहेन सुन्दर तादात्म्य स्थापित करैत पूर्वोक्त वेद-वर्णित श्लोक सहित ई सिद्ध कयलनि अछि जे न्युटन द्वारा खोजल गेल गुरुत्वाकर्षणक सिद्धान्त हो आ कि गैलीलियो केर दुरबीन हो, आजुक अणु-परमाणुक इलेक्ट्रान-प्रोटोन-न्युट्रान हो कि पाइथागोरस प्रमेय कि दाशमिक प्रणाली – एहि सब केँ क्रमशः ऋषि कणाद, तुरिय यंत्र, कणादक द्विअणु-त्रिअणु सिद्धान्त, ऋषि भाष्कराचार्यक त्रिभुजक क्षेत्रफल निकालबाक सूत्र, हिन्दसा अंक पद्धति…. एहि सभक आरम्भ मानव सभ्यताक प्राचीनतम सनातन संविधान वेद सँ होएत देखौलनि अछि। ईहो सिद्ध कयलनि अछि जे कोना वेद केँ अपनहि लोक (हिन्दू धर्मावलम्बी) मे बदनाम करय लेल आर्य केँ बाहरी आक्रमणकारीक सूची मे डालबाक कूकाज ९ अप्रैल १८६६ ई. केँ रोयल एसियाटिक सोसाइटी लंदन मे प्रस्ताव पारित कय केँ कयल गेल आर एकर प्रचार करबाक लेल कोना-कोना अन्य संस्था सब केँ भार देल गेल ताहि सब बातक जिकिर कयलनि अछि। असल मे आर्य तऽ मिथिलाक हिमालय वन (वर्तमान नेपालक मिथिला आ पहाड़ी प्रदेश) मे तपस्यारत छलाह जे ईश्वरीय वेद वाणी केँ श्रवण कय हृदयंगम करैत नदीक कीनार अपन कुटिया बनाकय वैदिक साहित्य केर रचना कार्य मे संलग्न भऽ एकर प्रसार करैत गेलाह। एकर प्रमाण अछि आर्य शब्दक प्रयोग ऋक् आर यजुर्वेद मे विशिष्ट व्यक्तिक रूप मे मात्र ३६ बेर प्रयोग भेल अछि तथा रामायण व महाभारत मे सेहो विशिष्ट आर आदरणीय व्यक्तिक रूप मे एहि शब्दक प्रयोग कयल गेल अछि। ताहि समय मिथिला भूभाग ब्रह्मपुरी, तपोभूमि, स्वर्णकानन, विदेह आदि नाम सँ विख्यात छल। ई सब नाम आर्य ऋषि लोकनिक कारण पड़ल छल। ऋग्वेद केर द्रष्टा ऋषि गौतम विदेह राज्यक राज पुरोहित छलाह। एहि तरहक बहुत रास महत्वपूर्ण ज्ञानक बात भेटल आजुक लेख मे। अतः मिथिलाक अध्ययनशील युवा समाज केँ अपन मूल वृत्ति मे कोनो दिनक आरम्भ करय लेल स्वाध्याय एक सर्वोत्तम साधन थिक ई नहि बिसरल जाय।
 
हरिः हरः!!